संपादकीय
जानिए संयुक्त राष्ट्र के 6 प्रमुख अंगों के बारे में ख़ास बातें (भाग 1)
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुए विनाश का सामना फिर से दुनिया को कभी न करना पड़े इसके लिए संयुक्त राष्ट्र (United Nations) को अस्तित्व में लाया गया था। हम यह भी जानते हैं कि किसी भी अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठन ने वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र जितनी मान्यता एवं सम्मान प्राप्त नहीं किया है। संयुक्त राष्ट्र के विषय में जितना साहित्य मौजूद है, उतना किसी अन्य संगठन को लेकर मौजूद नहीं है। यह संगठन, अपने अस्तित्व में आने के बाद से, पिछले 70 वर्षों की अधिकांश वैश्विक चुनौतियों और संकटों को सुलझाने में...
जानिए संयुक्त राष्ट्र (UN) के बारे में खास बातें और महत्वपूर्ण सवालों के जवाब
हम सभी ने संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के बारे में सुना है। हालाँकि इसका मुख्य कार्य क्या है इसको लेकर हम सभी की उत्सुकता बनी रहती है। यह तो हम समझते हैं कि यह संगठन वैश्विक स्तर पर सभी राष्ट्रों (हम अपनी सुविधा के लिए इन्हें 'देश' कह सकते हैं) के बीच सामान्य मूल्यों को स्थापित करता है, जिससे हर राष्ट्र एक यूनिफार्म तरीके से कुछ मूल्यों को अपना सके और इन मूल्यों का अपनाया जाना सभी राष्ट्रों के हित में होता है। सामान्य अर्थों में हम यह कह सकते हैं कि इसका एक मुख्य उद्देश्य यह भी है कि वैश्विक...
ईयरली राउंड अप : क्रिमिनल लॉ पर सुप्रीम कोर्ट के साल 2019 के ये अहम फैसले
साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट के क्रिमिनल लॉ पर दिए गए खास जजमेंट/ऑर्डर पर एक नज़र।मजिस्ट्रेट ट्र्रायल शुरू होने से पहले तक मामले में आगे की जांच के आदेश दे सकते हैं, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की एक बेंच ने वस्तुतः एक 43 साल पुरानी मिसाल को बदल दिया। न्यायमूर्ति रोहिंटन फली नरीमन, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी रामासुब्रमण्यन की पीठ ने गुजरात उच्च न्यायालय के एक आदेश को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि मजिस्ट्रेट के पास एक अपराध की जांच करने का आदेश देने की...
सुप्रीम कोर्ट मंथली डाइजेस्ट : दिसंबर 2019
अगर किसी नॉन-स्पीकिंग आदेश से विशेष अनुमति याचिका को ख़ारिज किया गया हो तो उस पर विलय का सिद्धांत लागू नहीं होता : सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी विशेष अनुमति याचिका को निरस्त करने के लिए कोई नॉन-स्पीकिंग आदेश संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत क़ानून का उद्घोष नहीं है और न ही यह विलय का सिद्धांत इस पर लागू होता है। पी सिंगरवेलन बनाम ज़िला कलेक्टर, तिरुपुर का यह मामला तमिलनाडु सरकार के एक आदेश की व्याख्या से जुड़ा था। अदालत ने पाया कि ऐसे बहुत सारे आदेश आए हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने...
भारत के कड़े अधिनियमों में से एक अधिनियम है एनडीपीएस एक्ट 1985, जानिए प्रमुख बातें
भारतीय संसद में 1985 में एनडीपीएस एक्ट पारित किया गया, जिसका पूरा नाम नारकोटिक्स ड्रग्स साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट 1985 है। नारकोटिक्स का अर्थ नींद से है और साइकोट्रोपिक का अर्थ उन पदार्थों से है जो मस्तिष्क के कार्यक्रम को परिवर्तित कर देता है। कुछ ड्रग और पदार्थ ऐसे है जिनका उत्पादन और विक्रय ज़रूरी है, लेकिन उनका अनियमित उत्पादन तथा विक्रय नहीं किया जा सकता। उन पर सरकार का कड़ा प्रतिबंध होता है और रेगुलेशन है, क्योंकि ये पदार्थ अत्यधिक मात्रा में उपयोग में लाने से नशे में प्रयोग होने लगते...
