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जानिए शांति भंग होने के संदेह में मजिस्ट्रेट (प्रशासन) कौन से लोगों से बांड (ज़मानत) मांग सकता है

Shadab Salim
5 July 2020 4:40 PM GMT
जानिए  शांति भंग होने के संदेह में मजिस्ट्रेट (प्रशासन) कौन से लोगों से बांड (ज़मानत) मांग सकता है
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कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं, जिनमें शांति बनाए रखे जाना नितांत आवश्यक हो जाता है। समाज में कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं, जिनके कार्यों से समाज के भीतर परिशांति भंग हो जाने का खतरा होता है। समय-समय पर राज्य प्रशासन ऐसे लोगों से प्रतिभूति सहित या रहित बंधपत्र लेता है। प्रशासन का मुख्य उद्देश्य राज्य में शांति की स्थापना करना होता है। इस शांति की स्थापना हेतु ही प्रतिभूति ली जाती है।

समाज में ऐसे कई अभ्यस्त अपराधी होते हैं जो बार बार अपराध करते हैं तथा अपराध का दोहराव करते हैं। इनके अपराधों से समाज के साधारण लोगों में भय उत्पन्न होता है तथा संकटकारी परिस्थितियां जन्म लेती हैं। ऐसी परिस्थितियों के कारण समाज में साधारण लोगों का जीवन संकटमय और भयाक्रांत हो जाता है।

इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु भारत के कानून में दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अंतर्गत पुलिस शक्ति का समावेश किया गया है तथा या शक्ति राज्य के कार्यपालक मजिस्ट्रेट को सौंपी गयी है। कार्यपालक मजिस्ट्रेट समाज में परिशांति बनाए रखने के प्रयास करता है।

वह व्यक्ति जिनसे ऐसी प्रतिभूति ली जाती है

दंड प्रक्रिया सहिंता के अध्याय -8 में ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख किया गया है, जिनसे ऐसी प्रतिभूति ली जा सकती है। वह व्यक्ति निम्न हैं-

दोषसिद्ध होने पर दोषी से प्रतिभूति ली जाना

अनेक ऐसे अपराधिक प्रकरण होते हैं, जिनमें दोषी सिद्ध हो जाने पर सत्र न्यायालय या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के न्यायालय द्वारा प्रतिभूति ली जाती है। किसी व्यक्ति के दोषी सिद्ध हो जाने पर सेशन न्यायालय या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट प्रतिभूति लेता है तथा यह प्रतिभूति में इन शर्तो का समावेश होता है कि दोषसिद्ध हो जाने के पश्चात दोषी द्वारा कोई ऐसा कार्य नहीं किया जाएगा जिससे परिशांति भंग हो।

न्यायालय प्रतिभूति का ऐसा आदेश 3 वर्ष से कम अवधि के लिए दे सकता है। धारा 106 के अंतर्गत जैसे विशेष अपराध बताए गए हैं, जिन अपराधों में व्यक्ति के दोष सिद्ध हो जाने के पश्चात न्यायालय द्वारा प्रतिभूति की मांग की जा सकती है।

साधारण मामले में परिशांति बनाए रखने के लिए प्रतिभूति

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107 के अंतर्गत कार्यपालक मजिस्ट्रेट को यह शक्ति प्राप्त है, यदि उसे इत्तिला मिलती है यह मुमकिन है कि कोई व्यक्ति परिशांति भंग करेगा या लोक शांति विक्षुब्ध करेगा या कोई ऐसा सदोष कार्य करेगा जिससे या मुमकिन है कि परिशांति भंग हो जाएगी या लोक शांति विक्षुब्ध हो जाएगी तब यदि उसकी राय में कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार है तो वह ऐसे व्यक्ति को प्रतिभूति सहित या रहित उसके विवेक के अनुसार बंधपत्र निष्पादित करने के लिए आदेश दे सकता।

इस धारा के अनुसार प्रतिभूति सहित या रहित बंधपत्र निष्पादन आदेशित करने के लिए मामले में कुछ तत्वों का होना आवश्यक है।

