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क्या किसी हाईकोर्ट के न्यायाधीश के खिलाफ दर्ज की जा सकती है FIR?: समझिये न्यायमूर्ति एस. एन. शुक्ला मामला
मंगलवार (31-07-2019) को मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने CBI को इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ के जज न्यायमूर्ति एस. एन. शुक्ला(श्री नारायण शुक्ला) के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA) के तहत FIR दर्ज करने की अनुमति दे दी है। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जहाँ किसी मौजूदा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ एक FIR दर्ज करने की अनुमति दी गयी है। दिल्ली न्यायिक सेवा संघ तीस हजारी कोर्ट बनाम गुजरात राज्य (1991 AIR 2176) के मामले में यह अच्छी तरह से तय किया गया था कि...
वायु प्रदूषण और सुप्रीम कोर्ट : वेहिकुलर पॉल्यूशन केस (१९८५-२०१९) की एक समीक्षा
'बीटिंग एयर पॉल्यूशन' इस वर्ष के पर्यावरण दिवस की थीम है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए वैश्विक स्तर पर पर्यावरण और वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य सम्बन्धी खतरों के प्रति जागरूकता फ़ैलाने की ओर प्रयास किये जा रहे है. यह थीम भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि IQ AIR, AIR VISUAL एवं GREEPEACE के सर्वे के मुताबिक़ विश्व के ३० सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से २२ शहर भारत में है. यह बात अविलम्ब और प्रभावी रूप से प्रदूषण रोकने के लिए कदम उठाने की जरुरत का एहसास करवाती है. प्रदूषण रोकने हेतू कानूनी...
उपाय जिनसे आप अपने ऋण की प्रतिभूति कर सकते है
इस दौर के प्रतिस्पर्धा युक्त बाजार मे, वित्तीय सहायता (क़र्ज़ द्वारा) बाजार में उक्त प्राइवेट कारोबारियों को एवं उद्यमों को दी जाती रही है। इस उद्देश्य से संस्थाओं को बनाया गया है, जो कि बाजार में क़र्ज़ प्रदान करने का व्यवसाय करती हैं जो कि अंततः आर्थिकसंवृद्धि में ईंधन की तरह बज़ार में कार्य करती हैं। परन्तु कर्ज देने के व्यवसाय में एक अहितकारी परिणाम होता हैं, जिसमे कर्ज़दार ऋण की अदायगी में चूक जाता है (default) और इस परिणाम से बचने के लिए उधारदाता को उस क़र्ज़ को प्रतिभूती (secure) करनेके...
समझिये IPC के अंतर्गत क्षम्य एवं तर्कसंगत कृत्य : धारा 76 एवं 79 में 'तथ्य की भूल' विशेष ['साधारण अपवाद श्रृंखला' 1]
भारतीय दंड संहिता का चैप्टर IV (4th), 'साधारण अपवाद' (General exception) की बात करता है। जैसा कि नाम से जाहिर है, यह अध्याय उन परिस्थितियों की बात करता है जहाँ किसी अपराध के घटित हो जाने के बावजूद भी उसके लिए किसी प्रकार की सजा नहीं दी जाती है।यह अध्याय ऐसे कुछ अपवाद प्रदान करता है, जहाँ किसी व्यक्ति का आपराधिक दायित्व खत्म हो जाता है। इन बचाव का आधार यह है कि यद्यपि किसी व्यक्ति ने अपराध किया है, परन्तु उसे उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि अपराध के समय, या तो मौजूदा हालात...
कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम २०१३ भाग-१
१६ अक्टूम्बर 2017 को कलाकार और एक्टिविस्ट Alyassa Milano ने अपने ट्विटर वॉल पर यह कहते हुए पोस्ट लिखा कि अगर सभी महिलाएं जिनके साथ किसी भी तरह का यौन उत्पीड़न हुआ है वो उनके पोस्ट के जवाब में #MeToo लिखे तो शायद समाज को यह नज़र आ जाये कि सेक्सुअल हरासमेंट कितनी बड़ी और व्यापक समस्या है. उस ट्वीट पर मात्र २४ घंटों में लगभग २४ मिलियन महिलाओं ने जवाब दिया और अगले १० दिनों में आंदोलन लगभग ८५ देशों तक पहुँच गया. भारत भी ...
