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जानिए आरोपी और दोषसिद्ध के संवैधानिक अधिकार (प्रमुख वाद)

Shadab Salim
21 Dec 2019 8:07 AM GMT
जानिए आरोपी और दोषसिद्ध के संवैधानिक अधिकार (प्रमुख वाद)
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Rights of Accused Persons

हम अपराध होते ही आरोपी के प्रति सख्त हो जाते हैं। बहुत से मामलों में तो हम त्वरित न्याय की भी मांग कर रहे हैं। मीडिया में आरोपी पर ट्रायल चलाना भी आम सा हो गया है, परन्तु भारतीय संविधान आरोपी और दोषसिद्ध दोनों व्यक्तियों को अनेक अधिकार प्रदान करता है।

कार्योत्तर विधियों से संरक्षण-

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20 के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति केवल उस ही विधि के अंतर्गत अपराध का दोषी ठहराया जाएगा जो प्रवृत विधि है। प्रवृत विधि के अलावा वह किसी अन्य विधि के लिए वह दोषी नहीं ठहराया जा सकता है और न ही वह अधिक दंड का पात्र होगा, वह केवल उस ही दंड का पात्र होगा जिस दंड को प्रवृत विधि में बताया गया है। प्रवृत विधि से तात्पर्य उस विधि से है, जो विधि लागू है या चलन में है।

बुद्ध सिंह बनाम हरियाणा राज्य के मामले में यह माना गया है कि व्यक्ति को केवल वह ही दंड दिया जा सकता है जो अपराध करते समय प्रवृत विधि के अंतर्गत दिया जा सकता था।

दोहरे दंड से से संरक्षण-

संविधान के अनुच्छेद 20 (2) के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति एक अपराध के लिए एक से अधिक बार दंडित नहीं किया जा सकता है। यह उपबंध आंग्ल विधि के सिध्दांत Nemo debet vis vexari पर आधारित है, जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दो बार अभियोजित और दंडित नहीं किया जा सकता।

इस प्रकार अनुच्छेद 20(2) के संरक्षण निम्न शर्तों पर हो सकता है-

व्यक्ति का अभियुक्त होना आवश्यक है-

अभियोजन या कार्रवाई किसी न्यायालय या न्यायिक अभिकरण के समक्ष हुई हो और वह न्यायिक प्रकृति की रही हो-

अभियोजन किसी विधि विहित अपराध के संबंध में हो जिसके लिए दण्ड का प्रावधान हो-

आत्म अभिशंसन से सुरक्षा-

संविधान के अनुच्छेद 20(3) के अंतर्गत आत्म अभिशंसन से मुक्ति दी गई है। किसी भी अभियोजन में आरोपी को आत्म अभिशंसन के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। उसे स्वयं के प्रति साक्ष्य देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।

संविधान में मिले इस अधिकार के लिए तीन शर्तें निर्धारित की गई हैं, जो निम्न हैं-

व्यक्ति पर अपराध करने का आरोप लगाया गया हो-

उसे अपने विरुद्ध साक्ष्य देना हो-

और उसे अपने विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए बाध्य किया गया जाए-

एमपी शर्मा बनाम सतीश चंद्र के मामले में यह अभिनिर्धारित हुआ है कि एफआईआर रिपोर्ट पुलिस द्वारा दर्ज़ होने पर ही व्यक्ति को आरोपी या अभियुक्त नहीं माना जाता अपितु मजिस्ट्रेट द्वारा दिये जांच के आदेश पर भी व्यक्ति को अभियुक्त माना जाएगा।

अमेरिकी संविधान में आत्म अभिशंसन से मुक्ति केवल अभियुक्त ही नहीं गवाहों को भी इससे मुक्ति दी गयी है।

पुलिस द्वारा एफ आई आर कॉपी दिए जाने का अधिकार-

किसी भी व्यक्ति को जब किसी मामले में अभियुक्त बनाया जाता है तो उस व्यक्ति को उस मामले में यह बताया जाता है कि उसे किस मामले में बंदी बनाया गया है तथा उस पर किन अपराध धारा के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया गया है।पुलिस उसे एफ आई आर की एक कॉपी सौंपेंगी तथा अपने विरुद्ध लगे मुकदमे की पूर्ण जानकारी देगी।

ज़मानत का अधिकार-

यदि अभियुक्त किसी ज़मानतीय अपराध में अभियुक्त बनाया गया है तो पुलिस द्वारा व्यक्ति को यह जानकारी दी जाएगी किया गया अपराध ज़मानतीय है और इस अपराध में ज़मानत पर छोड़ा जा सकता है।

