Begin typing your search above and press return to search.
मुख्य सुर्खियां

हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

LiveLaw News Network
12 July 2021 10:56 AM GMT
हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
x

05जुलाई2021 से 11 जुलाई2021 तक हाईकोर्ट के कुछ ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

COVID-19 वैक्सीन की पहली खुराक प्राप्त करने वाले लोग अंतराल अवधि समाप्त होने के बाद दूसरी खुराक के लिए अनिश्चित काल तक प्रतीक्षा नहीं कर सकते: त्रिपुरा हाईकोर्ट

त्रिपुरा हाईकोर्ट ने कहा कि कोविशील्ड या कोवैक्सिन में से जिन लोगों को COVID-19 वैक्सीन की पहली खुराक मिली है, उन्हें अनिवार्य अंतराल समाप्त होने के बाद अपनी दूसरी खुराक प्राप्त करने के लिए अनिश्चित काल तक इंतज़ार नहीं करवाया जा सकता, इसलिए इसने राज्य प्रशासन से वैक्सीनेशन खुराक की संख्या बढ़ाने के लिए कहा। मुख्य न्यायाधीश अकील कुरैशी और न्यायमूर्ति एस तालापात्रा की खंडपीठ ने यह टिप्पणी की, "... चिंता का कारण यह है कि जिन लोगों को पहले वैक्सीन मिल चुकी है, वे 12 सप्ताह या 4 सप्ताह पूरे होने पर दूसरी खुराक लेने के हकदार हैं (कोविशील्ड या कोवैक्सिन जैसा भी मामला हो, उपलब्ध होने पर)। ये लोग पहले ही अपनी पहली खुराक प्राप्त कर चुके हैं, अनिवार्य अवधि समाप्त होने के बाद दूसरी खुराक प्राप्त करने के लिए अनिश्चित काल तक प्रतीक्षा नहीं कर सकते।"

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

बॉम्बे हाईकोर्ट ने नागरिक उड्डयन मंत्रालय को हवाई अड्डों के नाम की पॉलिसी को अंतिम रूप देने पर विचार करने को कहा

बॉम्बे हाईकोर्ट ने शुक्रवार को मौखिक रूप से नागरिक उड्डयन मंत्रालय को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों के नाम के लिए एक अखिल भारतीय नीति तैयार करने पर विचार करने या नीति के मसौदे को अंतिम रूप देने के लिए कहा। मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जीएस कुलकर्णी की पीठ अधिवक्ता फिल्जी फ्रेडरिक की एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक समान पॉलिसी बनाने और महाराष्ट्र सरकार को आगामी नवी मुंबई हवाई अड्डे के नामकरण के लिए कोई प्रस्ताव करने से रोकने के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

दिल्ली कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियमों के अनुपालन में वीसी मोड के माध्यम से साक्ष्य की रिकॉर्डिंग की अनुमति दी

दिल्ली की एक अदालत ने हाल ही में पक्षकारों की ओर से पेश किए गए एक पारस्परिक आवेदन पर वीडियो कांफ्रेंसिंग मोड के माध्यम से साक्ष्य की रिकॉर्डिंग की अनुमति दी है। मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट देवांशु सजलान ने यह कहते हुए कि उपरोक्त प्रैक्टिस दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा बनाए गए वीडियो कांफ्रेंसिंग नियमों के अनुसार किया जाएगा, आदेश दिया: "मौजूदा मामला '5 साल पुराना' मामला है। दोनों पक्षों ने वीसी के माध्यम से साक्ष्य दर्ज करने में आपसी इच्छा दिखाई है। तदनुसार, पार्टियों की ओर से पेश किए गए आपसी मौखिक आवेदन की अनुमति है।"

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

"राष्ट्रगान के लिए खड़े नहीं होना या चुप रहना मौलिक कर्तव्यों का पालन करने में अनादर और विफलता के बराबर हो सकता है; लेकिन यह अपराध नहीं": जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

जम्मू और कश्मीर उच्च न्यायालय ने कहा है कि राष्ट्रगान के लिए खड़े नहीं होना या इसे नहीं गाना संविधान में निहित मौलिक कर्तव्यों का पालन नहीं करने या अनादर करने के बराबर हो सकता है, हालांकि, यह राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 के तहत अपराध नहीं हो सकता है। जस्टिस संजीव कुमार की सिंगल बेंच ने भारतीय सेना द्वारा किए गए सर्जिकल स्ट्राइक का जश्न मनाने के लिए 29 सितंबर 2018 को आयोजित समारोह में राष्ट्रगान का कथित रूप से अनादर करने के आरोप में एक कॉलेज व्याख्याता के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द कर दी।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

