बालीग बेटों की कमाने की क्षमता पत्नी के 'स्वतंत्र' और स्थायी गुज़ारा भत्ता के अधिकार को खत्म नहीं करती: राजस्थान हाईकोर्ट
Shahadat
4 April 2026 9:39 AM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि तलाकशुदा पत्नी का स्थायी गुज़ारा भत्ता पाने का अधिकार एक 'स्वतंत्र' और 'अलग' अधिकार है, जिसे सिर्फ़ इसलिए कम या खत्म नहीं किया जा सकता कि उसके बेटे बालीग हैं और कमाते हैं।
यह साफ़ करते हुए कि ये बातें ज़्यादा से ज़्यादा गुज़ारा भत्ते की रकम पर असर डाल सकती हैं, लेकिन पत्नी के बुनियादी अधिकार को खत्म नहीं कर सकतीं, कोर्ट ने कहा:
"...बेटों का बालीग होना और उनकी कमाने की क्षमता, भले ही कानूनी तौर पर मायने रखती हो, लेकिन हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत पत्नी के अधिकार को काफ़ी हद तक कम नहीं करती। स्थायी गुज़ारा भत्ता सिर्फ़ बच्चों पर निर्भर होने पर आधारित नहीं है, बल्कि यह शादी टूटने के बाद पति-पत्नी का एक अलग और स्वतंत्र अधिकार है।"
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की बेंच ने इस तरह एक पत्नी को दिए गए स्थायी गुज़ारा भत्ते की रकम ₹25 लाख से बढ़ाकर ₹40 लाख की।
बेंच ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 का दायरा सिर्फ़ गुज़ारा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मकसद आर्थिक रूप से कमज़ोर पति या पत्नी के लिए सम्मानजनक गुज़ारा और लंबे समय तक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करना है।
संक्षेप में मामला
कोर्ट दो क्रॉस-अपीलों पर सुनवाई कर रहा था, जिनमें फ़ैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई। इस आदेश में दोनों पक्षों की शादी खत्म की और पति (जो स्पेशलिस्ट मेडिकल ऑफिसर है) को स्थायी गुज़ारा भत्ते के तौर पर ₹25 लाख देने का निर्देश दिया गया।
अपनी अपील में पत्नी ने गुज़ारा भत्ते की रकम बढ़ाकर ₹2 करोड़ करने की मांग की, जबकि पति ने अपनी अपील में गुज़ारा भत्ते की रकम को चुनौती दी। उसने दावा किया कि यह रकम बहुत ज़्यादा है। उसके बालीग, सेहतमंद बेटों की यह कानूनी ज़िम्मेदारी है कि वे अपनी माँ का गुज़ारा करें।
संदर्भ के लिए, दोनों पक्षों की शादी अप्रैल 1994 में हुई थी। वे 2009 में अलग हो गए और पत्नी ने 2015 में तलाक के लिए अर्ज़ी दी। जोधपुर के फ़ैमिली कोर्ट ने 29 अगस्त, 2025 को दिए अपने फ़ैसले में शादी को खत्म कर दिया। किसी भी पक्ष ने तलाक के इस फ़ैसले को चुनौती नहीं दी।
पेश की गई दलीलें
अपीलकर्ता-पत्नी का यह कहना था कि उसके पति-प्रतिवादी की मासिक सैलरी ₹90,000 है, जो प्राइवेट प्रैक्टिस, RTO से जुड़े मेडिकल टेस्ट और एक मेडिकल एजेंसी से होने वाली कमाई को मिलाकर,शुरू में कुल लगभग ₹2,90,000 की मासिक आय बनती थी।
हालांकि, हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान, उसने दावा किया कि उसकी कमाई लगभग ₹8-10 लाख प्रति माह है। नतीजतन, उसने स्थायी गुज़ारा भत्ते के तौर पर ₹2 करोड़ की मांग की।
दूसरी ओर, पति ने अपनी मासिक सैलरी से जुड़े इस दावे को नकार दिया। इसके बजाय, उसने दावा किया कि पत्नी एक काबिल वकील है, जो हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करती है और लगभग ₹50 हज़ार प्रति माह कमाती है। साथ ही वह एक प्राइवेट स्कूल में टीचर के तौर पर भी काम करती है।
पति के वकील ने यह दलील भी दी कि दोनों बेटे बालिग हो चुके हैं और उन्हें कोई शारीरिक अक्षमता नहीं है। इसलिए उनके भरण-पोषण की आर्थिक ज़िम्मेदारी उस पर नहीं डाली जा सकती।
पति ने यह तर्क भी दिया कि शारीरिक रूप से सक्षम बालिग बेटे होने के नाते वे कानूनी तौर पर अपनी माँ (अपीलकर्ता) का सहारा बनने के लिए बाध्य हैं और ट्रायल कोर्ट ने इस स्थापित कानूनी स्थिति को नज़रअंदाज़ करके गलती की।
