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हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

LiveLaw News Network
27 Nov 2021 4:00 AM GMT
हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
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देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (22 नवंबर, 2021 से 26 नवंबर, 2021) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप।

पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

तीन साल की बच्ची का रेप-मर्डर केस- "दोषी को अपने कृत्य पर कोई पछतावा नहीं": बॉम्बे हाईकोर्ट ने मौत की सजा की पुष्टि की

बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को तीन साल नौ महीने की बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या करने वाले एक दोषी को मौत की सजा की पुष्टि की।

न्यायमूर्ति साधना एस. जाधव और न्यायमूर्ति पृथ्वीराज के. चव्हाण की खंडपीठ ने स्पेशल POCSO जज, ठाणे द्वारा दी गई मौत की सजा की पुष्टि करते हुए कहा, "गुलाब की एक कली खिलने से पहले कुचल दी गई। एक पतंग जब उड़ने वाली थी, इसे कुचल दिया गया। नवोदित फूल कुचल कर राख हो गया और पतंग आत्मा को उड़ा ले गई।"

केस का शीर्षक - द स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र बनाम रामकीरत मुनीलाल गौड़

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'वेतन पाने के हकदार नहीं': कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अवैध रूप से नियुक्त 'ग्रुप-डी' नॉन टीचिंग स्टाफ के वेतन पर रोक लगाने के आदेश दिए

कलकत्ता हाईकोर्ट ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल केंद्रीय विद्यालय सेवा आयोग को ग्रुप-डी (गैर-शिक्षण कर्मचारियों) के 25 नियुक्तियों को वेतन का भुगतान तुरंत रोकने का आदेश दिया, जिन्हें कथित तौर पर शिक्षा विभाग में ग्रुप-डी के पद पर नियुक्ति करने वाले पैनल की समाप्ति के बाद नियुक्त किया गया था।

न्यायालय पश्चिम बंगाल केंद्रीय विद्यालय सेवा आयोग (WBSSC) द्वारा कथित सिफारिश पर पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) के तहत प्रायोजित माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में 'ग्रुप-सी' और 'ग्रुप-डी' (गैर-शिक्षण स्टाफ) की नियुक्ति में कथित अनियमितताओं का विरोध करने वाली याचिकाओं के एक बैच पर फैसला सुना रहा था।

केस का शीर्षक: संदीप प्रसाद एंड अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एंड अन्य

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दिल्ली हाईकोर्ट ने नाबालिग रेप केस में दो अलग-अलग चार्जशीट दाखिल करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगाई

दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एक नाबालिग रेप केस मामले में दो अलग-अलग आरोप पत्र दाखिल करने के लिए एक जांच अधिकारी और एसएचओ के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का निर्देश देने वाले निचली अदालत के आदेश पर रोक लगा दी।

न्यायमूर्ति अनु मल्होत्रा 24 नवंबर 2021 के आदेश के संचालन पर रोक लगा दी। उन्होंने दिल्ली पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट मांगने के बाद यह आदेश दिया। अपने आदेश में ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई पूरी तरह से दुर्भावनापूर्ण और शातिर थी।

केस का शीर्षक: सतीश कुमार और अन्य बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य)

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"अगर अनुमति दी गई तो ऐसा कृत्य अराजकता की ओर ले जाएगा": वैवाहिक विवाद में बार-बार अदालत के निर्देशों की अवज्ञा करने वाले व्यक्ति को दिल्ली हाईकोर्ट ने तीन महीने की सजा दी

दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को एक व्यक्ति को तीन महीने की साधारण कारावास की सजा सुनाई और 2000 रुपये का जुर्माना लगाया। उस व्यक्ति ने वैवाहिक विवाद में न्यायालय के निर्देशों की बार-बार जानबूझकर अवज्ञा की थी। उसे अपनी पत्नी को भरण-पोषण का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।

जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस जसमीत सिंह ने कहा कि यह देखते हुए कि अदालत के आदेशों की पूर्ण अवहेलना करने के लिए पति के कृत्यों या चूक को स्वीकार नहीं किया जा सकता है, यदि इस प्रकार की कार्रवाई की अनुमति दी जाती है तो इससे अराजकता बढ़ेगी और कानून का शासन समाप्त हो जाएगा। न्यायालयों के आदेशों को हल्के में लिया जाएगा और संबंधित व्यक्ति अपनी मर्जी से उल्लंघन करने लगेगा।

केस शीर्षक: सोनाली भाटिया बनाम अभ‌िवंश नारंग

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धर्म परिवर्तन से व्यक्ति की जाति नहीं बदलेगी; केवल धर्मांतरण के आधार पर अंतर-जातीय विवाह प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जा सकता: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि एक व्यक्ति अपने समुदाय प्रमाण पत्र के बहाने 'अंतर-जातीय विवाह' प्रमाण पत्र का दावा करने का हकदार नहीं है, जब वह मूल रूप से एक निश्चित जाति का था, लेकिन दूसरे में धर्म परिवर्तन के कारण एक अलग समुदाय प्रमाण पत्र प्राप्त किया।

न्यायमूर्ति एस.एम. सुब्रमण्यम ने कहा कि धर्मांतरण से किसी व्यक्ति की जाति में परिवर्तन नहीं होता है और उक्त पहलू को उसके वर्तमान सामुदायिक प्रमाण पत्र के आधार पर अंतर्जातीय विवाह प्रमाणपत्र देने के लिए दबाया नहीं जा सकता है।

केस का शीर्षक: एस पॉल राज बनाम तहसीलदार, मेट्टूर थालुक एंड अन्य।

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एक महिला को अपने प्रजनन विकल्प का प्रयोग करने का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक आयाम है: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि एक महिला को अपनी प्रजनन विकल्प का उपयोग करने का अधिकार "व्यक्तिगत स्वतंत्रता" का एक आयाम है, जैसा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत समझा जाता है और उसे अपनी शारीरिक अखंडता की रक्षा करने का पवित्र अधिकार है।

जस्टिस एनएस संजय गौड़ा की सिंगल जज बेंच ने कहा, "एक महिला को अपने शरीर पर अवांछित घुसपैठ को सहन करने और उस घुसपैठ के परिणामों को सहन करने के लिए मजबूर करने का कार्य संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत "व्यक्तिगत स्वतंत्रता" के उसके अदृश्य मौलिक अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन होगा।"

केस शीर्षक: कुमारी डी बनाम कर्नाटक राज्य

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"याचिकाकर्ता का भय सरकार के आदेश से ही समाप्त हो गया": गुजरात हाईकोर्ट ने गांधी आश्रम के पुनरुद्धार के फैसले के खिलाफ तुषार गांधी की याचिका का निपटारा किया

गुजरात हाईकोर्ट ने महात्मा गांधी के महान-पोते तुषार गांधी की एक याचिका का निस्तारण किया है, जिसमें उन्होंने 1,200 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से अहमदाबाद‌ स्थित साबरमती आश्रम के पुनरुद्धार/पुनर्विकास के गुजरात सरकार के फैसले को चुनौती दी थी।

चीफ जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस आशुतोष जे शास्त्री की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता के सभी डर और आशंकाएं सरकार के आदेश में ही दूर हो गईं। न्यायालय गांधी की उस याचिका पर विचार कर रहा था जिसमें स्मारक और उसके परिसर के विकास के लिए उद्योग और खान विभाग द्वारा एक शासी परिषद और एक कार्यकारी परिषद बनाने के गुजरात सरकार के 5 मार्च के प्रस्ताव को रद्द करने की मांग की गई थी, जिसमें पूरी तरह से सरकारी अधिकारी शामिल थे।

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'तमिलनाडु बाल अधिकार आयोग की ओर से केवल सम्‍मन जारी होना रिट याचिका का कारण नहीं हो सकता': मद्रास हाईकोर्ट ने ईशा फाउंडेशन को राहत देने से इनकार किया

