सुप्रीम कोर्ट

BNSS S.223(1) का परंतुक अनिवार्य, आरोपी को सुने बिना संज्ञान लेना शुरू से ही अमान्य: सुप्रीम कोर्ट
BNSS S.223(1) का परंतुक अनिवार्य, आरोपी को सुने बिना संज्ञान लेना शुरू से ही अमान्य: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 223(1) का पहला परंतुक—जो किसी शिकायत मामले में संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य बनाता है—अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से उत्पन्न होने वाला एक मूल सुरक्षा उपाय है। इसका पालन न करने पर संज्ञान लेने का आदेश शुरू से ही अमान्य हो जाएगा।कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि आरोपी को ऐसे पालन न होने से हुए नुकसान को साबित करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह दोष एक ऐसी अवैधता है जो पूरी...

क्राइम सीन का री-एक्टमेंट हर स्थिति में खुद के खिलाफ गवाही देने के अधिकार का उल्लंघन नहीं करेगा: सुप्रीम कोर्ट
क्राइम सीन का री-एक्टमेंट हर स्थिति में 'खुद के खिलाफ गवाही देने के अधिकार' का उल्लंघन नहीं करेगा: सुप्रीम कोर्ट

यह देखते हुए कि जघन्य अपराधों की जांच में 'अपराध स्थल के री-एक्टमेंट' की तकनीक को काफी अहमियत मिल रही है, सुप्रीम कोर्ट ने इस तकनीक के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अपराध स्थल के री-एक्टमेंट को सिर्फ इसलिए असंवैधानिक बताकर पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसमें आरोपी भी शामिल होता है।कोर्ट ने साफ किया कि अपराध स्थल के री-एक्टमेंट में आरोपी की भागीदारी संविधान के अनुच्छेद 20(3) (खुद के खिलाफ गवाही देने के मौलिक अधिकार) का उल्लंघन तभी मानी जाएगी, जब इसके ज़रिए आरोपी को अपनी...

2 लाख से अधिक डॉग बाइट मामले; सुप्रीम कोर्ट बोला- आवारा कुत्तों की समस्या अब बेहद चिंताजनक
2 लाख से अधिक डॉग बाइट मामले; सुप्रीम कोर्ट बोला- आवारा कुत्तों की समस्या अब बेहद चिंताजनक

देशभर में बढ़ते कुत्तों के हमलों और डॉग बाइट की घटनाओं पर गंभीर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आवारा कुत्तों की समस्या अब “अत्यंत चिंताजनक” स्तर तक पहुंच चुकी है और यह सीधे तौर पर सार्वजनिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गई है। अदालत ने कहा कि यह घटनाएं अब इक्का-दुक्का नहीं रहीं, बल्कि पूरे देश में लगातार और व्यापक रूप से सामने आ रही हैं, जिनमें गंभीर शारीरिक चोटें, मानसिक आघात और कई मामलों में लोगों की मौत तक हो रही है।जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की...

बैंक बड़ी कंपनियों को भारी लोन देने में लापरवाह, लेकिन आम लोगों को मामूली लोन देने में भी बहुत सख़्त: सुप्रीम कोर्ट
बैंक बड़ी कंपनियों को भारी लोन देने में लापरवाह, लेकिन आम लोगों को मामूली लोन देने में भी बहुत सख़्त: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में टिप्पणी की कि आम तौर पर बैंक बड़ी कंपनियों को भारी रकम लोन के तौर पर देने में बहुत लापरवाह हो गए हैं, लेकिन जब आम लोगों की बात आती है तो वे बहुत ज़्यादा छानबीन करते हैं, जो अक्सर "उत्पीड़न की सीमा तक" पहुंच जाती है।ये टिप्पणियाँ जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने एक ऐसे मामले में कीं, जिसमें याचिकाकर्ता कंपनी भास्कर इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड को भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने बिना यह ठीक से जाँच किए कि लोन चुकाया जा पाएगा या नहीं, 8,90,000 रुपये...

BNSS लागू होने के बाद संज्ञान लिया गया हो तो PMLA शिकायत में आरोपी की सुनवाई पहले होना ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट
BNSS लागू होने के बाद संज्ञान लिया गया हो तो PMLA शिकायत में आरोपी की सुनवाई पहले होना ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट

एक अहम फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई मजिस्ट्रेट, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के लागू होने के बाद मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम, 2002 (PMLA) के तहत किसी कथित अपराध का संज्ञान लेता है तो BNSS की धारा 223(1) के पहले प्रावधान का पालन न करने पर वह संज्ञान रद्द माना जाएगा। इस प्रावधान के तहत संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का मौका देना ज़रूरी है, भले ही शिकायत BNSS के लागू होने से पहले ही दायर की गई हो।जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने...

