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जानिए किस हद तक आरोपी को आपराधिक मामले की केस-डायरी के निरीक्षण/इस्तेमाल की होती है अनुमति?

SPARSH UPADHYAY
7 July 2020 8:09 AM GMT
जानिए किस हद तक आरोपी को आपराधिक मामले की केस-डायरी के निरीक्षण/इस्तेमाल की होती है अनुमति?
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यदि हम दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (सीआरपीसी) की धारा 172 (1) की बात करें तो हम यह पाएंगे कि हर अन्वेषण अधिकारी (Investigation Officer) को किसी मामले में किये जा रहे अन्वेषण (Investigation) की प्रति दिन की कार्यवाही को एक डायरी में लिखते रहना होता है (जब वह दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय 12 के तहत अन्वेषण करता है)।

गौरतलब है कि इस डायरी को बनाये रखने का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि इसके जरिये सबूतों से छेड़छाड़ को और अन्वेषण के कालक्रम/घटनाक्रम को मनचाहे ढंग से बदलने जैसी घटनाओं को रोका जा सके। भगवंत सिंह बनाम कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (1983) 3 SCC 344 मामले के अनुसार, बेतरतीब ढंग से तैयार की गयी केस डायरी उस उद्देश्य को ही पराजित कर देती है, जिसके लिए उसे तैयार करना/किया गया होता है।

इस बात को अच्छी तरह से ध्यान में रखा जाना चाहिए कि केस डायरी स्वयं में कोई सबूत नहीं है और इसका उपयोग केवल न्यायालय या पुलिस अधिकारी द्वारा बहुत ही सीमित उद्देश्य के लिए किया जा सकता है। एक केस डायरी उसमे लिखी तारीखों, तथ्यों या बयानों का पुख्ता साक्ष्य नहीं होती है – [डिक्सन माली बनाम एम्परर (1942) 43 Cri LJ 36]

जैसे कि हमने ऊपर जाना, केस डायरी बनाये रखने से सम्बंधित सीआरपीसी की धारा 172 की उपधारा (1) है। यह धारा यह कहती है:-

[Bare Text Begins] धारा 172 (1) – प्रत्येक पुलिस अधिकारी को, जो इस अध्याय के अधीन अन्वेषण करता है, अन्वेषण में की गयी अपनी कार्यवाही को दिन-प्रतिदिन एक डायरी में लिखेगा, जिसमे वह समय जब उसे इत्तिला मिली, वह समय जब उसने अन्वेषण आरम्भ किया और जब समाप्त किया, वह स्थान या वे स्थान जहाँ वह गया और अन्वेषण द्वारा अभिनिश्चित परिस्थितियों का विवरण होगा [Bare Text Ends]

दरअसल, केस डायरी (अभियोग दैनिकी), एक आपराधिक मामले की दैनिक जांच का एक रिकॉर्ड है, जिसे पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाता है। इसके जरिये पुलिस अन्वेषण में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाती है।

सिद्धार्थ बनाम बिहार राज्य (2005 Cri। LJ 4499) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह दोहराया था कि एक अन्वेषण अधिकारी को सम्पूर्ण अन्वेषण के दौरान एक केस डायरी को अपने साथ रखना होता है जिसमे वह किसी मामले की दिन प्रतिदिन की गतिविधियों (अन्वेषण से सम्बंधित) दर्ज करेगा।

गौरतलब है कि केस डायरी के बारे में हम विस्तार से एक अन्य लेख में चर्चा कर चुके हैं। आपराधिक मामलों की 'केस डायरी' क्या होती है और कौन कर सकता है इसका उपयोग?

मौजूदा लेख में हम यह जानेंगे कि आखिर किस हद तक अभियुक्त पक्ष को केस डायरी देखने या इस्तेमाल करने/निरिक्षण की अनुमति दी जा सकती है।

अभियुक्त को किस हद तक है केस डायरी इस्तेमाल करने या देखने/निरिक्षण का अधिकार?

