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एनकाउंटर: क्या हैदराबाद पुलिस अपना दावा साबित कर सकती है?

LiveLaw News Network
10 Dec 2019 12:23 PM GMT
एनकाउंटर: क्या हैदराबाद पुलिस अपना दावा साबित कर सकती है?
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प्रोफेसर मदाभ‌ुष‌ि श्रीधर आचार्यलु

क्या हैदराबाद पुलिस यह साबित करने के लिए तैयार है कि उन्होंने आत्मरक्षा में चार आरोपियों को मार डाला? क्या कोई पुलिस 'आरोपी' पुलिस वालों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करेगी?

अगर मुठभेड़ में हुई हत्या को हत्या के लिए आवश्यक साबित किया जाता है, तो इसमें शामिल पुलिस अधिकारियों को आरोपी नहीं माना जाना चा‌हिए, यदि नहीं तो दिशानिर्देशों और कानून के अनुसार मामला दर्ज किया जाना चाहिए और जांच की जानी चाहिए। यदि हैदराबाद पुलिस का दावा असत्य बयानों पर आधारित है, तो हमारे राष्ट्रीय आदर्श वाक्य 'सत्यमेव जयते' की सच्चाई पर विश्वास करना मुश्किल है।

6 दिसंबर, महापरिनिर्वाण दिवस, यानी अंबेडकर की पुण्यतिथि, तेलंगाना पुलिस राष्ट्रीय स्तर पर बनाई सुर्खियों, पशु चिकित्सक के सामूहिक बलात्कार में चार आरोपियों की सनसनीखेज हत्या, के साथ गुजर गई. साइबराबाद पुलिस आयुक्त वीसी सज्जनार ने मीडिया को बताया कि वे मुठभेड़ के दिन तड़के क्राइम सीन के रिक्र‌िएशन के लिए क्राइम स्पॉट गए थे, जहां आरोपियों ने अचानक बंदूके छीन ली और गोलीबारी शुरू कर दी: तब पुलिस ने जवाबी कार्रवाई में गोलियां चला दीं, नतीजतन मौके पर ही चारो आरोपियों की मौत हो गई।

सज्जनार की प्रसिद्धि दो अन्य मुठभेड़ों के लिए है। अगस्त 2016 में, सज्जनार ने ग्रेहाउंड्स टीम का नेतृत्व किया थ, जिसने हैदराबाद के पास पूर्व नक्सली मोहम्मद नईम उद्दीन की गोली मारकर हत्या कर दी थी। पुलिस ने तब बताया था कि जब उन्होंने गिरफ्तारी की कोशिश की तो उसने हमला कर दिया, जीप के अंदर से की पुलिस टीम पर एके 47 से हमला किया। बाद में पता चला कि नईम एक माफिया सरगना था, जिसके कई विभागों में अधिकारियों और राजनेताओं के साथ संबंध थे। नईम के जीवित रहने से घोटालों के चौंकाऊ खुलासे हो सकते हैं। उसकी मौत ने उन सभी संभावनाओं को खत्म कर दिया। इससे पहले 2008 में वारंगल शहर में किशोर उम्र की लड़कियों पर भीषण एसिड अटैक हुआ था। तीनों युवा आरोपियों को ऐसी ही मुठभेड़ में मार डाला गया। लोगों ने लाइन लगाकर पुलिस की तारीफ की थी और उन्हें फूल दिए थे.

यह भरोसे के काबिल नहीं है कि लगभग दस या उससे अधिक सशस्त्र पुलिस अधिकारी हिरासत में चार आरोपियों से अपने हथियारों की सुरक्षा नहीं कर सके और अपनी जान बचाने के लिए उन्हें आरोपियों की जान लेने जैसी स्थिति में जाना पड़ा! अपने पिछले अनुभव के आधार पर पुलिस आरोपियों को हथकड़ी लगा सकती थी। बहुत ही सामान्य सा सवाल उठता है; 'क्या पुलिस के पास हथकड़ी नहीं थी?'

पुलिस के 'न्याय' के आगे फास्ट ट्रैक कोर्ट फेल!

भारी जन विरोध और के गुस्से के जवाब में तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने बलात्कार और हत्या के इस मामले में ट्रायल के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन का आदेश दिया, जिसे उच्च न्यायालय ने प्रशासनिक मंजूरी दे दी थी। हालांकि पुलिस ने और तेजी से 'न्याय' प्रदान कर दिया , जिसके बाद फास्ट ट्रैक कोर्ट किसी काम की नहीं रह गई है। पुलिस ने सरकार और न्यायपालिका को बेवकूफ बनाया है। पुलिस अधिकारी ही जांचकर्ता, अभियोजक, न्यायाधीश, जेलर और जल्लाद बन बैठा! बंदूक की गोली से पुलिस ने संवैधानिक सरकार, कानून, अदालतें, जांच और जेलें, सभी को बेकार और बिना मतलब का बना दिया। क्या हमें जजों और जेलों की जरूरत है? भारत के मुख्य न्यायाधीश बोबडे ने ठीक ही कहा, 'न्याय तब अपना चरित्र खो देता है जब वह बदला बन जाता है।' क्या पागल भीड़ इस सच्चाई को समझती है?

