ट्रायल के दौरान रिकॉर्ड साक्ष्य के आधार पर ही जोड़े जा सकते हैं अतिरिक्त आरोपी, केस डायरी सामग्री अप्रासंगिक: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

9 Jan 2026 7:01 PM IST

  • ट्रायल के दौरान रिकॉर्ड साक्ष्य के आधार पर ही जोड़े जा सकते हैं अतिरिक्त आरोपी, केस डायरी सामग्री अप्रासंगिक: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 319 के तहत किसी अतिरिक्त आरोपी को तलब करने का आधार केवल वही साक्ष्य हो सकता है, जो मुकदमे के दौरान न्यायालय के समक्ष रिकॉर्ड किया गया हो। चार्जशीट या केस डायरी में उपलब्ध सामग्री को साक्ष्य नहीं माना जा सकता। इनके आधार पर किसी व्यक्ति को अतिरिक्त आरोपी के रूप में समन नहीं किया जा सकता।

    यह टिप्पणी जस्टिस चवन प्रकाश की एकलपीठ ने दहेज मृत्यु के एक मामले में दाखिल आपराधिक पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए की। याचिका के माध्यम से मृतका के पिता ने अपने दामाद के पिता, माता और भाई को अतिरिक्त आरोपी के रूप में तलब किए जाने की मांग की थी।

    न्यायालय ने कहा कि CrPC की धारा 319 के तहत प्राप्त शक्ति असाधारण प्रकृति की है। इसका प्रयोग अत्यंत सावधानी और विवेक के साथ किया जाना चाहिए। कोर्ट ने दोहराया कि किसी व्यक्ति को अतिरिक्त आरोपी के रूप में समन करने के लिए केवल प्रथम दृष्टया मामला पर्याप्त नहीं है, बल्कि अदालत को यह संतुष्टि होनी चाहिए कि मुकदमे के दौरान रिकॉर्ड किए गए साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया से अधिक मजबूत मामला बनता है।

    मामले के संक्षिप्त तथ्य यह हैं कि मृतका के पिता मान सिंह ने निचली अदालत के 8 नवंबर, 2024 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी CrPC की धारा 319 के तहत दी गई अर्जी को खारिज कर दिया गया। अभियोजन के अनुसार, मान सिंह की पुत्री राधिका का विवाह लगभग पांच वर्ष पूर्व मनोज यादव से हुआ। आरोप था कि विवाह के बाद पति और उसके परिवारजन दहेज में भैंस और सोने की अंगूठी की मांग को लेकर राधिका को प्रताड़ित करने लगे। यह भी आरोप लगाया गया कि पति के अपनी भाभी सुनीता से अवैध संबंध थे।

    7 जनवरी, 2020 को राधिका मृत अवस्था में पाई गई। पिता ने आरोप लगाया कि उसकी पुत्री की हत्या कर शव को फांसी पर लटका दिया गया। इस संबंध में थाना स्तर पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए, 304बी और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धाराओं 3/4 के तहत FIR दर्ज की गई। हालांकि, विवेचना के दौरान पुलिस को पति के अलावा अन्य पारिवारिक सदस्यों की भूमिका नहीं मिली और केवल पति मनोज के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई।

    पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि ट्रायल के दौरान दर्ज किए गए गवाहों के बयान, विशेष रूप से सूचक और एक अन्य गवाह के बयान, ससुराल पक्ष के अन्य सदस्यों की संलिप्तता को दर्शाते हैं। वहीं, विपक्ष की ओर से यह कहा गया कि मृतका और उसका पति अन्य पारिवारिक सदस्यों से अलग रहते थे और कथित घटना में उनका कोई रोल नहीं था।

    न्यायालय ने संविधान पीठ के निर्णय 'हरदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य' के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि CrPC की धारा 319 में प्रयुक्त 'साक्ष्य' शब्द का अर्थ केवल वही साक्ष्य है, जो न्यायालय के समक्ष मुकदमे के दौरान प्रस्तुत और रिकॉर्ड किया गया हो। चार्जशीट या केस डायरी की सामग्री को साक्ष्य नहीं माना जा सकता।

    कोर्ट ने यह भी नोट किया कि विवेचक अधिकारी ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि मृतका अपने पति के साथ अलग रह रही थी और दहेज की मांग पति द्वारा ही की गई। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश सही ठहराया और कहा कि उसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।

    अंततः इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए यह दोहराया कि CrPC की धारा 319 के तहत किसी को अतिरिक्त आरोपी के रूप में तलब करना अपवादस्वरूप शक्ति है। इसका प्रयोग केवल तभी किया जाना चाहिए, जब मुकदमे में रिकॉर्ड किए गए साक्ष्य स्पष्ट रूप से इसकी मांग करते हों।

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