सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (20 जुलाई, 2026 से 24 जुलाई, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
MHADA री-डेवलप की जा रही बिल्डिंग में रहने वालों के पुनर्वास के लिए डेवलपर के वादे को लागू करवा सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (MHADA) के पास यह अधिकार है कि वह री-डेवलपमेंट के दौर से गुज़र रही 'सेस्ड' बिल्डिंग (जिन पर सेस या टैक्स लगता है) में रहने वालों को स्थायी वैकल्पिक आवास देने की डेवलपर की ज़िम्मेदारी को लागू करवाए। कोर्ट ने मुंबई के एक डेवलपर को निर्देश दिया कि वह 'स्थायी वैकल्पिक आवास समझौता' (PAAA) करे और दो महीने के भीतर एक निवासी के कानूनी उत्तराधिकारियों को तीन फ्लैटों का कब्ज़ा सौंपे।
Cause Title: Mrs. Mahabanoo Contractor and Anr. Versus M/s. Kalikund Developers and Ors.
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अटेंडेंस कम होने की वजह से लॉ स्टूडेंट्स को चल रहे एकेडमिक सेशन की परीक्षाओं से नहीं रोका जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने एक बार के लिए राहत दी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन लॉ स्टूडेंट्स का एकेडमिक सेशन उस समय चल रहा था, जब दिल्ली हाईकोर्ट ने 3 नवंबर, 2025 को अटेंडेंस के नियमों में ढील देने वाला फैसला सुनाया था (जिस पर बाद में रोक लगा दी गई थी), उन्हें अटेंडेंस कम होने के आधार पर उस एकेडमिक सेशन की फाइनल परीक्षाओं में बैठने से नहीं रोका जा सकता।
कोर्ट ने निर्देश दिया, "हम यह निर्देश देते हैं और व्यवस्था करते हैं कि जिन स्टूडेंट्स का एकेडमिक सेशन उस समय चल रहा था, जब दिल्ली हाईकोर्ट ने 3 नवंबर, 2025 को फैसला सुनाया था, उन्हें उस एकेडमिक सेशन की फाइनल परीक्षाओं में बैठने से रोका या वंचित नहीं किया जाएगा।"
Case Title – Prakruthi Jain v. Bar Council of India & Ors. and connected matters
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पार्टियों के बीच हुए और लागू हो चुके समझौते को बदलने के लिए आर्टिकल 142 का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपनी खास शक्तियों (Inherent Jurisdiction) का इस्तेमाल पार्टियों के बीच आपसी सहमति से हुए समझौतों की शर्तों को बदलने या उनमें संशोधन करने के लिए नहीं किया जा सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने एक पत्नी की याचिका खारिज की। पत्नी ने अपने और अपने पति के बीच हुए तलाक के समझौते को फिर से तय करने के लिए संविधान के आर्टिकल 142 का इस्तेमाल करने की मांग की। कोर्ट ने अपील करने वाली पत्नी की उस मांग को मानने से इनकार किया, जिसमें उसने बेटे की उच्च शिक्षा के लिए एक बार के उपाय के तौर पर लगभग 6 करोड़ से 6.50 करोड़ रुपये का अतिरिक्त फंड बनाने की बात कही थी।
Cause Title: VIJAYALAKSHMI R. VERSUS C. L. BALAJI
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NDPS Act की धारा 50 सिर्फ़ व्यक्ति की तलाशी पर लागू होती है, न कि तब जब आरोपी के पास मौजूद सामान से कोई चीज़ बरामद हो: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (21 जुलाई) को कहा कि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 (NDPS Act) की धारा 50 के तहत मिलने वाली सुरक्षा - यानी किसी गजेटेड ऑफिसर या मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में तलाशी - सिर्फ़ आरोपी की व्यक्तिगत तलाशी के दौरान ही मिलेगी। यह सुरक्षा तब लागू नहीं होती जब आरोपी के पास कोई बैग, कंटेनर या कोई अन्य चीज़ हो।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने एक व्यक्ति की सज़ा बरकरार रखते हुए कहा, "धारा 50 के तहत सुरक्षा उन मामलों तक ही सीमित है, जहां आरोपी की व्यक्तिगत तलाशी के ज़रिए कोई चीज़ बरामद की जानी हो। यह उन मामलों में लागू नहीं होती, जहां किसी चीज़ - जैसे बैग, कंटेनर, सूटकेस या कोई अन्य वस्तु - की तलाशी ली जा रही हो, जिसे आरोपी ले जा रहा हो।"