1) कार्यपालक मजिस्ट्रेट के पास इस बात की सूचना होना चाहिए कि कोई व्यक्ति परिशांति भंग करेगा या लोक शांति विक्षुब्ध करेगा या कोई ऐसा ऐसा कार्य करेगा, जिससे परिशांति भंग होने या लोक शांति विक्षुब्ध होने की संभावना है।

2) कार्यपालक मजिस्ट्रेट की राय में उस व्यक्ति के विरुद्ध जिसके बारे में इत्तिला मिली हो कार्यवाही करने का पर्याप्त आधार हो।

3) वह स्थान जहां पर शांति भंग होने या लोक शांति विक्षुब्ध (डिस्टर्ब) होने की आशंका हो उसकी स्थानीय अधिकारिता के अंदर होना चाहिए या वह व्यक्ति उसकी अधिकारिकता अंदर हो जिसके द्वारा उस मजिस्ट्रेट की अधिकारिता से परे लोक शांति भंग किए जाने की आशंका हो।

रंग लाल महतो बनाम बिहार राज्य AIR 1979 के वाद में कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति को 1 वर्ष की अवधि के लिए बंदपत्र निष्पादन हेतु आदेशित किया गया हो और उक्त आदेश से पुनरीक्षण या अपील करने में 1 वर्ष की समय अवधि व्यतीत हो चुकी हो तो वह स्वयं को बंधपत्र के निष्पादन से नहीं बचा सकता। अपील या पुनरीक्षण के बाद बंधपत्र निष्पादित करना होगा।

रामचंद्र दास बनाम कैलाश चंद्र 1993 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चय किया की धारा 107 के अधीन जांच के आधार पर की गयी कार्यवाही ठीक थी, किंतु 6 माह की अवधि सीमा बीत चुकी होने के कारण कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा विशेष कारणों का अभी लेखन किया जाना आवश्यक था।

मूसा मोहम्मद बनाम अमीन एआरआई 1967 केरल के मामले में अभिनिर्धारित किया गया है कि इस धारा के प्रयोजन के लिए सदोष कार्यवाही होगी जो विधि के अनुसार गलत हो।

राजद्रोह की बातें फैलाने वाले व्यक्ति से बंधपत्र लेना

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 108 के अंतर्गत वर्तमान परिदृश्य में बड़ी महत्वपूर्ण बात रखी गयी है। यह आज हमें राजनीतिक धरने प्रदर्शनों या फिर सरकार के विरुद्ध बोलने वाले व्यक्तियों के संदर्भ में रूप से देखने को मिलती है। समय-समय पर सरकार की नीतियों से आहत लोग या सरकार विरोधी लोग धरने इत्यादि समागम करते है। वहां अनेक बातें राजद्रोह से संबंधित हो जाती है।

वहां पर कार्यपालक मजिस्ट्रेट को यह शक्ति प्राप्त है कि उसकी स्थानीय अधिकारिता के भीतर कोई व्यक्ति मौखिक या लिखित रूप से कोई ऐसी बात का प्रकाशन कर रहा है जो भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए , 153ए , 153बी और 295 ए के अधीन दंडनीय है।

या फिर न्यायपालिका की मानहानि करता है या अश्लील वस्तुओं का विक्रय करता है या विक्रय करने के लिए बनाता है उनको आयात करता है उनको भाड़े पर चलाता है, ऐसे कोई भी कार्य करने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों से कार्यपालक मजिस्ट्रेट धारा 108 के अंतर्गत सदाचार के लिए प्रतिभूति मांग सकता है।

संदिग्ध व्यक्तियों से प्रतिभूति

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 109 के अंतर्गत कार्यपालक मजिस्ट्रेट अपने क्षेत्राधिकार के भीतर किसी संदिग्ध व्यक्ति से प्रतिभूति मांग सकता है। ऐसा संदिग्ध व्यक्ति अपनी उपस्थिति छिपाने में चालाकी बरत रहा हो या फिर संदिग्ध व्यक्ति अपनी उपस्थिति को किसी संज्ञेय अपराध को कारित करने की नियत से छुपा रहा हो तो कार्यपालक मजिस्ट्रेट धारा 109 के अंतर्गत ऐसे संदिग्ध व्यक्ति से प्रतिभूति प्राप्त करने का अधिकारी होता है।

