पुलिस थानों में सिर्फ CCTV लगाना काफी नहीं, उनका ठीक से काम करना भी ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट
Praveen Mishra
29 Jan 2026 8:28 PM IST

राजस्थान के पुलिस थानों में कार्यशील CCTV कैमरों की कमी को लेकर स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) से दर्ज मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल CCTV कैमरे लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका पूरी तरह कार्यशील होना भी उतना ही ज़रूरी है। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि “महज़ इंस्टॉलेशन से काम नहीं चलेगा, कैमरे सही ढंग से काम भी करने चाहिए।”
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ के समक्ष राजस्थान सरकार ने बताया कि राज्य में CCTV व्यवस्था को मज़बूत करने के लिए ₹75 करोड़ का अतिरिक्त बजट स्वीकृत किया गया है। सरकार ने यह भी आश्वासन दिया कि 31 मार्च तक राज्य के प्रत्येक पुलिस थाने में 12 की जगह 16 CCTV कैमरे लगाए जाएंगे।
कनेक्टिविटी, मेंटेनेंस और डेटा स्टोरेज बड़ी चुनौती
खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कनेक्टिविटी, रख-रखाव, डेटा स्टोरेज और निगरानी जैसे पहलुओं को गंभीर चिंता का विषय बताया। इस मामले में एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने एक केंद्रीकृत डैशबोर्ड की आवश्यकता पर ज़ोर दिया, जिससे सभी पुलिस थानों के CCTV की निगरानी एक ही प्लेटफॉर्म से हो सके।
कई राज्यों ने हलफनामे दाखिल नहीं किए
एमिकस ने कोर्ट को यह भी बताया कि सुओ मोटो मामले में आवश्यक हलफनामे अभी तक दाखिल नहीं किए गए हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार तथा गुजरात और छत्तीसगढ़ राज्यों ने अब तक हलफनामे दाखिल नहीं किए हैं।
“एनआईए ने हलफनामा तो दिया है, लेकिन उसमें कुछ ठोस नहीं कहा गया है। झारखंड, ओडिशा और एनआईए ने सिर्फ औपचारिकता निभाई है—यह खाली औपचारिकता नहीं होनी चाहिए,” उन्होंने कहा।
इस पर जस्टिस विक्रम नाथ ने स्पष्ट किया कि भले ही कुछ प्राधिकरणों ने जुड़े हुए परमवीर सिंह सैनी मामले में हलफनामे दाखिल किए हों, लेकिन अब निगरानी सुओ मोटो मामले में ही की जा रही है।
'मॉडल स्टेट्स' के रूप में MP, केरल और राजस्थान की सराहना
एमिकस ने मध्य प्रदेश, केरल और राजस्थान को “मॉडल स्टेट्स” बताते हुए कहा कि इन राज्यों की सकारात्मक पहल को अन्य राज्य अपनाया जा सकता है। इसके बाद पीठ ने सुझाव दिया कि एमिकस सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के गृह सचिवों और पुलिस महानिदेशकों के साथ एक वर्चुअल कॉन्फ्रेंस करें। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल और राज्यों के अतिरिक्त महाधिवक्ता भी इसमें शामिल हो सकते हैं।
न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने कहा कि अन्य राज्यों को इन मॉडल राज्यों की सर्वश्रेष्ठ प्रथाएं अपनाने के लिए प्रेरित किया जाए। वहीं न्यायमूर्ति नाथ ने टिप्पणी की कि “संभव है कुछ राज्य इससे भी बेहतर विचार सामने लाएं।”
केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर पर चर्चा
एमिकस ने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार एक ऐसा सॉफ्टवेयर विकसित करे, जिसे सभी राज्य अपने CCTV निगरानी सिस्टम के लिए अपना सकें। इस पर न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि सॉफ्टवेयर कोई भी विकसित कर सकता है और केरल इस मामले में सबसे आगे है, जहां हाईकोर्ट सहित कई संस्थानों के लिए स्वदेशी सॉफ्टवेयर विकसित किया गया है। हालांकि, एमिकस ने यह भी रेखांकित किया कि केंद्र सरकार के पास संसाधन अधिक हैं।
अनुपालन न करने पर सख्त चेतावनी
सुनवाई के अंत में एमिकस ने कोर्ट को बताया कि झारखंड और हरियाणा ने अब तक Paramvir Singh Saini मामले में कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया है। इस पर नाराज़गी जताते हुए न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने चेतावनी दी कि यदि उचित हलफनामे दाखिल नहीं किए गए, तो कड़ी टिप्पणियां (strictures) की जा सकती हैं।
पृष्ठभूमि
4 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस थानों में कार्यशील CCTV कैमरों की कमी को लेकर स्वतः संज्ञान से जनहित मामला दर्ज करने का आदेश दिया था। यह कार्रवाई दैनिक भास्कर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के आधार पर की गई थी, जिसमें बताया गया था कि पिछले 7–8 महीनों में पुलिस हिरासत में लगभग 11 लोगों की मौत हुई।
इससे पहले, दिसंबर 2020 में Paramvir Singh Saini बनाम बलजीत सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को प्रत्येक पुलिस थाने में CCTV कैमरे लगाने का निर्देश दिया था। बावजूद इसके, कई जगह कैमरे या तो लगाए नहीं गए या फिर खराब पड़े रहे।
15 सितंबर को कोर्ट ने यह भी कहा था कि वह पुलिस थानों के CCTV कैमरों की बिना मानवीय हस्तक्षेप के स्वतंत्र निगरानी पर विचार कर रहा है, क्योंकि कैमरे लगाए जाने के बावजूद उन्हें बंद किया जा सकता है।
इसके बाद 26 सितंबर को कोर्ट ने राजस्थान सरकार से 12 बिंदुओं पर जवाब मांगा था, जिनमें CCTV के नियमित ऑडिट, फुटेज सुरक्षित रखने की अवधि, अचानक निरीक्षण और छेड़छाड़-रोधी (tamper proof) व्यवस्था जैसे सवाल शामिल थे।
14 अक्टूबर को कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया था कि राजस्थान के पुलिस थानों के पूछताछ कक्षों में CCTV क्यों नहीं हैं, और पुलिस हिरासत में हुई मौतों पर राज्य का पक्ष क्या है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि पुलिस थानों के कैमरों की लाइव फीड किसी केंद्रीकृत एजेंसी/कमांड सेंटर तक जानी चाहिए, ताकि यदि कोई कैमरा बंद हो जाए तो तुरंत सूचना मिले और सुधारात्मक कदम उठाए जा सकें।

