सुप्रीम कोर्ट

सर्जन ही सबसे अच्छा जज होता है कि कौन-सा प्रोसीजर अपनाना है: सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल लापरवाही का केस रद्द किया
सर्जन ही सबसे अच्छा जज होता है कि कौन-सा प्रोसीजर अपनाना है: सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल लापरवाही का केस रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (6 अप्रैल) को पीडियाट्रिक सर्जन के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द की। इस सर्जन ने डेढ़ साल के बच्चे की ऑर्किडेक्टॉमी (अंडकोष निकालना) की थी। बच्चे के पिता ने आरोप लगाया था कि इस प्रोसीजर के लिए उनकी कोई सहमति नहीं ली गई।जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। बच्चे के पिता ने दलील दी कि उन्होंने सिर्फ ऑर्किडोपेक्सी (अंडकोष को सही जगह पर लाने का प्रोसीजर) के लिए सहमति दी थी, लेकिन सर्जन ने कथित तौर पर उनकी मंजूरी के बिना ऑर्किडेक्टॉमी...

NEET | मेडिकल सीट राष्ट्रीय संसाधन, धोखाधड़ी के कारण खाली हुई सीट अगले उम्मीदवार को ही दी जानी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
NEET | मेडिकल सीट राष्ट्रीय संसाधन, धोखाधड़ी के कारण खाली हुई सीट अगले उम्मीदवार को ही दी जानी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने NEET-UG के एक उम्मीदवार के एडमिशन को सही ठहराया। यह सीट तब खाली हुई थी, जब पता चला कि मूल रूप से चुने गए उम्मीदवार ने जाली मार्कशीट का इस्तेमाल करके एडमिशन लिया था। कोर्ट ने कहा कि जब ऐसी परिस्थितियों में कोई सीट खाली होती है तो अधिकारियों का यह फ़र्ज़ है कि वे उसे मेरिट लिस्ट में अगले योग्य उम्मीदवार को दें।जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने नेशनल मेडिकल काउंसिल की अपील खारिज की, जिसमें हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को चुनौती दी गई, जिसमें...

सरकारी नौकरी में दया की कोई जगह नहीं, फिजिकल टेस्ट में शामिल न होने वाले उम्मीदवार को दूसरा मौका नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सरकारी नौकरी में दया की कोई जगह नहीं, फिजिकल टेस्ट में शामिल न होने वाले उम्मीदवार को दूसरा मौका नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि पुलिस भर्ती प्रक्रिया में तय फिजिकल टेस्ट में शामिल न हो पाने वाला उम्मीदवार सिर्फ इसलिए टेस्ट को दोबारा कराने का अधिकार नहीं मांग सकता कि टेस्ट टालने की उसकी अर्जियों का जवाब नहीं दिया गया। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकारी नौकरी के मामलों में दया और अपनी मर्ज़ी से फैसले लेने की गुंजाइश बहुत कम होती है।जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल के उस फैसले को सही ठहराया...

मिहिर शाह फ़ैसले के अनुसार गिरफ़्तारी के आधार लिखित में न देने पर सुप्रीम कोर्ट ने NDPS मामले में डॉक्टरों को दी ज़मानत
'मिहिर शाह' फ़ैसले के अनुसार गिरफ़्तारी के आधार लिखित में न देने पर सुप्रीम कोर्ट ने NDPS मामले में डॉक्टरों को दी ज़मानत

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में नशीले पदार्थों से जुड़े मामले में आरोपी दो मेडिकल प्रोफ़ेशनल्स को इस आधार पर ज़मानत दी कि उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पहले गिरफ़्तारी के आधार लिखित में नहीं दिए गए।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह आदेश देते हुए कहा कि 'मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले के निर्देश के अनुसार, आरोपी को गिरफ़्तारी के आधार दिए जाने चाहिए थे।'मिहिर राजेश शाह' मामले में पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) बी.आर. गवई और जस्टिस ए.जी. मसीह की बेंच ने...

राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल लगाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास, राज्य केवल अन्य सड़कों पर ही टोल लगा सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट
राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल लगाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास, राज्य केवल अन्य सड़कों पर ही टोल लगा सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज की। इस याचिका में राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल टैक्स लगाने की केंद्र सरकार की शक्ति को चुनौती दी गई। कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि इस तरह के शुल्क संविधान के तहत 'संघ सूची' (Union List) के दायरे में आते हैं।जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) द्वारा राष्ट्रीय राजमार्गों के उपयोग के लिए वसूला जाने वाला टोल, सूची I (संघ सूची) की प्रविष्टि 23 (संसद द्वारा...

