हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat

11 Jan 2026 8:00 AM IST

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    देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (05 जनवरी, 2026 से 09 जनवरी, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    पीड़ित BNSS की धारा 419(4) के तहत हाईकोर्ट से स्पेशल लीव लेकर बरी करने के आदेश के खिलाफ दूसरी अपील दायर नहीं कर सकता: केरल हाईकोर्ट

    केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में एक फैसला सुनाया, जिसमें कहा गया कि कोई पीड़ित भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 419(4) के तहत हाईकोर्ट से स्पेशल लीव लेकर आरोपी को बरी किए जाने के खिलाफ दूसरी अपील दायर नहीं कर सकता।

    एशियन पेंट्स लिमिटेड बनाम राम बाबू और अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर भरोसा करते हुए जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस ने टिप्पणी की: “यह उपरोक्त टिप्पणियों से ही स्पष्ट है कि एक बार जब पीड़ित द्वारा अपीलीय उपाय का इस्तेमाल किया जाता है तो वही पक्ष दूसरी अपील के रूप में एक और अपील दायर नहीं कर सकता है। इसलिए BNSS की धारा 413 (या CrPC के संबंधित प्रावधान के तहत) के तहत सेशंस कोर्ट के समक्ष अपील दायर करने के बाद उसी अपीलकर्ता द्वारा BNSS की धारा 419(4) के तहत बरी करने की पुष्टि करने वाले आदेश के खिलाफ दूसरी अपील दायर नहीं की जा सकती है।”

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    कर्मचारी भविष्य निधि के लाभ स्वीकार करने पर रिटायरमेंट वेतन का अधिकार समाप्त: झारखंड हाइकोर्ट

    झारखंड हाइकोर्ट की एक खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए व्यवस्था दी कि यदि कोई कर्मचारी स्वेच्छा से कर्मचारी भविष्य निधि योजना का विकल्प चुनता है और सेवानिवृत्ति के समय इसके सभी लाभ प्राप्त कर लेता है तो वह बाद में राज्य सरकार से पेंशन या रिटायरमेंट वेतन का दावा नहीं कर सकता।

    जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस राजेश कुमार की खंडपीठ ने कहा कि वर्षों तक मौन रहने और वित्तीय लाभ स्वीकार करने के बाद इस तरह की मांग करना कानून की दृष्टि में उचित नहीं है।

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    HP Rent Control Act। किरायेदार की मृत्यु पर केवल पत्नी को ही किरायेदारी का अधिकार, आगे उत्तराधिकार नहीं: हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट

    हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मूल किरायेदार की मृत्यु के बाद किरायेदारी का उत्तराधिकार हिमाचल प्रदेश शहरी किराया नियंत्रण कानून के तहत निर्धारित वैधानिक क्रम के अनुसार ही होगा। अदालत ने कहा कि यदि किरायेदार की पत्नी उसकी मृत्यु के समय जीवित थी और उसके साथ निवास कर रही थी तो वही अकेली वैध उत्तराधिकारी होगी। उसके बाद किरायेदारी का अधिकार किसी अन्य कानूनी वारिस को हस्तांतरित नहीं हो सकता।

    जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर ने अपने फैसले में कहा कि चूंकि जवाला देवी अपने पति की मृत्यु तक जीवित थीं और उनके साथ रह रही थीं, इसलिए किरायेदारी के उत्तराधिकार का अधिकार केवल उन्हें ही प्राप्त हुआ। कानून की व्याख्या के अनुसार यह अधिकार व्यक्तिगत होता है। ऐसे उत्तराधिकारी की मृत्यु के बाद किरायेदारी किसी अन्य कानूनी वारिस को नहीं मिलती।

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    जिले से बाहर विवाह करने पर स्थानीय निवासी आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट

    जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि जो उम्मीदवार विवाह के बाद संबंधित जिले से बाहर निवास करता है, वह सार्वजनिक भर्ती में स्थानीय निवासी के आधार पर वरीयता का दावा नहीं कर सकता, जब तक कि वह ठोस और विश्वसनीय दस्तावेजों के माध्यम से अपने स्थानीय निवास को सिद्ध न करे।

    जस्टिस जावेद इकबाल वानी की पीठ ने यह निर्णय एक महिला अभ्यर्थी की याचिका पर सुनाया, जिसमें उसने दावा किया कि विवाह के बावजूद वह अपने मायके के गांव में ही निवास कर रही है। इसलिए उसे स्थानीय निवासी के रूप में वरीयता मिलनी चाहिए। हाइकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता अपने इस दावे को प्रमाणित करने में असफल रही है।

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    पत्नी के निजी फोटो तक अनधिकृत पहुंच और उन्हें वायरल करने की धमकी क्रूरता: झारखंड हाइकोर्ट