जानिए वकील के अदालत एवं न्यायिक अधिकारी के प्रति प्रमुख कर्त्तव्य
कानूनी पेशा, विश्व के सबसे पुराने पेशों में से एक है, और एक रूप में या दूसरे रूप में, यह सदियों से अपनी पहचान के साथ हमारे सामने रहा है। भारत में अंग्रेजों के आगमन के बाद, कानून की प्रैक्टिस के संबंध में कुछ नियम लागू किए गए थे। आजादी से पहले मुख्तार और वकील थे, जिन्हें मुफस्सिल अदालतों में कानून प्रैक्टिस करने की अनुमति थी, हालांकि वे सभी लोग, कानून में स्नातक डिग्री धारक नहीं थे। हालांकि, धीरे-धीरे ऐसे लोगों को इस पेशे से दूर किया गया और उनकी जगह उन लोगों द्वारा ली गई, जिन्हें कानून में डिग्री...
क्या है मानहानि और मानहानि के संबंध में भारतीय कानून के प्रावधान
सभ्य समाज में मानव को दिए अधिकारों में मान, सम्मान और ख्याति को भी अधिकार माना गया है। जहां एक ओर भारतीय में संविधान में अनुच्छेद 19 के अंतर्गत वाक्य स्वतंत्रता दी गयी है, वहीं कुछ निर्बंधन भी लगाए गए है। निर्बंधन वह हैं जो हमें व्यक्ति और राज्य की मानहानि करने से रोकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत में मानहानि के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। राजनीतिक नेता एक दूसरे के खिलाफ निराधार कारणों पर मानहानि के मामले दर्ज कर रहे हैं, जिसके उपरांत सामने वाली पार्टी मानहानि का मामला दर्ज करवाती है। कई...
जानिए एनआरसी और एनपीआर में क्या संबंध है?
नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीज़न (एनआरसी) और नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) में क्या संबंध है? हाल ही में केंद्र सरकार ने अप्रैल 2020 में होने वाले एनपीआर के लिए चार हज़ार करोड़ रुपए का बजट मंज़ूर किया और गृहमंत्री अमित शाह और केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर दोनों ने कहा कि एनसीआर और एनपीआर में आपस में कोई संबंध नहीं है। लेकिन ये बयान न केवल संसद में आए उन नौ अवसरों के विपरित है, जबकि भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने सदन में कहा कि एनपीआर, एनआरसी की दिशा में पहला कदम है, बल्कि कानून में जो लिखा है, उसके भी खिलाफ...
एक मामले में दी गई जमानत अन्य मामले में दर्ज FIR के आधार पर रद्द नहीं हो सकती : कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ ताजा एफआईआर दर्ज करना, किसी अन्य मामले में पहले से दी गई अग्रिम जमानत को रद्द करने का आधार नहीं हो सकता जहां पहले से ही ट्रायल चल रहा है। न्यायमूर्ति बीए पाटिल ने कहा, "एकमात्र आधार जो बनाया गया है वह यह है कि दो नए आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं। ट्रायल के रास्ते में उक्त मामले किस तरह से आते हैं, यह भी नहीं बताया गया है। ऐसी परिस्थितियों में, जमानत रद्द करने का ये आदेश कानून में ठहरने वाला नहीं है। " दरअसल खाजिम @ खजिमुल्ला खान ने सत्र...
जानिए 'इन -कैमरा' (बंद कमरा) कार्यवाही क्या होती है, इसे कब आयोजित किया जाता है?