सूचना का अधिकार भाग -३
पिछले दो लेखों में हमने ये जाना कि सूचना का अधिकार क्या है (भाग -१), सूचना पाने के लिए कैसे आवेदन करना होता है आदि (भाग-२). आज हम जानेंगे कि सूचना न मिलने पर क्या कार्यवाही करनी होती है. सूचना देने की समय सीमा- सूचना आवेदन के ३० दिनों के भीतर उपलब्ध करवाना अनिवार्य हैं. अगर किसी व्यक्ति की जीवन या स्वतंत्रता से सम्बंधित मामला है तो सूचना ४८ घंटों के भीतर देना अनिवार्य है. (धारा -७) आवेदन के पश्चात् क्या होता है? ...
सूचना का अधिकार भाग-२
पिछले लेख में हमनेसूचना के अधिकार के इतिहास, अधिकार का लोकतंत्र से क्या सम्बन्ध है और सूचना पाने के लिए कैसे आवेदन करें - ये सब जाना। आज हम अधिनयम की धारा -४ और कौन- कौन सी सूचनाएँ नहीं दी जाती है- ये जानेगें. लोक प्राधिकरण के कर्तव्य - २००५ के अधिनियम तहत नागरिकों के अधिकारों के साथ- साथ लोक प्राधिकरणों के कुछ कर्तव्य भी है, जो इस प्रकार से है- स्व- प्रेरणा से सूचना देने का कर्तव्य- सरकारी प्राधिकरण को स्वप्रेरणा से अर्थात स्वयं ही, बिना किसी आवेदन के अपने प्राधिकरण की...
सीआरपीसी की धारा 482 और उच्च न्यायालय की अन्तर्निहित शक्तियां: विस्तार से जानिए इस प्रावधान की महत्वता
अगर हम दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की बात करें तो इसमें कोई भी संशय नहीं है कि यह अपने आप में एक सम्पूर्ण एवं विस्तृत कानून है। यही नहीं, इसके अंतर्गत आपराधिक मामलो में अन्वेषण, ट्रायल, अपराध की रोकथाम एवं तमाम अन्य प्रकार की कार्यवाही का सम्पूर्ण ब्यौरा मिलता है। हालाँकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि कानून बनाते वक़्त, हर प्रकार की संभावनाओं को ध्यान में रखने के बावजूद कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन्हे 'केस टू केस' देखने की जरुरत होती है।ऐसे मामलों में प्रायः कानून द्वारा अदालत के ऊपर यह निर्णय छोड़ दिया...
सूचना का अधिकार भाग -१
हाल ही में भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में राफेल सौदे से सम्बन्धित कुछ दस्तावेजों के मीडिया में आ जाने पर यह चुनौती दी कि लीक करने वालों के विरुद्ध Official Secret Act, १९२३ के तहत कानूनी कार्यवाही की जायेगी. सरकार को इस निर्णय को लेकर भारी निंदा झेलनी पड़ी. विरोधियों का कहना था कहना था कि सरकार न केवल सूचना के अधिकार बल्कि लोकतंत्र को हानि पहुँचा रही है. अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भी सूचना के अधिकार को महत्व दिया और कहा कि सूचना का अधिकार नागरिकों का मूल अधिकार है. तो क्या है...
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अंतर्गत 'क्षमा-दान': परिस्थितयां, प्रावधान एवं कुछ जरुरी बातें
एक अप्रूवर को क्षमा-दान देने की प्रक्रिया को हमारी दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अंतर्गत जगह दी गयी है। आज इस लेख के माध्यम से हम उन परिस्थितियों के बारे में समझेंगे जहाँ क्षमा-दान दिया जा सकता है। इससे जरुरी हर वो बात हम आपको समझाने का प्रयास करेंगे, जो समझना आपके लिए आवश्यक है।उपरोक्त विषय से संबंधित कानून के प्रावधान धारा 306 से 308 दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 में उपस्थित हैं। आइये हम इन प्रावधानों को समझते हैं जिसके बाद हम इससे जुडी अन्य जानकारी आपको देंगे, जिससे इस विषय के बारे में हमारी और...