मद्रास हाईकोर्ट ने कोयंबटूर के वेल्लियांगिरी स्‍थ‌ित ईशा योग केंद्र द्वारा संचालित स्कूलों में कथित बाल अधिकारों के उल्लंघन पर तमिलनाडु बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा जारी सम्मन को रद्द करने से इनकार कर दिया।

जस्टिस एसएम सुब्रमण्यम ने कहा कि अधिनियम के प्रावधानों के तहत आयोग द्वारा केवल सम्मन जारी करने से याचिकाकर्ता को वर्तमान रिट याचिका दायर करने का कारण नहीं मिलेगा।

कोर्ट ने नोट किया कि इस तरह की रिट याचिका तभी मान्य होगी जब सम्मन किसी ऐसे प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया हो जो सक्षम न हो और न ही उसके पास ऐसा करने का अधिकार क्षेत्र हो। अन्यथा, याचिकाकर्ता को यह दिखाना होगा कि सम्मन दुर्भावना से जारी किया गया था और यह स्थापित करना चाहिए कि अपनी आपत्तियां दर्ज करके कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।

केस शीर्षक: प्रशासक, ईशा योग केंद्र बनाम तमिलनाडु बाल अधिकार संरक्षण आयोग

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2012 के शक्ति मिल्स गैंगरेप मामले में तीन दोषियों की मौत की सजा को कम किया, फोटो जर्नलिस्ट का किया था रेप

बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को 2013 में बंद हो चुकी शक्ति मिल में एक फोटो-जर्नलिस्टके सामूहिक बलात्कार के मामले में सजायाफ्ता तीन दष को दी गई मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया।

जस्टिस एसएस जाधव और पृथ्वीराज चव्हाण की पीठ ने ये फैसला सुनाया। 2014 में ट्रायल कोर्ट ने कासिम 'बंगाली' शेख (21), सलीम अंसारी (28) और विजय जाधव (19) को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 (ई) के तहत मौत की सजा दी थी।

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बलात्कार के जघन्य अपराध में पक्षकारों के बीच समझौता होने पर भी कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि बलात्कार के जघन्य अपराध के मामले में भले ही पक्षकारों ने विवाद सुलझने पर भी कार्यवाही को रद्द नहीं किया जा सकता। न ही उस समझौते को स्वीकार ही किया जा सकता है, क्योंकि इसका समाज पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

जस्टिस एचपी संदेश ने एक दंपत्ति की याचिका को खारिज करते हुए कहा, "पॉक्सो अधिनियम के विशेष अधिनियमन के उद्देश्य और दायरे को देखते हुए सीआरपीसी की धारा 482 के तहत शक्ति का प्रयोग करने का सवाल ही नहीं उठता।"

केस शीर्षक: अनिल पुत्र वेंकप्पा कुशलकर बनाम कर्नाटक राज्य

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"पीड़ित को आरोपी के साथ आखिरी बार देखा गया था, यह सबूत भरोसे का नहीं": इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग के बलात्कार, हत्या के मामले में मौत की सजा पाए व्यक्ति को बरी किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक नाबालिग लड़की की हत्या और बलात्कार के, मौत की सजा पाए दोषी को बरी कर द‌िया। कोर्ट ने कहा कथित घटना से पहले मृतक को आरोपी-अपीलकर्ता के साथ अंतिम बार देखे जाने के साक्ष्य को आश्वस्त करने वाला नहीं पाया गया।

ज‌स्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने यह भी कहा कि मामले को सुलझाने के लिए पुलिस पर अत्यधिक दबाव रहा होगा और कहा कि आरोपी-अपीलकर्ता का नाम मामले को सुलझाने के लिए केवल संदेह के आधार पर शामिल किया गया होगा, न कि सबूत के आधार पर।

