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धारा 37 एनडीपीएस एक्ट: वाणिज्यिक मात्रा से संबंधित अपराधों के लिए जमानत के सिद्धांत

LiveLaw News Network
4 July 2020 2:06 PM GMT
धारा 37 एनडीपीएस एक्ट: वाणिज्यिक मात्रा से संबंधित अपराधों के लिए जमानत के सिद्धांत
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विश्वजीत आनंद

कानून की एक सुलझी हुई स्थिति है यह है कि नार्कोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्स्टंस एक्ट से संबंधित मामले में उदार दृष्टिकोण अनुचित है (केरल राज्य बनाम राजेश, 24 जनवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट का निर्णय) और कई फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने व्यापक मानदंड तय क‌िए हैं, जिनका नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्‍स्टंस एक्ट, 1985 (एनडीपीएस एक्ट) के तहत अपराध में शामिल अभियुक्तों की जमानत याचिकाओं पर विचार करते हुए पालन करना चाहिए।

"…यह ध्यान में रखना चाहिए कि हत्या के मामले में, अभियुक्त एक या दो व्यक्तियों की हत्या करता है, जबकि वे मादक दवाओं के कारोबार में शामिल व्यक्ति मौत के कारण बन रहे हैं, या कई निर्दोष युवा पीड़ितों, जो कमजोर हैं, उन्हें मौत के मुंह में धकेल रहे हैं; इससे समाज पर क्षतिकर और प्राणघाती प्रभाव पड़ता है; वे समाज के लिए एक खतरा हैं, भले ही उन्हें अस्थायी रूप से रिहा किया जाए, हर हाल में, वे तस्करी और/या नशीले पदार्थों की अपनी नापाक गतिविधियां जारी रखेंगे। (यूनियन ऑफ इंडिया बनाम राम समुझ व अन्य 1999) (9) SCC 429)

एनडीपीएस एक्ट की धारा 37

नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्स्टंस एक्ट, 1985 (एनडीपीएस एक्ट) मादक दवाओं से संबंधित कानूनों में संशोधन करने के लिए बनाया गया एक कठोर कानून है। यह मादक दवाओं और साइकोट्रोपिक पदार्थों से संबंधित ऑपरेशनों के नियंत्रण और विनियमन के लिए सख्त प्रावधानों का निर्माण करता है। धारा 37, एनडीपीएस एक्ट के अध्याय IV के तहत आती है, इसमें अपराधों के संज्ञेय और गैर-जमानती होने की चर्चा की गई है।

एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 संसद द्वारा तैयार किया गया एक उपकरण है, जो बाजार में नशीले पदार्थों की आवक के खतरे पर नियंतत्रण लगाती है, और एनडीपीएस अधिनियम के तहत अभियुक्तों की जमानत के मामले में एक गैर-योग्यता है।

धारा 37 का विस्तार इस प्रकार है-

-इस धारा में कहा गया है कि अधिनियम के तहत दंडनीय प्रत्येक अपराध संज्ञेय होगा।

-[धारा 19 या धारा 24 या धारा 27-ए के तहत अपराध और व्यावसायिक मात्रा से जुड़े अपराध] के आरोपी किसी भी व्यक्ति निजी मुचलके पर जमानत नहीं दी जाएगी,

जब तक कि निम्न शर्तें पूरी नहीं होती हैं-

-जमानत के लिए निम्न शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है-

(i) यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि अभियुक्त इस प्रकार के अपराध का दोषी नहीं है।

(ii) जमानत दिए जाने पर वह ऐसे किसी अपराध में शामिल नहीं होगा।

केरल राज्य बनाम राजेश मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि धारा 37 की योजना से पता चलता है कि जमानत देने की शक्ति का प्रयोग न केवल सीआरपीसी की धारा 439 के तहत शामिल सीमाओं के अधीन है, बल्कि यह धारा 37 द्वारा रखी गई सीमा के भी अधीन है...। उक्त धारा का क्रियाकारी भाग नकारात्मक रूप में है, यह अधिनियम के तहत अपराध के आरोपी किसी भी व्यक्ति के जमानत के विस्तारण की संस्तुति करता है, जब तक कि दोनों शर्तों को संतुष्ट नहीं किया जाता है। पहली शर्त यह है कि अभियोजन पक्ष को आवेदन का विरोध करने का अवसर दिया जाना चाहिए, और दूसरी यह है कि न्यायालय को संतुष्ट होना चाहिए कि यह मानने के उचित आधार हैं कि वह इस तरह के अपराध का दोषी नहीं है। यदि इन दोनों शर्तों में से कोई भी संतुष्ट नहीं होती है, तो जमानत देने पर प्रतिबंध लागू होता है।

वाणिज्यिक मात्रा क्या है?