यदि हम सीआरपीसी की धारा 172 की उपधारा (3) को ध्यानपूर्वक पढेंगे तो हम यह पाएंगे कि न तो आरोपी व्यक्ति और न ही उसका कोई भी प्रतिनिधि, डायरी में वर्णित विवरण की मांग कर सकता है। ध्यान रहे, भले ही केस डायरी को अदालत में संदर्भित किया गया हो, लेकिन आरोपी व्यक्ति या उसके किसी प्रतिनिधि को इसे देखने का कोई अधिकार नहीं है।

हालाँकि, आरोपी पक्ष केस डायरी को उस परिस्थिति में देख सकता है या उसका इस्तेमाल पुलिस अधिकारी की प्रति-परीक्षा (CROSS EXAMINATION) के लिए कर सकता है - जब अदालत में पुलिस अधिकारी द्वारा प्रस्तुत किए गए सबमिशन का खंडन करने के लिए अदालत द्वारा डायरी में मौजूद विवरण का उपयोग/अवलोकन किया जाता है या उस डायरी का उपयोग पुलिस अधिकारी द्वारा अपनी स्मृति को ताज़ा करने के लिए किया जाता है [देखें सीआरपीसी की धारा 172 की उपधारा (3)]।

दूसरे शब्दों में, ऐसी 2 ही परिस्थितियां होती हैं, जहाँ अभियुक्त पक्ष को केस डायरी के निरीक्षण की सीमित अर्थों में अनुमति दी जाती है। यह दोनों ही परिस्थितियों का वर्णन सीआरपीसी की धारा 172 की उपधारा (3) में दिया गया है, जिसे अभी-अभी हमने समझा। मसलन, वो 2 परिस्थितियां हैं:-

(1) यदि पुलिस अधिकारी, साक्ष्य देने के दौरान, अपनी स्मृति को ताज़ा करने के लिए केस डायरी का उपयोग करता है, या

(2) यदि अदालत द्वारा, पुलिस अधिकारी की बातों का खंडन/विरोधाभास करने के प्रयोजन के लिए, केस डायरी का उपयोग किया जाता है

ध्यान रहे, यदि अदालत, पुलिस अधिकारी का विरोधाभास करने के उद्देश्य के लिए केस डायरी की ऐसी प्रविष्टियों का उपयोग नहीं करती है या यदि पुलिस अधिकारी अपनी स्मृति को ताज़ा करने के लिए उस का उपयोग नहीं करता है, तो अभियुक्त/बचाव पक्ष को प्रविष्टियों का उपयोग करने का कोई अधिकार प्राप्त होने का प्रश्न उस सीमित सीमा तक उत्पन्न ही नहीं होता है।

आइये अब इन दोनों ही परिस्थितयों को हम अलग-अलग शीर्षकों के अंतर्गत समझ लेते हैं, जिससे हमे इन दोनों परिस्थितियों के विषय में सम्पूर्ण रूप से ज्ञान हो जाए।

[प्रथम परिस्थिति] साक्ष्य देने के दौरान पुलिस अधिकारी द्वारा अपनी स्मृति को ताज़ा करने के लिए केस डायरी का उपयोग

अक्सर ऐसा होता है कि एक पुलिस अधिकारी एक साक्षी के रूप में अदालत के समक्ष साक्ष्य देते समय अपनी स्मृती को ताज़ा करने हेतु केस डायरी का उपयोग करता है। साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 159 के अंतर्गत इस प्रकार स्मृति को ताज़ा करने की गुंजाईश मौजूद है।

दरअसल धारा 159 के तहत, किसी भी प्रकार के दस्तावेज (Document) का इस्तेमाल करके एक साक्षी अपनी स्मृति को ताज़ा कर सकता है, और यह जरुरी नहीं कि वह डॉक्यूमेंट, अदालत में ग्राह्य (admissible) हो ही, बल्कि केवल यह जरुरी है कि दस्तावेज की मदद से स्मृति ताज़ा करके बताए जा रहे तथ्य ग्राह्य होना चाहिए।