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की राजधानियों में रिहायशी इलाकों को कमर्शियल ज़ोन में बदलने के बड़े पैमाने पर हो रहे मामलों की जांच के आदेश दिए
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की राजधानियों में रिहायशी इलाकों को कमर्शियल ज़ोन में बदलने के बड़े पैमाने पर हो रहे मामलों की जांच के आदेश दिए

एक अहम घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश में बिल्डिंग बाय-लॉ के बड़े पैमाने पर हो रहे उल्लंघन और रिहायशी इलाकों को कमर्शियल इस्तेमाल के लिए बिना इजाज़त बदलने के मामलों का गंभीरता से संज्ञान लिया।कोर्ट ने कहा,"हमारे सामने ऐसे मामले भी आ रहे हैं, जिनमें रिहायशी कॉलोनियों को रिहायशी इमारतों और ज़मीनों का कमर्शियल मकसद से बिना इजाज़त इस्तेमाल करके कमर्शियल इलाकों में बदला जा रहा है। ऐसी हरकतें न सिर्फ कानून और जनहित के खिलाफ हैं, बल्कि उन असली निवासियों के लिए भी बड़ी परेशानी और नुकसान का सबब...

कानूनी सुधारों और प्रगति के बावजूद दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा जारी, पितृसत्ता अब भी हावी: सुप्रीम कोर्ट
कानूनी सुधारों और प्रगति के बावजूद दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा जारी, पितृसत्ता अब भी हावी: सुप्रीम कोर्ट

यह देखते हुए कि दशकों के कानूनी सुधारों, कल्याणकारी योजनाओं और न्यायिक हस्तक्षेपों के बावजूद महिलाओं के खिलाफ अपराध अभी भी बड़े पैमाने पर जारी हैं, सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की है कि घरेलू हिंसा और लिंग-आधारित अपराधों का लगातार बने रहना एक गहरी जड़ें जमा चुकी पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था को दर्शाता है।कोर्ट ने गौर किया कि जहां एक ओर भारत ने आर्थिक विकास, बेहतर साक्षरता और शिक्षा तथा कार्यबल में महिलाओं की अधिक भागीदारी देखी है, वहीं दूसरी ओर महिलाओं के खिलाफ हिंसा अभी भी व्यापक है, विशेष रूप से...

ऊंचे पद पर बैठे कर्मचारी को अपने जूनियर कर्मचारियों जैसी हल्की सज़ा नहीं मिल सकती: सुप्रीम कोर्ट ने बैंक मैनेजर की बर्खास्तगी बहाल की
ऊंचे पद पर बैठे कर्मचारी को अपने जूनियर कर्मचारियों जैसी हल्की सज़ा नहीं मिल सकती: सुप्रीम कोर्ट ने बैंक मैनेजर की बर्खास्तगी बहाल की

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऊंचे पद पर बैठा कोई भी दोषी अधिकारी, उसी गलत काम के लिए अपने से नीचे के रैंक वाले कर्मचारियों जैसी सज़ा की मांग नहीं कर सकता।जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने पंजाब एंड सिंध बैंक के सीनियर मैनेजर की नौकरी से बर्खास्तगी को सही ठहराया। इस मैनेजर ने अपने जूनियर बैंक अधिकारी और एक गनमैन के साथ मिलकर, ग्राहकों के पैसे का अपने निजी फायदे के लिए गलत इस्तेमाल किया था।कोर्ट ने बैंक की अपील मान ली और दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें आरोपी की सज़ा...

पे कमीशन के फ़ायदे अतिरिक्त शर्तें लगाकर नहीं रोके जा सकते: सुप्रीम कोर्ट
पे कमीशन के फ़ायदे अतिरिक्त शर्तें लगाकर नहीं रोके जा सकते: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने 1 अप्रैल को यह टिप्पणी की कि सेंट्रल पे कमीशन की सिफ़ारिशों की मनमानी व्याख्या करके किसी कर्मचारी को पे कमीशन के फ़ायदों से वंचित करने के लिए कोई अतिरिक्त शर्त नहीं लगाई जा सकती।जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। यह मामला उन याचिकाकर्ताओं से जुड़ा था, जिन्होंने शुरू में बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइज़ेशन में जूनियर इंजीनियरिंग कैडर में नौकरी शुरू की थी। बाद में कैडर के विलय के बाद उन्हें 'जूनियर इंजीनियर' के तौर पर नया पदनाम दिया गया।लेवल 8 पर...

