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जानिए समरी ट्रायल (संक्षिप्त विचारण) के बारे में विशेष बातें

Shadab Salim
9 July 2020 8:38 AM GMT
जानिए समरी ट्रायल (संक्षिप्त विचारण) के बारे में विशेष बातें
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दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत सत्र न्यायाधीश तथा मजिस्ट्रेट किसी भी अपराध के मामले में विचारण करता है। मजिस्ट्रेट द्वारा विचारण को समन या वारंट मामले के आधार पर किया जाता है। वृहद मामलों का विचारण मजिस्ट्रेट तथा सत्र न्यायाधीश दोनों के माध्यम से किया जाता है।

मजिस्ट्रेट द्वारा वारंट मामलों और समन मामलों के विचारण किए जाने वाले मामले की न्यायिक प्रक्रिया थोड़ी वृहद रहती है। ऐसी विषाद प्रक्रिया से गुजरने के बाद न्याय के लक्ष्य को प्राप्त किया जाता है। मजिस्ट्रेट द्वारा छोटे मामलों में भी वारंट मामलों की तरह विचारण नहीं किया जाता है इससे न्यायालय में मामलों की अधिकता बढ़ती है, छोटे-छोटे मामलों से भी न्यायालय में प्रकरणों की भरमार हो सकती है।

इस समस्या से निपटने के लिए द्रुतगति से न्याय की प्रक्रिया को निपटाने के लिए भारतीय दंड संहिता के अध्याय 21 के अंतर्गत एक अभूतपूर्व उपबंध संक्षिप्त विचारण को रखा गया है। इस अध्याय में धारा 260 से लेकर धारा 265 तक संक्षिप्त विचारण के संबंध में प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है। इसके अंतर्गत अपनाई जाने वाली जांच की प्रक्रिया लघु प्रकृति की होती है।

धारा 262 के अनुसार संक्षिप्त विचारण के अंतर्गत संक्षिप्त विचारण के लिए वही प्रक्रिया अपनायी जाती है, जो समन मामलों के लिए निर्धारित की गयी है। संक्षिप्त विचारण के अंत में मजिस्ट्रेट अभियुक्त के अभिवचन को अभिलिखित करता है। इसमें औपचारिक रूप से आरोप विरचित नहीं किया जाता है तथा यदि अर्थदंड ₹200 से अधिक ना हो तो अपील का भी प्रावधान नहीं है।

वह अपराध जिनका विचारण संक्षिप्त किया जाएगा

सामान्यतः संक्षिप्त विचारण की प्रक्रिया ऐसे अपराधों के मामले में अपनायी जाती है जो 2 वर्ष से अधिक के कारावास से दंडनीय नहीं है। यह प्रक्रिया कतिपय विशिष्ट मामलों के लिए भी अपनायी जाती है जिनका उल्लेख धारा 260 उपधारा (1) के उपखंड में किया गया है।

1) 2 वर्ष तक के कारावास से दंडनीय अपराध

2) वह अपराध धारा जो भारतीय दंड संहिता की धारा 379, 380 तथा 381 के अधीन चोरी का है और चुराई हुई संपत्ति का मूल्य ₹2000 से अधिक नहीं है।

3) भारतीय दंड संहिता की धारा 411 के अधीन चोरी की संपत्ति को प्राप्त करना, उसे रखे रखना अपराध है। इस अपराध का विचारण संक्षिप्त किया जा सकता है परंतु यहां शर्त यह है कि संपत्ति का मूल्य ₹2000 से अधिक नहीं होना चाहिए।

4) भारतीय दंड संहिता की धारा 454 और 456 जिसमें अपराध की नीयत से घर में घुसने को अपराध बताया गया है। इस अपराध का विचारण संक्षिप्त किया जाएगा।

5) भारतीय दंड संहिता की धारा 504 जो लोकशांति भंग करने के आशय से किसी व्यक्ति का अपमान करना धारा 506 के अधीन आपराधिक अभित्रास (धमकी) देने का अपराध है। उसका विचारण संक्षिप्त किया जाएगा।

पशु अतिचार अधिनियम के अंतर्गत होने वाले अपराधों का विचारण भी संक्षिप्त किया जाएगा।

संक्षिप्त विचारण का महत्व

संक्षिप्त विचारण का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान है। इसके अंतर्गत छोटे मामलों को शीघ्रता से निपटाया जा सकता है तथा शीघ्र एवं सुगम न्याय छोटे मामलों में हो सकता है। इस प्रकार के प्रावधान से न्यायिक प्रक्रिया पर भार भी कम होता है। न्यायालय में प्रकरणों की संख्या कम होती है तथा न्यायाधीशों को न्याय की लंबी प्रक्रिया करना होती है। धन भी कम खर्च होता है क्योंकि जितनी विषाद न्याय की प्रक्रिया है राज्य का उतना धन नष्ट होता है।

