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जानिए 'इन -कैमरा' (बंद कमरा) कार्यवाही क्या होती है, इसे कब आयोजित किया जाता है?

SPARSH UPADHYAY
25 Dec 2019 3:00 AM GMT
जानिए इन -कैमरा (बंद कमरा) कार्यवाही क्या होती है,  इसे कब आयोजित किया जाता है?
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भारत में स्थापित न्यायिक प्रणाली की एक आवश्यक और आंतरिक व्यवस्था के रूप में यह अच्छी तरह से तय किया गया है कि देश में 'खुले न्यायालय' (Open Court) का सिद्धांत कार्यशील होगा। अर्थात न्यायालय में कोई भी न्यायिक कार्य एवं न्यायालय की कार्यशैली, जनसाधारण की नजरों से दूर नहीं होगी, और कोई भी व्यक्ति, जब चाहे न्याय के मंदिर में प्रवेश करते हुए वहां की कार्यप्रणाली का अनुभव कर सकता है। यह सिद्धांत, किसी भी आमजन को, जो कानून के शासन के वास्तविक प्रवर्तन को देखने का इच्छुक है, ऐसा करने में सक्षम बनाता है। इस बात को विस्तार से समझाने की कोई आवश्यकता नहीं है कि खुले न्यायालय की प्रणाली, एक निष्पक्ष एवं स्वतंत्र प्रणाली के रूप में मानी जाती है। इस तरह की पारदर्शिता, न्यायिक व्यवस्था में लोगों के विश्वास को भी मजबूत करती है और प्रणाली के नियमन के साथ-साथ उसकी दक्षता को भी सुनिश्चित करती है।

इसी क्रम में, नरेश बनाम महाराष्ट्र राज्य (AIR 1967 SC 1) के मामले में इस सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या की गयी है। इस मामले में यह कहा गया कि, "महान दार्शनिक, प्लेटो ने बहुत पहले अपने कानूनों में यह विचार किया था कि नागरिकों को ट्रायल के वक्त उपस्थित होना चाहिए और उसे ध्यान से सुनना चाहिए। हेगेल ने अपने 'अधिकार के दर्शन' में कहा है कि न्यायिक कार्यवाही सार्वजनिक होनी चाहिए क्योंकि न्यायालय का उद्देश्य न्याय करना है, जो सभी के लिए एक सार्वभौमिक मामला है, कुछ असाधारण मामलों को छोड़कर, न्याय की अदालत की कार्यवाही को जनता के लिए खोला जाना चाहिए।"

हालाँकि परिस्थितियों के मुताबिक, हर बार यह न्याय एवं पक्षकारों के हित में नहीं होता कि हर मामले की कार्यवाही को खुली अदालत में अंजाम दिया जाए। इसीलिए 'इन-कैमरा' कार्यवाही (बंद कमरे में चलने होने वाली कार्यवाही) को अंजाम दिया जाता है और इसे एक खुली अदालत के नियम एवं सिद्धांत के अपवाद के रूप में समझा जाता है। एक खुली अदालत या खुला न्याय तब होता है, जब किसी मामले की सुनवाई आम लोगों और प्रेस की उपस्थिति में की जाती है, जो जनता के समक्ष मामलों को रिपोर्ट करेगा। किसी भी अदालती कार्यवाही का सामान्य कोर्स, एक खुली अदालत है।

जहाँ खुली अदालत प्रणाली एक नियम है, वहीँ 'इन-कैमरा' कार्यवाही एक अपवाद है। निजी सुनवाई/बंद कमरे की सनुवाई, केवल न्यायाधीश, वकील, अभियुक्त की उपस्थिति में संबंधित गवाहों के साथ आयोजित की जाती है। इस तरह की सुनवाई की कार्यवाही मीडिया या आम जनता को ज्ञात नहीं होती है। गौरतलब है कि प्रेस और अन्य मीडिया को भी "इन-कैमरा" कार्यवाही, प्रकाशित करने की अनुमति नहीं है, इस संदर्भ में, हम "बंद कमरे में" कार्यवाही पर भारतीय कानून के कुछ बुनियादी प्रावधानों पर गौर कर सकते हैं।

कानूनी प्रावधान क्या हैं?