बलात्कार के दो मामले और हत्याएं

तेलंगाना के दिशा मामले के आरोपी तथाकथित एनकाउंटर में मारे गए, जबकि वे हिरासत में थे। इसके विपरीत, उन्नाव में बलात्कार पीड़िता पर चाकू से हमला किया गया, जमानत पर लौटे आरोपियों ने उसे तब जला दिया, जब वो अदालत जा रही थी. एक किलोमीटर तक वो आग का गोले बनी भागती रही, उसने खुद पुलिस को बुलाया। दिल्ली अस्पताल ‌श‌िफ्ट होने के बाद उसकी मौत हो गई। हालांकि दोनों मामलों में बलात्कारियों को गिरफ्तार किया गया था, तेलंगाना में अभियुक्तों को ट्रिगर ट्रैक जस्टिस का सामना करना पड़ा और यूपी में उन्हें जमानत पर या शायद अधिकारियों के सहयोग से छोड़ दिया गया। अगर ‌दिसा बलात्कार के आरोपी गरीब, अशिक्षित, लॉरी क्लीनर हैं तो उन्नाव के अपराधी समृद्ध और प्रभावशाली हैं। 5-6 दिसंबर 2019 को 48 घंटों की अवधि में हुई दोनों घटनाएं दिखाती हैं कि आर्थिक स्थिति और राजनीतिक संबंध भारत में न्याय को प्रभावित करते हैं। दोनों घटनाओं से पता चलता है कि कानून कैसे तोड़ा जाता है और पीड़ितों को उनके भाग्य या भ्रष्ट तंत्र के सहारे छोड़ दिया जाता है।

उन्नाव पीड़िता के मामले में एफआईआर में उसे बार-बार धोखा देने और बलात्कार करने की बात कही गई है. बलात्कारी शिवम त्रिवेदी ने प्यार और शादी का लालच देकर उसका यौन शोषण किया और कुछ दिनों तक उसे सेक्स स्लेव बनाकर रखा। उसे घर से बाहर देखने पर भी पीटा गया और बलात्कार किया गया। उसे धमकी दी गई कि अगर पुलिस को शिकायत की तो फिर से उसके साथ बलात्कार किया जाएगा, इसके बाद भी उसने एफआईआर दर्ज करने की हिम्मत की। 19 जनवरी, 2018 को उसकी शिवम से बहस हुई और पूछा कि क्यों वो उससे शादी नहीं कर रहा है, जबकि उसने वादा किया था. शिवम उसे रायबरेली की अदालत में ले गया था और विवाह अनुबंध तैयार किया था, हालांकि ये फिर से धोखा देने के लिए था। इस बार उस युवती को माता-पिता की हत्या की धमकी दी गई, उसने अपनी चाची के घर में शरण ली। अभियुक्त ने उसका पता लगाया और 12 दिसंबर, 2018 को वहां पहुंच गया और उस समय उसने वादे के अपने खेल को एक मंदिर से के सामने दोहराया। एफआईआर में कहा गया है कि आरोपी ने रास्ते में अपने भाई शुभम को बुलाया। इस बार उसने अपने दोस्त के घर पर बंदूक की नोंक पर पर सामूहिक बलात्कार करवाया।

पशु चिकित्सक का ट्रक के पास अपनी स्कूटी पार्क करते देख बलात्कार हुआ था, जिसमें आरोपी शराब पी रहे थे। उस घिनौने अपराध को अनियंत्रित ट्रक, अवैध पार्किंग, सार्वजनिक मद्यपान आदि जैसी प्रणालीगत खामियों के जरिए आसान बनाया गया था।

दोनों ही मामलों में पुलिस ने शुरुआत में मामला दर्ज करने से इनकार कर दिया। उन्‍नाव के मामले में अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही प्राथमिकी दर्ज की गई थी। तेलंगाना में, जब तक एफआईआर दर्ज की गई, तब तक पीड़ित की हत्या हो चुकी थी। राष्ट्रीय महिला आयोग ने कहा था कि तेलंगाना पुलिस ने, लड़की के माता-पिता को, जब उन्होंने पुलिस से अपनी लापता लड़की के बारे में पूछा था, ये कहकर अपमानित किया कि उनकी लड़की साथ भाग गई होगी. दिशा के पिता ने आरोप लगाया था कि जब वो अपनी बेटी की खोजबीन कर रहे थे, तब पुलिस ने ठीक से जवाब तक नहीं दिया था। जब एक मंत्री उनके घर गया तब उन्होंने बताया कि "पुलिस ने अपना काम ठीक से नहीं किया। मुझे मौके पर जाकर अपनी बेटी को खोजना पड़ा, यह देखने के लिए कि वह जीवित है या नहीं." जबकि मां ने आरोप लगाया कि पुलिस उन्हें अधिकार क्षेत्र का हवाला देकर गोल-गोल घुमाती रही। पूरी प्रक्रिया में पुलिस ने कई अपराध किए, मामले को दर्ज न करने का, कर्तव्य में लापरवाही, निष्क्रियता और अंत में मुठभेड़ के नाम पर बलात्कारी/हत्यारों की हत्या। अगर एनकाउंटर फर्जी साबित हुआ, तो यह पुलिस द्वारा की गई भयानक हत्या होगी।

सोशल मीडिया ने दी सहमति!