'खेदजनक स्थिति है कि अधिकारी गैंग-चार्ट तैयार करने में उचित ध्यान नहीं दे रहे हैं, यह आर्टिकल 21 का उल्लंघन'' : इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले महीने गैंग चार्ट तैयार करने में अधिकारियों के लापरवाह और सुस्त रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने पाया कि कुछ मामलों में अधिकारियों द्वारा गलत तरीके से गैंग-चार्ट तैयार किया गया है और गैंग चार्ट आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ अपराध के मामलों की गलत जानकारी का संकेत दे रहा था। इसलिए अदालत के इस मामले में अधिकारियों के रवैये पर सवाल भी उठाया। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान की खंडपीठ ने एक आरोपी/आवेदक की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अवलोकन किया, जिसने दलील दी थी कि वह कुछ मामलों में आरोपी नहीं था, जैसा कि गैंग चार्ट में दावा किया गया है। उसने कहा था कि पुलिस स्टेशन में गलत तरीके से गैंग चार्ट तैयार किया था और उक्त मामलों में आवेदक का भी नाम शामिल कर दिया गया।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

'लोक अभियोजकों की अनुपलब्धता का परिणाम अभियुक्तों के त्वरित ट्रायल के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है': कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य को रिक्तियों को भरने का निर्देश दिया

कर्नाटक हाईकोर्ट ने शुक्रवार को राज्य सरकार को राज्य में लोक अभियोजकों के सभी रिक्त पदों को चाहे वह नियमित भर्ती से हो या अनुबंध के आधार पर (यदि कानून में अनुमति हो), भरने के लिए त्वरित कदम उठाने का निर्देश दिया। मुख्य न्यायाधीश अभय ओका और न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज की खंडपीठ ने कहा, "सरकारी अभियोजकों की अनुपलब्धता का राज्य में आपराधिक न्याय प्रणाली के प्रशासन के साथ सीधा संबंध है। इस तथ्य के अलावा कि मुकदमे के संचालन में देरी से अभियुक्तों के मौलिक अधिकारों का हनन होता है। पर्याप्त संख्या में लोक अभियोजकों की उपलब्धता की कमी लंबित मामलों में वृद्धि के कई कारणों में से एक है।"

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

'जमानत आदेश में प्राथमिकी के तथ्यों को प्रतिबिंबित करने के तरीके पर न्यायिक अधिकारियों को निर्देश जारी किया जाए': पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने न्यायिक अकादमी को आदेश दिए

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने गुरुवार को चंडीगढ़ न्यायिक अकादमी के निदेशक को न्यायिक अधिकारियों को उचित निर्देश जारी करने का निर्देश दिया कि जमानत / अग्रिम जमानत प्रदान करते समय या इनकार करते समय जमानत आदेश में प्राथमिकी में दर्ज तथ्यों को प्रतिबिंबित करने की आवश्यकता है। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार सांगवान की खंडपीठ ने यह देखते हुए आदेश दिया कि एक कथित डकैती मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने प्राथमिकी के तथ्यों पर ध्यान दिए बिना फैसला सुनाया कि हिरासत में पूछताछ की जरूरत है, चूंकि याचिकाकर्ता पर आईपीसी की धारा 395 के तहत अपराध का मामला दर्ज किया गया था।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

'संबंधित अधिकारी मूकदर्शक बन गए हैं': केरल उच्च न्यायालय में दहेज निषेध अधिनियम को लागू करने के लिए जनहित याचिका दायर

राज्य में दहेज हत्याओं की बढ़ती संख्या के बीच दहेज निषेध अधिनियम के सख्त और प्रभावी कार्यान्वयन के लिए केरल उच्च न्यायालय के समक्ष एक जनहित याचिका दायर की गई है। यह याचिका एक शिक्षाविद डॉ. इंदिरा राजन ने दायर की है, जिन्होंने दहेज प्रथा और सरकार और अन्य अधिकारियों की निष्क्रियता के कारण महिलाओं को हो रही परेशानियों पर चिंता जताई है। याचिका में कहा गया है, "दहेज एक सामाजिक कलंक है, जो महिलाओं के प्रति अकल्पनीय यातना और अपराध का कारण बनता है। इस बुराई ने समाज के सभी वर्गों की कई निर्दोष महिलाओं की जान ले ली है, चाहे वह गरीब, मध्यम वर्ग या धनी हो। समय-समय पर सरकार का उदासीन रवैया सत्ता में और उसकी मशीनरी असहाय महिलाओं के सामने आ रहे इस दुर्भाग्य का मूल कारण है।"

