भरण-पोषण बार-बार मिलने वाला अधिकार, समझौते का उल्लंघन होने पर पत्नी फिर से शुरू कर सकती है पुरानी अर्जी: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
2 April 2026 10:47 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि अगर कोई पति मध्यस्थता समझौते की शर्तों का उल्लंघन करता है तो पत्नी को भरण-पोषण के लिए नई अर्जी दाखिल करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि वह पहले से शुरू की गई कार्यवाही को ही आगे बढ़ा सकती है।
हाईकोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भरण-पोषण का अधिकार कोई एक बार मिलने वाला तोहफ़ा नहीं है, बल्कि यह एक गतिशील और बार-बार मिलने वाला अधिकार है, जो हर बार दायित्व के उल्लंघन पर नए सिरे से लागू हो जाता है।
जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ मूल रूप से एक पति द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण अर्जी पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी पत्नी को भरण-पोषण के तौर पर 9,000 रुपये की राशि देने का निर्देश दिया गया।
पति ने अपनी अर्जी में कहा था कि अक्टूबर, 2021 में हाईकोर्ट के मध्यस्थता और सुलह केंद्र के समक्ष पति-पत्नी के बीच एक समझौता हुआ था। वे साथ रहने पर सहमत हुए थे; इस समझौते में यह भी तय हुआ था कि वे एक-दूसरे के खिलाफ दायर सभी मामले वापस ले लेंगे।
पति ने दलील दी कि चूंकि उसकी पत्नी यह आरोप लगा रही थी कि इस समझौते के बाद उसने (पति ने) उसके साथ मारपीट की और उसे घर से निकाल दिया, इसलिए अब एक बिल्कुल नया 'कॉज़ ऑफ़ एक्शन' (मुकदमे का आधार) पैदा हो गया। उसने तर्क दिया कि पत्नी को CrPC की धारा 125 के तहत अपनी पुरानी कार्यवाही जारी रखने के बजाय भरण-पोषण के लिए एक नई अर्जी दाखिल करनी चाहिए थी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज किया, क्योंकि उसने यह टिप्पणी की कि भरण-पोषण देने का दायित्व एक बार-बार होने वाला और निरंतर चलने वाला दायित्व है, न कि कोई एक अकेली घटना।
कोर्ट ने यह भी कहा कि CrPC की धारा 125 सामाजिक कानून है, जिसकी व्याख्या पत्नी और बेटी के कल्याण और लाभ को ध्यान में रखते हुए उदारतापूर्वक की जानी चाहिए।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब भरण-पोषण देने का दायित्व एक निरंतर चलने वाला दायित्व है तो ऐसे में बार-बार नई अर्ज़ियां दाखिल करने पर ज़ोर देना अनुचित होगा।
जस्टिस सिंह ने आगे कहा कि चूंकि पति ने कथित तौर पर अंतिम समझौता-पत्र की शर्तों का उल्लंघन किया, इसलिए पत्नी द्वारा पहले से शुरू की गई कार्यवाही को ही आगे बढ़ाना पूरी तरह से उचित था।
भरण-पोषण की राशि (कितना पैसा दिया जाए) के सवाल पर पति ने दावा किया कि वह दिहाड़ी मज़दूर है और आर्थिक तंगी का सामना कर रहा है। इसलिए 9,000 रुपये की मासिक राशि बहुत ज़्यादा है।
दूसरी ओर, पत्नी ने कहा कि उसका पति मुरादाबाद में पीतल का कारोबार करता है। हालांकि वह अपने इस दावे को साबित करने के लिए कोई दस्तावेज़ी सबूत पेश नहीं कर सकी। उसके बिज़नेस के बारे में पक्के सबूत न होने पर हाईकोर्ट ने उसकी कमाने की क्षमता के अनुमान पर भरोसा किया। चूंकि पति ने किसी भी तरह की शारीरिक अक्षमता का दावा नहीं किया। इसलिए कोर्ट ने कहा कि एक स्वस्थ व्यक्ति होने के नाते, वह अपनी कानूनी तौर पर शादीशुदा पत्नी का भरण-पोषण करने की अपनी कानूनी ज़िम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।
कोर्ट ने एक मज़दूर के तौर पर उसकी संभावित कमाई 700 रुपये प्रतिदिन मानी और इसलिए उसकी मासिक आय 21,000 रुपये होने का अनुमान लगाया। कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण भत्ता आम तौर पर पति की कुल आय के 25% तक दिया जा सकता है।
इस तरह अनुमानित 21,000 रुपये की आय का 25% हिसाब लगाने पर कोर्ट 5,250 रुपये के आंकड़े पर पहुंचा।
बेंच ने यह निष्कर्ष निकाला कि हालांकि पति की अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने की कानूनी ज़िम्मेदारी होती है, लेकिन दी गई रकम उचित और उसकी असल आर्थिक क्षमता के अनुपात में होनी चाहिए।
नतीजतन, हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण (Criminal Revision) को आंशिक रूप से मंज़ूर कर लिया और भरण-पोषण की रकम 9,000 रुपये से घटाकर 5,250 रुपये प्रति माह की।
Case title - Murtaza Alias Phool Miya Alias Guddu vs. State of U.P. and Another 2026 LiveLaw (AB) 165