संक्षिप्त विचारण का महत्व इसलिए है क्योंकि राज्य, न्यायपालिका एंव जनसाधारण तीनों को लाभ दे रहा है। आम जनता को संक्षिप्त विचारण से शीघ्र न्याय प्राप्त हो जाता है। पीड़ित पक्षकार तथा अभियुक्त दोनों को संक्षिप्त विचारण से शीघ्र राहत हो जाती है। किसी भी छोटे अपराध को विषाद विचारण से गुजारना न्याय हित में ठीक मालूम नहीं होता है। आज भारत में अनेको छोटे-छोटे मामले संक्षिप्त विचारण के माध्यम से निपटाएं जा रहे हैं।

परमेश्वर लाल बनाम सम्राट AIR 1922 पटना के एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ी रोचक बात कही गयी है। इस धारा में वर्णित अपराधों में संक्षिप्त विचारण की प्रक्रिया अपनाई जाने का विवेकाधिकार मजिस्ट्रेट को है। यदि मामला पेचीदा है जटिल हो तो मजिस्ट्रेट द्वारा उसके लिए संक्षिप्त विचारण की प्रक्रिया नहीं अपनायी जानी चाहिए।

कोई मामला संक्षिप्त विचारण द्वारा विचार नहीं होने पर भी यदि मजिस्ट्रेट उचित समझे तो उसे संक्षिप्त विचार पद्धति से ना निपटाए जाने का निर्णय ले सकता है क्योंकि यह उसके विवेक का प्रश्न है। इसी प्रकार धारा 260 उउपधारा (दो) में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि किसी मामले में संक्षिप्त विचारण के दौरान मजिस्ट्रेट यह अनुभव करता है कि मामले को संक्षिप्त विचारण करना उचित नहीं है तो वह मामले को अन्यथा सकता है तथा को बंद कर सकता है।

यह आवश्यक नहीं है कि संक्षिप्त विचारण के लिए मामले से संबंधित अपराध भारतीय दंड संहिता के अधीन दंडनीय हो व अन्य स्थान में अथवा विशेष अधिनियम के अंतर्गत दंड नहीं होने पर भी उसके लिए संक्षिप्त विचारण की प्रक्रिया अपनायी जा सकती है लेकिन कारावास की अवधि 2 वर्ष से अधिक ना होने पर कारावास सश्रम अथवा साधारण इनमें से कुछ भी हो सकता है।

बीके अग्रवाल बनाम बसंत राज भाटिया 1988 उच्चतम न्यायालय 1106 के मुकदमे में समरी ट्रायल के उद्देश्य पर टिप्पणी करते हुए उच्चतम न्यायालय ने अभिमत प्रकट किया है कि संहिता की धारा 260 में वर्णित संक्षिप्त विचारण की व्यवस्था में मामले के शीघ्र निपटारे हेतु की गयी है लेकिन इसका अर्थ कदापि नहीं है कि गंभीर अपराधों में मात्र विलंब के आधार पर कार्यवाही को ही बंद कर दिया जाए।

मजिस्ट्रेट का विवेक

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 260 के अंतर्गत संक्षिप्त विचारण को अभियोजन पक्ष या अभियुक्त के अधिकार की तरह नहीं दिया गया है अपितु यह तो मजिस्ट्रेट का अधिकार है।धारा 260 उपधारा 2 के अंतर्गत संक्षिप्त विचारण को मजिस्ट्रेट का विवेक बतलाया गया है।

संक्षिप्त विचारण के दौरान यदि मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि मामले का संक्षिप्त विचारण वांछनीय नहीं है तो वह मामले को दंड प्रक्रिया संहिता में वर्णित प्रक्रिया के अनुसार सुनने के लिए अग्रसर होगा। उन सब साक्षियों को पुनरीक्षण हेतु पुनः बुला सकेगा जिनका परीक्षण कर चुका है।

सेकंड क्लास मजिस्ट्रेट द्वारा संक्षिप्त विवरण

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 261 द्वित्तीय वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा संक्षिप्त विचारण की प्रक्रिया का उल्लेख करती है। संक्षिप्त विचारण की प्रक्रिया वस्तुतः नियमित विचारण का ही एक लघुकृत स्वरूप होने के कारण केवल वरिष्ठ तथा अनुभवी न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा ही ऐसे मामले में विचारण किया जाना उचित माना गया है। यदि कोई मजिस्ट्रेट जिसे विधि द्वारा संक्षिप्त विचारण की शक्ति नहीं दी गयी है, किसी अपराध का संक्षिप्त विचारण करता है तो उसके द्वारा की गयी ऐसी कार्यवाही दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 461 के खंड बी के अनुसार पूर्णतः शून्य एवं अविधिमान्य होगी।