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

"राज्य सरकार विधवा महिला द्वारा घर से दूर रहते हुए आजीविका कमाने की कल्पना कैसे कर सकती है?": गुजरात हाईकोर्ट ने निष्कासन आदेश पर रोक लगाई

गुजरात हाईकोर्ट ने मंगलवार को गुजरात सरकार द्वारा पारित निष्कासन आदेश पर रोक लगाई, जिसमें भरूच जिले से एक विधवा महिला को शराब की तस्करी के अपराध में छह महीने की अवधि के लिए निष्कासित कर दिया गया था। न्यायमूर्ति परेश उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले में शामिल तथ्य के आधार पर राज्य सरकार से पूछा कि राज्य सरकार विधवा महिला द्वारा छह महीन से घर से दूर रहते हुए आजीविका कमाने की कल्पना कैसे कर सकती है। यह ध्यान दिया जा सकता है कि उक्त निष्कासन आदेश गुजरात पुलिस अधिनियम, 1951 की धारा 56 (ए) के तहत शक्तियों के प्रयोग में पारित किया गया था।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

गरीब नवाज मस्जिद विध्वंस: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'द वायर' रिपोर्ट पर मस्जिद समिति सचिव के खिलाफ एफआईआर रद्द करने से इनकार किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गरीब नवाज मस्जिद समिति के सचिव मोहम्मद अनीस और बाराबंकी के एक स्थानीय निवासी मो. नईम ने उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया। विचाराधीन एफआईआर उनके और समाचार पोर्टल द वायर और उसके दो पत्रकारों के खिलाफ दर्ज की गई थी, जो उत्तर प्रदेश में गरीब नवाज मस्जिद के कथित अवैध विध्वंस (रामसानेहीघाट, बाराबंकी) मुद्दे पर अपने पोर्टल पर इसकी रिपोर्टिंग की थी।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

आनंद विवाह अधिनियम: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सिख विवाह के लिए नियम अधिसूचित करने के निर्देश की मांग करने वाली याचिका पर राज्य को नोटिस जारी किया

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बुधवार को राज्य सरकार को एक याचिका पर नोटिस जारी कर आग्रह किया कि राज्य सरकार को आनंद विवाह अधिनियम, 1909 के तहत नियमों को अधिसूचित करना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश आरएस चौहान और न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की पीठ ने राज्य को याचिका पर जवाब देने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। पक्षकार अमनजोत सिंह चड्ढा द्वारा व्यक्तिगत रूप से दायर की गई याचिका में कहा गया कि अधिनियम धारा छह के तहत राज्य सरकार पर आनंद विवाह के पंजीकरण के लिए नियम बनाने के लिए एक कर्तव्य डालता है, क्योंकि आनंद विवाह पंजीकरण के लिए उत्तराखंड राज्य में कोई मौजूदा ढांचा नहीं है। इसने विवाह पंजीकरण के उनके अधिकार में बाधा उत्पन्न की।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

सीआरपीसी की धारा 438 के तहत जुवेनाइल की अग्रिम जमानत याचिका सुनवाई योग्य नहीं: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 438 के तहत एक किशोर द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिका सुनवाई योग्य नहीं है; जमानती या गैर-जमानती अपराध में किशोर को जमानत दी जाती है, चाहे सीआरपीसी के तहत कुछ और भी हो। न्यायमूर्ति राजेश भारद्वाज ने कहा कि, "सीआरपीसी की धारा 438 के प्रावधानों को गिरफ्तारी की आशंका वाले व्यक्ति को जमानत देने के लिए उपयोग जाता है। सीआरपीसी की धारा 438 के प्रावधानों को अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों के साथ पढ़ने से पता चलता है कि किशोर को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है और इस प्रकार उसकी गिरफ्तारी की आशंका का कोई सवाल ही नहीं है। इसलिए सीआरपीसी की धारा 438 के तहत किशोर के मामले में याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।"

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

कलकत्ता हाईकोर्ट ने कस्टडी के मामले में बच्चे के हाथ से लिखे पत्र पर विश्वास जताया, नहीं सौंपी माँ को बच्चे की कस्टडी

