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जानिए कानून के एक जैसे शब्द और उनके अलग अलग अर्थ

Shadab Salim
13 Dec 2019 2:30 AM GMT
जानिए कानून के एक जैसे शब्द और उनके अलग अलग अर्थ
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भारतीय विधि व्यवस्था में आम लोगों के सामने ऐसे बहुत से शब्द आते हैं, जो दो शब्द एक जैसे अर्थो के प्रतीत होते हैं, परंतु उन शब्दों के अर्थ बहुत भिन्न भिन्न होते हैं। कानूनी प्रक्रिया से दूर रहने वाले लोग या फिर ऐसे लोग जिनका न्यायालय इत्यादि से कोई काम नहीं रहा वह इन शब्दों से भ्रमित होते हैं। बहुत से लोग तो सारा जीवन उन शब्दों को पढ़ते, देखते और उपयोग करते रहते हैं, उसके पश्चात भी उन शब्दों के संबंध में उचित जानकारी नहीं रख पाते हैं।

ये शब्द भ्रमित करने वाले होते हैं। आप जानकारी के अभाव में यह तय ही नहीं कर पाते कि इस व्यंजन के लिए यह शब्द होगा या फिर वह शब्द होगा, दो शब्दों के बीच भ्रम जैसा तत्व जन्म ले लेता है।

कभी कभी बात भी शब्दों के बीच रह जाती है। सही अर्थ वाली बात हो ही नहीं पाती और उसके स्थान पर गलत अर्थ के शब्द को उपयोग में कर लिया जाता है। विधि के ज्ञान में विधि के शब्दों की उचित जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। शब्दों का ठीक ज्ञान होना चाहिए। आम व्यक्ति से लेकर विधि व्यवसायी को भी शब्दों के ठीक अर्थों और टर्मिनोलॉजी की आवश्यकता होती है।

इस लेख में ऐसे कुछ शब्दों पर चर्चा की जा रही है।

बिल और अधिनियम-

आधुनिक समय में राज्य द्वारा अपने राज्य के भीतर राज्य के संचालन और राज्य के नागरिक तथा गैर नागरिकों के लिए आदेशों को विधि कहा जाता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 में विधि को परिभाषित किया गया है, जिसमे अध्यादेश, आदेश, उपविधि, नियम, विनियम, अधिसूचना, रूढ़ि या प्रथा विधि माना गया है।

अधिनियम इस ही विधि का एक हिस्सा है। अधिनियम एक सहिंताबद्ध विधि है, जिसमें किसी विशेष विषय पर राज्य का व्यवस्थित विधान होता है। अधिनियम संसद की बनायी सबसे शक्तिशाली विधि होती है।अधिनियम को अध्ययन, धाराओं और उपधाराओं के अंतर्गत सुविधाओं के हिसाब से बांटा जा सकता है। वैसे अधिनियम में धाराएं और उपधारा आवश्यक रूप से होती ही हैं।

बिल संसदीय विधि का शैशव काल है। कोई अधिनियम बिल होने के बाद ही अधिनियम का रूप लेता है। एक तरह से बिल जब बहुमत प्राप्त कर जाता है तो वह अधिनियम हो जाता है। बगैर यथेष्ट बहुमत प्राप्त किए कोई बिल अधिनियम का रूप नहीं धारण करता है। यदि बिल बहुमत प्राप्त नहीं कर पाता है तो यह कहा जा सकता है कि अधिनियम अपने शैशव काम मे ही मर गया। बिल यथेष्ट सदनों और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से मोहर लगने पर ही अधिनियम होता है। बिल पर जैसे ही राष्ट्रपति अपनी मोहर लगाते हैं, वह अधिनियम होकर राज्य में विधि बनकर लागू हो जाता है। बिल को विधि नहीं कहा जा सकता, क्योंकि बिल आदेशात्मक रूप से राज्य में लागू नहीं होता है वह संसद में ही रहता है। बिल का विकसित रूप अधिनियम होता है।

धारा और अनुच्छेद-

हांलाकि जानकार लोग अनुच्छेद और धारा का अंतर बहुत अच्छी समझते हैं। आम लोगों के लिए धारा और अनुच्छेद बहुत ज्यादा भ्रमित करने वाले शब्द हैं। यह शब्द तो आम लोगों के साथ बहुत से नेतागणों को भी भ्रमित कर देते हैं। वह समझ ही नहीं पाते कि धारा किसे कहा जाए और अनुच्छेद किसे कहा जाए।