ज़मीन मालिकों को दूसरे कानूनी फ़ायदे पाने के लिए कानूनी मुआवज़ा छोड़ने पर मजबूर नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
ज़मीन मालिकों को दूसरे कानूनी फ़ायदे पाने के लिए कानूनी मुआवज़ा छोड़ने पर मजबूर नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (20 मई) को फ़ैसला सुनाया कि मुआवज़े के कानूनी अधिकार को नागरिक अधिकारियों द्वारा लगाई गई अनुबंध की शर्तों के ज़रिए छोड़ा नहीं जा सकता। कोर्ट ने साफ़ किया कि एक बार जब कोई कानून किसी व्यक्ति को मुआवज़े का अधिकार दे देता है तो उस अधिकार को सिर्फ़ इसलिए छोड़ा हुआ नहीं माना जा सकता, क्योंकि ज़मीन मालिक ने किसी दूसरे कानूनी फ़ायदे या सुविधा को पाने की शर्त के तौर पर उसे छोड़ने पर सहमति दी थी।जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने बृहन्मुंबई म्युनिसिपल...

समान आरोपों में सह-आरोपी डिस्चार्ज हो चुके हों तो एक आरोपी पर अकेले मुकदमा नहीं चल सकता : सुप्रीम कोर्ट
समान आरोपों में सह-आरोपी डिस्चार्ज हो चुके हों तो एक आरोपी पर अकेले मुकदमा नहीं चल सकता : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि समान परिस्थितियों वाले सह-आरोपियों (Co-Accused) को पहले ही डिस्चार्ज किया जा चुका है, तो केवल एक आरोपी के खिलाफ मुकदमा जारी नहीं रखा जा सकता, खासकर तब जब उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्य अन्य आरोपियों की तुलना में अधिक मजबूत न हों। अदालत ने कहा कि समान आरोपों वाले व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जाना आपराधिक न्यायशास्त्र (Criminal Jurisprudence) का मूल सिद्धांत है।जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ओडिशा के एक Forest Range...

बार-बार अग्रिम ज़मानत याचिकाएं दायर करना प्रक्रिया का दुरुपयोग, इससे मुक़दमेबाज़ी महज़ जुआ बनकर रह जाती है: सुप्रीम कोर्ट
बार-बार अग्रिम ज़मानत याचिकाएं दायर करना प्रक्रिया का दुरुपयोग, इससे मुक़दमेबाज़ी महज़ जुआ बनकर रह जाती है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कम समय के अंतराल पर बार-बार अग्रिम ज़मानत याचिकाएं दायर करने की प्रथा पर नाराज़गी ज़ाहिर की। कोर्ट ने कहा कि अग्रिम ज़मानत का उपाय, जिसका मकसद किसी आरोपी की निजी आज़ादी को पहले से ही सुरक्षित रखना है, उसे महज़ एक जुआ बनाकर नहीं रखा जा सकता।जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच द्वारा पारित आदेश रद्द किया। इस आदेश में प्रतिवादी-आरोपी को उसकी लगातार तीसरी याचिका पर अग्रिम ज़मानत दी गई थी। कोर्ट ने पाया कि पिछली दो अग्रिम...

शैक्षणिक संस्थानों में आवारा कुत्तों को खिलाना है तो डॉग-बाइट की जिम्मेदारी भी लें : सुप्रीम कोर्ट
शैक्षणिक संस्थानों में आवारा कुत्तों को खिलाना है तो डॉग-बाइट की जिम्मेदारी भी लें : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के प्रबंधन से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि शैक्षणिक संस्थानों में पशु कल्याण समूह (Animal Welfare Groups) या छात्र संगठन तभी आवारा कुत्तों को खाना खिला सकते हैं या उनकी देखभाल कर सकते हैं, जब वे परिसर में किसी भी डॉग-बाइट या संबंधित नुकसान की कानूनी जिम्मेदारी लेने का औपचारिक हलफनामा (Affidavit) दें।जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने कहा कि आवारा कुत्तों के अधिकारों और संरक्षण को मानव जीवन एवं...

आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त : सभी हाईकोर्ट्स को निगरानी के निर्देश, लापरवाह अधिकारियों पर अवमानना कार्रवाई की चेतावनी
आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त : सभी हाईकोर्ट्स को निगरानी के निर्देश, लापरवाह अधिकारियों पर अवमानना कार्रवाई की चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को देशभर के सभी हाईकोर्ट्स को निर्देश दिया कि वे आवारा कुत्तों को स्कूलों, अस्पतालों, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और अन्य सार्वजनिक स्थानों से हटाने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुपालन की निगरानी के लिए स्वतः संज्ञान (Suo Motu) रिट याचिकाएं दर्ज करें। अदालत ने चेतावनी दी कि आदेशों का लगातार उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही (Contempt Proceedings) शुरू की जा सकती है।जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने यह...