कलकत्ता हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह दोहराया कि कस्टडी के मामलों में बच्चे की भलाई पर अत्यधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। तदनुसार, इसने उपेक्षा और दुर्व्यवहार के संबंध में बच्चे के हाथ से लिखे पत्र के आधार पर एक बच्चे को उसकी मां की कस्टडी से हटाने के आदेश को बरकरार रखा। न्यायमूर्ति शिवकांत प्रसाद ने कहा कि एक नाबालिग की भलाई अन्य सभी विचारों को देखकर हो पाएगा, "इस प्रकार, बच्चे की कस्टडी के मामले में यह अच्छी तरह से स्थापित कानून है कि सर्वोपरि विचार बच्चे की भलाई है न कि माता-पिता का अधिकार।"

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

"महिला स्वेच्छा से इस्लाम में परिवर्तित हुई": केरल हाईकोर्ट ने पत्नी और बेटे की अवैध कस्टडी और जबरन धर्मांतरण के आरोप में पति द्वारा दायर हेबियस कॉर्पस की याचिका खारिज की

केरल हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति ज़ियाद रहमान एए की खंडपीठ ने बुधवार को एक व्यक्ति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसकी पत्नी और बेटे को जबरन इस्लाम में परिवर्तित किया गया और अवैध रूप से कस्टडी में रखा गया है। दरअसल, कोर्ट को पता चला कि महिला ने खुद की इच्छा से धर्म परिवर्तन किया है। याचिकाकर्ता गिल्बर्ट पीटी (पूर्व माकपा कार्यकर्ता) ने 29 जून 2021 को एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की, जिसमें कोझीकोड के एक धार्मिक संस्थान, थेरबियाथुल इस्लाम सभा से अपनी पत्नी और बेटे को अवैध कस्टडी से रिहा करने की मांग की गई थी। यह भी प्रार्थना की गई कि उनकी कस्टडी याचिकाकर्ता को दी जाए, जो उनका कानूनी अभिभावक है।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

'पीड़िता की अनुमानित उम्र का सबूत सही उम्र के प्रमाण की जगह नहीं ले सकता': पटना हाईकोर्ट ने POCSO मामले में आरोपी को बरी किया

पटना हाईकोर्ट ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) मामले में एक आरोपी को बरी करते हुए कहा कि पीड़िता की अनुमानित उम्र का सबूत सही उम्र के प्रमाण की जगह नहीं ले सकता है। आरोपी-अर्जुन को करीब 13 साल की बच्ची का रेप का दोषी पाया गया था। आरोपी को ट्रायल कोर्ट द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 366A और 376 और POCSO अधिनियम की धारा 4 के तहत दोषी ठहराया गया था। उच्च न्यायालय ने अपील में इस प्रश्न पर विचार किया कि क्या अभियोजन पक्ष ने उचित संदेह से परे साबित कर दिया है कि पीड़िता की उम्र अपीलकर्ता के साथ शारीरिक संबंध के समय 18 वर्ष से कम थी ताकि मामले को भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के खंड छह के तहत लाया जा सके।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा, जुर्माने के भुगतान में चूक की सजा भुगतने के दौरान कैदी सजा में छूट का हकदार नहीं

दिल्ली उच्च न्यायालय ने माना है कि एक दोषी सजा की छूट का हकदार नहीं है, जब वह दिल्ली जेल नियमों की योजना के तहत जुर्माने का भुगतान नहीं करने पर सजा काट रहा है। जस्टिस मुक्ता गुप्ता की एकल पीठ ने कहा कि दिल्ली सरकार की अधिसूचना के अनुसार कैदियों की रिहाई के लिए आपातकालीन पैरोल का अनुदान, सजा की छूट की प्रकृति का था और पैरोल के मामले में सजा का निलंबन मात्र नहीं था। कोर्ट ने उक्त टिप्पणियां एक दोषी की याचिका पर विचार करते हुए की, जिसमें उसकी मूल सजा पूरी होने और जुर्माना के भुगतान में चूक के मद्देनजर रिहाई की मांग की गई थी।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