केस शीर्षक - बाल गोविंद उर्फ ​​गोविंदा बनाम यूपी राज्य

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POCSO अधिनियम के तहत 10 साल के लड़के के साथ ओरल सेक्स 'गंभीर यौन हमला' नहीं बल्कि 'पेनेट्रेटिव यौन हमला': इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 10 साल के लड़के के साथ ओरल सेक्स करने के आरोपी POCSO अपराधी की अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि लिंग को मुंह में डालना 'गंभीर यौन हमला' या 'यौन हमले' की श्रेणी में नहीं आता है। यह पेनेट्रेटिव यौन हमले की श्रेणी में आता है जो POCSO अधिनियम की धारा 4 के तहत दंडनीय है।

न्यायमूर्ति अनिल कुमार ओझा की खंडपीठ ने पॉक्सो अधिनियम के विशिष्ट प्रावधानों के अनुसरण में कहा कि अधिनियम [एक बच्चे के मुंह के अंदर लिंग डालना] पोक्सो एक्ट 2012 की धारा 4 के तहत दंडनीय 'पेनेट्रेटिव' यौन हमले की श्रेणी में आता है।

केस का शीर्षक: सोनू कुशवाहा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य

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रोमांटिक रिश्ते को भुलाया नहीं जा सकताः मेघालय हाईकोर्ट ने POCSO मामले में किशोर को जमानत दी

मेघालय हाईकोर्ट ने सोमवार को उस आरोपी किशोर को जमानत दे दी है, जिसके खिलाफ यौन शोषण के एक मामले में यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो अधिनियम) के प्रावधानों के तहत केस दर्ज किया गया था। अदालत ने जमानत देते समय इस बात को ध्यान में रखा कि नाबालिग पीड़िता और आरोपी के बीच रोमांटिक रिश्ता था और उनके बीच सहमति से संभोग हुआ था।

न्यायमूर्ति डब्ल्यू डिएंगदोह ने कहा कि ''रिकॉर्ड, विशेष रूप से पीड़िता और आरोपी के बयानों को देखने पर, प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट है कि दोनों के बीच एक रोमांटिक संबंध था और उनके बीच सहमति से यौन संबंध बने थे। हालांकि इस तथ्य के बावजूद कि एक कथित पीड़िता के नाबालिग होने के मामले में, सहमति की कोई कानूनी वैधता नहीं है, फिर भी अदालत द्वारा जमानत देने की याचिका पर विचार करते समय मामले के इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।''

केस का शीर्षकः एफीना खोंगलाह बनाम मेघालय राज्य

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एक वकील अपने मुवक्किल का पॉवर ऑफ अटार्नी और उसका वकील दोनों एक साथ नहीं हो सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि अधिवक्ताओं द्वारा अपने मुवक्किलों के मुख्तारनामा धारक (power of attorney holders) और मामले में अधिवक्ताओं के रूप में कार्य करने की प्रथा अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के प्रावधानों के विपरीत है।

न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह ने यह देखते हुए कि उक्त पहलू को शहर के सभी ट्रायल कोर्ट द्वारा पूरी तरह से सुनिश्चित किया जाना है, निर्देश दिया कि आदेश की एक-एक प्रति रजिस्ट्री द्वारा सभी निचली अदालतों को भेजी की जाए।

केस शीर्षक: अनिल कुमार और अन्य बनाम अमित और अन्य जुड़े मामले

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ट्राई को टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर को ग्राहक के कॉल रिकॉर्ड पेश करने का निर्देश देने के लिए नहीं कह सकता: केरल हाईकोर्ट

केरल ‌हाईकोर्ट ने हाल ही में एक रिट याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण को एक दूरसंचार सेवा प्रदाता को अपने एक ग्राहक के कॉल रिकॉर्ड को पेश करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