पति ने यह गुहार भी लगाई कि उसकी बुज़ुर्ग, बिस्तर पर पड़ी माँ के प्रति उसकी आर्थिक ज़िम्मेदारियाँ हैं, जिनके इलाज पर हर महीने लगभग ₹35 हज़ार का खर्च आता है। साथ ही एक दिव्यांग भाई भी उस पर निर्भर है।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने शुरू में ही यह बात नोट की कि हालांकि पति पर अपने माता-पिता और भाई के प्रति कुछ आर्थिक ज़िम्मेदारियां हैं, लेकिन ये ज़िम्मेदारियां इतनी ज़्यादा नहीं हैं कि वे अपनी पत्नी के लिए एक उचित, एकमुश्त आर्थिक इंतज़ाम करने की उसकी क्षमता को काफ़ी हद तक कम कर दें।
पत्नी की कमाने की क्षमता के बारे में कोर्ट ने नोट किया कि उसकी अपनी अलग से कोई आमदनी है, यह साबित करने का बोझ पति पर ही है।
कोर्ट को इस बात का कोई ठोस सबूत नहीं मिला कि पत्नी की कोई स्थिर या पर्याप्त आमदनी है, जिससे वह शादी के दौरान अपने वैवाहिक घर में जिस स्तर का जीवन जीती थी, उसी स्तर का जीवन वह अब भी जी सके; कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पति द्वारा पेश किए गए दस्तावेज़ 2011 से पहले के समय से जुड़े थे।
पति की आर्थिक स्थिति के बारे में कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट में पति द्वारा दायर किए गए हलफ़नामे पर भरोसा किया, जिसमें उसकी नियमित और स्थिर मासिक आमदनी लगभग ₹2 लाख बताई गई।
कोर्ट ने उसकी अचल संपत्तियों पर भी ध्यान दिया, जिसमें उसका अपना खरीदा हुआ रिहायशी मकान और पुश्तैनी खेती और रिहायशी ज़मीन-जायदाद में उसका अविभाजित हिस्सा शामिल था।
खास बात यह है कि कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पत्नी के पास रहने के लिए अपना कोई अलग से मकान नहीं है। बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि तलाक़शुदा पत्नी का रहने के लिए उचित जगह पाने का अधिकार, गुज़ारा-भत्ता से जुड़े क़ानून का एक जाना-माना और अहम पहलू है।
कोर्ट ने आगे कहा कि इसलिए पत्नी को दी जाने वाली रक़म इतनी होनी चाहिए कि वह कम-से-कम रहने के लिए एक ठीक-ठाक जगह का इंतज़ाम कर सके और अपनी लंबे समय की आर्थिक सुरक्षा भी सुनिश्चित कर सके।
एक और अहम बात यह है कि बेंच ने बेटों के बालिग होने और उनकी कमाने की क्षमता के बारे में पति की दलील ख़ारिज की। कोर्ट ने नोट किया कि ये बातें हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत पत्नी के अधिकारों को काफ़ी हद तक कम नहीं करती हैं।
हालांकि, बेंच ने पत्नी द्वारा माँगी गई ₹2 करोड़ की बहुत ज़्यादा रक़म की मांग को भी यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि यह मांग उचित अनुपात में नहीं है। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कोर्ट को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि गुज़ारा-भत्ता (एलिमनी) सिर्फ़ सहारा देने के लिए हो, न कि पत्नी को अमीर बनाने का ज़रिया बन जाए।
बेंच ने कहा,
"ज़रूरत इस बात की है कि एक संतुलित, वास्तविक और न्यायसंगत फ़ैसला लिया जाए, जिससे न तो पति पर बेवजह का आर्थिक बोझ पड़े और न ही पत्नी आर्थिक रूप से कमज़ोर या असुरक्षित स्थिति में रह जाए।"
इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए और शादी की लंबी अवधि (15 साल) तथा अलग रहने की अवधि (16 साल), पत्नी की अपनी कोई आमदनी न होने और रहने की कोई सुरक्षित जगह न होने, पति की स्थिर कमाने की क्षमता और बढ़ती हुई महँगाई के रुझानों को देखते हुए कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि शुरू में तय की गई ₹25 लाख की रक़म काफ़ी कम थी। इस प्रकार, हाईकोर्ट ने स्थायी गुज़ारा भत्ता बढ़ाकर ₹40 लाख कर दिया और पति को यह राशि छह महीने के भीतर चुकाने का निर्देश दिया।
तब तक उसे ₹45,000/- का मौजूदा मासिक गुज़ारा भत्ता देना जारी रखने का निर्देश दिया गया।
Case title - Shobha Kanwar vs Narpat Singh

