हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Update: 2026-08-08 14:30 GMT
High Courts

देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (03 अगस्त, 2026 से 07 अगस्त, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

मीटर से छेड़छाड़ के सबूत के बिना सिर्फ़ बिजली का बिल न भरना 'बिजली की चोरी' नहीं: पटना हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट ने कहा कि बिजली का बिल न भरना, इलेक्ट्रिसिटी एक्ट, 2003 की धारा 135 के तहत बिजली की चोरी नहीं माना जाएगा, जब तक कि इस बात का कोई सबूत न हो कि कनेक्शन असल में काट दिया गया या उपभोक्ता ने मीटर से छेड़छाड़ की थी। जस्टिस जितेंद्र कुमार की सिंगल जज बेंच ने कहा कि भले ही उपभोक्ता बकाया बिजली बिल चुकाने के लिए ज़िम्मेदार हो सकता है, लेकिन बेईमानी से बिजली इस्तेमाल करने के सबूत के बिना उस पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

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कर्मचारी की मौत से नियमितीकरण का अधिकार खत्म नहीं होता, कानूनी वारिसों को मिलता है लाभ: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी कर्मचारी के जीवनकाल में उसके नियमितीकरण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, तो उसकी मृत्यु के साथ नियमितीकरण पर विचार करने का अधिकार समाप्त नहीं होता। ऐसा अधिकार उसके कानूनी वारिसों के माध्यम से जीवित रहता है और आवश्यक होने पर कर्मचारी को काल्पनिक रूप से उस तारीख से नियमित मानते हुए सेवा संबंधी लाभ उसके कानूनी वारिसों को दिए जा सकते हैं।

जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला ने यह फैसला मृत कर्मचारी के बेटे की याचिका पर सुनाया। अदालत ने याचिकाकर्ता के पक्ष में 50 हजार रुपये की लागत भी लगाई। याचिकाकर्ता अपने पिता की मृत्यु के समय नाबालिग था।

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राजस्थान हाईकोर्ट ने मौत की सज़ा वाले सभी पेंडिंग मामलों पर फ़ैसला सुनाया: 9 मामलों में सज़ा बदली, 2 में बरी किया

एक अहम घटनाक्रम में जोधपुर स्थित राजस्थान हाई कोर्ट ने मौत की सज़ा से जुड़े सभी पेंडिंग मामलों (रेफ़रेंस केस) पर अपना फ़ैसला सुनाया। पहला मामला 3 अक्टूबर, 2025 को तय किया गया था (स्टेट बनाम अर्जुन सिंह), जबकि बाकी 10 मामलों पर फ़ैसला इसी साल सुनाया गया। आखिरी फ़ैसला 6 अगस्त को जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा की डिवीज़न बेंच ने सुनाया। कुल मिलाकर डिवीज़न बेंच ने 7 अप्रैल से 6 अगस्त के बीच मौत की सज़ा से जुड़े 10 मामलों पर फ़ैसला सुनाया।

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ट्रायल शुरू होने के बाद कोर्ट की अनुमति के बिना पुलिस आगे की जांच नहीं कर सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि ट्रायल शुरू होने के बाद कोई भी पुलिस अधिकारी, चाहे उसका पद कितना भी ऊंचा क्यों न हो, अदालत की अनुमति के बिना किसी आपराधिक मामले में आगे की जांच (Further Investigation) का आदेश नहीं दे सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह सिद्धांत पहले धारा 173(8) CrPC के तहत स्थापित था और अब धारा 193(9) BNSS में इसे स्पष्ट रूप से शामिल कर दिया गया है।

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कानपुर नगर के जॉइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस द्वारा लंबित हत्या के मुकदमे में आगे की जांच के आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर (Without Jurisdiction) बताते हुए रद्द कर दिया।

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'महंत मंदिर की ज़मीन को अपने निजी नाम पर घोषित करने की मांग नहीं कर सकते': मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जनराई तोरिया मंदिर के महंत की उस अपील को खारिज करने वाला ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा, जिसमें उन्होंने मंदिर की ज़मीन पर मालिकाना हक अपने निजी नाम पर घोषित करने की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि महंत मंदिर की ज़मीन को अपने निजी नाम पर घोषित करने की मांग नहीं कर सकते। [2026 LiveLaw (MP) 316]