भारत में स्थापित न्यायिक प्रणाली की एक आवश्यक और आंतरिक व्यवस्था के रूप में यह अच्छी तरह से तय किया गया है कि देश में 'खुले न्यायालय' (Open Court) का सिद्धांत कार्यशील होगा। अर्थात न्यायालय में कोई भी न्यायिक कार्य एवं न्यायालय की कार्यशैली, जनसाधारण की नजरों से दूर नहीं होगी, और कोई भी व्यक्ति, जब चाहे न्याय के मंदिर में प्रवेश करते हुए वहां की कार्यप्रणाली का अनुभव कर सकता है। यह सिद्धांत, किसी भी आमजन को, जो कानून के शासन के वास्तविक प्रवर्तन को देखने का इच्छुक है, ऐसा करने में सक्षम बनाता...
सुप्रीम कोर्ट में कैसा रहा पिछला सप्ताह, वीकली राउंड अप पर एक नज़र
सुप्रीम कोर्ट ने पिछए सप्ताह में कई अहम ऑर्डर, जजमेंट पास किए। आइए वीकली राउंड अप में प्रमुख ऑर्डर, जजमेंट पर एक नज़र डालते हैं। बीमा कंपनी देर होने को उपभोक्ता फ़ोरम के सामने पहली सुनवाई में इंकार करने का आधार नहीं बना सकती : सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बीमा कंपनी पहली ही बार इंकार करने के लिए देरी को आधार नहीं बना सकता अगर उसने सूचनार्थ भेजे गए पत्र में इंकार को विशेष रूप से आधार बनाने की बात नहीं कही है। सौराष्ट्र केमिकल्ज़ लिमिटेड बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के...
सीएए विरोधी प्रदर्शन: जानिए प्रदर्शनों को दबाने के लिए बल प्रयोग करने की कानूनी वैधता
शाश्वत अवस्थी एवं अनुष्का सुप्रीम कोर्ट ने 17 दिसम्बर 2019 को नागरिकता संशोधन कानून, 2019 के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के छात्रों के विरुद्ध पुलिस की दमनात्मक कार्रवाई की जांच अदालत की निगरानी में कराये जाने की अर्जी संबंधित उच्च न्यायालयों के समक्ष दायर करने का याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया। शीर्ष अदालत के हस्तक्षेप न करने का मुख्य कारण स्थापित तथ्यों की अनुपस्थिति में उसकी अनिच्छा (तथ्य का पता लगाना अनिवार्य तौर पर...
प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंंचाने के मामलों पर क्या कहता है कानून?
कई बार देश में विरोध प्रदर्शन, हिंसक हो जाते हैं और जिसके परिणामस्वरूप लोक संपत्ति को काफी नुकसान पहुचंता है। हाल के समय में उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पश्चिम बंगाल और असम के कुछ हिस्सों में इसी प्रकार की हिंसा देखने को मिली, जहाँ लोक संपत्ति को नुकसान पहुंंचाया गया। हम एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते यह समझते हैं कि इस तरह की हिंसा में न केवल लोक संपत्ति को नुकसान पहुंंचता है, बल्कि टैक्स अदा करने वाले नागरिकों के धन का नुकसान होता है, सरकार के खर्चों पर बोझ बढ़ता है, अशांति फैलती है और आमजन का जीवन...
एक्सप्लेनरः धारा 144 सीआरपीसी लगाने के आधार क्या हैं?
इन दिनों ' धारा 144 सीआरपीसी' की खासी चर्चा हो रही है। हाल ही में संसद से पास नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ बड़े पैमाने पर हो रहे विरोध पर लगाम लगाने के लिए देश् भर में पुलिस ने धारा 144 का इस्तेमाल किया है। उत्तर प्रदेश की तकरीबन आबादी 20 करोड़ है और पुलिस ने बीते दिनों पूरे सूबे पर धारा 144 लगा दी थी। यूपी डीजीपी ने ये जानकारी ट्विटर पर दी थी। बेंगलुरु के पुलिस आयुक्त ने धारा 144 लगाने को सही ठहराते हुए कहा कि जब दूसरों को 'असुविधा' हो तो मौलिक अधिकारों पर अंकुश लगाया जा सकता है। क्या...