कर्नाटक राज्य बनाम याराप्पा रेड्डी AIR 2000 SC 185 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने बचाव पक्ष के अधिवक्ता की इस दलील को अस्वीकार कर दिया था कि पुलिस अधिकारी, अन्वेषण के दौरान मामले से जुडी एंट्रीज़ को पुनः याद करने या/अपनी स्मृति को ताज़ा करने के लिए अपने रिकॉर्ड (Record) को नहीं देख सकता जो एंट्रीज़ उसने अन्वेषण के दौरान साथ ही साथ अपने रिकॉर्ड में दर्ज की थीं।

इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि वह पुलिस अधिकारी अपनी स्मृति को ताज़ा करने के लिए ऐसा करने का हकदार था। इसी प्रकार धारा 159 के तहत पुलिस अधिकारी अपनी स्मृति को ताज़ा करने के लिए केस डायरी का इस्तेमाल कर सकता है।

अब जब भी वह (पुलिस अधिकारी) केस डायरी का इस प्रकार से इस्तेमाल करता है तो अभियुक्त पक्ष, केस डायरी की उस प्रासंगिक एंट्रीज़ को देख सकता है और उसका इस्तेमाल पुलिस ऑफिसर की प्रति-परीक्षा (Cross-examination) करने के लिए कर सकता है (जैसा कि साक्ष्य अधिनियम, 1860 की धारा 161 में दिया गया है)।

चलिए अब धारा 161 साक्ष्य अधिनियम, 1860 को बहुत संक्षेप में समझ लेते हैं। यह धारा केवल इतना कहती है जब भी साक्ष्य अधिनियम, 1860 की धारा 159 या धारा 160 के तहत किसी साक्षी द्वारा, अपनी स्मृति को ताज़ा करने के लिए किसी दस्तावेज का इस्तेमाल अदालत में किया जाता है तो दूसरे पक्ष को यह अधिकार मिल जाता है कि वह उस दस्तावेज को देख सके (यदि वह चाहे तो) और यदि उसकी इच्छा हो तो वह उस साक्षी को उसके आधार पर क्रॉस-एग्जामिन भी कर सकता है।

गौरतलब है कि भले ही अभियुक्त, केस डायरी देखने का अधिकार आम तौर पर नहीं रखता हो लेकिन यदि पुलिस अधिकारी द्वारा उसका उपयोग अपनी स्मृति को ताजा करने के लिए गया है तो जिस सीमा तक उसका उपयोग किया गया है, उस सीमा तक केस डायरी को देखने का अधिकार अभियुक्त पक्ष को भी मिल जाता है।

ऐसा इसलिए जरुरी है कि केवल एक तरफ़ा पुलिस अधिकारी की ओर से केस डायरी को देख कर साक्ष्य दे देना उचित नहीं होगा, जबतक अभियुक्त को भी उस केस डायरी के उस अंश को दिखाया न जाए (जिसपर पुलिस अधिकारी भरोसा करके साक्ष्य दे रहा है) और वह यदि चाहे तो अधिकारी की प्रति-परीक्षा न कर ले क्योंकि इसी से साक्ष्य की कमियां (यदि कोई होंगी तो) निकल कर आ सकेंगी।

[द्वितीय परिस्थिति] अदालत द्वारा, पुलिस अधिकारी की बातों का खंडन करने के प्रयोजन के लिए, केस डायरी का उपयोग

सीआरपीसी की धारा 172 की उपधारा (2) से यह स्पष्ट है कि ट्रायल कोर्ट को अन्वेषण अधिकारी द्वारा बनाए गए केस डायरी में प्रविष्टियों की जांच करने और उसे तलब करने की शक्ति प्राप्त है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय है।

