S.138 NI Act | चेक बाउंस मामले में मिली सज़ा पक्षकारों के बीच समझौते के आधार पर रद्द की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

2 Jun 2026 3:37 PM IST

  • S.138 NI Act | चेक बाउंस मामले में मिली सज़ा पक्षकारों के बीच समझौते के आधार पर रद्द की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 147 (अपराधों का समझौता योग्य होना) के तहत अपराधों के कंपाउंडिंग (समझौते) की अनुमति दी, जब पार्टियों के बीच एक समझौता हो गया। इसके परिणामस्वरूप, कोर्ट ने NI Act की धारा 138 के तहत चेक बाउंस होने (खाते में पर्याप्त पैसे न होने के कारण) के अपराध के लिए दी गई सज़ा और दोषसिद्धि रद्द की।

    जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच ने यह आदेश दिया। उन्होंने अपने पहले के फैसले 'ज्ञान चंद गर्ग बनाम हरपाल सिंह (2025)' पर भरोसा किया, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि एक बार शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच समझौता हो जाने के बाद NI Act की धारा 138 के तहत दी गई सज़ा बरकरार नहीं रखी जा सकती।

    इस मामले में अपीलकर्ता (एक कंपनी का डायरेक्टर) को 2014 के एक फैसले में दोषी ठहराया गया। उसे एक साल की साधारण कैद की सज़ा सुनाई गई और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 357(3) के तहत मुआवजे के तौर पर 28,00,000 रुपये (चेक की राशि) का भुगतान करने का निर्देश दिया गया। इस फैसले को सेशंस कोर्ट ने और उसके बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया था।

    इसके बाद डायरेक्टर को सज़ा काटने के लिए हिरासत में ले लिया गया। लेकिन दो दिन के भीतर ही अपीलकर्ता द्वारा 30,00,000 रुपये का भुगतान करने पर दोनों पार्टियों के बीच समझौता हो गया। हालांकि, जब अपराध के कंपाउंडिंग (समझौते) के लिए एक अर्जी दायर की गई तो प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उसे खारिज कर दिया। बाद में हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि पहले दिए गए फैसले की समीक्षा नहीं की जा सकती।

    इस फैसले को रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा:

    "पार्टियों की ओर से पेश हुए वकीलों की दलीलें सुनने के बाद, और इस कोर्ट द्वारा 'ज्ञान चंद गर्ग बनाम हरपाल सिंह और अन्य' (2025 SCC OnLine SC 2317) मामले में तय किए गए कानून को ध्यान में रखते हुए हमें पार्टियों के बीच हुए समझौते को स्वीकार करने और अपराध का कंपाउंडिंग (समझौता) करने में कोई हिचकिचाहट नहीं है।"

    कोर्ट ने सेंट्रल जेल, रायपुर के जेल अधीक्षक को निर्देश दिया कि वे अपीलकर्ता को तुरंत रिहा करें और इस आदेश के पालन की सूचना सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को ईमेल के माध्यम से भेजें।

    Case : PARSHARVANATH WELD WIRES PVT LTD & ANR v. STATE OF CHHATTISGARH & ANR.

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