    झारखंड हाइकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि पति द्वारा पत्नी के निजी और आपत्तिजनक फोटो तक अनधिकृत रूप से पहुंच बनाना, उन्हें अपने पास सुरक्षित करना और उन्हें सार्वजनिक करने की धमकी देना क्रूरता की श्रेणी में आता है। हाइकोर्ट ने इसे पति द्वारा पत्नी की छवि धूमिल करने और चरित्र हनन का गंभीर मामला बताया।

    यह फैसला जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनाया, जिसमें पत्नी द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह विच्छेद की याचिका खारिज कर दी गई थी।

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    एडवोकेट की अनुपस्थिति में आपराधिक अपील खारिज नहीं की जा सकती, एमिकस क्यूरी नियुक्त करना अनिवार्य: इलाहाबाद हाइकोर्ट

    इलाहाबाद हाइकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि किसी आपराधिक अपील को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि अभियुक्त की ओर से वकील उपस्थित नहीं हुआ। हाइकोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में अपीलीय न्यायालय का कर्तव्य है कि वह अभियुक्त के लिए एमिकस क्यूरी नियुक्त करे और अपील का निर्णय मामले के गुण-दोष के आधार पर करे, न कि अनुपस्थिति के कारण।

    जस्टिस अब्दुल शाहिद की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि अभियुक्त के वकील की गैर-हाजिरी के कारण आपराधिक अपील को डिफॉल्ट में खारिज करना भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 425 के प्रावधानों के विपरीत है, जो पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 384 के अनुरूप है।

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    पति द्वारा जबरदस्ती अप्राकृतिक सेक्स करना IPC की धारा 498A के तहत क्रूरता, मगर वैवाहिक अपवाद के कारण बलात्कार नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने FIR रद्द करने की मांग वाली पति की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि पति द्वारा अपनी बालिग पत्नी के साथ जबरन अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने को धारा 376 के तहत बलात्कार के रूप में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, लेकिन यह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत क्रूरता माना जाएगा।

    जस्टिस राजेश कुमार गुप्ता की बेंच ने कहा, "हालांकि, इस कोर्ट की भी राय है कि पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ जबरन अप्राकृतिक यौन संबंध बनाना IPC की धारा 498A के तहत क्रूरता है। साथ ही IPC की धारा 376 के तहत बलात्कार के रूप में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, क्योंकि धारा 377 (अप्राकृतिक कृत्य) के संदर्भ में, मौजूदा कानून के तहत वैवाहिक बलात्कार की अवधारणा को मान्यता नहीं दी गई, क्योंकि धारा 375 में स्पष्ट वैवाहिक अपवाद है।"

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    ट्रायल के दौरान रिकॉर्ड साक्ष्य के आधार पर ही जोड़े जा सकते हैं अतिरिक्त आरोपी, केस डायरी सामग्री अप्रासंगिक: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 319 के तहत किसी अतिरिक्त आरोपी को तलब करने का आधार केवल वही साक्ष्य हो सकता है, जो मुकदमे के दौरान न्यायालय के समक्ष रिकॉर्ड किया गया हो। चार्जशीट या केस डायरी में उपलब्ध सामग्री को साक्ष्य नहीं माना जा सकता। इनके आधार पर किसी व्यक्ति को अतिरिक्त आरोपी के रूप में समन नहीं किया जा सकता।

    यह टिप्पणी जस्टिस चवन प्रकाश की एकलपीठ ने दहेज मृत्यु के एक मामले में दाखिल आपराधिक पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए की। याचिका के माध्यम से मृतका के पिता ने अपने दामाद के पिता, माता और भाई को अतिरिक्त आरोपी के रूप में तलब किए जाने की मांग की थी।

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    CrPC | समन मामले में संज्ञान लेने के बाद धारा 251 के स्तर पर आरोपी को बरी नहीं कर सकता मजिस्ट्रेट: दिल्ली हाइकोर्ट

    दिल्ली हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि समन वाद में एक बार जब मजिस्ट्रेट संज्ञान ले लेता है और आरोपी को समन जारी कर देता है तो उसके बाद दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 251 के चरण पर आरोपी को कार्यवाही से मुक्त करने अथवा बरी करने का अधिकार मजिस्ट्रेट को नहीं है।

    जस्टिस अमित महाजन ने कहा कि CrPC की धारा 251 का उद्देश्य केवल इतना है कि आरोपी को उस अपराध का विवरण बताया जाए, जिसका उस पर आरोप है। उससे यह पूछा जाए कि वह दोष स्वीकार करता है या अपना बचाव प्रस्तुत करना चाहता है। यह प्रावधान मजिस्ट्रेट को न तो किसी प्रकार का मिनी ट्रायल करने की अनुमति देता है और न ही कार्यवाही समाप्त करने या समन वापस लेने की शक्ति प्रदान करता है।

