औद्योगिक विवाद के अस्तित्व के लिए पूर्व लिखित मांग आवश्यक नहीं; आशंकित विवाद भी संदर्भित किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

28 Jan 2026 3:36 PM IST

  • औद्योगिक विवाद के अस्तित्व के लिए पूर्व लिखित मांग आवश्यक नहीं; आशंकित विवाद भी संदर्भित किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (27 जनवरी) को स्पष्ट किया कि औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत सुलह अधिकारी (Conciliation Officer) के समक्ष जाने से पहले किसी ट्रेड यूनियन पर प्रबंधन को औपचारिक रूप से “चार्टर ऑफ डिमांड्स” (मांगों का लिखित पत्र) सौंपना अनिवार्य नहीं है।

    अदालत ने कहा कि यह अधिनियम निवारक (preventive) और उपचारात्मक (remedial) दोनों प्रकृति का है और जैसे ही कोई औद्योगिक विवाद उत्पन्न होता है या होने की आशंका (apprehended) होती है, श्रमिक या यूनियन इसके तंत्र का सहारा ले सकते हैं।

    जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की खंडपीठ ने कहा कि यदि श्रमिकों को पहले प्रबंधन के समक्ष अपनी मांगें रखने के लिए बाध्य किया जाए, तो इससे अधिनियम का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा—विशेष रूप से उन परिस्थितियों में, जहां नियोक्ता से सीधे संपर्क करने पर पीड़न या सेवा से हटाए जाने का जोखिम हो सकता है।

    अदालत ने कहा कि कानून स्वयं सरकार को यह अधिकार देता है कि वह ऐसे औद्योगिक विवाद को भी संदर्भित कर सकती है जो मौजूद हो या होने की आशंका हो। यदि “पूर्व मांग” को अनिवार्य शर्त मान लिया जाए, तो अधिनियम में प्रयुक्त शब्द “आशंकित (apprehended)” निरर्थक हो जाएगा।

    खंडपीठ ने कहा:

    “यदि मामला औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 10(1) के दूसरे भाग में आता है, तो सरकार के पास आशंकित विवाद को श्रम न्यायालय में संदर्भित करने का पूर्ण अधिकार है। प्रबंधन की दलील धारा में ऐसे शब्द जोड़ती है जो वहां हैं ही नहीं और 'आशंकित विवाद' की अवधारणा को निष्प्रभावी कर देती है।”

    अदालत ने Shambu Nath Goyal Vs. Bank of Baroda (1978) के फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि जहां औद्योगिक अशांति की आशंका हो, वहां लिखित मांग औद्योगिक विवाद के अस्तित्व के लिए अनिवार्य शर्त (sine qua non) नहीं है।

    अदालत ने टिप्पणी की:

    “आशंकित विवाद को संदर्भित करने की शक्ति उस कहावत का वैधानिक रूप है—'समय पर लगाया गया एक टांका नौ टांकों से बचाता है।'”

    कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि प्रबंधन को प्रारंभिक आपत्तियों के माध्यम से इस त्वरित प्रक्रिया को रोकने की अनुमति दी जाए, तो यह अधिनियम के निवारक उद्देश्य को नष्ट कर देगा और त्वरित राहत की व्यवस्था को देरी के औजार में बदल देगा। सरकार औद्योगिक शांति बनाए रखने, श्रमिकों को न्यायोचित आर्थिक मांगें उठाने का अवसर देने और हड़ताल व तालाबंदी से बचने के उद्देश्य से ऐसे संदर्भ करती है।

    मामले की पृष्ठभूमि

    मामला संविदा श्रमिकों से जुड़ा है, जिन्होंने अपनी सेवा समाप्ति की आशंका को देखते हुए सुलह कार्यवाही शुरू की थी। यूनियन के नेतृत्व में श्रमिकों ने दावा किया कि वे स्थायी प्रकृति का कार्य कर रहे हैं, इसके बावजूद उन्हें स्थायी दर्जा और वैधानिक लाभ नहीं दिए जा रहे।

    प्रबंधन ने सुलह कार्यवाही का विरोध करते हुए Sindhu Resettlement Corporation Ltd. बनाम Industrial Tribunal (1968) पर भरोसा किया और कहा कि जब तक यूनियन ने पहले औपचारिक मांग नहीं उठाई, तब तक धारा 2(k) के तहत कोई “औद्योगिक विवाद” अस्तित्व में नहीं आता।

    श्रम आयुक्त द्वारा विवाद को औद्योगिक न्यायालय में संदर्भित किए जाने के फैसले को प्रबंधन ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने कहा कि सामान्यतः मांग रखी जानी चाहिए, लेकिन लिखित मांग औद्योगिक विवाद के लिए अनिवार्य नहीं है, सिवाय सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं के मामलों में।

    इसके बाद प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।

    निर्णय

    जस्टिस भट्टी द्वारा लिखित फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखते हुए प्रबंधन की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि धारा 10(1) ID Act सरकार को ऐसे विवाद को संदर्भित करने की शक्ति देती है जो मौजूद हो या होने की आशंका हो।

    अदालत ने दोहराया कि लिखित मांग अनिवार्य नहीं है, सिवाय सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं के मामलों में, जहां धारा 22 ID Act के तहत नोटिस आवश्यक है।

    कोर्ट ने Sindhu मामले को वर्तमान विवाद से अलग करते हुए कहा कि उस मामले में नियोक्ता-कर्मचारी संबंध और विवाद पहले से स्पष्ट थे, जबकि वर्तमान मामला मुख्य नियोक्ता, ठेकेदार और श्रमिकों के बीच जटिल त्रिपक्षीय संबंध से जुड़ा है, जहां संबंध स्वयं विवादित है।

    अंततः, अदालत ने औद्योगिक न्यायालय को निर्देश दिया कि वह चार महीनों के भीतर दो प्रमुख मुद्दों पर निर्णय करे:

    क्या श्रम अनुबंध दिखावटी और नाममात्र (sham and nominal) थे, और

    क्या प्रबंधन संबंधित श्रमिकों का मुख्य नियोक्ता था।

    इन निर्देशों के साथ, अपील खारिज कर दी गई।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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