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PC Act | 2018 के संशोधन से पहले अगर पूर्व सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया तो पहले से मंज़ूरी लेने की ज़रूरत नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' (Prevention of Corruption Act) की धारा 19 में 2018 का संशोधन, जिसके तहत पूर्व सरकारी कर्मचारियों पर मुकदमा चलाने के लिए पहले से मंज़ूरी लेने की ज़रूरत को बढ़ाया गया, भविष्य के मामलों पर लागू होता है। यह उन मामलों को फिर से नहीं खोलता, जिनमें 26 जुलाई, 2018 से पहले ही मामला दर्ज (संज्ञान) किया जा चुका है।

जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच ने कहा कि यह संशोधन इस हद तक 'पिछली तारीख से लागू' (Retrospective) होता है कि इसका फायदा तब भी मिलेगा, जब अपराध इसके लागू होने से पहले किया गया हो।

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UP Police Rules | कर्मचारी का जवाब मांगे बिना जांच रिपोर्ट से सहमत होने से अनुशासनात्मक कार्यवाही अमान्य नहीं होती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अनुशासनात्मक अधिकारी का 'कारण बताओ नोटिस' (Show Cause Notice) में जांच अधिकारी के निष्कर्षों से सहमति जताना, बाद में दिए गए सजा के आदेश को अमान्य नहीं करता। कोर्ट ने माना कि ऐसी सहमति 'कारण बताओ नोटिस' जारी करने की एक पूर्व-शर्त है। कोर्ट ने देखा कि सजा के लिए जांच अधिकारी की सिफारिश का स्पष्ट रूप से 'यू.पी. पुलिस ऑफिसर्स ऑफ सबऑर्डिनेट रैंक्स (डिसिप्लिन एंड अपील) रूल्स, 1991' के नियम 14(1) के अपेंडिक्स I में प्रावधान है।

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रिटायरमेंट के बाद एकेडमिक सेशन के आखिर तक नौकरी जारी रखने का हक रिसर्च ड्यूटी पर तैनात टीचर को नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि रिटायरमेंट के बाद एकेडमिक सेशन के आखिर तक नौकरी जारी रखना एक रियायत है, न कि कोई कानूनी अधिकार। इसका दावा सिर्फ़ वही टीचर कर सकता है जो असल में रेगुलर टीचिंग (नियमित शिक्षण) में लगा हो। कोर्ट ने कहा कि एक एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर, जिन्हें रिसर्च स्टेशन का इंचार्ज बनाया गया था, वह सिर्फ़ इसलिए इस फ़ायदे का दावा नहीं कर सकते कि वे एक मुख्य टीचिंग पोस्ट पर बने रहे और उसके बदले सैलरी लेते रहे।

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2013 रेप केस में सीनियर जर्नालिस्ट तरुण तेजपाल को 10 साल की सजा, बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला

बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने गुरुवार (6 अगस्त) को पत्रकार तरुण तेजपाल को रेप केस में 10 साल की कठोर कैद की सज़ा सुनाई। यह मामला नवंबर 2013 में उनकी एक जूनियर सहयोगी ने दर्ज कराया था। यह सज़ा IPC की धारा 376(2)(f) (भरोसे या अधिकार वाले रिश्ते में किसी व्यक्ति द्वारा किया गया गंभीर रेप) और 376(2)(k) (पीड़िता पर नियंत्रण या दबदबे की स्थिति में किसी व्यक्ति द्वारा किया गया गंभीर रेप) के तहत सुनाई गई।

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फतवे के आधार पर मुस्लिम दंपति का तलाक घोषित नहीं किया जा सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी फतवे (Fatwa) के आधार पर मुस्लिम दंपति का तलाक घोषित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी मदरसा या सेमिनरी (Seminary) किसी मुस्लिम पुरुष को तलाक नहीं दे सकती। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने भोपाल की दारुल-दफ़ा मसाजिद कमेटी द्वारा जारी फतवे के आधार पर तलाक की घोषणा की मांग करने वाले पति के मुकदमे को खारिज कर दिया।

जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने कहा कि संबंधित फतवे में कहीं भी विवाह समाप्त होने या तलाक दिए जाने की घोषणा नहीं की गई है। फतवा केवल इस्लामी ग्रंथों के उन प्रावधानों का उल्लेख करता है, जो पत्नी द्वारा कथित क्रूरता की स्थिति में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। इसलिए केवल फतवे के आधार पर अदालत तलाक की घोषणा नहीं कर सकती।

