हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat

5 April 2026 8:00 AM IST

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    देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (30 मार्च, 2026 से 03 अप्रैल, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    पार्टियां सिंगल जज के सामने यह मान लेने के बाद कि मामला किसी बाध्यकारी मिसाल के दायरे में आता है, इंट्रा-कोर्ट अपील में उन मुद्दों को दोबारा नहीं उठा सकतीं: पटना हाईकोर्ट

    पटना हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया कि एक बार जब पार्टियाँ सिंगल जज के सामने यह मान लेती हैं कि कोई मुद्दा किसी बाध्यकारी मिसाल से पहले ही तय हो चुका है तो वे बाद में इंट्रा-कोर्ट अपील में उसी मुद्दे को दोबारा नहीं उठा सकतीं; कोर्ट ने इस बात को दोहराया कि किसी फैसले में दर्ज बयान पार्टियों पर बाध्यकारी होते हैं।

    जस्टिस सुधीर सिंह और जस्टिस राजेश कुमार वर्मा की डिवीज़न बेंच CWJC नंबर 14725/2023 में एक सिंगल जज द्वारा 08.04.2024 को पारित आदेश को चुनौती देने वाली लेटर्स पेटेंट अपील पर सुनवाई कर रही थी।

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    S. 35 BNSS | पेशी का नोटिस फिजिकली ही दिया जाना चाहिए, WhatsApp या ईमेल मान्य तरीके नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि धारा 35(3) पुलिस को यह अधिकार नहीं देती कि वह WhatsApp या ईमेल के ज़रिए गिरफ्तारी से पहले का नोटिस या FIR की कॉपी भेजे। कोर्ट ने साफ किया कि गिरफ्तारी से पहले के चरण में नोटिस को फिजिकली (व्यक्तिगत रूप से) देना अनिवार्य है, जैसा कि विधायिका का इरादा था।

    जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की सिंगल बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भरोसा करते हुए यह माना कि BNSS की धारा 35 [CrPC की धारा 41A] के तहत नोटिस का इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजा जाना अमान्य है, जैसा कि कानून में 'जानबूझकर छोड़ी गई बात' (Conscious Omission) से समझा जा सकता है। कोर्ट ने 'सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम CBI, 2026 LiveLaw (SC) 114' मामले में सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी को दोहराया कि वह धारा 35 में ऐसी कोई प्रक्रिया शामिल नहीं कर सकता, जिसका इरादा विधायिका का न रहा हो।

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    30 जून को रिटायरमेंट, 1 ​​जुलाई के सालाना इंक्रीमेंट में रुकावट नहीं- दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस अनिल क्षत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीज़न बेंच ने फैसला सुनाया कि 30 जून को रिटायर होने वाला सरकारी कर्मचारी 1 जुलाई को मिलने वाले इंक्रीमेंट का हकदार है, क्योंकि यह इंक्रीमेंट रिटायरमेंट से पहले पूरी की गई सेवा के साल के लिए अर्जित किया जाता है। इसे सिर्फ इसलिए नकारा नहीं जा सकता कि यह रिटायरमेंट के बाद देय होता है।

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    बालीग बेटों की कमाने की क्षमता पत्नी के 'स्वतंत्र' और स्थायी गुज़ारा भत्ता के अधिकार को खत्म नहीं करती: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि तलाकशुदा पत्नी का स्थायी गुज़ारा भत्ता पाने का अधिकार एक 'स्वतंत्र' और 'अलग' अधिकार है, जिसे सिर्फ़ इसलिए कम या खत्म नहीं किया जा सकता कि उसके बेटे बालीग हैं और कमाते हैं।

    यह साफ़ करते हुए कि ये बातें ज़्यादा से ज़्यादा गुज़ारा भत्ते की रकम पर असर डाल सकती हैं, लेकिन पत्नी के बुनियादी अधिकार को खत्म नहीं कर सकतीं, कोर्ट ने कहा: "...बेटों का बालीग होना और उनकी कमाने की क्षमता, भले ही कानूनी तौर पर मायने रखती हो, लेकिन हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत पत्नी के अधिकार को काफ़ी हद तक कम नहीं करती। स्थायी गुज़ारा भत्ता सिर्फ़ बच्चों पर निर्भर होने पर आधारित नहीं है, बल्कि यह शादी टूटने के बाद पति-पत्नी का एक अलग और स्वतंत्र अधिकार है।"