बंदियों के अधिकार और अनुच्छेद 21 सिद्धदोष व्यक्ति भी अपने मूल अधिकारों से पूर्णतया वंचित नहीं होते है।

डीवीए पटनायक बनाम आंध्रप्रदेश राज्य के मामले में यह माना गया है कि जेल की दीवारों पर बिजली का करंट दौड़ाना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।

व्यक्ति को संपत्ति अर्जन करने,धारण और व्ययन का अधिकार

एक व्यक्ति को अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त प्रस्तुत अधिकार भी प्राप्त है जिसे उसे विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बगैर वंचित नहीं किया जा सकता।

निःशुल्क विधिक सहायता का अधिकार-

एमएम हासकाट बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में यह निर्धारित किया गया है कि सिद्धदोष व्यक्ति को निशुल्क कानून सहायता दी जाए और अपील के लिये निःशुल्क निर्णय की प्रतियां दी जाए।

यदि व्यक्ति कानूनी सुविधाएं लेने के लिए असमर्थ है तो राज्य द्वारा उसे निःशुल्क विधिक सहायता दी जाएगी। न्यायाधिपति कृष्ण अय्यर ने कहा है कि निःशुल्क कानूनी सहायता राज्य का कर्तव्य है न कि राज्य का दान है। किसी व्यक्ति को बगैर कानूनी सहायता दिए सिद्धदोष नहीं किया जा सकता। अगर व्यक्ति निर्धन है तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसे कानूनी सहायता के अधिकार से वंचित किया जाए।

हुस्न आरा ख़ातून के मामले में भी यह माना गया है निःशुल्क विधिक सहायता पाने का अधिकार अनुच्छेद 21 के अधीन युक्तियुक्त एव ऋतु प्रक्रिया है एक आवश्यक अंग है।

न्यायालय का यह कर्तव्य है कि वह अभियुक्त से यह पूछे कि क्या उसे राज्य के खर्च पर विधिक सहायता चाहिए? वह स्वयं विधिक सेवा लेने में समर्थ है कि नहीं।

एकांत कारावास के विरुद्ध संरक्षण-

सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन के मामले में पिटीशनर के प्रिजन्स एक्ट 1894 की धारा 30(2) की विधिमान्यता को इस आधार पर चुनोती दी थी कि वह संविधान के अनुच्छेद 14,19 और 21 का अतिक्रमण करता है अतएव अविधिमान्य है।

दोनों पिटीशनर तिहाड़ जेल में थे।सुनील बत्रा जो मृत्युदंड की सजा भुगत रहा था उसने अपने एकांत कारावास का तथा चार्ल्स शोभराज जिसका परीक्षण चल रहा था उसने अपने शरीर में लोहे की बेड़ी लगाने की इस आधार पर चुनाती दी कि इससे उसके प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन होता है।

सुनील बत्रा की दलील को तो खारिज कर दिया गया पर चार्ल्स शोभराज की दलील को सही माना गया। पंजाब जेल मैनुअल का पैरा 99 जो खतरनाक कैदियों को बेड़ी लगाने का उपबंध करता है उसे विधि नहीं माना तथा चौबीस घंटे कैदियों को बेड़ी लगाकर रखने के नियम को समाप्त कर दिया गया।

बाद में सुनील बत्रा के मामले में फिर सुनवाई कर कुछ नियम पारित किए गए और अंडर ट्रायल कैदियों के साथ सिद्धदोष व्यक्ति की तरह बर्ताव करने पर रोक लगायी गयी। कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार को प्रतिबंधित किया गया और परिचितों के मिलने तथा एकांत कारावास से सुरक्षा इत्यादि पर भी प्रतिबंध किया गया।

शीघ्र विचारण का अधिकार-

अब्दुल रहमान अंतुले बनाम आर एस नायक के मामले में उच्चतम न्यायालय ने आपराधिक मामलों के अभियुक्त के शीघ्रतर विचारण के लिए विस्तृत मार्गदर्शन सिध्दांत विहित किया है।

इसमें न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राप्त शीघ्रतर परीक्षण का अधिकार सभी स्तरों पर प्राप्त होता है अर्थात अन्वेषण, जांच,परीक्षण, अपील,पुनरीक्षण और पुनरीक्षण पर प्राप्त है। यह सभी अधिकार अभियुक्तों को भारतीय दण्ड प्रकिया सहिंता की धारा 309 के अधीन भी उसे प्राप्त हैं।