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दूसरी शादी की शिकायत पर संज्ञान लेने के चरण में 'सप्तपदी' रस्म के सबूत की ज़रूरत नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 494 के तहत बिगैमी (दूसरी शादी) के अपराध के लिए आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि कथित दूसरी शादी की ज़रूरी रस्में, जिसमें 'सप्तपदी' भी शामिल है, पूरी की गई थीं या नहीं, यह ट्रायल का मामला है और "संज्ञान लेने के शुरुआती चरण में इस पर विचार नहीं किया जा सकता"।

सुप्रीम कोर्ट के 'के. नीलावेनी बनाम राज्य' मामले के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता-पति का यह तर्क कि 'सप्तपदी' रस्म के सबूत न होने के कारण IPC की धारा 494 के तहत कोई अपराध नहीं बनता, समनिंग (बुलाने) के चरण में स्वीकार करने लायक नहीं है।

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लोन की रकम 'सौंपी गई संपत्ति' नहीं; सिर्फ़ लोन न चुका पाना 'क्रिमिनल ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट' नहीं: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि लोन के तौर पर दी गई रकम को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 के तहत 'क्रिमिनल ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट' (भरोसा तोड़ने का अपराध) के मकसद से उधार लेने वाले को 'सौंपी गई संपत्ति' नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि लोन लेने वाला लोन की रकम का इस्तेमाल करने के लिए आज़ाद होता है, जबकि किसी को सौंपी गई संपत्ति पाने वाले व्यक्ति को मालिक के निर्देशों के अनुसार ही उसका इस्तेमाल करना होता है।

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बंद हो चुकी सोसाइटी की संपत्ति का उत्तराधिकारी कंपनी को ट्रांसफर वैध: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 की धारा 13 किसी सोसाइटी को खुद को बंद करने और अपनी संपत्ति को कंपनीज़ एक्ट, 1956 की धारा 25 के तहत बनी कंपनी को ट्रांसफर करने का प्रस्ताव पारित करने से नहीं रोकती है। कोर्ट ने कहा कि जब कम से कम तीन-पांचवें सदस्य बंद करने का प्रस्ताव पास कर लेते हैं तो सोसाइटी तुरंत बंद हो जाती है। ऐसी कंपनी द्वारा उसकी संपत्ति, देनदारियों और कामकाज को अपने हाथ में लेना कानूनी दायरे में आता है।

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ED की तलाशी और बैंक अकाउंट फ्रीज करने की कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा की गई तलाशी और संपत्ति या बैंक अकाउंट फ्रीज करने की कार्रवाई को संविधान के अनुच्छेद 226 तथा दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528) के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।

जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने गेमिंग कंपनी गेम्सक्राफ्ट टेक्नोलॉजीज की याचिका पर सुनवाई करते हुए ED की प्रारंभिक आपत्ति खारिज की। कंपनी ने 23 फरवरी को दर्ज ECIR के आधार पर अपने बैंक अकाउंट और निवेश को फ्रीज किए जाने की कार्रवाई को चुनौती दी थी।

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13 साल से अधिक जेल में रहने के बाद आसाराम को पहली पैरोल, राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा- राज्य की आशंकाएं महज कल्पना

राजस्थान हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराए जा चुके स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को 20 दिन की पहली पैरोल देने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि आसाराम की उम्र और 13 वर्ष से अधिक समय तक जेल में रहने के तथ्य को देखते हुए वह पहली पैरोल पाने के हकदार हैं।

एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने पैरोल आवेदन खारिज करने के लिए राज्य सरकार की ओर से दिए गए कारणों को खारिज करते हुए कहा कि वे भ्रामक हैं और बिना किसी आधार के महज कल्पना पर आधारित हैं।