धारा 428 (सीआरपीसी) – दोषसिद्धि से पहले की हिरासत अवधि को सजा से कम करने का प्रावधान उम्रकैदियों के लिए भी लागू : मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट ने गत सोमवार को व्यवस्था दी कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 428 के तहत दोषसिद्धि से पहले काटी गयी हिरासत अवधि को सजा से घटाने का प्रावधान आजीवन कारावास भुगत रहे अपराधियों के लिए भी लागू होगा। हाईकोर्ट ने कहा है कि आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे अपराधी द्वारा जांच, पूछताछ अथवा ट्रायल के दौरान भुगती गयी हिरासत अवधि को दोषसिद्धि के बाद घोषित सजा में से कम किये जाने की अनुमति दी जानी चाहिए।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

'मुख्यालय में न्यायाधीश की गैर-मौजूदगी नागरिकों की स्वतंत्रता पर हमला है': इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ्ते एक आवेदक द्वारा दायर जमानत याचिका पर विचार किया, जिसने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट ने इसके साथ ही मामलों की सुनवाई के लिए अलीगढ़ जिला न्यायालय में जजशिप की गैर-मौजूदगी पर नाराजगी व्यक्त किया। कोर्ट ने कहा कि अलीगढ़ जिले में निचली अदालत के समक्ष जमानत याचिका दायर नहीं की जा सकती क्योंकि यह COVID-9 के कारण बंद है। पीठ ने गैर-उपलब्धता पर टिप्पणी की कि परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल हों, न्याय के दरवाजे पूरी तरह से दुर्गम नहीं होने चाहिए।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

कानून अधिकारी और केंद्र सरकार के वकील अपने वाहनों में न्यायालय का नाम प्रदर्शित नहीं कर सकते: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने माना कि राज्य के कानून अधिकारियों और केंद्र सरकार के वकील द्वारा अपने मोटर वाहनों के नाम-बोर्ड में अदालत का नाम प्रदर्शित करना मोटर वाहन अधिनियम के तहत बनाए गए नियमों के विपरीत है। अदालत ने आधिकारिक राज्य प्रतीकों के अनधिकृत प्रदर्शन और मोटर वाहनों पर नाम बोर्डों के अनधिकृत उपयोग को विनियमित करने के लिए कई निर्देश जारी करते हुए ऐसा कहा। न्यायमूर्ति अनिल के. नरेंद्रन ने मोटर वाहन नियमों के अनुपालन से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई करते हुए परिवहन आयुक्त को आदेश दिया कि वह इस संबंध में जारी निर्देशों के अनुसरण में की गई कार्रवाई के संबंध में एक पूर्व निर्णय दिनांक 28.10.2019 को रिपोर्ट दाखिल करें।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

"आईटी नियमों के अनुपालन में स्पष्ट जवाब के साथ आओ वरना मुश्किल में पड़ जाओगे" : दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्विटर को चेतावनी दी

सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 का अनुपालन न करने के लिए सोशल मीडिया दिग्गज ट्विटर इंक को आड़े हाथों लेते हुए, दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति रेखा पल्ली की एकल न्यायाधीश पीठ ने आज कहा कि वह ट्विटर को गैर-अनुपालन के परिणामों से किसी भी तरह की सुरक्षा नहीं देने जा रही हैं और इस मुद्दे पर वापस आने के लिए ट्विटर को समय दिया गया।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

ऑनर किलिंग- 'जीवन साथी चुनने के लिए परिवार के सदस्य को खत्म करने वाले लोगों की समाज में जगह नहीं हो सकती': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत देने से इनकार किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनी बहन की 'ऑनर किलिंग' में भूमिका निभाने वाले एक व्यक्ति को जमानत देने से इनकार करते हुए पिछले सप्ताह कहा था कि समाज में उन नागरिकों के लिए कोई जगह नहीं है, जो अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने के लिए परिवार के सदस्य को खत्म करने की हद तक जाते हैं। कोर्ट ने कहा, "इस न्यायालय की राय में प्रथम दृष्टया यदि इन आरोपों को मुकदमे में स्थापित किया जाना था, तो हमारे समाज में ऐसे नागरिकों के लिए कोई जगह नहीं है जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक मूल्यों का अपमान करते हैं। इसके बजाय पारिवारिक सम्मान के पुरातन सामाजिक मूल्यों में इस हद तक विश्वास करते हैं कि वे अपने लिए जीवन साथी चुनने वाले परिवार के किसी सदस्य को खत्म करने की हद तक चले जाएंगे।"

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

शिकायतकर्ता किशोर न्याय अधिनियम के तहत जमानत याचिका पर सुनवाई का हकदार नहीं: राजस्थान उच्च न्यायालय