राज्य बनाम अमूल कुमार के एक पुराने मामले में विनिश्चय हुआ है यदि कोई व्यक्ति गिरफ्तारी से बचने के लिए स्वयं को छिपाता है तो इस धारा के अंतर्गत कार्यवाही नहीं की जा सकती। इस धारा की कार्यवाही ऐसे संदिग्ध व्यक्ति के प्रति की जाएगी जो कोई संज्ञेय अपराध करने की टोह में बैठा हो। कुछ सीमा तक यह दंड प्रक्रिया सहिंता की धारा 151 के प्रकार की है परन्तु अंतर यह है कि उस धारा में अपराध रोकने के लिए पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जाता है।

अभ्यस्त अपराधियों से प्रतिभूति

कुछ व्यक्ति आदतन या अभ्यस्त अपराधी होते है जो बार-बार कोई अपराध करते है। ऐसे अपराधियों का समाज में बगैर प्रतिभूति के स्वतंत्र रूप से रहना घातक होता है। कार्यपालक मजिस्ट्रेट को ऐसे अभ्यस्त अपराधियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति लेने की शक्ति प्राप्त है।

जब कार्यपालक मजिस्ट्रेट को ऐसे किसी अभ्यस्त अपराधिक की जानकारी मिलती है जो उसकी स्थानीय अधिकारिता के भीतर है तथा जो बार-बार कोई विशेष प्रकार के अपराध जैसे लूट, गृहभेदन, चोरी, कूटरचना, छल, चुराई हुई संपत्ति को ठिकाने लगाना या अपहरण, धमकी, रिष्टि जैसे गंभीर अपराधों में बार-बार संलिप्त रहता है। ऐसे अपराधी अभ्यस्त अपराधी होते है। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 110 के अंतर्गत कार्यपालक मजिस्ट्रेट ऐसे अपराधियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति सहित या रहित बंधपत्र लेकर उनसे समाज का संरक्षण करता है।

अभ्यस्त अपराधियों का समाज में स्वतंत्र विचरण समाज के लिए घातक सिद्ध हो जाता है। इसके लिए यह प्रतिभूति नितांत आवश्यक है।

मैसूर राज्य बनाम शिवप्पा के मामले में अभ्यस्त शब्द के अंतर्गत मजिस्ट्रेट अपराधी के पूर्व आचरण एवं उसके पूर्व में किए गए अपराध कृत्य, उसकी दुष्ट प्रवृत्तियों आदि को ध्यान में रखेगा। इन बातों को ध्यान में रखकर ही धारा 110 की कार्यवाही की जाती है।

गोपालचारी बनाम केरल राज्य के एक पुराने मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने यह कहा है कि धारा 110 को संविधानिकता तब ही मिल पाएगी जब संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं होता है। संविधान के अनुच्छेद 21 के दायरे में रहते हुए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 110 के अंतर्गत कार्यवाही की जाती है।

धारा 107 धारा 110 के अधीन किसी व्यक्ति को बंधित करने के पूर्व उसे मजिस्ट्रेट द्वारा कारण बताओ नोटिस दिया जाना आवश्यक है ताकि वह आदेश में विनिर्दिष्ट सूचना के बारे में अपनी सफाई प्रस्तुत कर सकें। बगैर कारण बताओ नोटिस जारी किए यह कार्यवाही विधि के अनुकूल नहीं होगी।

धारा 107 एवं 108 के अंतर्गत किसी व्यक्ति को जब गिरफ्तार किया जाता है तो धारा 111 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आदेश दिया जाता है। ऐसा आदेश दिए जाने के पूर्व आदेश को जारी करने वाले न्यायालय या कार्यपालक मजिस्ट्रेट को कारण बताओ नोटिस जारी करना होता है। कारण बताओ नोटिस के आधार पर अभियुक्त प्रतिभूति क्यों नहीं दिए जाने के अपने कारणों को प्रस्तुत करता है।

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