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ज़मानत देते समय आरोपी की गरीबी का ध्यान रखा जाना चाहिए : एचपी हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
17 Dec 2019 6:44 AM GMT
ज़मानत देते समय आरोपी की गरीबी का ध्यान रखा जाना चाहिए : एचपी हाईकोर्ट
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ज़मानत देते समय अदालतों द्वारा पालन किए जाने वाले सिद्धांतों को ज़िक्र करते हुए हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि ज़मानत देते समय किसी आरोपी की गरीबी या उसकी समझी गई निर्धन स्थिति को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

दाताराम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य, Crl. Apl. No. 227/2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अभिनिर्धारित किया था कि

"किसी अभियुक्त की गरीबी या डीम्ड इंडिविजुअल स्टेटस भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारक है और यहां तक कि संसद ने भी दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 436 में एक स्पष्टीकरण को शामिल करके इसका नोटिस लिया है। संसद द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 436 ए को सम्मिलित करके असंगतता के लिए एक समान रूप से नरम रुख अपनाया गया है। "

एक व्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के संरक्षण के संबंध में दाताराम सिंह (सुप्रा) के मामले में निर्धारित कानून को दोहराया गया, भले ही वह किसी भी आय समूह में आता हो।

इसमें कहा गया था कि,

"... किसी संदिग्ध या आरोपी व्यक्ति को पुलिस हिरासत या न्यायिक हिरासत में भेजने के आवेदन पर विचार करते समय एक न्यायाधीश द्वारा एक मानवीय रवैया अपनाया जाना आवश्यक है। इसके कई कारण हैं, जिनमें एक आरोपी व्यक्ति की गरिमा को बनाए रखना शामिल है। वह व्यक्ति गरीब हो सकता है, संविधान के अनुच्छेद 21 की आवश्यकताएं और तथ्य यह है कि जेलों में अत्यधिक भीड़भाड़ है, जो सामाजिक और अन्य समस्याओं को बढ़ाती है, जैसा कि अमानवीय परिस्थितियों में इस न्यायालय द्वारा 1382 जेलों में देखा गया। "

अदालत चोरी के आरोपी एक प्रकाश चंद द्वारा दायर ज़मानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कहा कि उसे प्रकाश की रिहाई के संबंध में कोई आपत्ति नहीं, क्योंकि वह जांच में शामिल हो गया था और उसे हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं थी।

इस सबमिशन पर भरोसा करते हुए, अदालत ने आरोपी को ज़मानत पर छोड़ दिया और कहा,

"कहने की ज़रूरत नहीं है कि ज़मानत का उद्देश्य मुकदमे में अभियुक्तों की उपस्थिति को सुरक्षित करना है और इस प्रश्न के समाधान में उचित परीक्षण लागू किया जाए कि क्या जमानत दी जानी चाहिए या नहीं। यह संभावित है कि कोई पक्ष मुकदमे की सुनवाई के लिए कोर्ट आएगा। अन्यथा, जमानत को सजा के रूप में रद्द नहीं किया जाना चाहिए। सामान्य नियम भी जमानत का है, जेल का नहीं। न्यायालय को आरोपों की प्रकृति, उसके समर्थन में सबूत की प्रकृति, सजा की गंभीरता को ध्यान में रखना होगा।"


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