बार एसोसिएशन पर रिट अधिकार क्षेत्र लागू नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट का फ़ैसला सही ठहराया
Shahadat
1 Jun 2026 4:03 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फ़ैसले में दखल देने से इनकार किया, जिसमें कहा गया था कि बार एसोसिएशन संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत "राज्य" या राज्य की कोई संस्था नहीं है, क्योंकि यह वकीलों का एक निजी निकाय है जो सार्वजनिक कार्य नहीं करता।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने वकील संगीता राय द्वारा दायर SLP (विशेष अनुमति याचिका) को खारिज कर दिया, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी गई थी।
कोर्ट ने 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया और निर्देश दिया कि यह राशि पटियाला कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन को दी जाए। कोर्ट ने एक चैंबर पर कब्ज़े को लेकर हुए विवाद पर रिट याचिका दायर करने के लिए राय की आलोचना की।
जस्टिस नरसिम्हा ने टिप्पणी की,
"सिर्फ़ इसलिए कि आपको वकील होने का विशेषाधिकार मिला है, आपके हर काम को अधिकार के तौर पर नहीं देखा जाएगा। हम किसी अन्य मुवक्किल की याचिका पर भी विचार नहीं करते। वकीलों को दो कदम पीछे और दो कदम नीचे रहना चाहिए, इस अर्थ में कि आप वकील होने के विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए आपके कंधों पर एक बड़ी ज़िम्मेदारी है।"
यह मामला पटियाला हाउस कोर्ट परिसर में चैंबर नंबर 279A से जुड़े एक विवाद से उठा था। राय ने दावा किया कि वह 2013 से इस चैंबर का इस्तेमाल कर रही थीं, जिसे उन्होंने इसके मूल आबंटी, वकील असगर अली से किराए पर लिया था। उन्होंने आरोप लगाया कि अली और अन्य लोगों ने ज़बरदस्ती चैंबर में घुसकर उन्हें बेदखल किया और उनका सामान हटा दिया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि नई दिल्ली बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने चैंबर पर ताला लगा दिया, जिससे वह उन मामलों से जुड़ी फ़ाइलों तक नहीं पहुँच पा रही थीं, जिनकी वह पैरवी कर रही थीं।
राय ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और चैंबर का कब्ज़ा वापस दिलाने की मांग की। साथ ही उन्होंने नई दिल्ली बार एसोसिएशन और दिल्ली बार काउंसिल को उन वकीलों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का निर्देश देने की भी मांग की, जिन पर उन्होंने आपराधिक अतिचार (Criminal Trespass) का आरोप लगाया। बाद में उन्होंने कब्ज़े से जुड़ी अपनी मांग वापस ले ली और अपनी चुनौती को केवल उन वकीलों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग तक ही सीमित रखा।
दिल्ली हाईकोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि नई दिल्ली बार एसोसिएशन, जो 'सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860' के तहत पंजीकृत एक सोसायटी है, निजी वकीलों का एक निकाय है जिसे अपने सदस्यों के कल्याण के लिए बनाया गया और यह कोई सार्वजनिक कार्य नहीं करता है। इसलिए इसने यह निष्कर्ष निकाला कि यह एसोसिएशन न तो "राज्य" है और न ही अनुच्छेद 12 के तहत राज्य का कोई अंग है। इस पर मैंडमस रिट लागू नहीं होती। इससे नाराज़ होकर उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
सोमवार को सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि केरल हाईकोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह राय अपनाई थी कि मैंडमस रिट जारी की जा सकती है, जबकि दिल्ली हाईकोर्ट ने इस आधार पर आगे कार्रवाई की थी कि बार एसोसिएशन "राज्य" नहीं है।
हालांकि, जस्टिस नरसिम्हा ने याचिकाकर्ता से एक चैंबर पर कब्ज़े से जुड़े विवाद को लेकर रिट याचिका दायर करने पर सवाल उठाया। उन्होंने बार-बार पूछा कि कोई ऐसा व्यक्ति किस कानूनी अधिकार का दावा कर सकता है, जिसे केवल किसी दूसरे वकील को आवंटित चैंबर का इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई हो।
याचिकाकर्ता के वकील ने जवाब दिया कि याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट के समक्ष चैंबर का कब्ज़ा वापस पाने की अपनी गुहार पहले ही वापस ले ली थी। अब बचा हुआ मुद्दा केवल बार एसोसिएशन और बार काउंसिल ऑफ़ दिल्ली को उन वकीलों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश देने से संबंधित है, जिन पर आपराधिक अतिचार (Criminal Trespass) करने का आरोप है।
हालांकि, कोर्ट इससे सहमत नहीं हुआ।
जस्टिस अरविंद कुमार ने यह बात उठाई कि याचिकाकर्ता पहले ही आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई शुरू कर चुकी है। यह मामला वहां आगे बढ़ सकता है। आखिरकार, कोर्ट ने ₹25,000 के हर्जाने के साथ इस SLP को खारिज किया।
Case Title – Sangita Rai v. New Delhi Bar Association