जस्टिस पीवी कुन्हीकृष्णन ने कहा कि ट्राई को दी गई शक्तियों का विस्तार सेवा प्रदाताओं से इस प्रकार की कॉल डिटेल मांगने तक नहीं होता है। याचिकाकर्ता थालास्सेरी तटीय पुलिस स्टेशन में पुलिस उप निरीक्षक है। 19 अगस्‍त 2020 को, जब उसका एक चोट के कारण इलाज हो रहा था, उसके तत्कालीन वरिष्ठ अधिकारी ने उसे ड्यूटी के लिए रिपोर्ट करने के लिए कहा। हालांकि, उन्होंने अपनी बीमारियों के कारण ऐसा करने से इनकार कर दिया।

केस शीर्षक: मलयिल समद बनाम महाप्रबंधक, भारती एयरटेल लिमिटेड

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इंटरफेथ मैरिज- "सांप्रदायिक तनाव की आशंका पर हैबियस कॉर्पस याचिका सुनवाई योग्य नहीं": इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लड़की के पिता की याचिका खारिज की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक पिता द्वारा दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज किया, जिसमें अपनी बेटी को पेश करने और एक हिंदू व्यक्ति की अवैध हिरासत से मुक्त करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

धमकी की आड़ में सांप्रदायिक तनाव के संबंध में पिता की आशंका को ध्यान में रखते हुए कि यदि कथित बंदी को उन्हें नहीं सौंपा जाता है, तो न्यायमूर्ति विकास कुंवर श्रीवास्तव की खंडपीठ ने कहा, "केवल दंपत्तियों के विभिन्न धर्मों के कारण गांव में सांप्रदायिक तनाव के एक निहित खतरे की आड़ में आशंका पर याचिकाकर्ता के अगले दोस्त 'उस्मान' के पक्ष में बंदी प्रत्यक्षीकरण का कोई रिट जारी नहीं किया जा सकता है।"

केस का शीर्षक - हाशमी की ओर से उनके पिता नेचुरल गार्जियन उस्मान बनाम स्टेट ऑफ़ यू.पी. एंड अन्य।

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घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत 'पीड़ित व्यक्ति' में एक विदेशी नागरिक भी शामिल है: राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट (जोधपुर बेंच) ने एक महत्वपूर्ण अवलोकन में माना है कि 2005 के घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 2 (ए) के अनुसार, ' पीड़ित व्यक्ति' की परिभाषा में एक विदेशी नागरिक सहित कोई भी महिला शामिल होगी, जो घरेलू हिंसा के अधीन हैं। कोर्ट ने कहा, ऐसी महिला 2005 के अधिनियम की धारा 12 [मजिस्ट्रेट को आवेदन] के तहत सुरक्षा पाने की हकदार है।

जस्टिस विनीत कुमार माथुर की खंडपीठ ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम के सामान्य पठन से पता चलता है कि अधिनियम के तहत संरक्षण उन व्यक्तियों को दिया जाता है जो अस्थायी रूप से भारत के निवासी हैं, जो 2005 के अधिनियम की धारा 2(ए) के अनुसार पीड़ित व्यक्ति की परिभाषा के तहत आते हैं।

केस शीर्षक - रोबर्टो नीएड्डू बनाम राजस्थान राज्य और अन्य

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ड्यूटी के दौरान पुलिस अधिकारी को वर्दी पहनना अनिवार्य: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने इस तथ्य पर जोर दिया है कि पुलिस अधिकारियों को प्रासंगिक वैधानिक प्रावधानों/दिशानिर्देशों का पालन करना चाहिए, जिससे ड्यूटी के दौरान वर्दी पहनना अनिवार्य हो जाता है, सिवाय इसके कि जब कानून के तहत उक्त अनिवार्य आवश्यकता से विचलित होने की अनुमति हो।

न्यायमूर्ति मोहम्मद नियास सीपी ने सादे कपड़ों में एक अधिकारी द्वारा एक व्यक्ति से पूछताछ करने की कार्यवाही को रद्द करते हुए दोहराया कि ड्यूटी के दौरान वर्दी पहनने के लिए पुलिस अधिकारी की आवश्यकता को बिना किसी अपवाद के लागू किया जाना है।

