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जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा, राफेल मामले में फैसले पर के बाद भी सीबीआई याचिकाकर्ताओं की शिकायत पर कानूनी कार्रवाई कर सकती है

LiveLaw News Network
16 Nov 2019 7:21 AM GMT
जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा, राफेल मामले में फैसले पर के बाद भी सीबीआई याचिकाकर्ताओं की शिकायत पर कानूनी कार्रवाई कर सकती है
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जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा है कि राफेल मामले में दायर पुनर्विचार याचिका पर आया फैसला राफेल खरीद में लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर कानूनी कार्रवाई करने के मामले में सीबीआई के लिए रोड़ा नहीं बनेगा.

जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा है कि राफेल मामले में दायर पुनर्विचार याचिका पर आया फैसला राफेल खरीद में लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर कानूनी कार्रवाई करने के मामले में सीबीआई के लिए रोड़ा नहीं बनेगा,हालांकि उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17 ए के तहत अनुमोदन प्राप्त करना होगा। गुरुवार को राफेल खरीद में लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए दायर पुनर्विचार याचिका पर आए मुख्य फैसले से अलग अपने फैसले में ज‌स्ट‌िस केएम जोसेफ ने ये टिप्‍पणी की है।

ज‌स्ट‌िस जोसेफ ने ये भी कहा कि पुनर्विचार याचिका में याचिकाकर्ताओं- एडवोकेट प्रशांत भूषण, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा-ने अन्य प्रकार से उन ‌श‌िकायतों के ‌खिलाफ कार्रवाई के लिए केस बना दिया है, हालांकि कोर्ट ऐसा कोई आदेश नहीं दे सकती।

जस्टिस जोसेफ ने ऐसा करने के दो कारण बताएः

1. ललितकुमारी मामले में दिए आदेश के अनुसार, भ्रष्टाचार के मामले में प्रारंभिक जांच के बाद ही एफआईआर दर्ज की जा सकती है। हालांकि याचिकाकार्ताओं ने प्रारंभिक जांच किए जाने से राहत की मांग नहीं की है। (पैरा 85, 86)

2.भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17 ए के मुताबिक जांच के लिए पूर्व अनुमोदन भी आवश्यक होता है। याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में प्रारंभिक जांच से राहत की मांग भी नहीं की, जैसा की 17 ए में आवश्यक है। (पैरा 85,86)

इस बात पर जस्टिस केएम जोसेफ ने आश्चर्य भी जताया कि अगर कोर्ट एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे भी देती है तो धारा 17 ए को ध्यान में रखते हुए ये एक व्यर्थ की कार्रवाई होगी।

"याचिकाकर्ताओं की शिकायत पर कार्यवाई करते हुए कि एफआईआर भी दर्ज की जानी चाहिए, जो संज्ञेय अपराधों का खुलासा करने के लिए आवश्यक है और न्यायालय को इतना प्रत्यक्ष भी होना चाहिए। हालांकि क्या यह धारा 17 ए को देखते हुए एक व्यर्थ कवायद नहीं होगी। इसलिए मेरा मानना है कि याचिकाकर्ताओं ने 2018 की रिट पेटिशन (क्रिमिनल) नं 298 में भले ही ललिता कुमारी (सुप्रा) के मुकदमे में तय किए गए कानून को लेकर अपना केसा बनाया है, फिर भी यहां भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17 ए ज्यादा महत्वपूर्ण है, जो इस पुनर्विचार याचिका में याचिकाकर्ताओं को सफल नहीं होने देगी।"

हालांकि जस्टिस जोसेफ ने कहा कि ये फैसला सीबीआई को कानून के मुताबिक कार्रवाई करने से रोकेगा भी नहीं।

"हालांकि मेरे विचार से, जिस फैसले की समीक्षा के लिए 2018 की रिट पेटिशन (क्रिमिनल) नंबर 298 डाली गई है वो फैसला पहले प्रतिवादी को भ्रष्टाचार के शिकायत के मामले में कानून के मुताबिक कर्रावाई करने से रोकेगा नहीं, हांलाक‌ि ये पहले प्रतिवादी के लिए भ्रष्टाचार ‌निवारण अधिनियम की धारा 17 ए के तहत पूर्व अनुमोदन प्राप्त करने का विषय है।"

इन ‌टिप्‍पणियों के तहत ही जस्टिस जोसेफ, जस्टिस एसके कौल (स्वयं और सीजेआई रंजन गोगोई) द्वारा लिखे फैसलों से सहमत थे।

सीबीआई के समक्ष दर्ज श‌िकायत में याचिकाकर्ताओं ने निवेदन किया था कि जांच एजेंसी कम से कम सेक्‍शन 17 ए के तहत पहला कदम उठाए। हालांकि तथ्य ये है कि जस्टिस जोसेफ द्वारा निस्तारित की गई याचिका में ऐसा निर्देश देने को नहीं कहा गया था।

उन्होंने ये भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने सेक्‍शन 17 ए को चुनौती भी नहीं दी थी। फैसले के मुताबिक, सेक्‍शन 17ए की बाधा के कारण राफेल डील पर लगे आरोपों के एवज में प्रारं‌भिक जांच की न्यूनतम राहत भी नहीं दी जा सकती। क्योंकि सेक्‍शन 17 ए सरकार के अनुमोदन के बिना किसी भी सरकारी कर्मचारी से जांच, पूछताछ या अन्वेषण की इजाजत नहीं देता।

याचिकाकर्ता ने भारत सरकार पर फ्रांसीसी कंपनी देसॉ एवियेशन ने 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद में दाम तय करने के मामले में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था, साथ ही भारतीय ऑफसेट पार्टनर के रूप में अन‌िल अंबानी की कंपनी रिलायंस एयरोस्ट्रक्चर के चुनाव में भी धांधली का आरोप लगाया था।

