सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (27 जुलाई, 2026 से 31 जुलाई, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
S. 125 CrPC | पति शुरुआती में ही पत्नी का एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर साबित कर दे तो पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (31 जुलाई) को कहा कि CrPC की धारा 125 के तहत पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार किया जा सकता है, अगर पति शुरुआती स्तर पर ही पत्नी के एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर (व्यभिचार) को साबित कर देता है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा, "...हमारा मानना है कि अगर पति धारा 125(4) के तहत अर्ज़ी दाखिल करता है और पहली ही बार में सबूतों के ज़रिए आरोप को साबित कर देता है, तभी अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने पर रोक लगाई जा सकती है।"
Cause Title: HIMANSHU CHORDIA VERSUS STATE OF RAJASTHAN & ANR.
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CrPC की धारा 299 के तहत आदेश के बिना दर्ज गवाह की गवाही का इस्तेमाल बाद में फरार आरोपी के खिलाफ नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (31 जुलाई) को कहा कि आरोपी के खिलाफ मुकदमे में दर्ज सबूतों का इस्तेमाल बाद में किसी फरार आरोपी के खिलाफ तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक कि CrPC की धारा 299 / BNSS की धारा 335 के तहत कोई आदेश पारित न किया गया हो। इस आदेश में दो अधिकार-क्षेत्र संबंधी तथ्यों को स्थापित करना ज़रूरी है: पहला, आरोपी फरार था और दूसरा, उसे तुरंत गिरफ्तार करने की कोई संभावना नहीं थी।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने अपीलकर्ता की हत्या की सजा रद्द की। अपीलकर्ता 1999 में अपने सह-आरोपी के खिलाफ मुकदमे के दौरान फरार हो गया और बाद में उसे एक अलग मुकदमे में दोषी ठहराया गया। उसे एक ऐसे गवाह की गवाही के आधार पर दोषी ठहराया गया, जिसकी मृत्यु हो चुकी थी और जिसकी गवाही सह-आरोपी के खिलाफ पिछले मुकदमे में दर्ज की गई।
Cause Title: Mahendra Singh Versus The State of Chhattisgarh
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सड़कों पर आवारा पशु 'प्राकृतिक स्पीड ब्रेकर' नहीं, हादसों के पीड़ितों को मुआवजा दें राज्य: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में सड़कों और राजमार्गों पर घूम रहे आवारा मवेशियों से होने वाले हादसों पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि राज्य सरकारों को ऐसे मामलों में पीड़ितों को मुआवजा देने की व्यवस्था करनी चाहिए। अदालत ने केंद्र और राज्यों से मौजूदा कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने तथा आवारा पशुओं की समस्या के स्थायी समाधान के लिए व्यापक तंत्र विकसित करने का भी आग्रह किया।
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विवाहित बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति से बाहर नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति की नीति में केवल तलाकशुदा या परित्यक्ता बेटियों को पात्र मानकर अन्य विवाहित बेटियों को बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद 14 में प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बेटी और बेटे के बीच इस प्रकार का भेदभाव असंवैधानिक है।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने बिहार सरकार की 10 दिसंबर 2014 की नीति की संबंधित शर्त को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द किया।
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जेलों की निगरानी के लिए हर जिले में 'बोर्ड ऑफ विजिटर्स' गठित करें: सुप्रीम कोर्ट का राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे मॉडल प्रिजन मैनुअल, 2016 के अनुसार प्रत्येक जिले में 'बोर्ड ऑफ विजिटर्स' (BoV) का गठन करें, जिसकी अध्यक्षता संबंधित जिले के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश (Principal District Judge) करेंगे।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ जेलों में जाति, लिंग, दिव्यांगता आदि के आधार पर भेदभाव से जुड़े स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) मामले की सुनवाई कर रही थी, जो सुकन्या शांता फैसले के अनुपालन से संबंधित है।
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Indian Succession Act | पत्नी की मौत के बाद उसकी संपत्ति का मालिकाना हक किसे मिलता है? सुप्रीम कोर्ट ने ईसाई उत्तराधिकार कानून समझाया
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (30 जुलाई) को साफ़ किया कि ईसाई उत्तराधिकार कानून के तहत पति द्वारा अपनी पत्नी के नाम पर खरीदी गई संपत्ति पत्नी की ही संपत्ति मानी जाती है। इसलिए उसकी मौत के बाद ऐसी संपत्ति का उत्तराधिकार उसकी अपनी मिल्कियत के आधार पर तय किया जाना चाहिए। इसे इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 की धारा 33 लागू करने के मकसद से पति की संपत्ति नहीं माना जा सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई की। उस फैसले में मृतक पत्नी के नाम पर मौजूद संपत्ति को उसके पति की संपत्ति का हिस्सा माना गया और इंडियन सक्सेशन एक्ट की धारा 33 लागू की गई।
Cause Title: SHAKUNTALA & ORS. VERSUS ROBERT ANTHONY & ORS.
