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भारत के कड़े अधिनियमों में से एक अधिनियम है एनडीपीएस एक्ट 1985, जानिए प्रमुख बातें

Shadab Salim
31 Dec 2019 7:26 AM GMT
भारत के कड़े अधिनियमों में से एक अधिनियम है एनडीपीएस एक्ट 1985, जानिए प्रमुख बातें
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भारतीय संसद में 1985 में एनडीपीएस एक्ट पारित किया गया, जिसका पूरा नाम नारकोटिक्स ड्रग्स साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट 1985 है। नारकोटिक्स का अर्थ नींद से है और साइकोट्रोपिक का अर्थ उन पदार्थों से है जो मस्तिष्क के कार्यक्रम को परिवर्तित कर देता है।

कुछ ड्रग और पदार्थ ऐसे है जिनका उत्पादन और विक्रय ज़रूरी है, लेकिन उनका अनियमित उत्पादन तथा विक्रय नहीं किया जा सकता। उन पर सरकार का कड़ा प्रतिबंध होता है और रेगुलेशन है, क्योंकि ये पदार्थ अत्यधिक मात्रा में उपयोग में लाने से नशे में प्रयोग होने लगते हैं, जो मानव समाज के लिए बहुत बड़ी त्रासदी सिद्ध हो सकती है। ऐसी त्रासदी से बचने के लिए विश्व के लगभग सभी देशों द्वारा इस तरह के अधिनियम बनाए गए हैं।

एनडीपीएस अधिनियम के बनने से पहले भी समस्त भारत के लिए कुछ अधिनियम थे जो इन पदार्थों का नियमन करते थे। जैसे डेंजरस ड्रग्स अधिनियम 1930 था। सभी अधिनियम को समाप्त कर एक अधिनियम बनाया गया, जिसका नाम एनडीपीएस एक्ट 1985 रखा गया। यह अधिनियम इन पदार्थ और ड्रग्स के संबंध में पूरी व्यवस्थित प्रकिया और दंड का उल्लेख करता है।

यूएन सम्मेलन के बाद एनडीपीएस एक्ट

कई यूनाइटेड नेशन और यूनाइडेट स्टेट के सम्मेलनों में एनडीपीएस एक्ट बनाये जाने पर यूएन द्वारा ज़ोर दिया गया है तथा कठोरतापूर्वक इस अधिनियम को अधिनियमित किये जाने पर बल दिया है, उसके परिणामस्वरूप भारत समेत कई राष्ट्रों के ऐसे कानून तैयार किये हैं।

एनडीपीएस एक्ट में प्रतिबंधित ड्रग्स

अधिनियम के द्वारा एक अनुसूची दी गयी है। उस अनुसूची में केंद्रीय सरकार उन ड्रग्स को सम्मलित करती है जो नशे में प्रयोग होकर मानव जीवन के लिए संकट हो सकते है। इन ड्रग्स का उपयोग जीवन बचाने हेतु दवाई और अन्य स्थानों पर होता है, परन्तु इनका अत्यधिक सेवन नशे में प्रयुक्त होता है, इसलिए इन्हें पूर्ण रूप से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता परन्तु इनका नियमन अवश्य किया जा सकता है। कोका प्लांट्स, कैनाबिस, ओपियम पॉपी जैसे पौधे इसमे शामिल किए गए हैं।

मात्रा का महत्व

इस अधिनियम में मात्रा के द्वारा ही दंड का प्रावधान किया गया है। मात्रा को तीन भागों में बांटा गया है, जिसमे,अल्पमात्रा और वाणिज्यिक और इन दोनों के बीच की मात्रा है। दंड भी इन तीन स्तरों पर ही होगा।

1. अल्पमात्रा के लिए एक वर्ष तक का कारावास और जुर्माना जो दस हजार तक का हो सकेगा।

2. अल्पमात्रा और वाणिजियक मात्रा के बीच की मात्रा के लिए दस वर्ष तक का कारावास और जुर्माना जो एक लाख तक का हो सकेगा।