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हमले में कृपाण का इस्तेमाल करने के आरोपी सिख व्यक्ति पर आर्म्स एक्ट के तहत आरोप सही: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि कृपाण का इस्तेमाल करके चोट पहुँचाने के आरोपी सिख व्यक्ति को आरोप तय करने के चरण में संविधान के आर्टिकल 25 के स्पष्टीकरण I (Explanation I) के तहत मिलने वाली संवैधानिक सुरक्षा का दावा करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने माना कि कृपाण को आस्था की ज़रूरी चीज़ के तौर पर रखा गया था या हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया, इसका फ़ैसला सिर्फ़ ट्रायल के दौरान ही हो सकता है। इस तरह कोर्ट ने उन आरोपियों के समूह के ख़िलाफ़ IPC की धारा 307 (हत्या की कोशिश) के तहत लगे आरोप को सही ठहराया, जिन्होंने कथित तौर पर बहस के बाद तलवारों से शिकायतकर्ता पर हमला किया था।

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आपराधिक मामला लंबित होने मात्र से चरित्र प्रमाण पत्र देने से इनकार नहीं किया जा सकता : इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होने मात्र के आधार पर चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने से इनकार नहीं किया जा सकता। जस्टिस प्रकाश पड़िया और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 323, 504 और 506 के तहत दर्ज मामले का लंबित होना अपने आप में चरित्र प्रमाण पत्र की मांग खारिज करने का आधार नहीं बन सकता।

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गेस्ट लेक्चरर नियमित कर्मचारियों के समान अतिरिक्त आकस्मिक अवकाश के हकदार नहीं : मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि गेस्ट लेक्चरर नियमित सरकारी कर्मचारियों के समान अतिरिक्त आकस्मिक अवकाश (कैजुअल लीव) का दावा नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि गेस्ट लेक्चरर अस्थायी या आकस्मिक आधार पर नियुक्त किए जाते हैं और उनके सेवा नियम नियमित कर्मचारियों से अलग होते हैं। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त द्वारा अतिथि व्याख्याताओं को 7 दिन का अतिरिक्त आकस्मिक अवकाश देने की मांग वाली याचिका खारिज करने का आदेश बरकरार रखा।

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5 साल तक सहमति से बने संबंधों को शादी न होने पर रेप नहीं कहा जा सकता: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने शादी का झूठा वादा कर दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी करते हुए कहा कि यदि दो वयस्क लंबे समय तक सहमति से रिश्ते में रहे हों, तो केवल शादी नहीं होने के आधार पर उसे रेप नहीं माना जा सकता।

जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकलपीठ ने आईपीसी की धारा 376 के तहत ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा रद्द कर आरोपी को बरी कर दिया। अभियोजन के अनुसार, पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा कर लगभग पांच वर्षों तक उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।

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मुसलमानों में बहुविवाह पर रोक लगाने वाला कोई कानून नहीं, बिहार पॉलिसी के तहत मृतक कर्मचारी की एक से ज़्यादा विधवाओं को फ़ैमिली पेंशन पाने का हक: हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट ने कहा कि मुसलमानों में बहुविवाह पर रोक लगाने वाले किसी कानून के न होने पर अगर किसी मुस्लिम विधवा की शादी मृतक सरकारी कर्मचारी के साथ मोहम्मडन पर्सनल लॉ के तहत वैध है, तो वह फ़ैमिली पेंशन पाने की हकदार है। कोर्ट ने यह भी कहा कि फ़ाइनेंस डिपार्टमेंट का 2011 का स्पष्टीकरण, जो मृतक मुस्लिम सरकारी कर्मचारियों की जीवित विधवाओं को फ़ैमिली पेंशन देने की बात करता है, अभी भी लागू है और अधिकारी इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।

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RPwD Act के तहत प्रोबेशनर भी 'कर्मचारी', सर्विस के दौरान विकलांगता होने पर नौकरी से नहीं निकाला जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि सर्विस के दौरान विकलांग होने वाले प्रोबेशनरी सरकारी कर्मचारी को 'दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016' (RPwD Act) की धारा 20 के तहत सुरक्षा पाने का अधिकार है, और उसे सिर्फ़ इसलिए नौकरी से नहीं निकाला जा सकता क्योंकि वह प्रोबेशन पर था।

जस्टिस रेखा बोराना की बेंच ने एक कॉन्स्टेबल को राहत दी, जिसकी सर्विस प्रोबेशन पीरियड के दौरान एक दुर्घटना में 100% विकलांगता होने के बाद खत्म कर दी गई। कोर्ट ने कहा कि रेगुलर भर्ती प्रक्रिया से नियुक्त कर्मचारी सिर्फ़ इसलिए "कर्मचारी" नहीं रह जाता क्योंकि उसे सर्विस में कन्फर्म नहीं किया गया।