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    'ग्राम रोज़गार सेवक' का पद 'महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम' के तहत कोई 'वेतनभोगी पद' या 'लाभ का पद' नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि 'ग्राम रोज़गार सेवक' का पद 'महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1958' के तहत कोई "वेतनभोगी पद" या "लाभ का पद" नहीं माना जाएगा। इसलिए इस पद पर काम करने वाले चुने हुए सदस्य को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि ग्राम पंचायत का कोई भी चुना हुआ सदस्य, जो अपने पद पर रहते हुए 'ग्राम रोज़गार सेवक' के तौर पर भी काम करता है, उसे 'महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1958' की धारा 14(1)(f) या (g) के तहत अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।

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    भवन निर्माण कार्य विनियमन अधिनियम | अनुमति प्राप्त करने में धोखाधड़ी साबित होने पर शिकायतकर्ता का अधिकार क्षेत्र (Locus) अप्रासंगिक: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया कि भवन निर्माण कार्य विनियमन अधिनियम, 1958 की धारा 7-A के तहत कार्यवाही के उद्देश्य से शिकायतकर्ता का अधिकार क्षेत्र (locus) अप्रासंगिक है, जब प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट हो कि अधिनियम के तहत विकास की अनुमति धोखाधड़ी और गलत बयानी से प्राप्त की गई थी।

    भवन निर्माण कार्य विनियमन अधिनियम, 1958 की धारा 7-A में यह प्रावधान है कि यदि विकास की अनुमति धोखाधड़ी से प्राप्त की गई हो तो निर्धारित प्राधिकारी द्वारा लिखित रूप में कारण दर्ज करने के बाद उस अनुमति को रद्द किया जा सकता है। धारा 10 में यह प्रावधान है कि अधिनियम की धारा 6 के तहत दी गई अनुमति के उल्लंघन में या बिना अनुमति के किए गए किसी भी निर्माण को ध्वस्त किया जा सकता है।

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    सिर्फ़ गाली देना या जाति का नाम लेना SC/ST Act के तहत अपराध नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

    जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) की धारा 3(1)(s) के तहत अपराध साबित होने के लिए यह काफ़ी नहीं कि आरोपी सिर्फ़ किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को गाली दे या सिर्फ़ जाति का नाम ले।

    कोर्ट ने साफ़ किया कि ज़रूरी शर्त यह है कि आरोपी किसी सार्वजनिक जगह पर, जहाँ लोग देख सकें, ऐसे सदस्य को "जाति के नाम से" गाली दे।

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    Right to Education के तहत मनचाहे स्कूल में एडमिशन का अधिकार नहीं: EWS मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

    दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिक्षा का अधिकार (Right to Education) होने का मतलब यह नहीं है कि कोई स्टूडेंट अपनी पसंद के विशेष स्कूल में ही एडमिशन पाने का दावा कर सके। अदालत ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के तहत दाखिले की मांग वाली याचिका खारिज की।

    चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने कहा कि शिक्षा का अधिकार कल्याणकारी व्यवस्था है जिसका उद्देश्य सामाजिक समावेशन सुनिश्चित करना है लेकिन इसे किसी विशेष स्कूल चुनने के अधिकार के रूप में नहीं देखा जा सकता।

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    सहमति से बने किशोर संबंध को अपराध मानना अनुचित: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अपहरण केस पर लगाई रोक

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश में 15 वर्षीय लड़के के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाई। इस लड़के पर अपनी ही उम्र की लड़की के अपहरण का आरोप लगाया गया था। अदालत ने माना कि मामला सहमति से बने किशोर संबंध का प्रतीत होता है।

    जस्टिस आलोक मेहरा ने यह आदेश देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले को ध्यान में रखना जरूरी है, जिसमें कहा गया कि सहमति से बने किशोर संबंधों को नजरअंदाज करने से अन्यायपूर्ण परिणाम सामने आ सकते हैं।

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    वैवाहिक बलात्कार भले अपराध नहीं, लेकिन प्रेम संबंध में जबरन संबंध अपराध—FIR रद्द करने से इनकार: गौहाटी हाईकोर्ट