राजस्थान उच्च न्यायालय (जोधपुर बेंच) ने फैसला सुनाया है कि वह किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत एक किशोर आरोपी की जमानत अर्जी पर फैसला सुनाते समय शिकायतकर्ता को सुनवाई का अवसर प्रदान करने के लिए बाध्य नहीं है। जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधानों के समग्र अध्ययन से संकेत मिलता है कि एक किशोर आरोपी की जमानत, जो "कानून के कथित उल्लंघनकारी बच्चे" (CICL) की परिभाषा के अंतर्गत आता है, आवदेनों पर फैसला सुनाते हुए, कानून अदालतों को शिकायतकर्ता को सुनवाई के चरण, अपीलीय स्तर या पुनरीक्षण चरण में सुनवाई के लिए निर्देश नहीं देता है।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

'भारत में नोटरी पब्लिक को विदेशी नागरिक के हलफनामे को प्रमाणित करने के लिए कानून में कोई निषेध नहीं': केरल हाईकोर्ट ने कपल के विवाह पंजीकरण को मंजूरी दी

केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि भारत के नोटरी पब्लिक को वैवाहिक मामलों में विदेशी नागरिकों के हलफनामों को प्रमाणित करने के लिए अधिकृत है और विवाह अधिकारी को एक विदेशी महिला के नोटरीकृत हलफनामे को स्वीकार करने और इसके परिणामस्वरूप याचिकाकर्ता के साथ उसकी शादी को पंजीकृत करने का निर्देश दिया गया। न्यायमूर्ति पीबी सुरेश कुमार ने याचिका की अनुमति देते हुए कहा कि, "प्रमाणित करने का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि दस्तावेज़ में हस्ताक्षर उस व्यक्ति द्वारा किया गया है, जिसका दस्तावेज़ में हस्ताक्षर की जरूरत है।"

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

हूच त्रासदी: "ऐसे कृत्यों से समाज विधवा महिलाओं, अनाथ बच्चों से भरा होगा": पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने बूटलेगर को जमानत देने से इनकार किया

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने पिछले हफ्ते एक बूटलेगर (शराब का तस्कर) को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि नकली देशी शराब की अवैध आपूर्ति / बिक्री में शामिल लोगों से निपटने के लिए एक कठोर दृष्टिकोण की आवश्यकता है। न्यायमूर्ति हरनरेश सिंह गिल की पीठ ने जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि, "यदि इस तरह के व्यक्तियों को जमानत पर रिहा किया जाएगा तो वे समाज की पूरी व्यवस्था को और खराब कर देंगे और ऐसे कृत्यों से समाज विधवा महिलाओं, अनाथ बच्चों और बूढ़े और कमजोर माता-पिता के साथ दुख की कहानियों से भरा होगा।"

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

न्याय जो दया से अनभिज्ञ है वह न्याय ही नहीं है": दिल्ली हाईकोर्ट ने एचआईवी पॉजिटिव बीएसएफ जवान के ट्रांसफर पर रोक लगाई

दिल्ली हाईकोर्ट ने पिछले हफ्ते एक एचआईवी पॉजिटिव सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) जवान के ट्रांसफर पर रोक लगाई और बीएसएफ के आग्रह को खारिज कर दिया कि वह अपनी अनिश्चित चिकित्सा स्थिति में अपने नए पोस्टिंग स्थान पर ड्यूटी में शामिल होना चाहिए। न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की खंडपीठ ने विशेष रूप से कहा कि, "न्याय, यह अच्छी तरह से तय है कि दया और करुणा के साथ संयमित होना चाहिए। न्याय जो दया से अनभिज्ञ है वह न्याय ही नहीं है।"

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

घर से भागे हुए जोड़े की सुरक्षा याचिका: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एसएसपी को नाबालिग लड़की की कस्टडी लेने का निर्देश दिया

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक भागे हुए जोड़े (एक नाबालिग लड़की और एक 28 वर्षीय लड़का) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पिछले हफ्ते चंडीगढ़ के एसएसपी को नाबालिग लड़की (याचिकाकर्ता नंबर एक) की कस्टडी लेने का निर्देश दिया। न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी की खंडपीठ ने पुलिस को 28 वर्षीय लड़के (याचिकाकर्ता नंबर दो) के खिलाफ कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करने की स्वतंत्रता भी दी, जैसा कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार वारंट किया जा सकता है।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Next Story