CrPC | समन मामले में संज्ञान लेने के बाद धारा 251 के स्तर पर आरोपी को बरी नहीं कर सकता मजिस्ट्रेट: दिल्ली हाइकोर्ट

Amir Ahmad

9 Jan 2026 6:54 PM IST

  • CrPC | समन मामले में संज्ञान लेने के बाद धारा 251 के स्तर पर आरोपी को बरी नहीं कर सकता मजिस्ट्रेट: दिल्ली हाइकोर्ट

    दिल्ली हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि समन वाद में एक बार जब मजिस्ट्रेट संज्ञान ले लेता है और आरोपी को समन जारी कर देता है तो उसके बाद दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 251 के चरण पर आरोपी को कार्यवाही से मुक्त करने अथवा बरी करने का अधिकार मजिस्ट्रेट को नहीं है।

    जस्टिस अमित महाजन ने कहा कि CrPC की धारा 251 का उद्देश्य केवल इतना है कि आरोपी को उस अपराध का विवरण बताया जाए, जिसका उस पर आरोप है। उससे यह पूछा जाए कि वह दोष स्वीकार करता है या अपना बचाव प्रस्तुत करना चाहता है। यह प्रावधान मजिस्ट्रेट को न तो किसी प्रकार का मिनी ट्रायल करने की अनुमति देता है और न ही कार्यवाही समाप्त करने या समन वापस लेने की शक्ति प्रदान करता है।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 251 में न तो प्रत्यक्ष रूप से और न ही परोक्ष रूप से यह अधिकार निहित है कि मजिस्ट्रेट आरोपी के विरुद्ध कार्यवाही समाप्त कर सके। समन मामलों में औपचारिक आरोप तय करने की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि इस स्तर पर आरोपी को बरी किया जा सकता है।

    मामले के तथ्य यह थे कि याचिकाकर्ता कंपनी के पूर्व निदेशकों पर आरोप था कि उन्होंने इस्तीफा देने के बाद भी कंपनी के मूल्यवान मेडिकल उपकरणों और अन्य संपत्तियों को अवैध रूप से अपने पास रखा और उनका दुरुपयोग किया। मजिस्ट्रेट ने पहले मामले में संज्ञान लिया और आरोपियों को समन जारी किया, लेकिन बाद में CrPC की धारा 251 के स्तर पर उन्हें बरी कर दिया।

    दिल्ली हाइकोर्ट ने इस आदेश को गलत ठहराते हुए कहा कि समन वाद CrPC की के अध्याय बीस के अंतर्गत आते हैं, जहां वारंट मामलों की तरह बरी करने का कोई पृथक चरण नहीं है। अदालत ने दोहराया कि एक बार धारा 204 के तहत प्रक्रिया जारी हो जाने के बाद मजिस्ट्रेट के पास समन वाद में आरोपी को मुक्त करने का अधिकार नहीं रहता।

    हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि समन जारी करने का आदेश अंतरिम आदेश होता है, जिसकी पुनः समीक्षा मजिस्ट्रेट द्वारा नहीं की जा सकती। ऐसे में मजिस्ट्रेट का यह कहना कि वह अपने ही आदेश पर पुनर्विचार कर सकता है, विधिसंगत नहीं है।

    इन तथ्यों के आधार पर दिल्ली हाइकोर्ट ने पुनर्विचार याचिका स्वीकार करते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आरोपी को बरी करने का आदेश रद्द कर दिया और कहा कि मामले की कार्यवाही विधि अनुसार आगे बढ़ाई जाएगी।

    Next Story