दुर्भावनापूर्ण मुक़दमेबाजी को रोकने के लिये नहीं है कोई कानून
प्रतिवादी का वादी पर सबसे बड़ा आरोप यही होता है कि जो मुक़दमा दायर किया गया है वह विद्वेषपूर्ण (vexatitious), छिछोरा (frivolous) और दुर्भावनापूर्ण (malicious) एवं प्रतिहिसंक (vengeful) है और प्रतिवादी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचानेवालाहै। पर सवाल उठता है कि यह विद्वेषपूर्ण वाद (Vexatious Litigation) वास्तव में है क्या? विधि आयोग की 192वीं रिपोर्ट 7 जून 2005 में आई और आयोग ने इसके बाद Vexatious Litigation (Prevention) Bill 2005 का प्रस्ताव किया। इस बिल की प्रस्तावना में कहा गया कि हाईकोर्ट्स...
आइये जाने पैरा लीगल वालंटियर के बारे में
हमने विधिक सहायता से जुड़े पिछले दो लेखों में विधिक सहायता के अधिकार और लोक अदालतों के बारे में जाना। आज के लेख में हम विधिक सहायता की एक अन्य मुख्य कड़ी पैरा लीगल वालंटियर के बारे में जानेंगे. साथ ही हम विधि विश्विद्यालयों में चलने वाले लीगल एड केंद्रों की भी जानकारी करेंगे।कौन होते हैं पैरा-लीगल वालंटियर"(PLV) ?राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण का शुरुआत से ही लक्ष्य रहा है कि "न्याय" को आपके दरवाज़े तक बिना रोक-टोक के पहुँचाया जाये। इसी बात को ध्यान में रखतेहुये वर्ष 2009 से प्राधिकरण द्वारा...
आपराधिक मामलों में अपील का सम्पूर्ण लेखा जोखा: समझिये कहाँ और किन परिस्थितियों में हो सकती है अपील
आपराधिक न्याय की प्रक्रिया के किसी भी व्यक्ति के जीवन पर कुछ गंभीर परिणाम होते हैं, मुख्य रूप से व्यक्ति के जीवन के अधिकार पर और उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर। एक स्वतंत्र ट्रायल प्रक्रिया एवं उचित निर्णय पर पहुंचने के रास्ते मौजूद होते हुए भी, गलती की सम्भावना शेष रह जाती है, यह अदालतों द्वारा दिए गए निर्णयों पर भी लागू होता है। इसके परिणामस्वरूप, न्याय प्राप्त करने एवं निचली अदालतों के फैसलों की जांच करने हेतु हमारी दंड प्रक्रिया संहिता में कुछ विशिष्ट प्रावधान मौजूद हैं।यह ऐसे प्रावधान...
लोकतंत्र में आचार संहिता की क्या है प्रासंगिकता?
भारत के संविधान निर्माताओं ने संसदीय प्रणाली में राजनीतिक दलों को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया है। हालाँकि संविधान के प्रारंभिक रूप में राजनीतिक दलों का ज़िक्र नहीं मिलता हैं | पहली बार राजनीतिक दलों का ज़िक्र १९८५ में आया जब पचासवें संवैधानिक संशोधन अधिनियम,१९८५ के द्वारा दसवीं अनुसूची को संविधान में शामिल किया गया फिर भी इस बात में शायद ही कोई शंका हो सकती है कि भारतीय लोकतंत्र राजनीतिक दलों और उनकी विचारधाराओं के बिना संभव नहीं है. । लोकतंत्र में चुनाव सबसे महत्वपूर्ण घटना...
निर्वाचन आयोग के पास हैं असीमित अधिकार, सुप्रीम कोर्ट भी नहीं कर सकता इसमें हस्तक्षेप
भारत में चुनाव आयोग को चुनाव कराने को लेकर असीमित संवैधानिक अधिकार प्राप्त है और इस बात का पता इस देश के लोगों को विशेषकर उस समय लगा जब टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे।संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत आयोग को चुनाव कराने के बारे में असीमित अधिकार दिये हैं। इनमें चुनाव के देख रेख का अधिकार, प्रबंधन का अधिकार और इसके निर्देशन का अधिकार दिया है। एक बार जब आयोग चुनाव की घोषणा कर देता है तो न्यायलय भी आयोग के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। संविधानके अनुच्छेद 329 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट भी चुनाव की...