3. वाणिज्यिक मात्रा में बीस वर्ष तक का कारावास और कम से कम एक लाख तक का जुर्माना जो दो लाख तक का हो सकता है।

मात्रा का निर्धारण समय समय पर केंद्र द्वारा किया जाता रहता है। यहां अगर भारत के सीमा क्षेत्र के भीतर व्यक्ति के पास यदि एक ग्राम भी अफीम इस अधिनियम के अधीन बनाये नियम या दिए आदेश के अंतर्गत अनुज्ञप्ति के बगैर पायी जाती है तो भी वह दोषी होगा। ऐसे मामले में वह अल्पमात्रा का दोषी माना जाएगा। इन पदार्थों और ड्रग्स का लगभग हर रूप प्रतिबंधित किया गया है और शास्ति रखी गयी है-

अधिनियम के अंतर्गत अनुसूची में डाले गए पदार्थो का निर्माण, मैन्यूफेक्चरिंग, कृषि, प्रकिया, क्रय, विक्रय, संग्रह, आयात, निर्यात, परिवाहन और यहां तक उपभोग भी प्रतिबंधित किया गया है। इस ही के साथ उपभोग पर भी दंड रखा गया है।

इस अधिनियम में है मृत्युदंड तक का प्रावधान

इस अधिनियम में मृत्युदंड का भी प्रावधान रखा गया है। अधिनियम की धारा 31 A के अंतर्गत एक बार सिद्धदोष ठहराए जाने के बाद पुनः उस तरह का अपराध किया जाता है तो मृत्युदंड भी दिया जा सकता है।

अधिनियम के अंतर्गत अपराधों का प्रयास, तैयारी,उत्प्रेरणा,षड़यंत्र, उपभोग और फाइनेंस को भी अपराध बनाया गया है।और इन सभी के लिए वही दंड है जो इन अपराधों के लिए दंड रखा गया है।

तीन प्रमुख पौधे

अधिनियम के अंतर्गत तीन प्रमुख पौधे हैं, जिनकी खेती, परिवहन, आयात, निर्यात, संग्रह, क्रय, विक्रय, उत्पादन, कब्ज़ा और उपभोग अनुज्ञप्ति और इस अधिनियम के अंतर्गत किसी आदेश के बगैर दंडनीय है।

कोका का पौधा- इस पौधे से मुख्यता कोकेन प्राप्त की जाती है। कोकेन अत्यधिक नशीली होती है।

कैनाबिस का पौधा- इसे सामान्यता भांग का पौधा भी कहा जाता है। इस ही पौधे की फूल,पत्तियों और तने को सुखाकर गांजा बनाया जाता है। भांग केवल पत्तियों से तैयार हो जाती है। इस पौधे की मादा प्रजाति से एक गोंद जैसा द्रव निकलता है जिससे चरस बनती है।

पोस्त का पौधा- इसे अफीम के पौधे के नाम से जाना जाता है। इस पौधे की पत्तियां नशीली नहीं होती है। इसका एक फल होता है जिसे डोडा कहा जाता है। डोडा पर चाकू मारने से दूध जैसा द्रव निकलता है जो सूखने पर अफीम बनता है। डोडा के भीतर दाने होते है जिन्हें खस खस के दाने कहा जाता है वह नशीले नहीं होते हैं, उन्हें मेवों में इस्तेमाल किया जाता है, जो सूखा हुआ ऊपर खोल बचता है उसे डोडा चूरा कहा जाता है जो नशीला होता है लेकिन अफीम से कम।

इस ही पौधे से अत्यधिक आवश्यक औषधि मॉर्फिन प्राप्त की जाती है जो दर्द निवारक और नींद के लिए प्रयुक्त होती है।

विशेष न्यायालय

इस अधिनियम की धारा 36 के अंतर्गत विशेष न्यायालय से गठन किया गया है। उन ही न्यायालय द्वारा यह मामले विचारित किये जाते हैं। इस अधिनियम का उद्देश्य नशे के कारोबार पर सख्ती से अंकुश लगाना है और इसीलिए विशेष न्यायालय बनाए गए हैंं।

