कर्मचारी भविष्य निधि के लाभ स्वीकार करने पर रिटायरमेंट वेतन का अधिकार समाप्त: झारखंड हाइकोर्ट

Amir Ahmad

10 Jan 2026 7:18 PM IST

  • कर्मचारी भविष्य निधि के लाभ स्वीकार करने पर रिटायरमेंट वेतन का अधिकार समाप्त: झारखंड हाइकोर्ट

    झारखंड हाइकोर्ट की एक खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए व्यवस्था दी कि यदि कोई कर्मचारी स्वेच्छा से कर्मचारी भविष्य निधि योजना का विकल्प चुनता है और सेवानिवृत्ति के समय इसके सभी लाभ प्राप्त कर लेता है तो वह बाद में राज्य सरकार से पेंशन या रिटायरमेंट वेतन का दावा नहीं कर सकता।

    जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस राजेश कुमार की खंडपीठ ने कहा कि वर्षों तक मौन रहने और वित्तीय लाभ स्वीकार करने के बाद इस तरह की मांग करना कानून की दृष्टि में उचित नहीं है।

    यह विवाद एक ऐसे कर्मचारी से संबंधित है, जिसकी नियुक्ति वर्ष 1967 में बिहार सरकार के खाद्य आपूर्ति विभाग में चौकीदार के रूप में हुई। इसके पश्चात, वर्ष 1973 में उसे बिहार राज्य खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम में प्रतिनियुक्ति पर भेज दिया गया, जहां उसने अपनी रिटायरमेंट तक कार्य किया। अपनी सेवा समाप्त होने के बाद कर्मचारी ने तर्क दिया कि वह राज्य सरकार से रिटायरमेंट वेतन प्राप्त करने का पात्र है। उसका मुख्य तर्क यह था कि उसकी सेवाओं को आधिकारिक तौर पर निगम को स्थानांतरित नहीं किया गया और न ही इस संबंध में उसकी सहमति मांगी गई। उसने समानता के अधिकार का हवाला देते हुए एक अन्य कर्मचारी का उदाहरण भी दिया जिसे यह लाभ मिल रहा था।

    राज्य सरकार ने इस याचिका का कड़ा विरोध करते हुए स्पष्ट किया कि कर्मचारी ने अपनी सेवा के दौरान स्वयं ही कर्मचारी भविष्य निधि योजना को अपनाया था। वह नियमित रूप से इसमें अपना अंशदान जमा कर रहा था और रिटायरमेंट के समय उसने बिना किसी विरोध के इस निधि की पूरी राशि और अन्य अंतिम परिलाभ स्वीकार कर लिए थे। सरकार ने यह भी रेखांकित किया कि रिटायरमेंट के सोलह वर्षों के लंबे अंतराल के बाद इस प्रकार का दावा करना वैधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं है। इसके अतिरिक्त, राज्य ने स्पष्ट किया कि जिस दूसरे कर्मचारी से तुलना की जा रही थी, उसकी सरकारी सेवा की अवधि लंबी थी, जबकि इस याचिकाकर्ता की सरकारी सेवा मात्र छह वर्ष की, जो आनुपातिक लाभ के लिए पर्याप्त नहीं थी।

    अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि रिटायरमेंट वेतन का अधिकार कर्मचारी के आचरण और उसके द्वारा चुने गए विकल्पों पर निर्भर करता है। जब कर्मचारी ने स्वेच्छा से भविष्य निधि योजना को चुना, उसमें निरंतर योगदान दिया और अंततः लाभ प्राप्त कर लिए तो यह माना जाएगा कि उसने अपनी मर्जी से रिटायरमेंट वेतन के अधिकार का परित्याग कर दिया। अदालत ने इसे 'विवंधन' का मामला माना, जहां एक बार लाभ स्वीकार करने के बाद व्यक्ति अपनी स्थिति से पीछे नहीं हट सकता।

    "रिटायरमेंट वेतन एक संवैधानिक अधिकार हो सकता है, परंतु यदि कर्मचारी ने किसी वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था को चुनकर उसके लाभ उठा लिए हैं और वर्षों तक शांत रहा है, तो वह बाद में पुनः पुरानी व्यवस्था के लाभ की मांग नहीं कर सकता।"

    हाइकोर्ट ने सिंगल जज का पुराना आदेश रद्द कर दिया, जिसमें राज्य सरकार को भुगतान का निर्देश दिया गया। खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि कर्मचारी का आचरण और देरी इस मामले में उसके विरुद्ध जाती है, इसलिए राज्य सरकार की अपील स्वीकार की जाती है।

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