शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना असंवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट ने पलटा इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

Amir Ahmad

2 Jun 2026 5:37 PM IST

  • शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना असंवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट ने पलटा इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

    देश की सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि केवल विवाह हो जाने के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति या उससे जुड़े लाभों से बाहर नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उन फैसलों को निरस्त कर दिया, जिनमें विवाहित बेटियों को परिवार की परिभाषा से बाहर मानते हुए अनुकंपा नियुक्ति का लाभ देने से इनकार किया गया था।

    जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि वैवाहिक स्थिति किसी पात्र बेटी को कल्याणकारी योजना से वंचित करने का आधार नहीं बन सकती।

    अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट के उन निर्णयों का समर्थन किया, जिनमें माना गया था कि शादीशुदा बेटी के साथ ऐसा भेदभाव संविधान के समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।

    मामला उत्तर प्रदेश की एक महिला से जुड़ा था, जिसने अपनी मां की मृत्यु के बाद उचित मूल्य की दुकान के लाइसेंस के लिए आवेदन किया था। महिला शादीशुदा थी लेकिन विवाह के बाद भी अपने परिवार के साथ उसी गांव में रहती थी। वह अपनी मां के साथ दुकान का संचालन करती थी और अपनी दिव्यांग बहन की देखभाल भी करती थी। मां के निधन के बाद उसने लाइसेंस अपने नाम कराने का आवेदन दिया लेकिन केवल इस आधार पर उसे खारिज कर दिया गया कि वह विवाहित बेटी है।

    विवाद की जड़ वर्ष 2019 का सरकारी आदेश था, जिसमें परिवार की परिभाषा से विवाहित बेटियों को बाहर रखा गया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट में इस विषय पर अलग-अलग फैसले आने के कारण प्रश्न सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भेजा गया था।

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि विवाहित पुत्र को परिवार का सदस्य मानकर लाभ दिया जा सकता है, तो केवल विवाह के आधार पर पुत्री को इससे वंचित करना न्यायसंगत नहीं है।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 में निहित समानता और भेदभाव निषेध के सिद्धांतों के विपरीत है।

    अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि अपीलकर्ता विवाह के बाद भी अपने परिवार के साथ रह रही थी, अपनी मां की दुकान चलाने में सहयोग कर रही थी और मां की मृत्यु के बाद अपनी बहनों, विशेषकर दिव्यांग बहन की जिम्मेदारी भी संभाल रही थी। ऐसे में केवल उसके विवाहित होने के आधार पर आवेदन खारिज करना संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है।

    अदालत ने कहा,

    "विवाहित बेटी होने के आधार पर उसका आवेदन अस्वीकार किया जाना संवैधानिक रूप से अवैध आधार है।"

    इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने महिला को लाइसेंस देने से इनकार करने वाले सभी आदेश रद्द किए और संबंधित अधिकारियों को चार सप्ताह के भीतर उसके पक्ष में वैध लाइसेंस जारी करने का निर्देश दिया।

    यह फैसला न केवल अनुकंपा नियुक्तियों से जुड़े मामलों में बल्कि महिलाओं के समान अधिकारों और पारिवारिक पहचान से संबंधित विवादों में भी एक महत्वपूर्ण नज़ीर माना जा रहा है।

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