शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत वापस लेने के बाद BCI की अनुशासनात्मक समिति अधिवक्ता पर दंड नहीं लगा सकती: सुप्रीम कोर्ट
Praveen Mishra
30 Jan 2026 1:49 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (29 जनवरी) को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की अनुशासनात्मक समिति के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक अधिवक्ता को पेशेवर कदाचार का दोषी ठहराया गया था। अदालत ने कहा कि जब शिकायतकर्ता-मुवक्किल ने स्पष्ट रूप से अपनी शिकायत वापस ले ली हो और अधिवक्ता की सेवाओं से पूर्ण संतोष व्यक्त किया हो, तो ऐसी स्थिति में अनुशासनात्मक कार्यवाही को जारी नहीं रखा जा सकता।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने एडवोकेट की अपील स्वीकार करते हुए कहा
“जब प्रतिवादी-शिकायतकर्ता ने स्वयं अधिवक्ता द्वारा दी गई पेशेवर सेवाओं से पूर्ण संतोष व्यक्त करते हुए शिकायत वापस लेने की स्पष्ट मांग की, तो अनुशासनात्मक कार्यवाही का मूल आधार ही समाप्त हो गया। ऐसे में अधिवक्ता को पेशेवर कदाचार का दोषी ठहराने वाला आदेश तथ्यों और कानून—दोनों के आधार पर पूरी तरह अस्थिर है।”
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता-अधिवक्ता को एक एफआईआर रद्द (क्वैशिंग) कराने के लिए नियुक्त किया गया था। हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए लागत जमा करने की शर्त रखी। लागत जमा करने में देरी के कारण आदेश निरस्त हो गया और आपराधिक कार्यवाही पुनर्जीवित हो गई। हालांकि, बाद में अधिवक्ता द्वारा दायर आवेदन पर हाईकोर्ट ने आदेश वापस लेते हुए अधिक लागत के साथ एफआईआर को अंततः रद्द कर दिया। बाद में हाईकोर्ट ने लागत भी माफ कर दी।
इस बीच, कथित लापरवाही का आरोप लगाते हुए मुवक्किल ने राज्य बार काउंसिल का रुख किया। बाद में विवाद आपसी सहमति से सुलझ गया और दिसंबर 2022 में शिकायतकर्ता ने हलफनामे के माध्यम से शिकायत वापस लेते हुए अधिवक्ता के आचरण से पूर्ण संतोष व्यक्त किया।
इसके बावजूद, अप्रैल 2025 में BCI की अनुशासनात्मक समिति ने शिकायत वापसी को नज़रअंदाज़ करते हुए अधिवक्ता पर ₹1 लाख का दंड लगा दिया। इसके खिलाफ अधिवक्ता ने अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 38 के तहत सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ
जस्टिस संदीप मेहता द्वारा लिखित निर्णय में कोर्ट ने कहा कि—
“समिति यह समझने में विफल रही कि जब विवाद सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझ चुका था और शिकायतकर्ता ने शपथपत्र के माध्यम से स्वयं शिकायत वापस ले ली थी, तब शिकायत का मूल आधार समाप्त हो चुका था। विवादित आदेश न तो शिकायतकर्ता के हलफनामे पर विचार करता है और न ही आरोपों की स्पष्ट वापसी तथा अधिवक्ता के पेशेवर आचरण से संतोष की अभिव्यक्ति से निपटता है।”
अदालत ने गंभीर प्रक्रिया संबंधी खामियों की ओर भी इशारा किया और कहा कि कदाचार का निष्कर्ष केवल मूल शिकायत में किए गए निराधार आरोपों पर आधारित था।
“रिकॉर्ड से यह नहीं दिखता कि शिकायतकर्ता ने आरोपों के समर्थन में कोई साक्ष्य पेश किया हो। न तो शिकायतकर्ता को शपथ पर परखा गया और न ही अधिवक्ता को जिरह का अविच्छिन्न अधिकार दिया गया। ऐसे में मात्र आरोपों के आधार पर पेशेवर कदाचार ठहराना कानूनन अस्थिर है।”
आदेश
इन कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए ₹1 लाख का दंड लगाने वाला आदेश तथा पूरी अनुशासनात्मक कार्यवाही रद्द कर दी।