पति की मृत्यु पर मुआवजे का दावा करने वाली एक विधवा का अधिकार पुनर्विवाह पर समाप्त नहीं होगा : दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली उच्च न्यायालय ने माना है कि मोटर वाहन दुर्घटना के कारण पति की मृत्यु पर मुआवजे का दावा करने वाली एक विधवा का अधिकार पुनर्विवाह पर समाप्त नहीं होगा और वह मृतक के माता-पिता के समान ही अधिकार की हकदार है। ट्रिब्यूनल ने मृतक के दावेदार अर्थात, उसकी विधवा और उसके माता-पिता को रुपए 1,68,39,642 दिए गए। हालांकि मृतक की विधवा को केवल 3,91,054.47 रुपए ही मिले। अदालत ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने पत्नी को "प्यार और आकर्षण की हानि" और "सह व्यवस्था और सहयोग के नुकसान" के लिए मुआवजा नहीं दिया।...
क्या पुलिस विश्वविद्यालय/कॉलेज परिसर में बिना अनुमति के प्रवेश कर सकती है?
इस बात को लेकर हर कहीं बहस छिड़ी हुई है कि क्या पुलिस को किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश करने से पहले कॉलेज/विश्वविद्यालय प्रशासन या किसी अन्य प्राधिकरण से अनुमति लेने की आवश्यकता होती है? दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी एवं उत्तर प्रदेश के अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पुलिस द्वारा प्रवेश किये जाने के बाद यह सवाल सोशल मीडिया से लेकर आम चर्चा में छाया हुआ है। जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में प्रवेश करने को लेकर पुलिस ने यह कहा है कि वे स्थिति को नियंत्रित करने के...
न्यायाधीशों का आकलन कौन करे?
अवनी बंसल हाल ही में सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली पीठ द्वारा दिये गये हालिया फैसलों को लेकर व्यक्त किये जा रहे मतों से हमारे तकनीकी, मानसिक और संभवतया रूहानी इनबॉक्स छलकने लगे हैं। अब सबकी निगाहें नये मुख्य न्यायाधीश- न्यायमूर्ति शरद अरविंद बोबडे पर टिकी हुई हैं। वास्तविक विषय-वस्तु पर आने से पहले, मैंने एक जज के नाम से पहले 'जस्टिस' (न्यायमूर्ति) शब्द जुड़ा पाया है, जैसा मेरे नाम के पहले तो कतई नहीं है। जस्टिस गोगोई की विरासत पर विचार करते हुए और बाबरी...
मरने से पहले दिया गया बयान केवल इसलिए अविश्वसनीय नहीं होगा क्योंकि इसे कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने दर्ज किया है : दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने माना है कि मरने से पहले दिया गया बयान (dying declaration) केवल इसलिए अविश्वसनीय नहीं होगा, क्योंकि इसे न्यायिक मजिस्ट्रेट के बजाय एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किया गया है। न्यायमूर्ति आईएस मेहता की एकल पीठ ने उल्लेख किया है कि जैसे ही यह मालूम हो कि मरने से पहले स्वेच्छा से बयान दिया गया है और यह सत्य है तो इसकी प्रासंगिकता इस बात से प्रभावित नहीं होगी कि एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा इस बयान को दर्ज किया गया है। वर्तमान मामले में आरोपी व्यक्तियों द्वारा कई...
अपनी नवजात बच्ची की हत्या करने की आरोपी मां को सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया, पढ़ें फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी नवजात बच्ची की गला दबाकर हत्या करने के आरोपी एक महिला को बरी कर दिया है। ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन के मामले को बरकरार रखा था कि मंजू ने अपने नवजात जन्मे बच्चे की हत्या इसलिए कर दी, क्योंकि वह एक लड़की थी। उच्च न्यायालय ने धारा 302 आईपीसी और सजा के तहत सजा की पुष्टि की थी। मंजू ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की जिस पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मोहन एम शांतनगौदर और न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी की पीठ ने कहा कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि आरोपी ने नवजात बच्ची का गला इसलिए...




