Cause Title: MEHBOOB SHAH Versus STATE OF MADHYA PRADESH
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तथ्यों की दोबारा जांच के लिए Revisional Jurisdiction का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 115 के तहत Revisional Jurisdiction का इस्तेमाल केवल तथ्यों या कानून की सामान्य त्रुटियों को सुधारने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक कोई क्षेत्राधिकार संबंधी (Jurisdictional) त्रुटि न हो, हाईकोर्ट निचली अदालतों के तथ्यों संबंधी निष्कर्षों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने रेंट कंट्रोलर और अपीलीय प्राधिकरण (Appellate Authority) द्वारा पारित बेदखली (Eviction) के आदेशों को अपनी Revisional Jurisdiction का प्रयोग करते हुए पलट दिया था।
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JJ Act- हत्या 'गंभीर अपराध', न कि सिर्फ़ 'सीरियस ऑफ़ेंस'; IPC की धारा 302 का मतलब है कम-से-कम उम्रकैद की सज़ा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1)) के तहत सज़ा-योग्य हत्या का अपराध, किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (JJ Act) के तहत एक "जघन्य अपराध" (Heinous Offence) है। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि उम्रकैद इसकी कम से कम सज़ा मानी जाएगी, भले ही इस प्रावधान में स्पष्ट रूप से कम से कम सज़ा का ज़िक्र न हो।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की बेंच ने बिहार के एक हत्या के मामले में आरोपी किशोर की अपील खारिज की। उन्होंने पटना हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा, जिसमें कहा गया कि उस पर चिल्ड्रन कोर्ट में एक बालिग की तरह मुक़दमा चलाया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि, JJ Act की धारा 101(2) के तहत अपीलीय अदालत को मनोवैज्ञानिकों या cs[fkn विशेषज्ञों से मदद लेने का अधिकार है, लेकिन ऐसी मदद लेना अनिवार्य नहीं है, बल्कि यह अदालत की मर्ज़ी पर निर्भर करता है।
Case Title: X v. State of Bihar & Anr.
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न्यायिक नियुक्तियों के लिए वाइवा-वोस में न्यूनतम कट-ऑफ तय करना उचित: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में न्यायिक पद के उम्मीदवार की सिविल अपील खारिज की। उम्मीदवार ने राजस्थान न्यायिक सेवा नियम, 2010 के नियम 41 के एक प्रावधान को चुनौती दी थी, जबकि उसने बिना किसी आपत्ति के पूरी प्रक्रिया में भाग लिया था। इस प्रावधान में एडवोकेट कोटे से एडिशनल जिला जजों की नियुक्ति के लिए इंटरव्यू में कम-से-कम 25% अंक लाना ज़रूरी था, जिसे बाद में 2017 में राज्य सरकार ने स्पष्ट रूप से हटा दिया था।
Case Details: MANOJ GOYAL v. RAJASTHAN HIGH COURT & ORS|CIVIL APPEAL NO(s). 8142 OF 2018
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प्रक्रिया में देरी करके एम्प्लॉयर 'अनुकंपा नियुक्ति' का दावा खारिज नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई एम्प्लॉयर किसी कर्मचारी की मेडिकल आधार पर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (voluntary retirement) की अर्ज़ी को तब तक पेंडिंग नहीं रख सकता, जब तक कि कर्मचारी तय उम्र सीमा पार न कर ले, और फिर उस देरी का इस्तेमाल कर्मचारी के आश्रित को दया के आधार पर नियुक्ति देने से इनकार करने के लिए करे।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी व्याख्या से एम्प्लॉयर को "प्रोसेस में देरी करके पात्रता को कंट्रोल करने" और एक फायदेमंद स्कीम के मकसद को नाकाम करने की छूट मिल जाएगी।
Cause Title: RAHUL S/o. RAMNARAYAN MADANKAR & ANR. VERSUS THE NEW INDIA ASSURANCE COMPANY LIMITED & ORS.