विधायिका ने अदालत में पूर्ण विश्वास दिखाया है जो जांच या मुकदमे का संचालन कर रही है। यदि साक्ष्य में किसी प्रकार की असंगतता या अंतर्विरोध उत्पन्न हो रहा है, तो न्यायालय, पुलिस अधिकारी के विरोधाभास के प्रयोजनों के लिए डायरी में बनाई गई प्रविष्टियों का उपयोग कर सकता है (साक्ष्य अधिनियम, 1860 की धारा 145 के अनुसार), जैसा कि सीआरपीसी की धारा 172 की उप-धारा (3) में प्रदान किया गया है।

हालाँकि, बालकराम बनाम उत्तराखण्ड राज्य (2017) 7 SCC 668 मामले के अनुसार यह निष्कर्ष अवश्य निकाला जा सकता है कि यदि न्यायालय चाहे तो, इस तरह की डायरियों को सबूत के तौर पर इस्तेमाल न करते हुए, केवल अपराध के अन्वेषण के दौरान हुई किसी भी चीज़ का पता लगाने के लिए केवल सहायता के रूप में इस्तेमाल करने के लिए तलब कर सकता है [देखें धारा 172 (2)]।

लेकिन ऐसे मामले में अभियुक्त को केस डायरी देखने का अधिकार नहीं मिल जाता है, क्योंकि अदालत उसका प्रयोग पुलिस अधिकारी का विरोधाभास करने अथवा पुलिस अधिकारी स्वयं उसका प्रयोग अपनी स्मृति को ताज़ा करने के लिए नहीं कर रहे होते हैं।

लेकिन हाँ, यदि अदालत द्वारा पुलिस अधिकारी के विरोधाभास के प्रयोजनों के लिए डायरी में बनाई गई प्रविष्टियों का उपयोग किया जा रहा है तो फिर अभियुक्त को केस डायरी को सीमित अर्थों में निरिक्षण करने का अधिकार मिल जाता है और यहाँ साक्ष्य अधिनियम, 1860 की धारा 145 लागू होती है [जैसा कि धारा 172 (3) में दिया गया है]।

गौरतलब है कि यहाँ सीआरपीसी की धारा 172 की उपधारा (2) एवं (3) का अंतर स्पष्ट भी हमारे पाठकों के लिए स्पष्ट हो जाता है कि जब धारा 172 की उपधारा (2) के अंतर्गत केस डायरी को तलब किया जाता है तो अभियुक्त को केस डायरी के निरिक्षण करने का कोई अधिकार नहीं होता है।

हालाँकि, जब धारा 172 की उपधारा (3) के अंतर्गत केस डायरी का उपयोग अदालत द्वारा किया जाता है, तो अभियुक्त को सीमित प्रयोजनों के लिए केस डायरी के निरिक्षण का अधिकार प्राप्त हो जाता है जिससे पुलिस अधिकारों को क्रॉस एग्जामिन किया जा सके।

क्या अभियुक्त को सम्पूर्ण केस डायरी दिखाई जा सकती है?

इसका सीधा सा जवाब 'नहीं' है। दरअसल, यदि पूरे मामले की केस डायरी आरोपी को उपलब्ध कराई जाती है, तो यह उन लोगों के लिए गंभीर पूर्वाग्रह पैदा कर सकता है और यहां तक कि उन लोगों की सुरक्षा और सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकता है, जिन्होंने पुलिस को बयान दिए होंगे।

ध्यान दिया जाना चाहिए कि आपराधिक जांच के मामले में गोपनीयता हमेशा रखी जाती है और आरोपी को पूरे मामले की डायरी उपलब्ध कराना वांछनीय नहीं होता है। इस बात को उच्चतम न्यायालय द्वारा तमाम मामलों में दोहराया जा चुका है, मुख्य रूप से इस बात को सिद्धार्थ बनाम बिहार राज्य 2005 Cri। LJ 4499 में रेखांकित किया गया था।

अंत में, यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि एक केस डायरी, एक गोपनीय दस्तावेज है जिसकी गोपनीयता बरक़रार रखी जानी चाहिए, अन्वेषण अधिकारी ने किस गवाह से क्या जाना, उससे क्या पूछा और उसका निष्कर्ष क्या हो सकता है यह सभी बातें गोपनीय ही रखी जानी।

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