    गौहाटी हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि प्रेम संबंध (love relationship) होने से बलात्कार के अपराध की गंभीरता कम नहीं हो जाती। अदालत ने कहा कि यदि महिला की इच्छा के विरुद्ध जबरन शारीरिक संबंध बनाया जाता है, तो वह आपराधिक कृत्य ही रहेगा।

    जस्टिस प्रांजल दास की पीठ एक आपराधिक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोपी ने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी। यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) और POCSO अधिनियम की धारा 4 के तहत दर्ज अपराधों से जुड़ा है।

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    भरण-पोषण बार-बार मिलने वाला अधिकार, समझौते का उल्लंघन होने पर पत्नी फिर से शुरू कर सकती है पुरानी अर्जी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि अगर कोई पति मध्यस्थता समझौते की शर्तों का उल्लंघन करता है तो पत्नी को भरण-पोषण के लिए नई अर्जी दाखिल करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि वह पहले से शुरू की गई कार्यवाही को ही आगे बढ़ा सकती है।

    हाईकोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भरण-पोषण का अधिकार कोई एक बार मिलने वाला तोहफ़ा नहीं है, बल्कि यह एक गतिशील और बार-बार मिलने वाला अधिकार है, जो हर बार दायित्व के उल्लंघन पर नए सिरे से लागू हो जाता है।

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    बरेली नमाज़ विवाद—बड़े जमावड़े पर रोक, शांति भंग हुई तो राज्य कार्रवाई को स्वतंत्र: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में, जिसमें एक व्यक्ति को अपने घर में नमाज़ पढ़ने से रोके जाने के आरोप पर पहले 24 घंटे सुरक्षा प्रदान की गई थी, अब यह निर्देश दिया है कि वह अपने आवास पर बड़ी संख्या में लोगों को एकत्र न करे। यह आदेश जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने 25 मार्च को पारित किया।

    मामला बरेली निवासी हसीन खान से जुड़ा है, जिन्हें पहले एक अन्य पीठ द्वारा सुरक्षा दी गई थी। हालांकि, बाद में बेंच के पुनर्गठन के बाद मामले की सुनवाई नई पीठ के समक्ष हुई।

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    AGMUT कैडर के IAS अधिकारियों पर गृह मंत्रालय को कार्रवाई का अधिकार : दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम फैसले में स्पष्ट किया कि गृह मंत्रालय AGMUT (अरुणाचल प्रदेश, गोवा, मिजोरम और केंद्र शासित प्रदेश) कैडर के IAS अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने और दंड देने के लिए विधिक रूप से सक्षम है।

    जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने कहा कि संयुक्त कैडर प्राधिकरण के प्रतिनिधि के रूप में गृह मंत्रालय द्वारा की गई कार्रवाई को कानून के अधिकार से बाहर नहीं माना जा सकता।

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    मृत सरकारी कर्मचारी के परिजनों को भी मिलेगा इलाज खर्च का हक: हाईकोर्ट ने नियम में किया बदलाव

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (चिकित्सा उपस्थिति) नियम 2011 के नियम 16 की व्याख्या को व्यापक बनाते हुए कहा कि अब मृत या असमर्थ कर्मचारी के कानूनी वारिस भी चिकित्सा प्रतिपूर्ति (रिइम्बर्समेंट) का दावा कर सकेंगे।

    जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि नियम 16 को रीड डाउन करते हुए इस तरह पढ़ा जाना चाहिए कि यदि लाभार्थी (बेनेफिशियरी) की मृत्यु हो जाए या वह दावा करने में असमर्थ हो, तो उसके कानूनी वारिस भी दावा प्रस्तुत कर सकें।

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    बच्चे के भरण-पोषण के दावे में पिता के खिलाफ कमाने वाली माँ को पक्षकार बनाना ज़रूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि किसी बच्चे द्वारा अपने पिता के खिलाफ दायर भरण-पोषण की याचिका में कमाने वाली माँ को औपचारिक रूप से एक पक्षकार के तौर पर शामिल करना ज़रूरी नहीं है।

    हालांकि, जस्टिस मदन पाल सिंह की बेंच ने निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में ट्रायल कोर्ट को 'साझी माता-पिता की ज़िम्मेदारी' के सिद्धांत के आधार पर भरण-पोषण की अंतिम राशि तय करते समय, कमाने वाले दोनों माता-पिता की आर्थिक क्षमता पर विचार करना चाहिए।