अमेरिकी संविधान में मूल अधिकारों में ही शीघ्र विचारण का प्रावधान रखा गया है पर भारतीय संविधान में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान तो नहीं है पर अंतुले के मामले में यह माना गया है कि निश्चित ही अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता में यह अधिकार निहित है। अभियुक्त को शीघ्रतर विचारण से वंचित नहीं किया जा सकता है।

पुलिस मुठभेड़ में मृत्यु के लिए प्रतिकर-

पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज बनाम भारत संघ के मामले में पिटीशनर ने अनुच्छेद 32 के अधीन लोकहित वाद फाइल करके न्यायालय से प्रार्थना की गई कि इम्फाल पुलिस द्वारा नकली मुठभेड़ जिसमे दो व्यक्ति मारे गए थे कि जांच का आदेश दे दोषी पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध समुचित कार्रवाई निर्देश दे तथा मृतक के परिवारजनों को प्रतिकार प्रदान करे।

न्यायालय द्वारा यह माना गया कि पुलिस मुठभेड़ में दो व्यक्तियों को जान से मार डालना अनुच्छेद 21 में प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का सीधा सीधा उल्लघंन है।

संप्रभु की विमुक्ति का सिद्धांत यह लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि आरोपितों को पुलिस मुठभेड़ में मार डालना किसी भी सूरत में जायज़ नहीं है।मृतक के परिजनों को एक एक लाख का प्रतिकर सरकार द्वारा प्रदान किया जाए।

निरुद्ध व्यक्ति को अपने परिवार सदस्यों और वक़ील से बात करने का अधिकार-

फ्रैंसिस कोरेली बनाम संघ क्षेत्र दिल्ली के मामले में निवारक निरोध अधिनियम के अधीन निरुद्ध कैदी को अपने परिवार तथा वकील से मिलने का अधिकार प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार में निहित है।

न्यायालय ने वकील और परिवार के लोगो से मिलने को भी प्राण और दैहिक स्वतंत्रता माना है तथा किसी भी आरोपी को परिवार तथा वकील से मिलने के लिए कोई शर्त निर्धारित नहीं की जा सकती।

पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु के विरुद्ध संरक्षण-

पुलिस अभिरक्षा में गिरफ्तार व्यक्ति और जेल में कैदियों की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है। व्यक्ति को पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु जैसे घृणित काम से संरक्षण भारतीय संविधान प्रदान करता है। यह संरक्षण प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार में निहित होता है।

डीके बासू बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के एतिहासिक मामले में तो उच्चतम न्यायालय ने यह तक कहा है कि -पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु होने विधि शासन द्वारा शासित सभ्य समाज में सबसे खराब अपराध है।

गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा अपनी गिरफ्तारी की जानकारी अन्य को देना-

गिरफ्तार व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि वह अपनी कुशलता चाहने वाले व्यक्ति जो उसका मित्र या नातेदार हो उसे अपनी गिरफ्तारी की जानकारी देगा जिससे निरुद्ध व्यक्ति की उचित रिहाई के प्रबंध किए जा सके।

निरुद्ध व्यक्ति को लोकेशन की जानकारी देना-

पुलिस द्वारा निरुद्ध व्यक्ति को अपनी लोकेशन की जानकारी दी जाएगी।किसी भी व्यक्ति को अंजान स्थान पर लाकर नहीं पटका जा सकता है।पुलिस द्वारा अन्वेषण के दौरान व्यक्ति को संपूर्ण जानकारी व्यक्ति को देना होगी,पुलिस उसे किस स्थान पर लेकर जा रही है और किस स्थान पर रख रही है इसकी जानकारी पुलिस को देना होगी।

24 घंटो के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना-

व्यक्ति को पुलिस गिरफ्तारी के बाद चौबीस घंटों के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने का प्रावधान अनुच्छेद 22 में रखा गया है। मजिस्ट्रेट के आदेश के बगैर व्यक्ति को 24 घंटो से अधिक पुलिस अपनी अभिरक्षा में नहीं रख सकती। आगे पुलिस को निरुद्ध व्यक्ति को अधिक समय के लिए अपनी अभिरक्षा में लेने के लिए मजिस्ट्रेट से समय लेना होगा। मजिस्ट्रेट द्वारा दिये समय तक ही पुलिस द्वारा व्यक्ति को अपनी अभिरक्षा में रखा जा सकता है।

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