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ट्रेड यूनियन 'राज्य' नहीं, प्रस्तावित हड़ताल रोकने के लिए नियोक्ता सीधे हाईकोर्ट नहीं जा सकता : कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी प्रस्तावित हड़ताल को रोकने के लिए नियोक्ता द्वारा ट्रेड यूनियन के खिलाफ सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर करना सामान्यतः स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ट्रेड यूनियन संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' की श्रेणी में नहीं आती और न ही वह कोई सार्वजनिक कर्तव्य निभाने वाली संस्था है।

जस्टिस अनंत रामनाथ हेगड़े की एकलपीठ ने बॉश ऑटोमोटिव इलेक्ट्रॉनिक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की याचिका खारिज करते हुए कहा कि यदि सुलह कार्यवाही के दौरान हड़ताल पर वैधानिक रोक का उल्लंघन होने का आरोप है, तो नियोक्ता को राहत के लिए औद्योगिक न्यायाधिकरण का रुख करना चाहिए।

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सेवा के दौरान दिव्यांग होने वाले कर्मचारियों को ही मिल सकता है अतिरिक्त पद का लाभ, आरक्षण से नियुक्त कर्मियों को नहीं: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 20(4) के तहत अतिरिक्त पद (सुपरन्यूमेरेरी पद) पर समायोजन का लाभ केवल उन कर्मचारियों को मिल सकता है, जो सेवा के दौरान दिव्यांग हुए हों। यह प्रावधान उन कर्मचारियों पर लागू नहीं होता, जिन्हें पहले से दिव्यांग होने के कारण आरक्षित श्रेणी में सरकारी नौकरी मिली है।

जस्टिस अजय मोहन गोयल ने कहा, "धारा 20(4) का सीधा अर्थ है कि यह प्रावधान तभी लागू होता है, जब कोई कर्मचारी सेवा के दौरान दिव्यांग हो जाए। वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता को दिव्यांग व्यक्ति होने के आधार पर ही सरकारी सेवा मिली थी, इसलिए इस धारा का लाभ उसे नहीं दिया जा सकता।"

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सिर्फ़ 'आखिरी बार साथ देखे जाने' के आधार पर हत्या की सज़ा नहीं दी जा सकती: इलाहाबादहाई कोर्ट ने 1996 के दोहरे हत्याकांड मामले में तीन लोगों को बरी किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते 1996 के दोहरे हत्याकांड मामले में तीन लोगों की सज़ा रद्द की। कोर्ट ने कहा कि परिस्थितिजन्य सबूतों (Circumstantial Evidence) पर आधारित मामले में, सिर्फ़ "आखिरी बार साथ देखे जाने" (Last Seen Together) के सिद्धांत या सबूत के आधार पर सज़ा को बरकरार नहीं रखा जा सकता, जब तक कि परिस्थितियों की कड़ी का हर हिस्सा बिना किसी शक के साबित न हो जाए।

कोर्ट ने पाया कि इस मामले में अभियोजन पक्ष (Prosecution) दोषी ठहराने वाली परिस्थितियों की पूरी कड़ी बनाने में नाकाम रहा और ट्रायल कोर्ट ने अविश्वसनीय "आखिरी बार साथ देखे जाने" के सबूत और कथित हत्या के हथियारों की संदिग्ध बरामदगी पर गलत तरीके से भरोसा किया।

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नोटरी वाले हलफ़नामे स्वीकार्य: रिट याचिका दायर करने से पहले फ़ोटो वेरिफिकेशन के लिए याचिकाकर्ताओं को यात्रा करने की ज़रूरत नहीं- इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि देश में कहीं भी विधिवत नोटरीकृत हलफ़नामा रिट याचिका दायर करने के चरण में स्वीकार किया जाता है, और रिट कार्यवाही शुरू करने से पहले फ़ोटो वेरिफिकेशन के लिए याचिकाकर्ताओं को इलाहाबाद या लखनऊ में हाई कोर्ट बेंच तक यात्रा करने की आवश्यकता नहीं है। जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की बेंच ने 'फ़ोटो हलफ़नामा पहचान व्यवस्था' (Photo Affidavit Identification Regime) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह स्पष्टीकरण दिया।

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