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एनडीपीएस एक्ट की धारा 50 : अनुपालन के न्यायशास्त्र से असहमति

LiveLaw News Network
28 Oct 2019 6:23 AM GMT
एनडीपीएस एक्ट की धारा 50 : अनुपालन के न्यायशास्त्र से असहमति
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यह आलेख ‘सेक्शन 50 एनडीपीएस एक्ट: अंडरस्टैँडिंग द ज्यूरिसप्रुडेंस ऑफ कम्पलायेंस’ के परिप्रेक्ष्य में है।

अमित गुप्ता

उपरोक्त आलेख में लेखक ने निष्कर्ष दिया है कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 50 के तहत संदिग्ध की तलाशी मजिस्ट्रेट या एक राजपत्रित अधिकारी की मौजूदगी में होनी चाहिए। मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी की मौजूदगी अलंघनीय अनिवार्यता है। मजिस्ट्रेट अथवा राजपत्रित अधिकारी की मौजूदगी में तलाशी से छूट की आरोपी की मांग निरर्थक है।

यह निष्कर्ष आरिफ खान बनाम उत्तरांचल सरकार (एससी) और सुमित राय उर्फ सुबोध रवि बनाम राज्य (एचसी) के फैसलों पर आधारित हैं।

हालांकि उपरोक्त निष्कर्ष गलत है। यह आलेख 'सेक्शन 50 एनडीपीएस एक्ट: अंडरस्टैँडिंग द ज्यूरिसप्रुडेंस ऑफ कम्पलायेंस'के परिप्रेक्ष्य में है।

हालांकि यह निष्कर्ष गलत है। आरिफ खान मामले में फैसला कानूनी तथ्यों से परे (पर इनक्यूरियम) है। साथ ही, सुमित राय मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय यह विचार करने में असफल रहा है कि कानूनी तथ्यों से परे फैसले पहले के फैसले के आधार पर मुकदमे के तथ्यों के निर्धारण के विधिक सिद्धांत (स्टेरी डिसाइसिस) का अपवाद होते हैं।

आरिफ खान बनाम एनडीपीएस एक्ट की धारा 500

आरिफ खान मामले में धारा 50 की भाषा की सम्पूर्णता को नजरंदाज किया गया है। धारा 50 स्पष्ट शब्दों में लिखा गया है। जहां तक आरोपी को मजिस्ट्रेट या एक राजपत्रित अधिकारी के समक्ष तलाशी के विकल्प दिये जाने का प्रश्न है तो इस धारा में कोई भ्रम की स्थिति नहीं है।

धारा 50(एक) और (दो) में इस्तेमाल भाषा ऐसे दृष्टांत बताती है, जहां संदिग्ध व्यक्ति मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी की मौजूदगी में तलाशी न कराने की इच्छा व्यक्त करता है। धारा 50(एक) 'यदि ऐसा व्यक्ति आवश्यक समझता है' मुहावरे का इस्तेमाल करती है जबकि 50(दो) में कहा गया है, 'यदि ऐसा अनुरोध किया जाता है।'

इसी तरह, धारा 50(पांच) और (छह) वैसे दृष्टांत देती है, जहां मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी की अनुपस्थिति में एक अधिकारी द्वारा कारणों को दर्ज करके तथा वरीय अधिकारी को सूचित करके तलाशी ली जाती है। स्पष्ट रूप से, विधायिका ने मादक पदार्थों के संदिग्ध आरोपियों की तलाशी के दौरान किसी मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी की उपस्थिति अनिवार्य करने पर विचार नहीं किया।

आरिफ खान मामले में, आरोपी ने मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी की मौजूदगी में तलाशी लिये जाने का अपना अधिकार छोड़ दिया था। हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने पैरा संख्या 244 में बगैर कोई उचित कारण दिये खुद ही निष्कर्ष निकाल लिया कि चूंकि तलाशी संदिग्ध के शरीर की करनी थी, इसलिए, अभियोजन पक्ष के लिए यह साबित करना अनिवार्य है कि अपीलकर्ता की तलाशी और रिकवरी मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी की उपस्थिति में हुई थी।

संबंधित फैसले में इस बात पर कोई विमर्श नहीं किया गया है कि आखिर जब आरोपी ने मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी की उपस्थिति में तलाशी लिये जाने के अपने अधिकार को छोड़ दिया तब भी जांच एजेंसी इनकी उपस्थिति में ही तलाशी सुनिश्चित करने के लिए बाध्य क्यों है?