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    मालिकाना हक के विवाद के कारण किसी कब्जेदार को बिजली की सप्लाई से मना नहीं किया जा सकता: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

    इस बात पर ज़ोर देते हुए कि बिजली एक बुनियादी ज़रूरत है, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ कोई सिविल केस पेंडिंग होने के आधार पर किसी उपभोक्ता की बिजली सप्लाई बंद नहीं की जा सकती, जब तक कि बिजली सप्लाई रोकने का कोई साफ़-साफ़ आदेश न हो। जस्टिस निनाला जयसूर्या 62 साल की एक महिला की दायर की गई रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे।

    इस महिला ने साल 2000 में एक प्रॉपर्टी खरीदी थी और वह उस जगह पर खुद रहते हुए (घरेलू इस्तेमाल के लिए) एक होटल (व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए) चला रही थी। हालांकि, तब एक विवाद खड़ा हो गया जब किसी दूसरे व्यक्ति (प्रतिवादी नंबर 7) ने प्रॉपर्टी पर कब्ज़े से जुड़ा सिविल कोर्ट का एकतरफ़ा (Ex-Parte) फ़ैसला हासिल कर लिया। जब उस फ़ैसले को चुनौती देने की कानूनी कार्रवाई अभी चल ही रही थी, तभी प्रतिवादी नंबर 7 ने DISCOM अधिकारियों से संपर्क किया और उसके बाद उस जगह की बिजली सप्लाई काट दी गई।

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    तलाक उसी तारीख से लागू होता है, जिस दिन उसका ऐलान किया जाता है; कोर्ट का बाद का आदेश सिर्फ़ ऐलानिया होता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि मोहम्मदिया कानून के तहत, तलाक उसी तारीख से लागू होता है, जिस दिन पति तलाक का ऐलान करता है। बाद में कोर्ट का जो आदेश इसकी पुष्टि करता है, वह सिर्फ़ ऐलानिया प्रकृति का होता है। जस्टिस मदन पाल सिंह की बेंच ने यह साफ़ किया कि कोर्ट का ऐसा आदेश फ़ैसले की तारीख से कोई नया तलाक नहीं बनाता, बल्कि यह तलाक के ऐलान की मूल तारीख से ही जुड़ा माना जाता है।

    बेंच ने साफ़ किया, "यह भी तय है कि जहाँ कोई पति तलाक का ऐलान करता है। बाद में उसी के संबंध में आदेश लेने के लिए कोर्ट जाता है तो कोर्ट द्वारा पारित आदेश आम तौर पर ऐलानिया प्रकृति का होता है, जो सिर्फ़ उस तलाक की स्थिति को मान्यता देता है या उसकी पुष्टि करता है जो पहले ही हो चुका होता है।"

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    DoE की पहले से मंज़ूरी के बिना प्राइवेट स्कूल को बंद नहीं माना जा सकता, स्टाफ़ सैलरी का हकदार: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि किसी मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूल को सिर्फ़ इसलिए "कानूनी तौर पर बंद" नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसने शिक्षा निदेशालय (DoE) से पहले से मंज़ूरी लिए बिना काम करना बंद कर दिया। इस तरह एकतरफ़ा तौर पर काम बंद कर देने से कर्मचारियों की सैलरी और सर्विस के अधिकार खत्म नहीं हो जाते।

    जस्टिस संजीव नरूला यहां के एक प्राइवेट, बिना सरकारी मदद वाले स्कूल - दयानंद आदर्श विद्यालय - से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे थे।

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    'गृहणी परिवार को कई तरह की सेवाएं देती है, वह अकुशल मज़दूर नहीं': मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दुर्घटना में महिला की मौत के बाद मुआवज़ा बढ़ाया

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दुर्घटना में जान गंवाने वाली महिला के परिजनों को दिए गए मुआवज़े की राशि बढ़ाई। कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि गृहणी के योगदान को किसी अकुशल मज़दूर के काम के बराबर नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह बिना किसी तय समय या छुट्टी के परिवार के लिए कई तरह की सेवाएं करती है।

    कोर्ट ने कहा कि उचित मुआवज़ा तय करते समय इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने मुआवज़े की राशि बढ़ाकर 12 लाख रुपये से ज़्यादा कर दी।