BREAKING | सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देशों में बदलाव से किया इनकार, कहा- कुत्तों के काटने का खतरा बढ़ रहा है
BREAKING | सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देशों में बदलाव से किया इनकार, कहा- 'कुत्तों के काटने का खतरा बढ़ रहा है'

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अपने पहले के निर्देशों को वापस लेने से इनकार किया। इन निर्देशों में कहा गया कि अस्पतालों, बस स्टैंडों, स्कूलों, रेलवे स्टेशनों जैसी सार्वजनिक जगहों से पकड़े गए आवारा कुत्तों को वैक्सीनेशन/नसबंदी के बाद उसी जगह पर वापस नहीं छोड़ा जाना चाहिए।जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने उन कई अर्जियों को खारिज किया, जिनमें पिछले साल नवंबर में कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों में बदलाव की मांग की गई। दूसरे शब्दों में, सार्वजनिक जगहों के परिसर से...

कुत्तों को संस्थागत परिसरों में रहने का पूर्ण अधिकार नहीं, ABC नियम ऐसे परिसरों में उन्हें छोड़ने को अनिवार्य नहीं बनाते: सुप्रीम कोर्ट
कुत्तों को संस्थागत परिसरों में रहने का पूर्ण अधिकार नहीं, ABC नियम ऐसे परिसरों में उन्हें छोड़ने को अनिवार्य नहीं बनाते: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि स्कूलों, अस्पतालों, खेल परिसरों, हवाई अड्डों, बस स्टैंड और रेलवे स्टेशनों जैसे संस्थागत और प्रतिबंधित-पहुंच वाले परिसरों में पाए जाने वाले आवारा कुत्तों को 'पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023' के तहत "सड़क के कुत्ते" या "सामुदायिक कुत्ते" के रूप में नहीं माना जा सकता। इसलिए वे पकड़े जाने और नसबंदी के बाद उसी स्थान पर वापस छोड़े जाने का दावा नहीं कर सकते।कोर्ट ने कहा कि आवारा कुत्तों के पास सभी श्रेणियों के स्थानों पर रहने का कोई "अखंडनीय या पूर्ण अधिकार" नहीं है, चाहे उन...

UAPA मामलों में बेल नियम, जेल अपवाद: सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद को बेल से इनकार करने वाले फैसले पर जताई आपत्ति
UAPA मामलों में 'बेल नियम, जेल अपवाद': सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद को बेल से इनकार करने वाले फैसले पर जताई आपत्ति

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के मामलों में भी “बेल नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत लागू होता है। अदालत ने जनवरी 2026 में दिए गए उस फैसले पर गंभीर आपत्ति जताई, जिसमें दिल्ली दंगा बड़ी साजिश मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को बेल देने से इनकार किया गया था।जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की खड़नपीठ ने यह टिप्पणी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी की जमानत याचिका मंजूर करते हुए की। अंद्राबी पिछले पांच वर्षों से कथित...

रेस ज्यूडिकाटा का सिद्धांत एक ही मुकदमे के दो चरणों के बीच भी लागू होता है: सुप्रीम कोर्ट ने इंटरलोक्यूटरी रेस ज्यूडिकाटा को समझाया
'रेस ज्यूडिकाटा' का सिद्धांत एक ही मुकदमे के दो चरणों के बीच भी लागू होता है: सुप्रीम कोर्ट ने 'इंटरलोक्यूटरी रेस ज्यूडिकाटा' को समझाया

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि 'रेस ज्यूडिकाटा' (Res Judicata) का सिद्धांत एक ही मुकदमे के दो अलग-अलग चरणों के बीच भी लागू होता है। इसे 'इंटरलोक्यूटरी रेस ज्यूडिकाटा' (Interlocutory Res Judicata) का सिद्धांत कहा जाता है।इसलिए सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VII नियम 11 के तहत पहले दायर की गई किसी अर्जी को खारिज कर दिए जाने के बाद उसी आधार पर वाद (Plaint) को खारिज करने के लिए बाद में दायर की गई अर्जी पर रोक लगाई जा सकती है।कोर्ट ने कहा कि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वाद को खारिज करने की...

जब प्रारंभिक डिक्री में विकल्प बताया गया हो कि भौतिक बंटवारा संभव नहीं है तो अंतिम डिक्री के लिए आवेदन ज़रूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
जब प्रारंभिक डिक्री में विकल्प बताया गया हो कि भौतिक बंटवारा संभव नहीं है तो अंतिम डिक्री के लिए आवेदन ज़रूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (18 मई) को यह टिप्पणी की कि सिर्फ़ इसलिए कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश XX नियम 18 के तहत अंतिम डिक्री पारित करने के लिए कोई अलग आवेदन दायर नहीं किया गया, कोई प्रारंभिक डिक्री लागू करने योग्य नहीं रह जाएगी; खासकर तब, जब डिक्री में ही यह प्रावधान हो कि यदि सीमाओं और माप के आधार पर बंटवारा संभव न हो, तो संपत्ति की नीलामी की जानी चाहिए - जिससे उस डिक्री को अंतिम डिक्री का भी दर्जा मिल जाता है।जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की खंडपीठ ने मध्य प्रदेश...