कंपनी आम बैठक में विशेष प्रस्ताव के बिना डायरेक्टर को लोन नहीं दे सकती: सुप्रीम कोर्ट
कंपनी आम बैठक में विशेष प्रस्ताव के बिना डायरेक्टर को लोन नहीं दे सकती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (2 अप्रैल) को बिजनेसमैन सतिंदर सिंह भसीन की ज़मानत रद्द की, क्योंकि उन्होंने कोर्ट द्वारा लगाई गई ज़मानत की शर्तों का उल्लंघन किया था। लगाई गई शर्तों में से एक यह थी कि भसीन को सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में 50 करोड़ रुपये जमा करने होंगे। हालांकि, यह बात सामने आई कि इस शर्त को पूरा करने के लिए उन्होंने अपनी कंपनी भसीन इन्फोटेक एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड (BIIPL) के फंड का गलत इस्तेमाल किया था।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने कहा कि भसीन को इस शर्त...

कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने पर ब्लैकलिस्टिंग अपने आप नहीं होती, इसके लिए अलग से सोच-समझकर फैसला लेना ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट
कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने पर ब्लैकलिस्टिंग अपने आप नहीं होती, इसके लिए अलग से सोच-समझकर फैसला लेना ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने 2 अप्रैल को फैसला सुनाया कि किसी कॉन्ट्रैक्ट को खत्म करने से अपने आप ब्लैकलिस्टिंग सही साबित नहीं हो जाती। ब्लैकलिस्टिंग के लिए एक अलग से 'कारण बताओ नोटिस' (Show Cause Notice) देना और ठीक से सोच-समझकर फैसला लेना ज़रूरी है।जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने झारखंड हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें पेयजल और स्वच्छता विभाग द्वारा जारी किए गए कॉन्ट्रैक्ट खत्म करने और ब्लैकलिस्ट करने के आदेश को सही ठहराया गया था। यह आदेश अपीलकर्ता (कॉन्ट्रैक्टर) की तरफ से निर्माण...

कारण बताओ नोटिस को असाधारण मामलों में रिट अधिकार क्षेत्र में चुनौती दी जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट
कारण बताओ नोटिस को असाधारण मामलों में रिट अधिकार क्षेत्र में चुनौती दी जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि यद्यपि अदालतें आमतौर पर कारण बताओ नोटिस (SCN) को चुनौती देने वाली रिट याचिकाओं पर विचार नहीं करती हैं। फिर भी यह सिद्धांत पूर्ण नहीं है और असाधारण परिस्थितियों में नोटिस के चरण पर हस्तक्षेप की अनुमति है।अदालत ने टिप्पणी की कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा का सहारा तब लिया जा सकता है, जब कारण बताओ नोटिस में ऐसी मौलिक कानूनी कमियां हों, जिनके परिणामस्वरूप स्पष्ट अन्याय हो सकता है।अदालत ने कहा कि यद्यपि सामान्य नियम कारण बताओ नोटिसों को चुनौती देने को...

FEMA | S.37A के तहत सक्षम प्राधिकारी द्वारा ज़ब्ती की पुष्टि न होना, निर्णय प्रक्रिया पर असर डालता है: सुप्रीम कोर्ट
FEMA | S.37A के तहत सक्षम प्राधिकारी द्वारा ज़ब्ती की पुष्टि न होना, निर्णय प्रक्रिया पर असर डालता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने 1 अप्रैल को फैसला सुनाया कि विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (FEMA Act) की धारा 37A के तहत ज़ब्ती आदेश की पुष्टि न होने का बाद की निर्णय प्रक्रियाओं पर महत्वपूर्ण असर पड़ सकता है। साथ ही अधिकारी इस तरह से आगे नहीं बढ़ सकते, जिससे लंबित वैधानिक अपील प्रभावी रूप से रद्द हो जाए या उस पर पहले से ही फैसला सुना दिया जाए।हालांकि, कोर्ट ने ऐसे हर मामले में निर्णय प्रक्रियाओं को अपने आप 'अमान्य' (non est) घोषित करने से परहेज़ किया, लेकिन उसने फैसला दिया कि ज़ब्ती की पुष्टि करने से...