जैसे कि आपने कश्मीर के संबंध में सुना होगा कि धारा 370। पत्रकारों द्वारा भी 370 के साथ धारा शब्द उपयोग कर दिया जाता था, परन्तु यह धारा शब्द बिल्कुल नहीं है, यह अनुच्छेद 370 है।

धारा-

संसद द्वारा जो साधारण अधिनियम बनाए जाते हैं, उनमें विषयों को बांटने के लिए धारा शब्द उपयोग किया जाता है। धारा के साथ उपधारा भी रखी जाती है। धारा को अंग्रेजी भाषा में 'सेक्शन' कहा जाता है। धारा अधिनियम का महत्वपूर्ण भाग होती है। किसी भी अधिनियम में मुख्यतः धारा ही उपयोग में लाई जाती है, परन्तु कुछ अधिनियम में आदेश और नियम भी होते हैं।

अनुच्छेद-

किसी भी संविधान में अनुच्छेद होते हैं। कोई आधुनिक संविधान बगैर अनुच्छेद के शायद ही पूर्ण होता होगा। संविधान को पृथक पृथक भागों में बांटा जाता है तथा यह भाग अनुच्छेद में बंटे होते हैं, परन्तु भिन्न भिन्न भाग के लिए भिन्न भिन्न अनुच्छेद नहीं होते हैं। अनुच्छेद सीधे चलते हैं जैसे अनुच्छेद 1 से शुरु हुआ और अनुच्छेद 400 पर संविधान समाप्त हुआ।

जिला एवं सत्र न्यायालय-

भारत की अधिकांश जिलों की कोर्ट के बाहर जिला एवं सत्र न्यायालय लिखा होता है। इस कोर्ट को जिला कोर्ट के नाम से जाना जाता है। ये दोनों कोर्ट एक नहीं हैं, इनके अर्थ अलग अलग हैं, परन्तु व्यक्ति एक ही है। सामान्यतः हम इन दोनों कोर्ट को एक ही कोर्ट मान कर चलते हैं।

जिला न्यायालय-

जब किसी सिविल मामले को सुना जाता है तो सुनने वाला न्यायालय जिला न्यायालय कहलाता है, अर्थात जिले का सबसे बड़ा न्यायालय जो किसी भी सिविल मामले में सुनवाई करेगा।

सत्र न्यायालय-

जब किसी आपराधिक मामले की सुनवाई की जाती है तो न्यायालय को सत्र न्यायालय कहा जाता है अर्थात जिले का सबसे बड़ा आपराधिक मामलों को सुनने वाला न्यायालय। जैसे यदि किसी आरोपी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के अंतर्गत अभियोजन चलेगा तो उसकी सुनवाई सत्र न्यायालय में हो होगी, क्योंकि मृत्यु दंड और आजीवन कारावास देने की अधिकारिकता केवल सत्र न्यायाधीश को होती है।

सिविल जज और मजिस्ट्रेट और कार्यपालक मजिस्ट्रेट-

सिविल जज और मजिस्ट्रेट एक ही व्यक्ति है। यह मामलों के नेचर से पता किया जाता है कि वह मामला सिविल है या आपराधिक।

जब किसी सिविल मामले को किसी न्यायाधीश द्वारा सुना जाता है तो उसे सिविल जज कहा जाता है। यह सिविल जज फर्स्ट और सेकंड क्लास होते हैं। मामलों को सुनने की अधिकारिकता और और कोई आदेश सुनाने के अधिकार के आधार पर क्लास तय की जाती है। किसी भी जिला न्यायाधीश से नीचे सिविल मामलों को सुनने वाला न्यायाधीश सिविल जज कहा जाता है।

मजिस्ट्रेट-

जब यही न्यायाधीश किसी आपराधिक मामले को सुनता है तो वह मजिस्ट्रेट कहलाता है। मजिस्ट्रेट और सिविल जज का निर्धारण मामले की प्रकृति के आधार पर होता है।

कार्यपालक मजिस्ट्रेट-यह कार्यपालिका का एक अंग है पर इसे सेमी ज्यूडिशियल पोस्ट भी मानी गई है, क्योंकि यह कुछ न्यायिक अधिकार और कर्तव्य भी रखता है।

ज़मानती और दोषमुक्त-

बहुत से मामलों में ज़मानती आरोपी को दोषमुक्त समझ लिया जाता है। ज़मानती और दोषमुक्त में अंतर होता है और अंतर बहुत बड़ा अंतर है।