केस का शीर्षक: अविनाश बनाम केरल राज्य

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किसी विशेष पद पर भर्ती के लिए उच्च योग्यता प्राप्त उम्मीदवारों को बाहर रखने का नियोक्ता का निर्णय उचित है: जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि एक विशेष पद के लिए निर्धारित योग्यता से उच्चतर कोई भी योग्यता उपयुक्त योग्यता नहीं हो सकती है, और कहा कि नियोक्ता का अपने विवेकानुसार, उच्च योग्यता प्राप्त उम्मीदवारों को चयन के दायरे से बाहर रखना उचित है।

जस्टिस संजय धर और जस्टिस अली मोहम्मद माग्रे की खंडपीठ ने कहा कि क्लास- 4 पद के लिए न्यूनतम और अधिकतम योग्यता क्रमशः मैट्रिक और 10+2 रखना ना तो तर्कहीन, अनुचित और ना ही मनमाना है।

केस शीर्षक - फिरदौस अहमद गनई बनाम जम्मू कश्मीर और अन्य राज्य

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सीआरपीसी की धारा 41A और 'अर्नेश कुमार' दिशानिर्देशों के तहत गिरफ्तारी प्रक्रिया का उल्लंघन करने पर पुलिस अधिकारी कार्रवाई का सामना करेंगे: तेलंगाना हाईकोर्ट

तेलंगाना हाईकोर्ट ने हाल ही में एक आरोपी को सीआरपीसी की धारा 41 ए के तहत गिरफ्तारी की प्रक्रिया का उल्लंघन करने पर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता दी। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के लिए 'अर्नेश कुमार' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करना पुलिस का कर्तव्य है।

न्यायमूर्ति ललिता कन्नेगंती की एकल-न्यायाधीश पीठ सिकंदराबाद में एक शिक्षा / नौकरी परामर्श फर्म के प्रमुख द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मुख्य रूप से याचिकाकर्ता पर आईपीसी की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया है।

केस का शीर्षक: वी. भरत कुमार बनाम तेलंगाना राज्य

सीआरपीसी की धारा 125 (3) –"भरण पोषण के भुगतान में चूक के मामले में एक माह से अधिक के कारावास की सजा नहीं दी जा सकती": पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 (3) के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक अदालत भरण पोषण के भुगतान में चूक के मामले में एक माह से अधिक के कारावास की सजा नहीं दी जा सकती है।

न्यायमूर्ति मंजरी नेहरू कौल की पीठ ने यह फैसला सुनाया, जो एक बाल राज द्वारा दायर एक रिवीजन याचिका से निपट रहे थे। याचिकाकर्ता ने सीआरपीसी की धारा 125 (3) के तहत एक आवेदन पर पारित फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी।

केस का शीर्षक - बाल राज बनाम प्रिया एंड अन्य

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आवाजाही की स्वतंत्रता एक संवैधानिक गारंटी, आवश्यक नागरिक सुविधाओं के अभाव में यह प्रभावित नहीं होनी चाहिए: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान में निहित नागरिकों की आवाजाही की स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी नागरिक सुविधाओं की कमी से प्रभावित नहीं होनी चाहिए।

जस्टिस नजमी वज़ीरी ने कहा, " आवाजाही की स्वतंत्रता (Freedom Of Movement) एक संवैधानिक गारंटी है, इसे आवश्यक नागरिक सुविधाओं की कमी से प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए। नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकारों के आनंद में सशक्त और सुविधा प्रदान करने की आवश्यकता है। इसके लिए बुनियादी नागरिक सुविधाओं का प्रावधान आवश्यक है। एक सुरक्षित पड़ोस, पंक्तिबद्ध-छायादार पेड़ वाले रास्ते और फुटपाथ, जहां इत्मीनान से टहलना वास्तव में एक आनंददायक व्यायाम है, न कि बाधा पहुंचाने वाला और कष्टदायक अनुभव।"