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 अधिनियम के तहत हर अपराध को संज्ञेय मानती है। और यह एनडीपीएस एक्ट की धारा 19 या 24 या 27-ए के तहत उल्लिखित अपराधों और वाणिज्यिक मात्रा के संबंध में किसी भी अपराध के लिए जमानत से इनकार करती है। वाणिज्यिक मात्रा एनडीपीएस अधिनियम की धारा 2 (vii-a) के तहत अच्छी तरह से परिभाषित की गई है, जिसका अर्थ है-वह मात्रा, जो अनुसूची में निर्दिष्ट मात्रा से अधिक है।

धारा 2 (vii-a) परिभाषित करती है: "वाणिज्यिक मात्रा", मादक दवाओं और साइकोट्रॉप‌िक्स पदार्थों के संबंध में, केंद्र सरकार द्वारा अधिसूच‌ित आधिकारिक गैजेट में निर्दिष्ट मात्रा से अधिक मात्रा है।

अधिनियम द्वारा प्रदान किया गया एक और स्पष्टीकरण, प्रासंगिक लगता है "छोटी मात्रा" के बारे में है।

धारा 2 (xxiii-a)"छोटी मात्रा", को उस मात्रा के रूप में व्याख्याय‌ित करता है, जो एनडीपीएस एक्ट की अनुसूची में निर्दिष्ट मात्रा से कम है।

धारा 2 (xxiii-a) मादक दवाओं और साइकोट्रॉपिक पदार्थों के संबंध में "छोटी मात्रा", केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचना आधिकारिक गैजेट में निर्दिष्ट मात्रा से कम मात्रा है।

धारा 37 की शर्तें

धारा 37 के तहत उल्लिखित पहली शर्त लोक अभियोजक को एक अवसर प्रदान करना और जमानत आवेदन पर अपना रुख साफ करना है। दूसरी शर्त यह है कि न्यायालय को इस बात पर संतुष्ट होना चाहिए कि यह मानने के लिए उचित आधार मौजूद हैं कि अभियुक्त ऐसे अपराध का दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए वह कोई अपराध करने की संभावना नहीं रखता है। यदि इन दोनों में से कोई भी शर्त पूरी नहीं होती है, तो जमानत देने पर प्रतिबंध लागू होता है।

इसलिए एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 की कठोरता से संबंधित कानून को संक्षेप में प्रस्तुत किया जा सकता है:

a) जमानत देने की सीमाएं तभी आती हैं जब मेरिट जमानत देने का प्रश्न पर उठता है। [कस्टम, नई दिल्ली बनाम अहमदलीवा नोदिरा, (2004) 3 एससीसी 549]।

b)यदि अदालत ने जमानत देने का प्रस्ताव किया है तो सीआरपीसी या किसी अन्य अधिनियम के प्रावधानों की मानक आवश्यकताओं के अलावा दो शर्तें का संतुष्‍ट होना अनिवार्य है। [यूनियन ऑफ इंडिया बनाम नियाजुद्दीन व अन्‍य, (2018) 13 एससीसी 738]।

c)लो क अभियोजक को अवसर प्रदान करने के अलावा, दूसरी शर्त जो वास्तव में प्रासंगिक है, अदालत की संतुष्टि है कि यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि अभियुक्त कथित अपराध का दोषी नहीं है। [एनआर मोन बनाम मोहम्‍मद नसीमुद्दीन, (2008) 6 एससीसी 721]।

d)अभियुक्त के दोषी न होने के संबंध में किया गया चिंतन प्रथम दृष्टया आधार से अधिक होना है, यह मानने और उचित ठहराए जाने के पर्याप्त संभावित कारणों पर विचार करना है कि अभियुक्त कथित अपराध का दोषी नहीं है। [कस्‍टम, नई दिल्ली बनाम अहमदलीवा नोदिरा, (2004) 3 एससीसी 549]।

