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 एक मामले में दी गई जमानत अन्य मामले में दर्ज FIR के आधार पर रद्द नहीं हो सकती : कर्नाटक हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
26 Dec 2019 6:45 AM GMT
 एक मामले में दी गई जमानत अन्य मामले में दर्ज FIR के आधार पर रद्द नहीं हो सकती : कर्नाटक हाईकोर्ट
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कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ ताजा एफआईआर दर्ज करना, किसी अन्य मामले में पहले से दी गई अग्रिम जमानत को रद्द करने का आधार नहीं हो सकता जहां पहले से ही ट्रायल चल रहा है।

न्यायमूर्ति बीए पाटिल ने कहा,

"एकमात्र आधार जो बनाया गया है वह यह है कि दो नए आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं। ट्रायल के रास्ते में उक्त मामले किस तरह से आते हैं, यह भी नहीं बताया गया है। ऐसी परिस्थितियों में, जमानत रद्द करने का ये आदेश कानून में ठहरने वाला नहीं है। "

दरअसल खाजिम @ खजिमुल्ला खान ने सत्र अदालत द्वारा पारित एक आदेश को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें 27 जुलाई के एक आदेश द्वारा उन्हें दी गई अग्रिम जमानत को रद्द कर दिया गया।

मामला यह था कि उसने अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश, तृतीय मैसूरु के समक्ष आईपीसी की धारा 302, 392, 201 के साथ धारा 34 के तहत दंडनीय अपराध के लिए अपराध संख्या 178 / 2015 में अग्रिम जमानत का आवेदन किया था।

15 नवंबर, 2017 के आदेश से सत्र न्यायाधीश ने याचिका की अनुमति दी और कुछ शर्तों को लागू करके याचिकाकर्ता-अभियुक्त को अग्रिम जमानत पर रिहा कर दिया। इसमें एक शर्त यह थी कि याचिकाकर्ता इस या किसी समान अपराध में शामिल नहीं होगा।

इसके बाद राज्य ने यह कहते हुए जमानत रद्द करने की अपील दायर की कि याचिकाकर्ता-अभियुक्त उदयगिरि पुलिस स्टेशन के अपराध संख्या 84 / 2019 और 95/2019 में शामिल रहा है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद मजिस्ट्रेट ने अग्रिम जमानत रद्द करने का आदेश पारित किया।

अभियुक्त के वकील ने तर्क दिया कि "जिस मामले में जमानत दी गई है, ट्रायल पहले ही शुरू हो चुका है और कई गवाहों की जांच की जा चुकी है और याचिकाकर्ता-अभियुक्त नियमित रूप से ट्रायल जज के समक्ष उपस्थित हो रहा है और इस आशय का कोई आरोप नहीं है कि वह ट्रायल में शामिल नहीं हो रहा है और मामले के सुचारू ट्रायल में हस्तक्षेप कर रहा है।

इसके अलावा, एक बार जमानत मिल जाने के बाद, बिना किसी पर्याप्त सामग्री के इस आशय कि अभियुक्त का कृत्य उस मुकदमे के रास्ते में आ गया है जिसमें जमानत दी गई है, न्यायालय जमानत रद्द नहीं कर सकता।

उसकी ओर से आगे कहा गया कि जमानत को स्वचालित और यंत्रवत् रद्द करना नहीं चाहिए। कोर्ट को अपने विवेक का इस्तेमाल करना होगा और कोर्ट को केस की मेरिट के बारे में जानकारी देनी होगी। मामले के गुणों पर कोई जांच किए बिना इस आदेश को पारित कर दिया गया है।

हालांकि राज्य के वकील ने दलील का विरोध करते हुए कहा कि "इससे पहले याचिकाकर्ता-अभियुक्त आईपीसी की धारा 302, 392, 201 के तहत दंडनीय मामलों में शामिल रह चुका है और अब अभियुक्त इसी तरह के अपराधों में शामिल है और उसने और भी कई अपराध किए हैं और जो शर्त लगाई गई है ये उसका स्पष्ट रूप से उल्लंघन है। आरोपी नंबर 3 द्वारा दी गई स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया गया है। "

इस दौरान अदालत ने कहा,

" दिए गए फैसलों के ऊपर के क्षेत्र में निर्धारित अनुपात से गुजरने के बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जमानत रद्द करने के लिए आवेदन पर विचार करते समय किन मानदंडों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। ट्रायल कोर्ट में कोई भी अस्पष्ट और न्यायोचित कारण नहीं बताया गया है कि सुनवाई के दौरान केस का पंजीकरण उस ट्रायल के रास्ते में कैसे आता है जिसमें जमानत दी गई है। "

इसमें कहा गया कि

" सिर्फ इसलिए कि अग्रिम जमानत देते समय शर्त लगाई गई है, फिर भी स्वचालित रूप से इसे तकनीकी आधार पर नहीं होना चाहिए।

तथ्यों से भी संकेत मिलता है कि अभियुक्त को अग्रिम जमानत दी गई और उसके बाद से वो अदालत के सामने पेश हो रहा है और पहले से ही ट्रायल में कई और गवाहों की जांच की जा चुकी है।

जब उक्त मामले में अभियुक्त द्वारा दी गई स्वतंत्रता की कोई बाधा या दुरुपयोग नहीं है, जिसमें जमानत दी गई है,केवल इसलिए कि कुछ अन्य मामले दर्ज किए गए हैं और उस प्रकाश में यदि स्वचालित रूप से जमानत रद्द की गई है, तो यह किसी विशेष व्यक्ति की स्वतंत्रता जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दी गई है, को प्रभावित करने वाला है।

न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से निपटने के दौरान उपरोक्त सभी तथ्यों को ध्यान में रखना होगा और यदि कोई उचित आशंका है कि दी गई स्वतंत्रता का दुरुपयोग होने वाला है, तो ऐसी परिस्थितियों में न्यायालय अपनी शक्ति का प्रयोग कर जमानत रद्द कर सकता है। "

याचिकाकर्ता के लिए वकील बी लतीफ उपस्थित हुए जबकि एम शिवकर मद्दुर, राज्य के लिए पेश हुए।


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