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    स्त्रीधन पर पत्नी का पूर्ण अधिकार, इसे लेने पर नहीं बनता आपराधिक मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि 'स्त्रीधन' पर महिला का पूर्ण अधिकार होता है और उसे लेने के लिए पत्नी के खिलाफ आपराधिक विश्वासघात (धारा 406 आईपीसी) का मामला नहीं चलाया जा सकता। जस्टिस चावन प्रकाश ने कहा कि विवाह से पहले, विवाह के समय या उसके बाद महिला को जो भी संपत्ति दी जाती है, वह उसका 'स्त्रीधन' होती है और उस पर केवल उसी का अधिकार रहता है।

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    सिर्फ एक ही पूर्वज होना पर्याप्त नहीं, संपत्ति को संयुक्त परिवार की नहीं माना जा सकता: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट

    मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया कि केवल यह तथ्य कि सभी पक्ष एक ही पूर्वज से संबंधित हैं, अपने आप में यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि संपत्ति संयुक्त परिवार की है। जस्टिस विवेक जैन की पीठ ने कहा कि संयुक्त पारिवारिक संपत्ति होने का दावा करने वाले पक्ष पर यह जिम्मेदारी है कि वह इसका प्रथम दृष्टया प्रमाण प्रस्तुत करे।

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    पति की मृत्यु के बाद भी खत्म नहीं होती भरण-पोषण की जिम्मेदारी, विधवा ससुर से मांग सकती है गुजारा भत्ता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि पति की अपनी पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उसकी मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं होती। ऐसे में विधवा को अपने ससुर से भरण-पोषण मांगने का अधिकार है।

    जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने कहा, “यह स्थापित सिद्धांत है कि पति अपनी पत्नी के भरण-पोषण के लिए बाध्य है। यह दायित्व उसकी मृत्यु के बाद भी जारी रहता है और कानून विधवा को ससुर से भरण-पोषण मांगने की अनुमति देता है।”

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    शादी के वादे का सिर्फ़ टूटना, अगर शुरू से कोई धोखा न हो तो रेप नहीं माना जाएगा: उत्तराखंड हाईकोर्ट

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि शादी के वादे का सिर्फ़ टूटना रेप नहीं माना जाएगा, जब तक कि पहली नज़र में यह साबित न हो जाए कि वह वादा शुरू से ही झूठा था और सिर्फ़ सहमति पाने के लिए किया गया। इसी सिद्धांत को लागू करते हुए कोर्ट ने IPC की धारा 376 के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने कहा कि आरोपों से ज़्यादा से ज़्यादा यही पता चलता है कि दो बालिग लोगों के बीच आपसी सहमति से बना रिश्ता टूट गया।

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    जांच के आदेश के बाद उसी सामग्री पर समन जारी नहीं कर सकता मजिस्ट्रेट: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

    जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि मजिस्ट्रेट प्रारंभिक साक्ष्य से संतुष्ट नहीं होकर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 202 के तहत जांच का आदेश देता है तो वह बाद में उसी सामग्री के आधार पर आरोपियों को समन जारी नहीं कर सकता।

    जस्टिस संजय धर ने कहा, “जब मजिस्ट्रेट प्रारंभिक साक्ष्य से संतुष्ट नहीं होता और जांच का आदेश देता है तो यह स्पष्ट है कि उपलब्ध सामग्री पर्याप्त नहीं है। ऐसे में बिना किसी नए साक्ष्य के उसी आधार पर समन जारी करना उचित नहीं है।”

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    सोशल मीडिया पोस्ट फॉरवर्ड करना BNS के तहत अपराध नहीं, मंशा जरूरी: तेलंगाना हाईकोर्ट

    तेलंगाना हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि केवल सोशल मीडिया पर किसी सामग्री को आगे बढ़ा देना (फॉरवर्ड करना) अपने आप में अपराध नहीं है, जब तक उसमें गलत मंशा या दुष्प्रेरणा (इरादा) साबित न हो। अदालत ने इसी आधार पर फेक न्यूज फैलाने के आरोप में दर्ज FIR रद्द की।

    जस्टिस के. सुजना की सिंगल बेंच ने कहा, “मान भी लिया जाए कि याचिकाकर्ताओं ने सामग्री प्रसारित या फॉरवर्ड की तब भी भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते। ऐसे में कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।”