e) धारा 37 की दोनों शर्तें संचयी हैं और वैकल्पिक नहीं हैं। [कस्टम, नई दिल्ली बनाम अहमदलीवा नोदिरा, (2004) 3 एससीसी 549]।

f) जमानत के समय, अदालत देख सकती है कि अभियोजन पक्ष के सभी गवाहों के बयान, यदि विश्वसनीय हैं, तो उन्हें सजा तो नहीं होगी। [बबुआ बनाम उड़ीसा राज्य, (2001) 2 एससीसी 566]।

g) इस स्तर पर, यह न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय है कि इस नतीजे पर पहुंचने के लिए साक्ष्य को तौला जाए कि क्या आरोपी ने एनडीपीएस एक्ट के तहत अपराध किया है या नहीं और जमानत पर रहते हुए उक्त अधिनियम तहत आगे अपराध करने की संभावना है या नहीं। [यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रतन मल्लिक @ हबुल, (2009) 2 एससीसी 624]।

h) धारा 37 के संबंध में जमानत के लिए आवेदन पर विचार करते समय, न्यायालय को दोषी न होने की नतीजे को दर्ज करने के लिए नहीं बुलाया जाता है। [यूनियन ऑफ इंडिया बनाम शिव शंकर केसरी, (2007) 7 एससीसी 798]।

i) असंगति की स्थिति में, एनडीपीएस एक्ट की धारा 37, धारा 439 सीआरपीसी पर प्रभावी होगी। [नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो बनाम किशन लाल, 1991 (1) एससीसी 705]।

J) जमानत कठोर शर्तों के अधीन होनी चाहिए। [सुजीत तिवारी बनाम गुजरात राज्य, 2020 SCC ऑनलाइन SC 84]।

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सतीश सिंह बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य के मामले में दिए गए एक उल्लेखनीय फैसले में उपर्युक्त अवलोकन दिए हैं। न्यायालय ने एनडीपीएस एक्ट के तहत विचाराधीन कैदी को जमानत देने के उपरोक्त पहलूओं को संक्षेप में प्रस्तुत किया था।

"उचित आधार" का मतलब

शब्‍द "उचित आधार" का धारा 37 (1) (बी) (ii) के तहत उचित वेटेज है, जिसका अर्थ है कि प्रथम दृष्टया आधार से कुछ अधिक है।

धारा 37 (1) (बी) (ii) के तहत शर्त भाग निम्नानुसार व्यक्त किया गया हैः

जहां सरकारी वकील आवेदन का विरोध करता है, न्यायालय इस बात से संतुष्ट होती है कि इस बात के लिए उचित आधार हैं कि वह ऐसे अपराधों का दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए वह कोई अपराध करने की संभावना नहीं रखता है।

दिल्ली नगर निगम बनाम मेसर्स जगननाथ अशोक कुमार और अन्य, (1987) 4SCC 497 में अदालत ने कहा था:

"उचित" शब्द का कानून में प्रथम दृष्टया उन परिस्थितियों के संबंध में उचित अर्थ है, जिनमें कर्ता को यथोचित कार्य करने के लिए कहा जाता है....। "उचित" शब्द को सटीक परिभाषा देना मुश्किल है। स्ट्रॉड्स ज्यूडिशियल डिक्शनरी, चौथा संस्करण, पेज 2258 में कहा गया है कि "उचित" शब्द की सटीक परिभाषा की उम्मीद करना अनुचित होगा।"

वाक्य "उचित आधार" का अर्थ प्रथम दृष्टया आधार से कुछ अधिक है। यह मानने के लिए पर्याप्त संभावित कारणों पर विचार करता है कि अभियुक्त कथित अपराध का दोषी नहीं है। हो सकता है कि यह हो, अगर अदालत इस तरह के नतीजे पर पहुंचती है, तो यह अभियुक्त को मुक्ति का प्रमाण पत्र देने के बराबर है।

यहां तक ​​कि शर्तों में से एक को पूरा करने पर, जमानत की अवधि के दौरान यह विश्वास करने के लिए उचित आधार हो कि, अभियुक्त इस तरह के अपराध के लिए दोषी नहीं है, अदालत यह नतीजा या आश्वासन नहीं दे सकती है कि अभियुक्त ऐसे अपराध नहीं करेगा। इस प्रकार, वाणिज्यिक मात्रा रखने के लिए जमानत या जमानत से इनकार करना प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा। (सतीश सिंह, सुप्रा)

