MMDR Act के तहत रॉयल्टी में बढ़ोतरी कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों से ऊपर: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

5 Jun 2026 11:00 AM IST

  • MMDR Act के तहत रॉयल्टी में बढ़ोतरी कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों से ऊपर: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (4 जून) को कहा कि माइन्स एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट, 1957 (MMDR Act) के तहत खनिजों पर रॉयल्टी का भुगतान उसी दर पर किया जाना चाहिए, जो खदान से उनके असल डिस्पैच या हटाने की तारीख पर लागू हो, चाहे पार्टियों के बीच हुए कॉन्ट्रैक्ट में कोई भी दर तय की गई हो।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा,

    "...भुगतान खनिजों की आवाजाही (मूवमेंट) की तारीख पर किया जाना है। अगर आवाजाही की तारीख रॉयल्टी में बढ़ोतरी के बाद की तो कानूनी बदलाव से पहले किए गए कॉन्ट्रैक्ट से इसके असर को सीमित नहीं किया जा सकता।"

    कोर्ट ने कहा कि अगर खदान के स्टॉकयार्ड से आयरन ओर (लौह अयस्क) की पूरी मात्रा हटाए जाने से पहले MMDR Act के तहत शेड्यूल में संशोधन के जरिए रॉयल्टी की दर बढ़ाई जाती है तो बढ़ी हुई दर लागू होगी, भले ही कॉन्ट्रैक्ट में कोई और दर तय की गई हो।

    मामले की पृष्ठभूमि

    यह विवाद कर्नाटक के बेल्लारी इलाके में माइनिंग ऑपरेशन बंद होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर बनी मॉनिटरिंग कमेटी द्वारा ई-ऑक्शन के जरिए आयरन ओर स्टॉक की बिक्री से शुरू हुआ।

    जून 2014 में हुए ऑक्शन में M/s BMM इस्पात लिमिटेड सफल बोलीदाता (बिडर) के तौर पर सामने आई, जब MMDR Act के दूसरे शेड्यूल के तहत आयरन ओर पर रॉयल्टी 10% थी। कंपनी ने ऑक्शन की कीमत के साथ-साथ उस समय लागू दर के हिसाब से कैलकुलेट की गई रॉयल्टी का भुगतान किया।

    हालांकि, स्टॉकयार्ड से आयरन ओर की पूरी मात्रा हटाए जाने से पहले केंद्र सरकार ने 1 सितंबर 2014 से दूसरे शेड्यूल में संशोधन किया और आयरन ओर पर रॉयल्टी 10% से बढ़ाकर 15% की।

    इसके बाद राज्य सरकार ने संशोधन के बाद हटाई गई मात्रा के लिए अतिरिक्त रॉयल्टी की मांग की और कंपनी की सिक्योरिटी डिपॉजिट से ₹2 करोड़ से ज़्यादा की रकम एडजस्ट की। कंपनी ने इस मांग को चुनौती दी और तर्क दिया कि उसकी देनदारी (लायबिलिटी) तभी तय हो गई थी जब बोली स्वीकार की गई और संशोधन से पहले भुगतान किया गया।

    कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले से असंतुष्ट होकर, जिसमें ज़्यादा रॉयल्टी के तौर पर एडजस्ट की गई रकम को रेस्पॉन्डेंट-असेसी (प्रतिवादी-करदाता) को वापस करने का निर्देश दिया गया, राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची।

    मामला

    कोर्ट के सामने यह सवाल था कि लागू होने वाली रॉयल्टी दर का निर्धारण नीलामी और भुगतान की तारीख के आधार पर किया जाना चाहिए या उस तारीख के आधार पर जब खनिज को असल में लीज़ वाले इलाके से निकाला गया।

    फैसला

    विवादित आदेश रद्द करते हुए जस्टिस करोल के फैसले में कहा गया कि MMDR Act की धारा 9 साफ तौर पर रॉयल्टी की देनदारी को खनिजों को निकालने या इस्तेमाल करने से जोड़ती है, न कि नीलामी या कॉन्ट्रैक्ट बनने की तारीख से।

    कोर्ट ने कहा कि चूंकि रेस्पोंडेंट द्वारा आयरन ओर (लौह अयस्क) निकालने से पहले ही रॉयल्टी की दर बढ़ा दी गई, इसलिए तय की गई रॉयल्टी दर की जगह कानून के तहत तय रॉयल्टी दर लागू होगी।

    कोर्ट ने असल में यह कहा कि अगर रेस्पोंडेंट ज़्यादा रॉयल्टी की देनदारी से बचना चाहता था तो वह दर बढ़ने से पहले आयरन ओर निकाल सकता था। ऐसा न करने पर उन्हें कॉन्ट्रैक्ट के तहत तय रॉयल्टी दर का फ़ायदा नहीं दिया जा सकता, क्योंकि MMDR Act के तहत बदली हुई रॉयल्टी दर ने उसे बदल दिया था।

    कोर्ट ने कहा,

    "दूसरे शब्दों में अपील करने वाले का रेस्पोंडेंट की सिक्योरिटी डिपॉज़िट से अतिरिक्त 5% रॉयल्टी काटना सही था। रेस्पोंडेंट के पास यह विकल्प था कि वह साइट से आयरन ओर को एक ही बार में या संशोधन से पहले किसी भी तारीख पर निकाल ले, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने ही या तो खनिज को धीरे-धीरे (टुकड़ों में) निकालने का तरीका अपनाया या फिर संशोधन की तारीख के बाद पूरी मात्रा निकाली। इसलिए वे बढ़ी हुई रॉयल्टी के भुगतान से बच नहीं सकते।"

    ऊपर बताई गई बातों के आधार पर अपील मंज़ूर की गई।

    Cause Title: THE DIRECTOR OF MINES AND GEOLOGY VERSUS M/s BMM ISPAT LTD & ANR.

    Next Story