बीते साल 14 दिसंबर को आए फैसले में सरकार की निर्णय प्रक्रिया को सही बताया गया था और दाम समेत ऑफसेट पार्टनर तय करने जैसे फैसलों की किसी भी तरह के भ्रष्टाचार से इनकार किया गया था। याचिकाकर्ताओं ने पुनर्विचार याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अपने फैसले की समीक्षा करने का निवेदन ये कहते हुए किया था‌ कि वे केवल ललिताकुमार फैसले के मुताबिक राफेल मामले में एफआईआर चाहते थे,जबकि कोर्ट ने डील की मेरिट का परीक्षण करने लगी।

हालांकि याचिकाकर्ताओं की दलीलों ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गोगोई और जस्टिस कौल को प्रभावित नहीं किया, उन्होंने अपने फैसले मे कहा कि याचिककर्ता आर्टिकल 32 के तहत आवेदन करने के बाद ये दावा नहीं कर सकते कि वे एक अलग निर्णय प्रक्रिया चाहते थे। जस्टिस कौल ने कहा कि याचिकाकर्ताओं का तर्क 'निष्पक्ष' नहीं था क्योंकि सभी पक्षों द्वारा 'निर्णय लेने की प्रक्रिया', 'मूल्य निर्धारण' और 'ऑफसेट पार्टनर' के पहलुओं पर विस्तृत तर्क दिए गए थे।

न्यायमूर्ति जोसेफ ने इसके साथ ही एक अप्रिय टिप्पणी करते हुए कहाः

"अगर अदालत ने इसे छूने के लिए भी नहीं चुना तो यह पार्टी की गलती नहीं है।"

‌‌‌श‌िकायतकर्ता की मेरिट जैसी भी हो, लेकिन अगर वो वो उस आधार की परवाज नहीं करता, जो इस न्यायालय की एक संविधान पीठ द्वारा निर्धारित सिद्धांतों पर आधारित है और इसकी समीक्षा में शिकायत की जाती है तो यह उस उद्देश्य, जिसके लिए काम किया जा रहा है, के समीक्षा क्षेत्र‌ाधिकार को नुकसान पहुंचाएगा। (पैरा 58) "

उन्होंने कहा कि 14 दिसंबर का फैसला ललिताकुमारी के आदेश के साथ मेल नहीं खाता।

"यदि समीक्षा याचिका, दूसरे शब्दों में, खारिज कर दी जाती है तो यह न्यायालय अपने फैसले को बरकरार रखेगा, जिसे ललिता कुमारी (सुप्रा) के मामले में संविधान पीठ के फैसले के बरअक्स रखा जाएगा तो दोनों निर्णयों में बिलकुल समानता नहीं होगी।"

यदि कोर्ट को यह सुझाव देना होगा कि इस आधार पर कि कोर्ट ने आर्टिकल 32 के तहत इस डील को मंजूरी दी है, इसलिए कोई एफआईआर दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है तो ये अदालत ललिताकुमारी के आदेश पर दिखावा करेगी।

अपने फैसले में जस्टिस जोसेफ ने कहा किः

"यदि याचिकाकर्ता की शिकायत संज्ञेय अपराध जैसे कृत्य की श्रेणी में आता और एफआईआर दर्ज की जानी होती और मामले की जांच की जाती है, तो यह सुझाव देने कोई दिक्‍कत नहीं होगी कि इस अदालत ने अनुच्छेद 32 के तहत न्यायिक समीक्षा की कार्यवाही को मंजूरी दी है और यह स्पष्ट करना कि संपूर्ण कार्रवाई को सीमित न्यायिक समीक्षा के चश्मे से देखा जाना चाहिए, जिन्हें ऐसे कार्यवाहियों में कोर्ट अपनाती है और यह अदालत ललिता कुमारी मामले में संविधान पीठ द्वारा निर्धारित कानून से कम का दिखावा करती।"

जस्टिस जोसेफ ने आगे कहा कि मुख्य फैसले के निष्कर्ष अनुच्छेद 32 के तहत न्यायिक समीक्षा के सीमित दायरे में थे। न्यायालय ने तकनीकी व्यवहार्यता के मुद्दों में प्रवेश करने से खुद को दूर रखा। फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया था कि व्यक्त किए गए विचार अनुच्छेद 32 के तहत तय अधिकार क्षेत्र के दृष्टिकोण से ‌‌दिए गए थे। अनुच्छेद 32 के तहत न्यायिक समीक्षा का कार्य एक जांच अधिकारी द्वारा किए गए तथ्यान्वेषण से अलग है।

"यह कहना एक बात है कि न्यायालय के पास उपलब्ध सीमित न्यायिक समीक्षा के साथ उसे याचिकाकर्ताओं के केस में मेरिट नहीं दिखी, जिसमें डीपीपी का पालन करने में विफलता, अधिक मूल्य निर्धारण ‌होना, एक पार्टी को फेवर करने के लिए ऑफसेट दिशानिर्देशों का उल्लंघन जैसे आरोप शामिल थे और ये कोर्ट द्वारा तय कानूनों के आधार पर कार्रवाई करने का आदेश देना दूसरी बात है। " (पैरा 67)

"एक जांच अधिकारी द्वारा तथ्यों की खोज, न्यायिक समीक्षा में तथ्यों की खोज से पूरी तरह से अलग होती है। पूरी कार्यवाही एक दूसरे से बिलकुल अलग होती है।" जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा।

इस पृष्ठभूमि में, जस्टिस जोसेफ ललिताकुमारी मामले के आदेश की उपयोगिता की जांच के लिए आगे बढ़े और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिका की प्रकृति को देखते उन्हें हुए राहत नहीं दी जा सकती है।

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