भारत की आपराधिक वैधानिक व्यवस्था उदारतापूर्वक है। यहां किसी भी आरोपी को ज़मानत पर छोड़े जाने के नियम रखे गए हैं। ज़मानती और गैर-ज़मानती अपराधों का वर्गीकरण किया गया है।

ज़मानती-

ज़मानती का अर्थ होता है ऐसा व्यक्ति जिस पर कोई अभियोजन चल है और न्यायलयों द्वारा उस व्यक्ति को जमानत या मुचलके पर छोड़ा गया है तथा उसके दोषसिद्ध होने पर उसे पुनः हिरासत में ले लिया जाएगा।

दोषमुक्ति-

दोषमुक्ति का अर्थ है आरोपी को विचारण में सभी तरह के आरोपो से दोषमुक्त कर दिया गया तथा आरोपी अब दोषमुक्त है, जितने आरोप उस पर लगाये थे वह कोई भी सिद्ध नहीं हुए।

आरोपी और दोषसिद्ध-

आरोपी और दोषसिद्ध में भी अंतर है।आरोपी वह व्यक्ति है, जिस पर राज्य द्वारा किसी अपराध में अभियोजन चलाया जा रहा है। हमारे यहां किसी भी व्यक्ति पर आरोप तय होना तो दूर की बात है एफआईआर दर्ज होते ही उसे दोषसिद्ध घोषित कर दिया जाता है, जबकि भारत में आरोपी को दोषसिद्ध व्यक्ति बनाने तक एक लंबी प्रक्रिया है। अधिकांश भारतीय विचारण जैसी किसी चीज़ को समझते ही नहीं।

दोषसिद्ध-

दोषसिद्ध वह व्यक्ति है जिस पर आरोप लगने के बाद विचारण हो जाने के बाद किसी भी अदालत द्वारा दोषसिद्ध घोषित कर दिया गया है अर्थात आरोपी पर लगे सभी आरोप सिद्ध हो चुके हैं और वह अपराध करने वाला मान लिया गया है तथा उस अपराध के लिए उसे दंड सुना दिया गया है।

राज्य द्वारा आरोप लगाना बहुत सरल है। आरोप तय अदालत द्वारा किये जाते हैं। राज्य पुलिस या अन्य जांच एजेंसी द्वारा अपना अंतिम प्रतिवेदन अदालत के समक्ष पेश कर देता है। आरोप तय करना न्यायालय का काम है। आरोप लगते ही व्यक्ति को दोषसिद्ध नहीं मान लेना चाहिए।

संसद और सांसद-

लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधान निर्माण का कार्य संसद द्वारा किया जाता है। लोकसभा राज्यसभा और राष्ट्रपति से मिलकर भारतीय संसद बनती है। यह तीनों संसद के अंग है। इस संसद के दोनो सदनों के सदस्यों को सांसद कहा जाता है।जैसे लोकसभा सांसद और राज्यसभा सांसद।

नगर निगम और नगर पालिका-

यह दो शब्दों से भी आम आदमी को बहुत काम होता है। यह दो शब्द जीवन का अहम हिस्सा है। कहते समय इन दोनों शब्दों को एक जैसा समझ लिया जाता है, जबकि शब्द और उसके अर्थ दोनों में बहुत अंतर है।

वैसे तो अलग अलग प्रदेशों के द्वारा अपने अपने निकाय विधान बनाये जाते हैं, परन्तु फिर भी एक व्यवस्थित नियम है कि 20 हज़ार से ऊपर आबादी के कस्बो में और दो लाख से कम आबादी के शहरों में नगर पालिका बनायी जाती है।

दो लाख से ऊपर आबादी के शहरों में नगर निगम बनाई जाती है। नगर निगम और पालिका के नियम अलग अलग है तथा अधिकार कर्तव्य भी अलग अलग अधिरोपित किये गए हैं।

शमनीय और गैर शमनीय-

अपराध दो तरह के हैं। पहला शमनीय और दूसरा गैर शमनीय। जिन अपराधों को दंड प्रक्रिया सहिंता के अंर्तगत समझौते के लिए बताया गया अर्थात जिन में समझौता किया जा सकता है वह अपराध शमनीय है। जिन अपराधों में समझौता नहीं किया जा सकता अर्थात जिनमे न्यायालय द्वारा या तो दोषमुक्त किया जाएगा या दोषसिद्ध किया जाएगा, परन्तु अपराध का शमन नहीं होगा।

जैसे भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत धारा 302 और 376 इत्यादि के अपराध बहुत से मामलों में लोग हत्या जैसे अपराध को भी शमनीय समझ लेते

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