आइये जाने FIR के बारे में
कोई भी अपराध मात्र एक पीड़ित के खिलाफ अपराध नहीं होता बल्कि वह सामाजिक सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था को एक चुनौती होता है. इसलिए जब भी कोई अपराध होता है तो पीड़ित तो एक निजी व्यक्ति ही होता है फिर भी राज्य / सरकार उस अपराध के विरुद्ध कार्यवाही करती है. अपराधी को उचित सजा दिलाना और न्याय सुनिश्चित करना पीड़ित का नहीं बल्कि राज्य का कर्तव्य एवं अधिकार माना जाता है, यह प्रक्रिया FIR दायर करने से शुरू होती है. आज के लेख में...
आइये! लोक अदालत को जानें और समझें
लोक अदालत का मतलब होता है लोगों की अदालत इसकी संकल्पना हमारे गाँवों में लगने वाली पंचायतों पर आधारित है। इसके अलावा आज के परिवेश में इसके गठन का आधार 1976 का 42वां संविधान संशोधन है, जिसके अंदर अनुच्छेद 39-A में आर्थिक न्याय को जोड़ा गया। लोक अदालत को अमल में लाने के दो मुख्य कारण हैं , पहला यह कि आर्थिक रूप से कमजोर होने कि वज़ह से बहुत सारे लोग न्याय पाने के लिए संसाधन नहीं जुटा पाते। दूसरा अगर वह कोर्ट तक पहुँच भी जाते हैं, तो करोड़ों मुक़दमे लंबित और अपूर्ण होने के कारण उनको समय से...
लोकपाल के जरिये कैसे कसी जाएगी भ्रष्टाचार पर नकेल?: समझिये लोकपाल के कार्य, नियुक्ति और शक्तियों के बारे में
भारत में लोकपाल को लेकर चर्चा, वर्ष 1966 में प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा सिफारिश किए जाने से शुरू हुई, और वर्ष 2011 तक कानून बनाने के 8 असफल प्रयासों के बाद भी खत्म नहीं हुई। वर्ष 2011 में ही, अन्ना हजारे की भूख-हड़ताल ने संसद को इस कानून के प्रति प्रथम बार सोचने को मजबूर किया और अंततः जनवरी, 2014 में यह कानून अस्तित्व में आ सका। वर्ष 2011 और 2014 के बीच प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में मंत्रियों के एक समूह ने इस विधेयक का प्रस्ताव रखा, जिसमें संसद की स्थायी समिति ने पर्याप्त संशोधन किए।...
कॉलेजियम प्रणाली, तीन जज मामले और संवैधानिक अदालतों में नियुक्तियां/तबादले: समझिये यह महत्वपूर्ण गणित
प्रतिदिन हम केवल संसद एवं विधायिकाओं द्वारा बनाये गए कानूनों से ही निर्देशित नहीं होते हैं, बल्कि हमारी अदालतों द्वारा सुनाये गए निर्णयों एवं उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों से भी हम प्रभवित होते हैं। हालाँकि जहाँ संसद एवं विभिन्न राज्यों की विधायिकाओं में प्रवेश का एक तय नियम मौजूद है, वहीँ उच्चतम न्यायलय में न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर हमेशा से विवाद रहा है।हम आज बात करने जा रहे हैं उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के बारे में। इसके साथ ही हम उन मामलों के बारे में भी आपको...




![समझिये IPC के अंतर्गत क्षम्य एवं तर्कसंगत कृत्य : धारा 76 एवं 79 में तथ्य की भूल विशेष [साधारण अपवाद श्रृंखला 1] समझिये IPC के अंतर्गत क्षम्य एवं तर्कसंगत कृत्य : धारा 76 एवं 79 में तथ्य की भूल विशेष [साधारण अपवाद श्रृंखला 1]](https://hindi.livelaw.in/h-upload/2019/05/19/500x300_360952-ipc.jpg)