केस शीर्षक: भावरीन कंधारी बनाम ज्ञानेश भारती और अन्य

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नाबालिग पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाना बलात्कार की श्रेणी में आता हैः मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पति को जमानत देने से इनकार किया

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (ग्वालियर बेंच) ने हाल ही में एक ऐसे व्यक्ति को जमानत देने से इनकार कर दिया, जिस पर अपनी 'पत्नी' के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करने का आरोप लगाया गया है, जो कथित अपराध के समय 18 वर्ष से कम उम्र की थी और इसलिए उसके खिलाफ का मामला दर्ज किया गया है।

न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया की खंडपीठ ने कहा कि इंडिपेंडेंट थॉट बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व एक अन्य (2017) 10 एससीसी 800 के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 के प्रावधान को पढ़ने के बाद यह माना था कि एक नाबालिग पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाना भी (यानी 18 वर्ष से कम उम्र) बलात्कार की श्रेणी में आएगा।

केस का शीर्षक - अजय जाटव बनाम एमपी राज्य व अन्य

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वे लोग जो सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव के लिए जिम्मेदार हैं केवल उन्हें यह तय करना चाहिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या राज्य की सुरक्षा की क्या जरूरते हैं: जम्मू,कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट

जम्मू, कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने जम्मू कश्मीर जन सुरक्षा अधिनियम, 1978 के तहत जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) के एक कथित कार्यकर्ता की हिरासत को बरकरार रखते हुए पिछले सप्ताह कहा कि जो लोग राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए या सार्वजनिक व्यवस्‍था के रखरखाव के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या राज्य की सुरक्षा के लिए क्या आवश्यकता है, इसका एकमात्र जज होना चाहिए।

जस्टिस ताशी रबस्तान की खंडपीठ ने यह देखते हुए कि निवारक उपाय करना और शरारती व्यक्ति को रोकना आवश्यक है, उन्होंने जोर देकर कहा कि निवारक निरोध कानून समाज को सुरक्षा प्रदान करने के लिए तैयार किए गए हैं।

केस शीर्षक - मुंतज़िर अहमद भट बनाम केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और अन्य।

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जमानत आदेशों की ई-कॉपी रिहाई के लिए पर्याप्त, प्रमाणित कॉपी जरूरी नहीं: तेलंगाना हाईकोर्ट

तेलंगाना हाईकोर्ट ने किसी आरोपी के जमानत के आदेश की प्रति की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि जब तक कि जमानत आदेश उचित समय के भीतर प्रस्तुत नहीं किया जाता है, जमानत आदेशों की प्रमाणित प्रतियों की आवश्यकता नहीं। सर्टिफाइज कॉपी के बजाय ई-कॉपी के आधार पर ही जमानत आदेश को स्वीकार किया जा सकता है।

अदालत ने आदेश सुनाया कि 22.11.2021 से मामले की स्थिति की जानकारी में उपलब्ध मामले के विवरण के साथ हाईकोर्ट की वेबसाइट से एक आदेश प्रति पर्याप्त होगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नए निर्देश सभी जमानत आवेदनों पर लागू होंगे। इनमें आपराधिक संशोधन के साथ-साथ आपराधिक अपील में जमानत भी शामिल है।

केस शीर्षक: वी. भरत कुमार बनाम तेलंगाना राज्य

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विपरीत लिंग के दो व्यक्तियों के घनिष्ठ संबंध के बारे में कहना मानहानि के दायरे में नहीं माना जा सकता : इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह मानहानि शिकायत मामले में समन आदेश को रद्द करते हुए कहा कि विपरीत लिंग के दो लोग के बीच करीबी संबंध होने के बारे में कहना मानहानि नहीं होगी।

न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह की खंडपीठ ने आगे कहा कि प्राकृतिक या सामान्य मानवीय संबंध में किसी के करीब होना और अवैध संबंध बनाना दो पूरी तरह से अलग चीजें हैं।

केस का शीर्षक - नाकली सिंह बनाम यू.पी. राज्य और दूसरे

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