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 153 बी यह कहती है कि, 'वह स्थान जहाँ किसी वाद के विचारण के प्रयोजन के लिए कोई सिविल न्यायालय लगता है, खुला न्यायालय समझा जायेगा और उसमे साधारणतः जनता की वहां तक पहुँच होगी जहाँ तक जनता इसमें सुविधापूर्वक समां सके:

परन्तु यदि पीठासीन न्यायाधीश ठीक समझे तो वह किसी विशिष्ट मामले की जांच या विचारण के किसी भी प्रक्रम पर यह आदेश दे सकता है कि साधारणतः जनता या किसी विशिष्ट व्यक्ति की न्यायालय द्वारा प्रयुक्त कमरे या भवन तक पहुँच नहीं होगी या वह उसमे नहीं आएगा या वह नहीं रहेगा।

'इन-कैमरा' कार्यवाही आमतौर पर न्यायिक पृथक्करण, तलाक की कार्यवाही, नपुंसकता और ऐसे अन्य मामलों सहित वैवाहिक विवादों के मामलों में आयोजित की जाती है। हालाँकि, जहाँ एक सिविल कोर्ट, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के तहत कार्यवाही का संचालन कर रही है, उसके पास यह विवेकाधिकार होता है कि वह एक मुकदमे में "इन-कैमरा" कार्यवाही करने के आदेश दे सकती है (केवल परिवार से संबंधित मामलों की कार्यवाही, या यदि पार्टियों की ऐसी इच्छा हो तो) - Order XXXII A Rule 2 CPC के अंतर्गत।

बेशक, अदालतें अपने निहित शक्तियों के अभ्यास में किसी भी व्यक्ति के अदालत में प्रवेश पर रोक लगा सकती हैं। इसी प्रकार, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 327 (1) में यह कहा गया है कि 'वह स्थान, जिसमे कोई दंड न्यायालय किसी अपराध की जांच या विचारण के प्रयोग से बैठता है, खुला न्यायालय समझा जायेगा, जिसमे जनता साधारणतः प्रवेश कर सकेगी जहाँ तक कि सुविधापूर्वक वे उसमे समां सकें':

हालाँकि इसी धारा में यह प्रावधान है कि, 'यदि पीठासीन न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट ठीक समझे तो वह किसी विशिष्ट मामले की जांच या विचारण के किसी भी प्रक्रम में यह आदेश दे सकता है कि जनसाधारण या कोई विशेष व्यक्ति उस कमरे में या भवन में, जो न्यायालय द्वारा उपयोग में लाया जा रहा है, न तो प्रवेश करेगा, न होगा न रहेगा।'

इसी प्रकार हम देख सकते हैं कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 327 में उन मामलों के प्रकारों को रखा गया है, जिनकी कार्यवाही "इन-कैमरा" संचालित की जानी चाहिए, इनमे बलात्कार, पीड़िता की मृत्यु या लगातार विकृतशील दशा कारित करने, पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ पृथक्करण के दौरान मैथुन, प्राधिकार में किसी व्यक्ति द्वारा मैथुन, सामूहिक बलात्संग के मामले शामिल हैं। "कैमरा में" कार्यवाही आम तौर पर ऊपर बताए गए संवेदनशील मुद्दों से जुड़े मामलों में पार्टियों की गोपनीयता की रक्षा के लिए आयोजित की जाती है। इसके सम्बन्ध में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 327 (2) कहती है:-

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 376, धारा 376 क, धारा 376 ख, धारा 376 ग़, धारा 376 घ, धारा 376 ड के अधीन, बलात्संग या किसी अपराध की जांच या उसका विचारण बंद कमरे में किया जायेगा।

इसके अलावा हम हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और परिवार न्यायालय अधिनियम के तहत "कैमरे में" कार्यवाही के अन्य उदाहरण देख सकते हैं। हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के अंतर्गत धारा 22 की कार्यवाही, कैमरे में होनी चाहिए और यह मुद्रित या प्रकाशित नहीं हो सकती है। इस अधिनियम के तहत हर कार्यवाही 'बंद कमरे' में की जाएगी और किसी भी व्यक्ति के संबंध में किसी भी मामले को छापना या प्रकाशित करना कानूनन उचित नहीं होगा। उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के फैसले को मुद्रित या प्रकाशित, न्यायालय की पूर्व अनुमति के साथ किया जाता है।

फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 11 कहती है कि, हर उस मुकदमे या कार्यवाही में, जिसके लिए यह एक्ट लागू होता है, उसकी कार्यवाही 'इन-कैमरा' हो सकती है, यदि फैमिली कोर्ट की ऐसी इच्छा हो और यह कैमरा के अंतर्गत होगी ही, अगर कोई पक्षकार चाहें तो। संथिनी बनाम विजय वेंकटेश TRANSFER PETITION (CIVIL) NO।1278 OF 2016 के मामले में CJI की पीठ ने यह फैसला दिया था कि वैवाहिक विवादों की कार्यवाही को 'बंद कमरे' में आयोजित किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि 'इन-कैमरा' कार्यवाही करने का निर्णय, पारिवारिक अदालतों पर छोड़ दिया जाना चाहिए। एक कठोर नियम नहीं बनाते हुए, अदालत ने आगे कहा कि 'इन-कैमरा' कार्यवाही करने के कारण, केस-टू-केस विश्लेषण पर निर्भर कर सकते हैं।

'इन-कैमरा' कार्यवाही की महत्वता

कुछ विशेष मामलों में 'इन-कैमरा' कार्यवाही की महत्वता ऐसे समझी जा सकती है कि अपने विवेक के प्रयोग में और यदि अदालत ऐसा करना उचित समझती है, तो न्यायालय यह आदेश दे सकता है कि किसी मुकदमें की कार्यवाही को 'इन-कैमरा' रखा जायेगा, और आम तौर पर जनता के पास अदालत द्वारा उपयोग किए जाने वाले न्यायालय कक्ष या भवन में पहुंचने या रहने की कोई अनुमति नहीं होगी। इस अपवाद की प्रकृति ही ऐसी है कि अदालत के लिए यह निर्णय लेने से पहले कि अदालती कार्यवाही को जनता की निगाह से बाहर रखा जायेगा, उचित देखभाल और सावधानी बरतने की आवश्यकता है। ऐसी सावधानी बरतने के बाद असाधारण और उचित मामलों में, अदालत यह निर्देश दे सकती है कि पूरी कार्यवाही या उसका एक हिस्सा 'इन-कैमरा' संचालित किया जाएगा - जानकी बल्लाव बनाम बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड (AIR 1989 Orissa 225)

हमे यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि सार्वजनिक परीक्षण के महत्व पर जोर देते हुए, हम इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि न्यायपालिका का प्राथमिक कार्य, उन पक्षों के बीच न्याय करना है, जो मामले को अदालत के सामने लाते हैं। नरेश श्रीधर मिराजकर एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य 1966 SCR (3) 744 के मामले में अदालत ने इस प्रश्न का अवलोकन किया था कि यदि किसी कारण से, मामले का परिक्षण करने वाला न्यायाधीश इस बात को लेकर संतुष्ट हो जाता है कि मामले में सच्चाई खोजने का उद्देश्य धुंधला जाएगा, यदि गवाहों को सार्वजनिक रूप से साक्ष्य देने की आवश्यकता होगी तो क्या यह बेहतर नहीं कि उसे यह अन्तर्निहित शक्ति दी जाए कि वह उस मामले की कार्यवाही को आंशिक रूप से या पूरी तरह से 'इन-कैमरा' आयोजित करने के आदेश दे? यदि अदालत का प्राथमिक कार्य उसके सामने लाए गए मामलों में न्याय करना है, तो इस बात को स्वीकार करना मुश्किल है कि खुले अदालत के सिद्धांत के लिए कोई अपवाद नहीं हो सकता है।