तो संक्षेप में, 'उचित' का अर्थ "तर्क के अनुसार" होगा। अततः यह तथ्यों के प्रश्न के सा‌थ निहित है। और अधिनियम की तर्कशीलता संदर्भ और परिस्थितियों पर अत्यधिक निर्भर है।

"यह मानना कि अभियुक्त अपराधों की दोषी नहीं है"

एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 (1) (बी) (ii) उपर्युक्त पहलू को व्यक्त करती है, "... यह मानते हुए कि अभियुक्त ऐसे अपराधों का दोषी नहीं है"।

एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 के तहत जमानत के लिए आवेदन पर विचार करते समय अदालत का अंतिम उद्देश्य प्रारंभिक स्तर पर भी दोषी नहीं होने का अवलोकन दर्ज नहीं करना है। यह सीमित उद्देश्य के लिए अनिवार्य रूप से आरोपी को जमानत पर रिहा करने के सवाल तक सीमित है कि अदालत को यह तय करना होता है कि क्या यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि अभियुक्त दोषी नहीं है और अदालत ऐसे आधारों पर अपनी संतुष्टि दर्ज करती है। लेकिन अदालत को यह विचार नहीं करना है जैसे कि वह दोषमुक्त होने का फैसला सुना रही है और दोषी नहीं होने की जांच कर रही है। (सतीश सिंह, सुप्रा)

यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रतन मल्लिक @ हबुल, (2009) 2 एससीसी 624 में कहा गया है-

हालांकि, हम इसे जोड़ने की जल्दबाजी करते हैं, जबकि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्स्टंस एक्ट की धारा 37 के संदर्भ में जमानत के लिए आवेदन पर विचार करते समय, न्यायालय को 'दोषी नहीं है' का अवलोकन दर्ज नहीं करना होता है। इस स्तर पर, यह न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय है कि साक्ष्य को एक सकारात्मक निर्णय पर पहुंचने के लिए तौला जाए कि क्या आरोपी ने नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्स्टंस एक्ट के तहत अपराध किया है या नहीं। यह देखा जाना चाहिए कि क्या यह मानने के लिए उचित आधार है कि अभियुक्त अपराध का दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए उक्त अधिनियम के तहत अपराध करने की संभावना नहीं है। उक्त दोनों शर्तों के अस्तित्व के बारे में न्यायालय की संतुष्टि एक सीमित उद्देश्य के लिए है और आरोपी को जमानत पर रिहा करने के सवाल तक ही सीमित है।

शर्तें संचयी हैं, वैकल्‍पिक नहीं हैं-

गुरबख्श सिंह सिब्बिया और अन्य बनाम पंजाब राज्य, 1980 (2) SCC 565 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने तय किया था कि जमानत देने या न देने का सवाल उत्तर के लिए विभिन्न परिस्थितियों पर निर्भर है, जिनका संचयी प्रभाव न्यायिक फैसले में दर्ज करना चाहिए। किसी भी एक परिस्थिति को सार्वभौमिक वैधता के रूप में या आवश्यक औचित्य रूप से जमानत देने या इनकार करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

एनआर सोम बनाम एमडी नसीमुद्दीन, (2008) 6 एससीसी 721, सुप्रीम कोर्ट कहा है-

जमानत देने की सीमाएं तभी आती हैं जब जमानत देने का प्रश्न मेरिट पर उठता है। लोक अभियोजक को अवसर प्रदान करने के अलावा, अन्य दोनों शर्तों, जो वास्तव में अब तक प्रासंगिक है, जहां वर्तमान अभियुक्त-प्रतिवादी का संबंध है, ये हैं: अदालत की संतुष्टि कि यह विश्वास करने के उचित आधार हैं, कि अभियुक्त कथित अपराध का दोषी नहीं है और उसे जमानत पर रहते हुए कोई अपराध करने की संभावना नहीं है। ये शर्तें संचयी हैं, वैकल्पिक नहीं हैं। अभियुक्तों के दोषी न होने के संबंध में विचार किया गया संतुष्टि का आधार, उचित आधारों पर आधारित है। अभिव्यक्ति "उचित आधार" का अर्थ प्रथम दृष्टया आधारों से कुछ अधिक है....।

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