आरिफ खान बनाम विजयसिंह चंदूभा जडेजा

विजयसिंह चंदूभा जडेजा बनाम गुजरात सरकार मामले में संविधान पीठ के समक्ष हुआ विमर्श यहां आवश्यक हो जाता है, क्योंकि आरिफ खान मामले में 'अपीलकर्ता की तलाशी एवं उससे बरामदगी' जैसे शब्दों से शुरू 24वां पैरा धारा 50 की अनिवार्यता को संतुष्ट नहीं करता, जैसा विजय सिंह चंदूभा जडेजा मामले में इस कोर्ट ने कहा है।

हालांकि, आरिफ खान मामले में पैरा 24(4) में निष्कर्ष देते हुए विजयसिंह चंदूभा जडेजा मामले को समग्रता में सही तरीके से नहीं समझा गया है।

विजयसिंह चंदूभा जडेजा मामले के अनुसार, धारा 50 पर सख्ती से अनुपालन आवश्यक है। न्यायालय ने 'पर्याप्त अनुपालन' की अवधारणा को अपनी मंजूरी नहीं दी। यह व्यवस्था दी गयी थी कि संदिग्ध व्यक्ति को आवश्यक तौर पर यह सूचित किया जाना है कि उसके पास धारा 50 के प्रावधानों के तहत किसी मजिस्ट्रेट अथवा राजपत्रित अधिकारी के समक्ष तलाशी करवाने का अधिकार है। इस प्रकार, यदि संबंधित अधिकारी संदिग्ध व्यक्ति को विशेष तौर पर धारा 50 के तहत मिले अधिकार की जानकारी दिये बिना मजिस्ट्रेट अथवा राजपत्रित अधिकारी की मौजूदगी में तलाशी का विकल्प देता है तब भी ऐसा करना धारा 50 का पूरी तरह अनुपालन कहा जायेगा।

रोचक तथ्य है कि विजय सिंह चंदूभा जडेजा मामले में स्पष्ट व्यवस्था दी गयी है कि मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी की उपस्थिति में आरोपी की तलाशी के संबंधित अधिकारी के दायित्व का प्रश्न तभी उठेगा जब आरोपी व्यक्ति इस विकल्प के इस्तेमाल को तैयार होगा।

इस संबंध में संबंधित फैसले के पैरा संख्या 20 का संदर्भ दिया जा सकता है:-

"20. - धारा 50 के प्रावधान सटीक एवं स्पष्ट है कि जिस व्यक्ति की तलाशी लेनी है, यदि वह संबंधित अधिकारी को निकटतम राजपत्रित अधिकारी अथवा मजिस्ट्रेट के पास ले चलने की इच्छा जताता है तो उसकी तलाशी तब तक नहीं ली जायेगी, जब तक मजिस्ट्रेट या गजेटेड ऑफिसर संबंधित अधिकारी को ऐसा करने की इजाजत नहीं देता।"

पैरा 29 में यह व्यवस्था दी गयी है कि संदिग्ध व्यक्ति संबंधित प्रावधानों के तहत प्राप्त अपने अधिकार का इस्तेमाल कर भी सकता है और नहीं भी।

अपवाद के तौर पर आरिफ खान मामले को छोड़कर चंदूभा जडेजा मामले के बाद के किसी भी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था नहीं दी है कि राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट की अनुपस्थिति के कारण मुकदमा निष्प्रभावी हो जायेगा, यहां तक कि वैसे मामले में भी जहां आरोपी ने अपने संबंधित अधिकार छोड़ दिये हैं। इस प्रकार, न तो वैधानिक व्याख्या के आधार पर, न ही पूर्व के निर्णय द्वारा न्यायोचित ठहराये जाने के आधार पर, सुप्रीम कोर्ट ने, न जाने कहां से, आरिफ खान मामले में एनडीपीएस एक्ट की धारा 50 के तहत पूरी तरह से नयी व्यवस्था दी है।

सुमित राय - स्टेरी डिसाइसिस अथवा पर-इनक्यूरियम की अवधारणा

सुमित राय, मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह महसूस किया कि विजयसिंह चंदूभा जडेजा मामला इस निष्कर्ष तक नहीं पहुंचता है कि एक आरोपी को अनिवार्य तौर पर मजिस्ट्रेट अथवा राजपत्रित अधिकारी के समक्ष पेश किया जाना जरूरी है, यदि वह अपने अधिकार छोड़ देता है।