अपराधी परिवीक्षा का लाभ नहीं मिलना

अधिनियम के अंतर्गत सिद्धदोष व्यक्ति को अपराधी परिवीक्षा एवं दंड प्रकिया सहिंता 1973 की धारा 360 का लाभ नहीं मिलेगा।

तलाशी के लिए शर्तें

अधिनियम की धारा 50 के अंतर्गत तलाशी के लिए कुछ शर्तें रखी गयी हैं। इस धारा के निर्माण का उद्देश्य फ़र्ज़ी मुकदमे से जनसाधारण को सुरक्षित करना है। जब पुलिस या जांच अधिकारी किसी व्यक्ति से प्रतिबंधित स्वापक औषधि या मनः प्रभावी पदार्थ पाए जाने की शंका करता है तो उस निरुद्ध कर निकटवर्ती राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट के समक्ष लेकर जाएगा तथा उसके सामने तलाशी लेगा।

हालांकि पंजाब राज्य बनाम बलजिंदर सिंह के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजी तलाशी के दौरान एनडीपीएस अधिनियम की धारा 50 का पालन नहीं करने से वाहन से हुई बरामदगी अमान्य नहीं हो जाती। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी की निजी तलाशी के दौरान नशीला पदार्थ अधिनियम ‌(एनडीपीएस ) की धारा 50 का पालन नहीं करने के कारण वाहन से हुई बरामदगी अमान्य नहीं हो जाती है। न्यायमूर्ति यूयू ललित, इंदु मल्होत्रा और कृष्ण मुरारी की पीठ ने कहा कि एनडीपीएस अधिनियम की धारा 50 सिर्फ निजी तलाशी तक सीमित है न कि वाहन या किसी कंटेनर परिसर की।

आरिफ खान बनाम उत्तरांचल सरकार (एससी) के मामले में धारा 50 की भाषा की सम्पूर्णता को नजरंदाज किया गया है। धारा 50 स्पष्ट शब्दों में लिखा गया है। जहां तक आरोपी को मजिस्ट्रेट या एक राजपत्रित अधिकारी के समक्ष तलाशी के विकल्प दिये जाने का प्रश्न है तो इस धारा में कोई भ्रम की स्थिति नहीं है।

धारा 50(एक) और (दो) में इस्तेमाल भाषा ऐसे दृष्टांत बताती है, जहां संदिग्ध व्यक्ति मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी की मौजूदगी में तलाशी न कराने की इच्छा व्यक्त करता है। धारा 50(एक) 'यदि ऐसा व्यक्ति आवश्यक समझता है' मुहावरे का इस्तेमाल करती है जबकि 50(दो) में कहा गया है, 'यदि ऐसा अनुरोध किया जाता है।'

इसी तरह, धारा 50(पांच) और (छह) वैसे दृष्टांत देती है, जहां मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी की अनुपस्थिति में एक अधिकारी द्वारा कारणों को दर्ज करके तथा वरीय अधिकारी को सूचित करके तलाशी ली जाती है। स्पष्ट रूप से, विधायिका ने मादक पदार्थों के संदिग्ध आरोपियों की तलाशी के दौरान किसी मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी की उपस्थिति अनिवार्य करने पर विचार नहीं किया। आरिफ खान मामले में, आरोपी ने मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी की मौजूदगी में तलाशी लिये जाने का अपना अधिकार छोड़ दिया था।

हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने पैरा संख्या 244 में बगैर कोई उचित कारण दिये खुद ही निष्कर्ष निकाल लिया कि चूंकि तलाशी संदिग्ध के शरीर की करनी थी, इसलिए, अभियोजन पक्ष के लिए यह साबित करना अनिवार्य है कि अपीलकर्ता की तलाशी और रिकवरी मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी की उपस्थिति में हुई थी।

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