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    धारा 498-A केवल गंभीर क्रूरता पर लागू, वैवाहिक असंगति या अपूर्ण विवाह पर नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने पत्नी द्वारा पति और ससुराल वालों के खिलाफ दर्ज धारा 498-A आईपीसी का मामला रद्द करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि “कानून असंगति (incompatibility) या अपूर्ण विवाह को अपराध नहीं बनाता। धारा 498-A वैवाहिक समस्याओं का सार्वभौमिक इलाज नहीं है।” जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने कहा कि धारा 498-A एक विशिष्ट और सीमित प्रावधान है, जो केवल गंभीर और जानलेवा स्तर की क्रूरता या दहेज से जुड़ी प्रताड़ना को दंडित करने के लिए बनाया गया है।

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    पिता द्वारा बलात्कार 'साधारण अपराध से परे', पीड़िता बेटी की गवाही ही पर्याप्त: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने POCSO मामले में बलात्कार की सजा के खिलाफ दायर अपील खारिज करते हुए कहा कि पीड़िता स्वयं, जो कि अभियुक्त की बेटी है, घटना की सबसे विश्वसनीय और सर्वोत्तम साक्षी है, क्योंकि अपने ही पिता को झूठा फँसाने का उसके पास कोई कारण नहीं हो सकता।

    जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने यह भी कहा कि एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी को सामाजिक बदनामी, पारिवारिक परिस्थितियों और आरोपों की गंभीरता के मद्देनज़र संतोषजनक रूप से समझाया गया है और केवल देरी के आधार पर अभियोजन की कहानी को खारिज नहीं किया जा सकता।

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    पति का पत्नी को उसके वर्कप्लेस पर बदनाम करना, सहकर्मियों के सामने उसकी पवित्रता पर सवाल उठाना मानसिक क्रूरता: कलकत्ता हाईकोर्ट

    कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई पति अपनी पत्नी को उसके वर्कप्लेस पर बदनाम करता है, उसकी पवित्रता पर सवाल उठाता है और सहकर्मियों के सामने उसे गाली देता है, तो यह मानसिक क्रूरता है जिसके आधार पर शादी खत्म की जा सकती है।

    जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस सुप्रतिम भट्टाचार्य की डिवीजन बेंच ने कहा कि किसी जीवनसाथी द्वारा सार्वजनिक अपमान, चरित्र हनन और पेशेवर बदनामी किसी व्यक्ति की गरिमा और मानसिक शांति पर सीधा हमला है। इसे मामूली वैवाहिक कलह कहकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

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    जिस जज ने फैसला सुरक्षित रखा, उसे ट्रांसफर के बावजूद फैसला सुनाना होगा, उत्तराधिकारी जज दोबारा सुनवाई का आदेश नहीं दे सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार जब किसी क्रिमिनल ट्रायल में फाइनल बहस पूरी हो जाती है और मामला फैसले के लिए सुरक्षित रख लिया जाता है तो जिस जज ने केस सुना है, उसे फैसला सुनाना ही होगा, भले ही बाद में उसका ट्रांसफर हो जाए।

    जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने रजिस्ट्रार जनरल द्वारा जारी 18.11.2025 और 26.11.2025 के आदेशों पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया कि सभी ट्रांसफर किए गए ज्यूडिशियल अधिकारियों को उन मामलों के बारे में सूचित करना होगा, जिनमें चार्ज छोड़ने से पहले फैसले या आदेश सुरक्षित रखे गए और उन्हें ट्रांसफर की तारीख से दो से तीन हफ्तों के अंदर ऐसे सुरक्षित रखे गए फैसले या आदेश सुनाने होंगे, भले ही उनकी पोस्टिंग या ट्रांसफर हो गया हो।

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    पुलिस रिपोर्ट से दर्ज मामलों में बरी किए जाने के खिलाफ अपील का अधिकार केवल राज्य को, तीसरे पक्ष को नहीं: दिल्ली हाइकोर्ट

    दिल्ली हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिन आपराधिक मामलों की शुरुआत पुलिस रिपोर्ट के आधार पर होती है, उनमें अभियुक्त के बरी होने के खिलाफ अपील दायर करने का अधिकार केवल राज्य सरकार को प्राप्त है। ऐसे मामलों में कोई तीसरा पक्ष दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 372 के प्रावधान का सहारा लेकर अपील नहीं कर सकता, जब तक वह विधि में परिभाषित “पीड़ित” की श्रेणी में न आता हो।