धारा 261 द्वित्तीय वर्ग के मजिस्ट्रेट को प्राप्त संक्षिप्त विचारण की शक्ति का वर्णन है। ऐसा सेकंड क्लास न्यायिक दंडाधिकारी जिसे उच्च न्यायालय द्वारा संक्षिप्त विचारण करने की शक्ति प्रदान की गयी है वह केवल अर्थदंड से और 6 माह से अधिक कारावास के दंड से दंडनीय अपराधों का संक्षिप्त विचारण द्वारा निपटाने के लिए सक्षम होता है।

ऐसा मजिस्ट्रेट अपराधों के मामले में संक्षिप्त विचारण कर सकता है। हालांकि सेकंड क्लास मजिस्ट्रेट को संक्षिप्त विवरण की बहुत सीमित शक्तियां दी गयी हैं।

संक्षिप्त विचारण की प्रक्रिया

संक्षिप्त विचारण की कोई विशेष प्रक्रिया नहीं होती है। दंड प्रक्रिया सहिंता की धारा 262 के अंतर्गत संक्षिप्त विचारण की प्रक्रिया बतायी गयी है। इस धारा के अनुसार संक्षिप्त विचारण की प्रक्रिया वही होती है जो कि समन मामलों के विचारणों में अपनायी जाती हैं। वैसे ही प्रक्रिया संक्षिप्त के मामलों में अपनायी जाती है।

यदि सुनवाई कर लेने के पश्चात मजिस्ट्रेट को यह लगता है कि मामला समन विचारण की तरह विचार किया जाना चाहिए तो वह प्रकरण को समन मामलों का विचारण करेगा।

संक्षिप्त विचारण में दंड

दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत संक्षिप्त विचारण में दिए जाने वाले दंड की अवधि तय की गयी है। धारा 262 की उपधारा 2 के अंतर्गत यह उल्लेख किया गया है कि किसी भी संक्षिप्त विचारण के अंतर्गत 3 माह से अधिक का कारावास नहीं दिया जाएगा तथा इसके अंदर जुर्माना किया जा सकता है। यदि जुर्माने का भुगतान नहीं किया जाता है तो जुर्माने के भुगतान नहीं किए जाने के परिणाम स्वरूप जो कारावास दिया जाएगा वह अतिरिक्त कारावास होगा, दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत जो 3 माह के कारावास का उल्लेख किया गया है यह कारावास अतिरिक्त है। जुर्माना नहीं दिए जाने का कारावास अलग से भुगतना होगा।

यह बात स्टेट बनाम मांगीलाल के मामले में कही गयी है।

इस धारा के अधीन संक्षिप्त विचारण में मजिस्ट्रेट द्वारा दंड के रूप में जुर्माने की कोई भी राशि अधिग्रहित की जा सकती है। उसकी कोई सीमा नहीं है केवल कारावास की अवधि की सीमा संक्षिप्त विचारण में तय की गयी है।

संक्षिप्त विचारण के रिकॉर्ड

धारा 263 के अंतर्गत संक्षिप्त विचारण के सभी रिकॉर्ड लेखबद्ध किए जाएंगे। सामान्यतः कुछ बातें है जैसे अपराध का क्रमांक, अभियुक्त का पता नाम इत्यादि सभी बातों को एक कैसे फॉर्मेट में लेखबद्ध किया जाएगा जैसा फॉर्मेट राज्य सरकार निहित करती है।

संक्षिप्त विचरण के मामले में निर्णय

संहिता की धारा 264 के अंतर्गत संक्षिप्त मामलों के अंतर्गत निर्णय दिया जाता है। यदि मामले में अभियुक्त दोषी होने का अभिवाक नहीं करता है अपराध स्वीकार नहीं करता है तो मजिस्ट्रेट साक्ष्य लेता है। साक्ष्य लेने के बाद साक्ष्य के सारांश तथा अपने निष्कर्ष के कारणों का उल्लेख निर्णय में करेगा।

इस धारा का उद्देश मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए निर्णय के विरुद्ध अपील की दशा में अपील न्यायालय को समुचित जानकारी उपलब्ध कराना है। कोई भी मजिस्ट्रेट जो अपना निर्णय देगा अपने निष्कर्ष का उल्लेख करेगा एवं उसके कारणों को लेखबद्ध करेगा।

यदि मजिस्ट्रेट ने सारांश का उल्लेख नहीं किया है तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अनुसार साक्षियों के साक्ष्य लेकर इस कमी को पूरा कर सकता है लेकिन मुंबई कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इसके ऐसे निर्णय को अवैध घोषित किया है। मजिस्ट्रेट को कारणों को लेखबद्ध करना ही होगा।

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