कॉन्ट्रैक्ट लेबर से जुड़े विवादों के निपटारे का सही मंच इंडस्ट्रियल कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट
Praveen Mishra
29 Jan 2026 8:35 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कॉन्ट्रैक्ट लेबर के रोजगार और सेवा समाप्ति से जुड़े विवादों के निपटारे के लिए औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत गठित इंडस्ट्रियल कोर्ट/लेबर कोर्ट ही उपयुक्त मंच है।
जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी Steel Authority of India Limited Vs. National Union Waterfront Workers (2001) के संविधान पीठ के फैसले पर भरोसा करते हुए की।
खंडपीठ ने कहा—
“कॉन्ट्रैक्ट लेबर के रोजगार और सेवा समाप्ति से जुड़े मुद्दों के निर्णय के लिए इंडस्ट्रियल कोर्ट ही उचित मंच है।”
बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें लेबर कमिश्नर द्वारा विवाद को इंडस्ट्रियल कोर्ट को संदर्भित किए जाने के निर्णय को सही ठहराया गया था। कोर्ट ने कहा कि यह तय करना कि प्रबंधन और लेबर कॉन्ट्रैक्टर के बीच किया गया अनुबंध वास्तविक है या दिखावटी (शैम)—एक न्यायिक कार्य है, जिसका निर्णय केवल इंडस्ट्रियल कोर्ट ही कर सकती है।
क्या था मामला
यह मामला औरंगाबाद मज़दूर यूनियन से जुड़े 118 कामगारों से संबंधित था, जिन्हें अपीलकर्ता कंपनी एम/एस प्रीमियम ट्रांसमिशन ने पंजीकृत लेबर कॉन्ट्रैक्टरों के माध्यम से नियोजित किया था। यूनियन का आरोप था कि कॉन्ट्रैक्ट लेबर व्यवस्था महज़ एक “शैम और छलावा” है, जिसका उद्देश्य कामगारों को स्थायी दर्जा और वैधानिक लाभों से वंचित रखना है।
जब कामगारों के अनुबंध का नवीनीकरण नहीं किया गया, तो यूनियन ने सीधे औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत समझौता अधिकारी (Conciliation Officer) का रुख किया, बिना प्रबंधन को औपचारिक रूप से चार्टर ऑफ डिमांड्स सौंपे।
हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक
समझौता विफल होने के बाद, जनवरी 2020 में डिप्टी लेबर कमिश्नर ने विवाद को औरंगाबाद की इंडस्ट्रियल कोर्ट को भेज दिया। प्रबंधन ने इसे बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि यूनियन ने पहले कंपनी को चार्टर ऑफ डिमांड नहीं दिया, इसलिए कोई वैध “औद्योगिक विवाद” अस्तित्व में नहीं है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया, जिसके बाद प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
तकनीकी आधार पर विवाद खारिज नहीं किया जा सकता
अपील खारिज करते हुए जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी द्वारा लिखित निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल तकनीकी आधार पर विवाद को खारिज नहीं किया जा सकता। चूंकि विवाद का मूल प्रश्न यह था कि कॉन्ट्रैक्ट व्यवस्था वास्तविक है या दिखावटी, और यह विषय समझौता कार्यवाही में तय नहीं किया जा सकता, इसलिए इसे इंडस्ट्रियल कोर्ट को भेजना पूरी तरह उचित था।
कोर्ट ने कहा—
“कॉन्ट्रैक्ट के तहत काम करने वाले श्रमिकों को सेवा समाप्ति या काम बंद होने की स्थिति में अपने उपाय इंडस्ट्रियल कोर्ट के समक्ष ही तलाशने होंगे।”
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि कॉन्ट्रैक्ट लेबर से जुड़े जटिल और तथ्यात्मक विवादों का समाधान न्यायिक जांच के जरिए ही किया जा सकता है, न कि केवल तकनीकी आपत्तियों के आधार पर।