चुनाव याचिका का फैसला रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर ही होना चाहिए, सबूतों की कमी पूरी करने के लिए इसे वापस नहीं भेजा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
चुनाव याचिका का फैसला रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर ही होना चाहिए, सबूतों की कमी पूरी करने के लिए इसे वापस नहीं भेजा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि चुनाव याचिका का फैसला रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर ही किया जाना चाहिए। अपीलीय अदालत के लिए यह स्वीकार्य नहीं है कि वह चुनाव याचिकाओं को दोबारा विचार के लिए वापस भेज दे, सिर्फ इसलिए कि नए सबूत पेश किए जा सकें या गवाहों को बुलाकर विशेषज्ञों से जांच कराई जा सके, जबकि ये मुद्दे चुनाव ट्रिब्यूनल के सामने उठाए ही नहीं गए।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता के 'दोहरे मतदान' (Double...

विभागीय जांच में कर्मचारी द्वारा स्वीकार न किए गए दस्तावेज़ों को गवाह के ज़रिए साबित करना ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट
विभागीय जांच में कर्मचारी द्वारा स्वीकार न किए गए दस्तावेज़ों को गवाह के ज़रिए साबित करना ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (1 अप्रैल) को यह टिप्पणी की कि जब कोई कर्मचारी अपने ऊपर लगे आरोपों को स्वीकार नहीं करता है तो उसे नियोक्ता के बिना साबित हुए दस्तावेज़ी सबूतों के आधार पर नौकरी से नहीं निकाला जा सकता। कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि नियोक्ता को ऐसे दस्तावेज़ी सबूतों को गवाहों के ज़रिए साबित करना होगा ताकि कर्मचारी को गवाह से जिरह करने का मौका मिल सके।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने यह टिप्पणी तब की, जब वे यूपी कोऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड के कर्मचारी की बर्खास्तगी रद्द कर रहे थे।...

S. 197 CrPC | मंजूरी की ज़रूरत का बाद में विस्तार उस समय लिए गए संज्ञान को अमान्य नहीं करेगा, जब कोई रोक नहीं थी: सुप्रीम कोर्ट
S. 197 CrPC | मंजूरी की ज़रूरत का बाद में विस्तार उस समय लिए गए संज्ञान को अमान्य नहीं करेगा, जब कोई रोक नहीं थी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (1 अप्रैल) को कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 के तहत मंजूरी सुरक्षा का बाद में किया गया विस्तार, उन कार्यवाहियों को रोकने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जो उस समय शुरू की गई थीं, जब ऐसी कोई रोक मौजूद नहीं थी।जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कलकत्ता पुलिस बल के अधीनस्थ अधिकारी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को सही ठहराया। इस अधिकारी के खिलाफ अपराध का संज्ञान उस समय लिया गया था, जब कलकत्ता पुलिस के सभी अधीनस्थ अधिकारियों को CrPC...

Karnataka Stamp Act | कोर्ट के पास कम पड़ी ड्यूटी के दस गुना से कम जुर्माना लगाने का कोई विवेकाधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
Karnataka Stamp Act | कोर्ट के पास कम पड़ी ड्यूटी के दस गुना से कम जुर्माना लगाने का कोई विवेकाधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि जब अदालतें 'कर्नाटक स्टाम्प अधिनियम, 1957' के तहत स्टाम्प ड्यूटी में किसी कमी का निर्धारण करती हैं तो उनके पास कम पड़ी ड्यूटी के दस गुना से कम जुर्माना लगाने का कोई विवेकाधिकार नहीं होता है।जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने यह टिप्पणी की, “जब किसी दस्तावेज़ को डिस्ट्रिक्ट कमिश्नर के पास भेजे बिना कोर्ट में सबूत के तौर पर पेश करने की कोशिश की जाती है, तो जुर्माने की रकम तय करने में कोई छूट नहीं होती।” बेंच ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस...

ट्रस्ट संपत्ति सार्वजनिक चिंता का विषय—CSI चर्च जमीन बिक्री मामले में आपराधिक केस बहाल: सुप्रीम कोर्ट
'ट्रस्ट संपत्ति सार्वजनिक चिंता का विषय'—CSI चर्च जमीन बिक्री मामले में आपराधिक केस बहाल: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने चर्च ऑफ साउथ इंडिया ट्रस्ट एसोसिएशन (CSITA) की भूमि की कथित धोखाधड़ी से बिक्री से जुड़े मामले में आपराधिक कार्यवाही बहाल कर दी है। कोर्ट ने कहा कि ट्रस्ट की संपत्ति को निजी मामला नहीं माना जा सकता और उसके हस्तांतरण में किसी भी अनियमितता को सार्वजनिक चिंता का विषय माना जाएगा।जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया गया था।मामला आंध्र प्रदेश के...