यूपी किराया नियंत्रण अधिनियम के तहत सुरक्षा का दावा करने वाले किरायेदार को कानून की प्रयोज्यता साबित करनी होगी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Shahadat

18 May 2026 7:47 PM IST

  • यूपी किराया नियंत्रण अधिनियम के तहत सुरक्षा का दावा करने वाले किरायेदार को कानून की प्रयोज्यता साबित करनी होगी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि किसी किरायेदार को उत्तर प्रदेश शहरी भवन (किरायेदारी, किराया और बेदखली का विनियमन) अधिनियम, 1972 के प्रावधानों के तहत सुरक्षा पाने के लिए, उसे इस कानून की प्रयोज्यता (लागू होने) को साबित करना होगा।

    जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने फैसला सुनाया,

    “जहां कोई किरायेदार यूपी अधिनियम संख्या 13, 1972 के प्रावधानों के तहत सुरक्षा चाहता है तो यह साबित करने का बोझ उस पक्ष पर होता है, जो अधिनियम की प्रयोज्यता का दावा कर रहा है। उसे उन बुनियादी तथ्यों को स्थापित करना होगा, जो ऐसी सुरक्षा को आकर्षित करते हैं, जिसमें निर्माण पूरा होने की तारीख भी शामिल है, खासकर तब जब धारा 2(2) के तहत छूट का मुद्दा विचाराधीन हो।”

    उत्तर प्रदेश शहरी भवन (किरायेदारी, किराया और बेदखली का विनियमन) अधिनियम, 1972 की धारा 2 उन परिस्थितियों को बताती है, जिनके तहत यह अधिनियम लागू नहीं होता है। धारा 2(2) में यह प्रावधान है कि निर्माण पूरा होने की तारीख से 10 साल की अवधि तक यह अधिनियम लागू नहीं होगा।

    धारा 2(2) की व्याख्या (a) में यह कहा गया:

    “किसी भवन का निर्माण उस तारीख को पूरा माना जाएगा जिस तारीख को उसके पूरा होने की सूचना संबंधित क्षेत्राधिकार वाले स्थानीय प्राधिकरण को दी जाती है या उसके द्वारा दर्ज की जाती है। ऐसे भवन के मामले में जिसका मूल्यांकन (Assessment) होना है, उस तारीख को जब उसका पहला मूल्यांकन प्रभावी होता है। यदि ये तारीखें अलग-अलग हैं तो इनमें से जो तारीख सबसे पहले आती है, उसे ही माना जाएगा। यदि ऐसी कोई रिपोर्ट, रिकॉर्ड या मूल्यांकन उपलब्ध नहीं है तो उस तारीख को माना जाएगा, जिस तारीख को उस भवन में पहली बार वास्तव में कोई व्यक्ति रहने के लिए प्रवेश करता है (इसमें केवल निर्माण की देखरेख करने या निर्माणाधीन भवन की रखवाली करने के उद्देश्य से किया गया प्रवेश शामिल नहीं है)।”

    मकान मालिक-प्रतिवादी ने लघु वाद न्यायालय (Small Causes Court) में किरायेदार की बेदखली के लिए एक मुकदमा दायर किया। इसका आधार यह था कि किरायेदार-याचिकाकर्ता ने किराया चुकाने में चूक की थी। इस मुकदमे का फैसला मकान मालिक के पक्ष में सुनाया गया। साथ ही यह माना गया कि यह अधिनियम दोनों पक्षों के इस मामले पर लागू नहीं होता। इस फैसले के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका (Revision) को भी खारिज कर दिया गया। इसके बाद किरायेदार ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    किरायेदार ने यह दलील दी कि इस मामले में 1972 का अधिनियम लागू होता है, क्योंकि अधिनियम की धारा 2(2) की व्याख्या (a) के अनुसार आवश्यक तारीखें उपलब्ध नहीं थीं। यह दलील दी गई कि यह अधिनियम लागू होता है, क्योंकि इमारत का निर्माण 1991 में हुआ था; जबकि मकान मालिक ने दावा किया कि दुकान का निर्माण 1988 में हुआ था और किरायेदारी 1987 में शुरू हुई थी।

    अदालत ने यह माना कि अधिनियम की प्रयोज्यता को दर्शाने के लिए ठोस सबूत होने चाहिए। ठोस सबूतों के अभाव में अदालत ने यह फैसला दिया कि इमारत/दुकान के निर्माण की तारीख का निर्धारण केवल किरायेदार द्वारा किए गए कोरे दावों के आधार पर नहीं किया जा सकता।

    “यह बात भी उतनी ही अच्छी तरह से स्थापित है कि यूपी अधिनियम संख्या 13, 1972 की प्रयोज्यता से संबंधित प्रश्न—जहाँ यह निर्माण कार्य पूरा होने की तारीख पर निर्भर करता है—का निर्धारण, अधिनियम की धारा 2(2) के दूसरे परंतुक के स्पष्टीकरण I में निहित 'मानक प्रावधानों' (Deeming Provisions) के अनुसार ही सख्ती से किया जाना चाहिए।”

    तदनुसार, अदालत ने किरायेदार को निर्देश दिया कि वह फरवरी 2027 तक संपत्ति का कब्ज़ा मकान मालिक को सौंप दे, और जब तक कब्ज़ा नहीं सौंप दिया जाता, तब तक किराया देना जारी रखे।

    Case Title: Mohammad Zaki Khan v. Gopal Krishna Gangal 2026 LiveLaw (AB) 283

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