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    नाबालिगों के लिए जमानत नियम, भले ही उन पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाया जाए: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 (JJ Act) के तहत कानून का उल्लंघन करने वाले बच्चे के लिए जमानत एक नियम है, भले ही उस नाबालिग पर चिल्ड्रन्स कोर्ट में "वयस्क आरोपी" के तौर पर मुकदमा चलाया जा रहा हो। हत्या के आरोपी नाबालिग याचिकाकर्ता की जमानत याचिका खारिज करने वाले आदेशों को रद्द करते हुए जस्टिस अनूप कुमार धंड की बेंच ने पुष्टि की कि कथित अपराध की गंभीरता या नाबालिग की उम्र एक्ट की धारा 12 के तहत जमानत देने से इनकार करने के लिए प्रासंगिक विचार नहीं थे।

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    तय कोटे से ज़्यादा एड-हॉक प्रमोशन से सीनियरिटी या सर्विस बेनिफिट्स का कोई अधिकार नहीं मिलता: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

    हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक रिट याचिका खारिज करते हुए कहा कि जब एड-हॉक प्रमोशन साफ तौर पर 15% कोटे से ज़्यादा है। इसलिए रिक्रूटमेंट और प्रमोशन नियमों के अनुसार नहीं है तो कोई भी सर्विस बेनिफिट्स नहीं दिए जा सकते।

    जस्टिस रंजन शर्मा ने टिप्पणी की, “एक बार जब याचिकाकर्ता को दिया गया एड-हॉक प्रमोशन 15% कोटे से ज़्यादा था, नियमों के अनुसार नहीं' दिया गया एड-हॉक प्रमोशन न तो कोई अधिकार देगा और न ही सर्विस बेनिफिट्स के लिए नियमों के बाहर दी गई सेवा के लाभ के लिए कानूनी रूप से लागू करने योग्य दावा।”

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    S. 105 BNSS | पुलिस को तलाशी और ज़ब्ती की वीडियोग्राफी करनी होगी, वरना अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया कि वह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 105 के तहत निर्धारित तलाशी और ज़ब्ती की अनिवार्य ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के लिए एक विस्तृत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) जारी करें। 40 मोटरसाइकिलों की कथित बरामदगी से जुड़े चोरी के मामले में आरोपी को जमानत देते हुए जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने कहा कि BNSS की धारा 105 के अनिवार्य प्रावधान का पालन न करने से पूरी अभियोजन कहानी पर संदेह पैदा होता है।

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    तलाक के बाद भी प्रॉपर्टी और 'स्त्रीधन' के दावों पर फैसला करने का अधिकार फैमिली कोर्ट के पास रहता है: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

    हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट का अधिकार क्षेत्र सिर्फ इसलिए खत्म नहीं हो जाता कि तलाक का फैसला पहले ही हो चुका है, बल्कि वह स्त्रीधन, तोहफे और दूसरी शादी से जुड़ी प्रॉपर्टी से जुड़े विवादों पर फैसला कर सकता है। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 27 के तहत पत्नी का आवेदन फैमिली कोर्ट द्वारा खारिज करने का फैसला रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि मुकदमों की संख्या कम करने के लिए पति-पत्नी के बीच प्रॉपर्टी विवादों का निपटारा फैमिली कोर्ट द्वारा ही किया जाना चाहिए।

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    POCSO Act के तहत यौन इरादे से नाबालिग के प्राइवेट पार्ट को छूना गंभीर यौन हमला: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि यौन इरादे से किसी नाबालिग बच्चे के प्राइवेट पार्ट को छूना POCSO Act की धारा 10 के तहत गंभीर यौन हमला माना जाएगा। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने 3 साल 11 महीने की नाबालिग लड़की पर गंभीर यौन हमला करने के लिए एक आदमी की सज़ा और सात साल की जेल की सज़ा बरकरार रखी।

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    HMA की धारा 13B | आपसी सहमति से तलाक में 6 माह की कूलिंग ऑफ अवधि अनिवार्य नहीं: गुजरात हाईकोर्ट

    गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया, जिसमें पति-पत्नी की आपसी सहमति से तलाक की याचिका को केवल इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि हिंदू विवाह अधिनियम 1955 (HMA) की धारा 13बी के तहत छह माह की कूलिंग ऑफ अवधि का पालन किया जाना आवश्यक है।

    न्यायालय ने स्पष्ट किया कि छह माह की यह अवधि अनिवार्य नहीं बल्कि निर्देशात्मक (डायरेक्टरी) है। अदालत ने कहा कि जब दंपति के बीच सुलह की कोई संभावना नहीं है तो केवल औपचारिकता के नाम पर तलाक से इनकार करना उनके मानसिक कष्ट को अनावश्यक रूप से बढ़ाएगा।

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