फिर भी, हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी कि वह संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत आरिफ खान मामले से संबंधित आदेश से बंधा हुआ है, क्योंकि "विजयसिंह चंदूभा जडेजा मामले के बाद आरिफ खान मामले में तय कानून कहता है कि हालांकि, उस मामले और मौजूदा मामले की तरह ही जहां आरोपी ने एनडीपीएस कानून की धारा 50 के तहत प्रस्ताव ठुकरा भी दिया हो, फिर भी छापा मारने वाली टीम को अपीलकर्ता की तलाशी राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में लेना जरूरी था। (पैरा-18)"

इस बात को लेकर कोई मतभेद नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कोई कानून अनुच्छेद 141 के तहत हाईकोर्ट पर बाध्यकारी होता है। हालांकि कानूनी तथ्यों से परे फैसले (पर इन्क्यूरियम) पूर्व के फैसले के आधार पर मुकदमे के तथ्यों के निर्धारण के विधिक सिद्धांत (स्टेरी डिसाइसिस) का अपवाद होते हैं।

'सिद्धराम सतलिंगप्पा म्हेत्रे बनाम महाराष्ट्र सरकार' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि कम जजों वाली कोई भी बेंच संविधान पीठ के फैसलों को मानने को बाध्य है और कमतर पीठ द्वारा विपरीत फैसला दिया जाना 'पर इन्क्यूरियम' की श्रेणी में आता है। उच्चतम न्यायालय ने उस तत्कालीन फैसले पर अमल की बाध्यता से इन्कार कर दिया था जो गुरबक्श सिंह सिबिया आदि बनाम पंजाब सरकार के मामले में संविधान पीठ के फैसले के विपरीत था। इस मामले में, दंड विधान संहिता (सीआरपीसी) की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत के सभी आयामों को व्यापक तरीके से समीक्षा की गयी है।

इसी तरह संदीप कुमार बाफना बनाम महाराष्ट्र सरकार के मामले में यह व्यवस्था दी गयी थी कि कोई फैसला 'पर इनक्यूरियम' होगा यदि वह एक समान जजों की संख्या वाले या वृहद पीठ के पूर्व में दिये में गये फैसलों के अनुरूप नहीं होगा। कोर्ट ने व्यवस्था दी कि हाईकोर्ट में हमेशा इस बात को लेकर संघर्ष होता रहता है कि वकीलों द्वारा दो या उससे अधिक असमान फैसलों को अपने अपने हिसाब से उद्धृत किया जाता रहा है। हमारा मानना है कि पहले दिये गये विचार को ही उचित मानना चाहिए क्योंकि बाद वाला फैसला 'पर इनक्यूरियम' की कसौटी पर नहीं टिकेगा।"

इस प्रकार, सुमित राय मामले में हाईकोर्ट यह आंकलन करने में असफल रहा है कि आरिफ खान मामले में दिया गया निर्णय विजयसिंह चंदूभा जडेजा के मामले में दिये निर्णय से भिन्न है। यह कहना गलत होगा कि आरिफ खान मामले में दिया गया निर्णय विजयसिंह चंदूभा जडेजा के न्यायशास्त्र पर आधारित था। इस प्रकार आरिफ खान मामला 'पर इन्क्यूरियम' है और बाद के फैसलों में इसके अनुसरण के लिए बाध्यकारी नहीं बताया जा सकता।

इसलिए यह दलील कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 50 के तहत किसी संदिग्ध की तलाशी के लिए मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी की उपस्थिति अनिवार्य है, भले ही आरोपी ऐसा न चाहता हो, गलत और अरक्षणीय है। यदि आरोपी को एनडीपीएस एक्ट की धारा 50 में मिले उसे अधिकारों के बारे में अवगत करा दिया जाता है, इसके बावजूद वह मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी की उपस्थिति में तलाशी कराने के अपने अधिकार को छोड़ देता है तो संबंधित मुकदमे को सिर्फ इसलिए निष्प्रभावी नहीं कर दिया जाना चाहिए कि आरोपी की निजी तलाशी के समय वहां मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी मौजूद नहीं था।

(लेखक ऑक्सफोर्ड एवं कोलम्बिया यूनिवर्सिटी के स्नातक हैं, और नई दिल्ली में वकालत करते हैं। लेखक दिल्ली हाईकोर्ट में अतिरिक्त लोक अभियोजक भी हैं। हालांकि इस आलेख में उनके विचार निहायत निजी हैं। )

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