पिता द्वारा बलात्कार 'साधारण अपराध से परे', पीड़िता बेटी की गवाही ही पर्याप्त: राजस्थान हाईकोर्ट

Praveen Mishra

9 Jan 2026 6:15 PM IST

  • पिता द्वारा बलात्कार साधारण अपराध से परे, पीड़िता बेटी की गवाही ही पर्याप्त: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने POCSO मामले में बलात्कार की सजा के खिलाफ दायर अपील खारिज करते हुए कहा कि पीड़िता स्वयं, जो कि अभियुक्त की बेटी है, घटना की सबसे विश्वसनीय और सर्वोत्तम साक्षी है, क्योंकि अपने ही पिता को झूठा फँसाने का उसके पास कोई कारण नहीं हो सकता।

    जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने यह भी कहा कि एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी को सामाजिक बदनामी, पारिवारिक परिस्थितियों और आरोपों की गंभीरता के मद्देनज़र संतोषजनक रूप से समझाया गया है और केवल देरी के आधार पर अभियोजन की कहानी को खारिज नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने टिप्पणी की कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराध केवल शारीरिक चोट तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे पीड़ित के मानसिक और भावनात्मक अस्तित्व को भी गहराई से आघात पहुँचाते हैं, विश्वास, सुरक्षा और मानवीय गरिमा को तोड़ देते हैं।

    अदालत ने कहा—

    “जब अपराधी स्वयं पिता हो—जो बच्चे का स्वाभाविक संरक्षक होता है—तो ऐसा अपराध साधारण आपराधिक कृत्य से आगे बढ़कर एक घृणित और विकृत रूप ले लेता है।”

    मामले की पृष्ठभूमि

    पीड़िता की मां ने अपने पति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी कि उसने कई बार उनकी नाबालिग बेटी के साथ बलात्कार किया। इस शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज हुई और अंततः आरोपी को दोषी ठहराया गया। इस सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

    अभियुक्त की दलीलें

    अभियुक्त ने कहा कि यह शिकायत वैवाहिक विवाद के कारण झूठी है और उसकी पत्नी तलाक चाहती थी। उसने यह भी तर्क दिया कि एफएसएल और डीएनए रिपोर्ट नकारात्मक थीं, जिन्हें निचली अदालत ने नजरअंदाज किया।

    अदालत की राय

    रिकॉर्ड देखने और दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन ने संदेह से परे अपराध सिद्ध कर दिया है। अदालत ने कहा कि चिकित्सकीय साक्ष्य भी अभियोजन के संस्करण की पुष्टि करते हैं कि पीड़िता यौन उत्पीड़न की शिकार हुई थी।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि पीड़िता 12 वर्ष की नाबालिग थी, इसलिए सहमति का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(ए) के अनुसार, जब पीड़िता ने गवाही में कहा कि उसने सहमति नहीं दी थी, तो यह मान लिया जाता है कि सहमति नहीं थी।

    इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने कहा कि अभियुक्त का कृत्य केवल गंभीर अपराध ही नहीं, बल्कि पिता–पुत्री के पवित्र रिश्ते के साथ पूर्ण विश्वासघात है। अदालत ने जोर देकर कहा कि ऐसे अपराधों पर कड़ी निंदा और कठोर दंड आवश्यक है, क्योंकि किसी भी प्रकार की नरमी बच्चों की सुरक्षा के संवैधानिक और कानूनी दायित्व के विपरीत होगी।

    अंतिम आदेश

    हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह यौन उत्पीड़न पीड़िता मुआवजा योजना के तहत पीड़िता को ₹7 लाख का मुआवजा प्रदान करे।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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