जिले से बाहर विवाह करने पर स्थानीय निवासी आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट

Amir Ahmad

10 Jan 2026 6:30 PM IST

  • जिले से बाहर विवाह करने पर स्थानीय निवासी आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट

    जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि जो उम्मीदवार विवाह के बाद संबंधित जिले से बाहर निवास करता है, वह सार्वजनिक भर्ती में स्थानीय निवासी के आधार पर वरीयता का दावा नहीं कर सकता, जब तक कि वह ठोस और विश्वसनीय दस्तावेजों के माध्यम से अपने स्थानीय निवास को सिद्ध न करे।

    जस्टिस जावेद इकबाल वानी की पीठ ने यह निर्णय एक महिला अभ्यर्थी की याचिका पर सुनाया, जिसमें उसने दावा किया कि विवाह के बावजूद वह अपने मायके के गांव में ही निवास कर रही है। इसलिए उसे स्थानीय निवासी के रूप में वरीयता मिलनी चाहिए। हाइकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता अपने इस दावे को प्रमाणित करने में असफल रही है।

    हाइकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा केवल पंचायतनामा प्रस्तुत किया गया, जबकि इसके अतिरिक्त कोई भी ऐसा दस्तावेज रिकॉर्ड पर नहीं रखा गया, जिससे यह साबित हो सके कि विवाह के बाद भी वह उसी गांव में निवास कर रही थी। इसके विपरीत, सरकारी पक्ष द्वारा राशन कार्ड, मतदाता सूची और आधार कार्ड जैसे आधिकारिक अभिलेख प्रस्तुत किए गए, जिनमें याचिकाकर्ता का पता उसके पति के निवास स्थान पर दर्ज पाया गया, जो संबंधित जिले से बाहर है।

    हाइकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि उपायुक्त के निर्देश पर तहसीलदार द्वारा की गई जांच रिपोर्ट में भी यही तथ्य सामने आया। उस रिपोर्ट को याचिकाकर्ता ने कभी चुनौती नहीं दी। ऐसे में अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता का स्थानीय निवासी होने का दावा विश्वसनीय नहीं है।

    इन परिस्थितियों में हाइकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अस्थायी चयन सूची से याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी को निरस्त किया जाना पूरी तरह उचित था। अदालत ने यह भी कहा कि भर्ती विज्ञापन और उसके संशोधन में स्थानीय निवासियों को वरीयता देने का स्पष्ट प्रावधान था। उसी के अनुरूप अन्य उम्मीदवार का चयन सही ढंग से किया गया।

    चयन प्रक्रिया में देरी को लेकर लगाए गए आरोपों पर भी हाइकोर्ट ने कोई दम नहीं पाया। अदालत ने कहा कि जब तक दुर्भावना के ठोस और विश्वसनीय आधार प्रस्तुत न किए जाएं, तब तक केवल देरी के आधार पर सरकारी अधिकारियों की मंशा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।

    इस प्रकार, हाइकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए यह स्पष्ट संदेश दिया कि स्थानीय निवास के आधार पर मिलने वाली वरीयता केवल दावों से नहीं, बल्कि ठोस प्रमाणों से ही प्राप्त की जा सकती है।

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