फ़ेसबुक यूजर्स ने तेलंगाना पुलिस के त्वरित न्याय को हज़ारों लाइक्स और इमोटिकॉन्स देकर स्वागत किया। ट्विटर यूजर्स तेलंगाना के शासकों और पुलिस की तरीफ भारतीय न्याय प्रणाली के नायकों के रूप में किया, जिसे दूसरे राज्यों और देश को पालन करना चाहिए। हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली में मृत्युदंड को समाप्त नहीं किया जाता है, इसलिए दिशा या निर्भया जैसे मामलों के अभियुक्तों को खत्म करना कानूनी रूप से संभव है। लोकतंत्र में लोग असली जज होते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस तरह की भीड़ की सहमति या भीड़ की हिंसा के साथ पुलिस की गोलियों से निपटारा हो।

अगर भीड़ ऐसा त्वरित न्याय चाहती है तो बलात्कार के हजारों मामलों का क्या करना चाहिए? राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की राष्ट्रीय अपराध रिपोर्ट कहती है कि 2017 में 46,984 पंजीकृत बलात्कार के मामलों में से 5,855 मामलों में अभियुक्तों को दोषी ठहराया गया था। इसका मतलब है कि 86.6% बलात्कार के मामले में आरोप-पत्र साबित नहीं हो सके। NCRB के अनुसार, 2017 के अंत तक सजा की दर 32.2% ही थी, तब देश में बलात्कार के 14,406 मामले लंबित थे। अपर्याप्त सबूतों के कारण 1,012 दावों को खारिज कर दिया गया था. 30 मामलों को जांच के दौरान समाप्त कर दिया गया।

भारत में सजा की दर सामान्य लगभग 45% है। चीन में 99.9 प्रतिशत, जापान और कनाडा ने 97%, जबकि अमेरिका ने लगभग 93% है। बलात्कार के दो तिहाई मामलों में अभियोजन पक्ष सफल नहीं होता है। यह कहना मुश्किल है कि सभी दोषी वास्तव में बलात्कारी थे और बरी हुए सभी निर्दोष। बलात्कार के मामलों में झूठे आरोपों की संख्या अधिक है।

यदि गोली ही न्याय का मार्ग है, तो हर शहर में पुलिस कमिश्नर को मुख्य मेट्रोपॉलिटन जज की अतिरिक्त ड्यूटी दी जानी चाहिए, ताकि टीवी और सोशल मीडिया द्वारा पेश किए गए सबूतों का समर्थन किया जा सके और आरोपी को 'मुठभेड़' में मारने के लिए पुलिस को निर्देश दिया जा सके। ये पुलिस द्वारा किया गया मुकदमा है, सनसनीखेज मीडिया द्वारा किया गया अभियोजन, भावनाओं के आधार पर और बिना सबुतों के संवेदनहीन सोशल मीडिया द्वारा लगाया गया आरोप है, जिनमें सबूत बहुत कम है। पुलिस ने हिरासत में आरोपियों को मारने में अपनी वीरता और कौशल दिखाया है, इस प्रकार उसने सेल्युलाइड की दुनिया के रजनीकांत को पीछे छोड़ दिया, जहां केवल नायक ही मार-पीट और हत्या के जर‌िए न्याय करेंगे, जबकि युवा और बुजुर्ग, सक्षम या कमजोर, प्रशंसा के साथ नायक को देखते रहेंगे, जबकि खलनायक के गुर्गे खुद को बलिदान करते रहेंगे।

अम्बेडकर शायद लगभग 70 साल पहले संविधान-निर्माण के उन आदिम दिनों में नहीं समझ पाए थे, तेजी से न्याय संभव है जैसा कि साइबराबाद पुलिस की टीम ने साबित कर दिया है। अन्यथा, उन्होंने इसे रजनीकांत खंड के रूप में संविधान में शामिल कर लिया होता!

यदि हैदराबाद पुलिस के पास कानून के लिए कोई सम्मान है, तो उसे ये साबित करना होगा कि चार आरोपियों की हिरासत में हुई हत्या वास्तविक मुठभेड़ थी और अगर ऐसा नहीं था तो एक सामान्य मुकदमे में भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत पुलिस को सजा का सामना करना चाहिए। क्या वे ऐसा करने के लिए तैयार हैं?

एम श्रीधर आचार्युलु, पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त और बेनेट विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं।

(इस लेख में व्यक्त की गई राय लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। लेख में ‌दिए गए तथ्य और राय LiveLaw के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं और उन्हें लेकर LiveLawअपनी कोई जिम्मेदारी या दायित्व नहीं मानता है.)

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