ऐसे मामले अवश्य उत्पन्न हो सकते हैं, जहां इस सिद्धांत का पालन करने से न्याय स्वयं पराजित हो सकता है। यही कारण है कि नरेश श्रीधर मिराजकर मामले में कहा गया कि 'इन-कैमरा' ट्रायल, या कार्यवाही मामले की परिस्थितियों को देखते हुए आयोजित की जा सकती है।

आइये देखते हैं वह कुछ मामले जहाँ "इन-कैमरा" कार्यवाही को अनुमति दी गयी

भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद का मामला: पुलिस के आदेशों की अवहेलना में 20 दिसम्बर 2019 को नमाज के बाद दिल्ली की जामा मस्जिद पर विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद को शनिवार (21 दिसम्बर) को मस्जिद से बाहर आने के बाद गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्हें चाणक्यपुरी पुलिस स्टेशन ले जाया गया और बाद में अदालत में पेश किया गया, जहाँ असामान्य रूप से एक 'इन-कैमरा' सुनवाई की गयी और उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इससे पहले दिल्ली पुलिस के कर्मियों ने पत्रकारों को अदालत कक्ष में पहुंचने से रोकने के लिए, अदालत के दरवाजे बंद कर दिए थे, लेकिन कुछ पत्रकारों ने विरोध प्रदर्शन के बाद अदालत कक्ष में प्रवेश प्राप्त कर लिया।

जब पत्रकारों ने पुलिस के व्यवहार के बारे में मजिस्ट्रेट से शिकायत की, तो मामले की सुनवाई की प्रेस रिपोर्टिंग को रोकते हुए "इन-कैमरा" कार्यवाही के लिए मजिस्ट्रेट अरजिंदर कौर द्वारा एक आदेश पारित किया गया। आजाद के वकील एडवोकेट महमूद पारचा ने मीडिया रिपोर्टिंग पर रोक लगाने पर आपत्ति जताई। पत्रकारों ने जिला न्यायाधीश कामिनी लाउ के समक्ष पुलिस के व्यवहार और मीडिया रिपोर्टिंग पर रोक के बारे में शिकायत की। जिला न्यायाधीश ने मौखिक रूप से सहमति व्यक्त की कि अदालत की कार्यवाही की रिपोर्टिंग करना मीडिया का मौलिक अधिकार था, और उन्होंने इस घटना को "बिल्कुल दुर्भाग्यपूर्ण" करार दिया।

नपुंसकता का मामला:

केरल राज्य के एक मामले में, एक पत्नी ने पति की नपुंसकता के आधार पर तलाक की मांग की थी। तलाक की कार्यवाही के दौरान, पत्नी ने अपने और अपने परिवार की गोपनीयता बनाए रखने के लिए, 'इन-कैमरा' कार्यवाही के लिए आवेदन किया था।

लिएंडर पेस के खिलाफ घरेलू हिंसा की कार्यवाही:

रिया पिल्लई ने बांद्रा मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट अदालत के सामने अपने पति लिएंडर पेस के खिलाफ एक याचिका दायर की थी (घरेलू हिंसा का आरोप लगाते हुए), जिसमें अदालत ने कहा था कि यह मामला एक "व्यक्तिगत प्रकृति" का था और इस लिए कार्यवाही का हिस्सा, बंद कमरे में आयोजित किया गया था।

आसाराम बापू के खिलाफ बलात्कार का मामला:

आसाराम बापू के खिलाफ बलात्कार के आरोपों में, गांधीनगर की एक अदालत ने मई 2017 में बंद कमरे में कार्यवाही आयोजित करने का आदेश दिया था। गवाहों की सुरक्षा के लिए एवं उनकी गोपनीयता बनाए रखने के लिए यह फैसला किया गया था। अदालत ने कहा, "अब से, गवाहों के जीवन पर जोखिम को देखते हुए, कार्यवाही 'इन-कैमरा' आयोजित की जाएगी।"

16 दिसंबर, 20012 गैंगरेप:

एक 23 वर्षीय महिला के साथ बस में 6 लोगों द्वारा बर्बरतापूर्वक बलात्कार करने के मामले की सुनवाई करते हुए, दिल्ली की एक अदालत ने कार्यवाही को बंद कमरे में आयोजित करने का आदेश दिया था।

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