BNSS और NDPS मामलों में संज्ञान से पहले आरोपी की सुनवाई जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

21 May 2026 1:05 PM IST

  • BNSS और NDPS मामलों में संज्ञान से पहले आरोपी की सुनवाई जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) लागू होने के बाद NDPS Act के तहत दायर शिकायतों में विशेष अदालत आरोपी को सुने बिना संज्ञान नहीं ले सकती।

    जस्टिस बृजराज सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए लखनऊ स्थित NDPS विशेष अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी को सुनवाई का अवसर दिए बिना संज्ञान लिया गया था।

    मामले में आरोपी की ओर से दलील दी गई कि 1 जुलाई 2024 से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू होने के बाद धारा 223(1) के पहले प्रावधान के तहत अदालत के लिए यह अनिवार्य हो गया कि शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर दिया जाए।

    अदालत को बताया गया कि नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने 14 जुलाई 2025 को शिकायत दायर की थी, यानी उस समय BNSS की धारा 223 प्रभावी थी। ऐसे में विशेष अदालत पर कानूनी रूप से यह दायित्व था कि वह आरोपी को सुनवाई का अवसर देती।

    आरोपी की ओर से यह भी कहा गया कि NDPS Act की धारा 36ए(1)(डी) और धनशोधन निवारण कानून की धारा 44(1)(बी) समान प्रकृति की हैं। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के “कुशल कुमार अग्रवाल बनाम प्रवर्तन निदेशालय” फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया कि 1 जुलाई 2024 के बाद दर्ज शिकायतों पर BNSS के अध्याय 16 की धाराएं लागू होंगी।

    वहीं नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) की ओर से तर्क दिया गया कि जिस दिन संज्ञान आदेश पारित हुआ, उसी दिन आरोपी को रिमांड पर भेजा गया था और विशेष जज ने आदेश में लिखा था कि शिकायत और उससे जुड़े दस्तावेजों का अवलोकन किया गया।

    एजेंसी ने यह भी कहा कि बाद में आरोप तय हो चुके थे और आरोपी ने समय रहते संज्ञान आदेश को चुनौती नहीं दी।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि आरोपी को संज्ञान से पहले सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया।

    हाईकोर्ट ने कहा,

    “आरोपी को आपत्ति दाखिल करने का अवसर दिया जा सकता था और उसके बाद कारणयुक्त आदेश पारित किया जाना चाहिए था। लेकिन विवादित आदेश में ऐसी किसी प्रक्रिया का उल्लेख नहीं है, इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि BNSS की धारा 223(1) का पालन किया गया।”

    अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के अलावा पटना हाईकोर्ट और कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसलों का भी उल्लेख किया और कहा कि इस मामले में कानून की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट है।

    इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ पारित संज्ञान आदेश रद्द कर दिया। साथ ही आरोपी को 29 मई को विशेष अदालत के समक्ष उपस्थित होकर अपनी आपत्तियां दाखिल करने का निर्देश दिया गया।

    अदालत ने कहा कि विशेष जज दोनों पक्षों को सुनने के बाद कानून के अनुसार नया आदेश पारित करेंगे।

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