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    माता-पिता से मिली पत्नी की संपत्ति पर पति का कोई अधिकार नहीं: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

    आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि यदि किसी हिंदू महिला को उसके माता-पिता से संपत्ति विरासत में मिलती है और उसकी मृत्यु बिना वसीयत के हो जाती है तो उस संपत्ति पर उसके पति या उसके ससुराल पक्ष का कोई अधिकार नहीं होगा।

    जस्टिस तरलाडा राजशेखर राव ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15(2)(क) का हवाला देते हुए कहा, “यदि किसी महिला को संपत्ति उसके पिता या माता से मिली है और उसकी मृत्यु बिना संतान के होती है तो ऐसी संपत्ति उसके पिता के उत्तराधिकारियों को जाएगी न कि पति को।”

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    संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में नाबालिग के लिए अलग अभिभावक जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी हिंदू नाबालिग का हित अविभाजित संयुक्त परिवार की संपत्ति में है तो उसके लिए अलग से अभिभावक नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे मामलों में परिवार का वयस्क सदस्य ही संपत्ति का प्रबंधन करता है।

    जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने कहा, “यदि नाबालिग का हित संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में है तो परिवार का वयस्क सदस्य चाहे पुरुष हो या महिला उस संपत्ति की देखभाल करेगा और अलग से अभिभावक नियुक्त करने की जरूरत नहीं है।”

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    जनजाति से होने मात्र से तलाक पर रोक नहीं, ठोस परंपरा साबित करना जरूरी: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल अनुसूचित जनजाति से संबंध होने के आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) के तहत तलाक की कार्यवाही को रोका नहीं जा सकता। इसके लिए यह साबित करना आवश्यक है कि संबंधित समुदाय में विवाह और तलाक के लिए अलग मान्य परंपराएं मौजूद हैं।

    जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए पत्नी की अपील खारिज की। पत्नी ने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उसका आवेदन खारिज कर दिया गया था। उसने यह दलील दी थी कि दोनों पक्ष मीणा समुदाय से हैं, जो अनुसूचित जनजाति में आता है, इसलिए हिंदू विवाह अधिनियम लागू नहीं होता।

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    मुसलमान भी नाबालिग की कस्टडी मांगने के लिए 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' के प्रावधानों का सहारा ले सकते हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जो लोग मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आते हैं, उन्हें 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890' के तहत किसी नाबालिग की कस्टडी मांगने से रोका नहीं जा सकता। जस्टिस अनिल कुमार-X की बेंच ने कहा कि हालांकि पर्सनल लॉ पार्टियों के अधिकारों को तय करने में कोर्ट की मदद कर सकता है। फिर भी सबसे ज़रूरी बात हमेशा नाबालिग का भला ही होता है, जो बाकी सभी बातों से ऊपर होता है।

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    Section 144 BNSS | बहू पर सास-ससुर के भरण-पोषण की कानूनी बाध्यता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि CrPC की धारा 125 या BNSS की धारा 144 के कानूनी प्रावधानों के तहत बहू पर अपने सास-ससुर के भरण-पोषण की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यह देखते हुए कि BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार एक कानूनी अधिकार है और यह केवल उन व्यक्तियों की श्रेणियों तक ही सीमित है, जिनका उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया, जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी की कि सास-ससुर उक्त प्रावधान के दायरे में नहीं आते हैं।

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    बिना तलाक शादीशुदा व्यक्ति लिव-इन में नहीं रह सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने 20 मार्च को यह टिप्पणी की कि कोई व्यक्ति जो पहले से विवाहित है और जिसका जीवनसाथी जीवित है, वह बिना पूर्व जीवनसाथी से तलाक लिए किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में कानूनी रूप से नहीं रह सकता। जस्टिस विवेक कुमार सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी उस रिट याचिका को खारिज करते हुए की, जो एक ऐसे जोड़े द्वारा दायर की गई थी (दोनों अलग-अलग लोगों से विवाहित थे), जिसमें उन्होंने शांतिपूर्ण जीवन में हस्तक्षेप न करने और सुरक्षा प्रदान करने के लिए निर्देश (मैंडमस) की मांग की थी।

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