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बिना छूट के पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा संवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने दोषी की पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा को संवैधानिक माना। कोर्ट ने उन कई याचिकाओं को खारिज किया, जिनमें ऐसी सज़ाओं को असंवैधानिक और सज़ा में छूट के कानूनी नियमों के खिलाफ बताया गया।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने चार समूहों के दोषियों की याचिकाओं को खारिज किया। इनमें वे कैदी भी शामिल थे जिन्हें मौत की सज़ा मिली थी, लेकिन संवैधानिक अधिकारियों ने उसे बदलकर या अदालतों ने उसे बदलकर पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा में बदल दिया था।
Cause Title: RAMASREY @ FAKKAD VERSUS STATE OF UTTAR PRADESH (with connected matters)
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EWS आरक्षण के लिए 8 लाख रुपये की आय सीमा प्रथमदृष्टया उचित: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण के लिए निर्धारित 8 लाख रुपये की वार्षिक आय सीमा को प्रथमदृष्टया उचित बताया है। हालांकि, अदालत ने इस मानदंड की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम फैसला फिलहाल सुरक्षित रखते हुए सुनवाई एक सप्ताह के लिए स्थगित की।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की खंडपीठ 2021 में दायर उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की उस अधिसूचना को चुनौती दी गई, जिसके तहत मेडिकल पाठ्यक्रमों की अखिल भारतीय कोटा सीटों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत और EWS के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया।
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नए क्रिमिनल लॉ के तहत शुरुआती 15 दिनों के बाद भी पुलिस कस्टडी मिल सकती है: सुप्रीम कोर्ट ने BNSS की धारा 187(2) समझाई
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (27 जुलाई) को कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत पुलिस कस्टडी सिर्फ़ रिमांड के शुरुआती 15 दिनों तक सीमित नहीं है और इसे कानूनी समय-सीमा के भीतर अलग-अलग हिस्सों में भी मांगा जा सकता है। कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की उस शर्त को रद्द किया, जिसमें आरोपी की पुलिस कस्टडी को रिमांड के शुरुआती 15 दिनों से आगे बढ़ाने पर रोक लगाई गई।
Cause Title: THE STATE OF ANDHRA PRADESH VERSUS SUDA SURESH VEERA VENKATA NAGA RAJU
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Art. 311(2) | पक्की नौकरी वाले सरकारी कर्मचारी को बिना जांच के गैर-कानूनी नियुक्ति के आरोप पर नौकरी से नहीं निकाला जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जिस सरकारी कर्मचारी की नौकरी पक्की (कन्फर्म) हो चुकी है, उसे सिर्फ़ इसलिए नौकरी से नहीं निकाला जा सकता कि उसकी नियुक्ति में कथित तौर पर कोई गड़बड़ी थी। कोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच किए बिना नौकरी से निकालना संविधान के अनुच्छेद 311(2) का उल्लंघन होगा।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा, "नौकरी पक्की होना कोई मामूली प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी को एक ठोस दर्जा देता है, जिससे उसे नौकरी की बेहतर सुरक्षा और सिविल सेवक को मिलने वाले संवैधानिक सुरक्षा उपाय मिलते हैं। एक बार जब अपील करने वाले कर्मचारी पक्के कर्मचारी का दर्जा पा लेते हैं तो उनकी नियुक्ति की वैधता से जुड़े आरोपों के आधार पर सिर्फ़ प्रशासनिक आदेश से उनकी सेवा समाप्त नहीं की जा सकती थी। क्या नियुक्ति में कोई गड़बड़ी थी, क्या इसमें अपील करने वालों की कोई भूमिका थी और क्या ऐसी गड़बड़ी के लिए नौकरी से निकालना सही था - ये सभी मामले अनुच्छेद 311(2) में बताई गई प्रक्रिया के अनुसार तय किए जाने चाहिए।"
Cause Title: DEBASHISH MOHAPATRA & ORS. VS. DISTRICT AND SESSION JUDGE, JAGATSINGHPUR & ORS.