S. 35 BNSS | पेशी का नोटिस फिजिकली ही दिया जाना चाहिए, WhatsApp या ईमेल मान्य तरीके नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट

Shahadat

4 April 2026 8:31 PM IST

  • S. 35 BNSS | पेशी का नोटिस फिजिकली ही दिया जाना चाहिए, WhatsApp या ईमेल मान्य तरीके नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि धारा 35(3) पुलिस को यह अधिकार नहीं देती कि वह WhatsApp या ईमेल के ज़रिए गिरफ्तारी से पहले का नोटिस या FIR की कॉपी भेजे। कोर्ट ने साफ किया कि गिरफ्तारी से पहले के चरण में नोटिस को फिजिकली (व्यक्तिगत रूप से) देना अनिवार्य है, जैसा कि विधायिका का इरादा था।

    जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की सिंगल बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भरोसा करते हुए यह माना कि BNSS की धारा 35 [CrPC की धारा 41A] के तहत नोटिस का इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजा जाना अमान्य है, जैसा कि कानून में 'जानबूझकर छोड़ी गई बात' (Conscious Omission) से समझा जा सकता है। कोर्ट ने 'सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम CBI, 2026 LiveLaw (SC) 114' मामले में सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी को दोहराया कि वह धारा 35 में ऐसी कोई प्रक्रिया शामिल नहीं कर सकता, जिसका इरादा विधायिका का न रहा हो।

    कोर्ट ने राय दी,

    "...सुप्रीम कोर्ट का मानना ​​है कि अपराध या किसी अन्य जानकारी का इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजा जाना वह बात नहीं है, जिसके बारे में विधायिका ने सोचा था। धारा 35(3) पुलिस को यह अधिकार नहीं देती कि वह इलेक्ट्रॉनिक कॉपी या WhatsApp के ज़रिए नोटिस या FIR की कॉपी भेजे। इसे अनिवार्य रूप से फिजिकली ही दिया जाना चाहिए..."

    'सतेंद्र कुमार अंतिल' मामले सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी:

    "विधायिका ने अपनी समझदारी से BNSS, 2023 की धारा 35 के तहत नोटिस देने की प्रक्रिया को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अनुमत प्रक्रियाओं के दायरे से विशेष रूप से बाहर रखा है... विधायिका द्वारा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के उपयोग पर लगाई गई पाबंदियां—जो केवल कुछ खास प्रक्रियाओं तक सीमित हैं—किसी भी अन्य प्रक्रिया के लिए इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के उपयोग को रोकती हैं..."

    राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि पुलिस पिछले 40 दिनों से भी ज़्यादा समय से याचिकाकर्ता को ढूंढ रही थी, ताकि उसे गिरफ्तारी से पहले के नोटिस की फिजिकल कॉपी सौंपी जा सके। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता ने यह तर्क दिया कि अगर पुलिस का मकसद सिर्फ उसे कार्यवाही के बारे में सूचित करना ही था तो वह आसानी से इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी नोटिस भेज सकती थी।

    युगादेव और उसकी पत्नी, जो खुद को योग शिक्षक बताते हैं, 'जय भैरवी देवी' (JBD) नाम की एक कंपनी चला रहे हैं और शिकायतकर्ताओं से निवेश के तौर पर पैसे इकट्ठा कर रहे थे। आरोप है कि इस दंपति ने निवेशकों के साथ करीब 98 लाख रुपये की धोखाधड़ी की। याचिकाकर्ता पर 9 दिसंबर, 2025 को अडुगोडी पुलिस स्टेशन में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66(c) [पहचान की चोरी] और 66(d) [कंप्यूटर संसाधन का उपयोग करके प्रतिरूपण द्वारा धोखाधड़ी] और BNS की धारा 318(4) [धोखाधड़ी और बेईमानी से संपत्ति की सुपुर्दगी के लिए प्रेरित करना] के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया। हालांकि, उसे 17 जनवरी, 2026 को ही गिरफ्तार किया गया, क्योंकि वह 40 दिनों से अधिक समय से पुलिस से बच रहा था। यहां तक कि 17 जनवरी को भी, पुलिस ने उससे आमना-सामना होने पर उसे भौतिक नोटिस देने की कोशिश की, लेकिन आरोपी ने उसे स्वीकार करने से इनकार किया।

    जब आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया तो उसकी गिरफ्तारी को मंजूरी दी गई। उसने उक्त आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

    सिंगल जज बेंच ने टिप्पणी की,

    “पुलिस ने गिरफ्तारी के लिए यह कारण बताया कि आरोपी फरार चल रहा था। संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट ने भी विवादित आदेश में यह दर्ज किया कि याचिकाकर्ता ने BNSS की धारा 35(3) के तहत नोटिस स्वीकार नहीं किया और जांच में सहयोग करने तथा अपनी गिरफ्तारी का विरोध किया।”

    न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि आरोपी द्वारा लगभग 40 दिनों तक BNSS की धारा 35(3) के नोटिस को भौतिक रूप से प्राप्त करने से बचने का तथ्य 'असहयोगी व्यवहार' के समान है। इसलिए न्यायालय ने गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की।

    आगे कहा गया,

    “पुलिस 40 दिनों से याचिकाकर्ता को धारा 35(3) के नोटिस की भौतिक प्रति सौंपने के लिए उसकी तलाश कर रही थी। याचिकाकर्ता के असहयोगी व्यवहार के कारण उसे हिरासत में लेने के लिए यह परिस्थिति पर्याप्त है। पुलिस द्वारा याचिकाकर्ता को हिरासत में लेने से याचिकाकर्ता का कोई भी अधिकार—विशेषकर कोई संवैधानिक अधिकार—छिन नहीं जाता है। प्रस्तुत मामले में गिरफ्तारी से संबंधित सभी बारीकियों का पालन किया गया। उसके बाद ही याचिकाकर्ता को हिरासत में लिया गया।”

    न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि गिरफ्तारी-पूर्व नोटिस की भौतिक तामील न हो पाने का दोष स्वयं आरोपी पर ही डाला जाना चाहिए। न्यायालय की राय में यह बात पुलिस हिरासत को उचित ठहराती है।

    Case Title: Mr. Yugadev R. v. State of Karnataka & Others

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