सुप्रीम कोर्ट
पैरा-टीचर्स का रेगुलराइज़ेशन का दावा राज्य द्वारा तय किए गए शैक्षिक मानकों के अधीन: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट पर रखे गए टीचर सिर्फ़ अपनी लंबी सेवा के आधार पर किसी न्यायिक आदेश के ज़रिए रेगुलराइज़ेशन का दावा अपने अधिकार के तौर पर नहीं कर सकते; क्योंकि इससे वैधानिक नियमों के बाहर सार्वजनिक भर्ती का एक समानांतर तरीका बन जाता है।जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस SVN भट्टी की बेंच ने कहा कि जहां एक तरफ़ एड-हॉक टीचर का सरकारी टीचर बनने की "इच्छा" रखना उचित है, वहीं दूसरी तरफ़ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए उम्मीदवारों की "उपयुक्तता" का आकलन करना भी राज्य का कर्तव्य...
संजय कपूर की संपत्ति विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ को मध्यस्थ नियुक्त किया
सुप्रीम कोर्ट के सुझाव के बाद दिवंगत उद्योगपति संजय कपूर की मां रानी कपूर और पत्नी प्रिया कपूर ने रानी कपूर फैमिली एस्टेट विवाद को मध्यस्थता (Mediation) के जरिए सुलझाने पर सहमति जताई है। इस पारिवारिक विवाद में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ मध्यस्थ की भूमिका निभाएंगे।जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने दोनों पक्षों की सहमति के बाद मामले को मध्यस्थता के लिए भेज दिया। कोर्ट ने पक्षकारों से खुले मन से मध्यस्थता प्रक्रिया में भाग लेने और सोशल मीडिया या सार्वजनिक मंचों पर...
'राजस्व रिकॉर्ड से मालिकाना हक साबित नहीं होता': सुप्रीम कोर्ट ने भूमि स्वामित्व पर कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किए
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (6 मई) को कहा कि राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Entries) केवल कब्जे का प्रमाण हो सकते हैं, लेकिन वैध स्वामित्व दस्तावेजों के अभाव में उन्हें जमीन के मालिकाना हक का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि केवल जमाबंदी, पहानी या अन्य राजस्व प्रविष्टियों के आधार पर भूमि पर मालिकाना दावा नहीं किया जा सकता, जब तक कि प्राथमिक शीर्षक दस्तावेज (Title Documents) पेश न किए...
अनुशासनात्मक प्राधिकारी बिना नए कारण बताओ नोटिस के कर्मचारी को ऐसे आरोप के लिए दंडित नहीं कर सकता, जो मूल रूप से तय नहीं किया गया: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (6 मई) को फैसला सुनाया कि कोई भी दोषी कर्मचारी, जिसने अपने ऊपर लगे आरोप का सफलतापूर्वक बचाव किया, उसे किसी ऐसे नए आरोप के आधार पर सेवामुक्त नहीं किया जा सकता, जिसके बचाव का उसे अवसर ही न दिया गया हो।जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने रिटायर बाल रोग विशेषज्ञ द्वारा दायर अपील पर सुनवाई की। इस विशेषज्ञ को, पटना मेडिकल कॉलेज में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के निरीक्षण के दौरान जमा किए गए एक घोषणा पत्र में यह जानकारी छिपाने के कारण तीन महीने के लिए...
S.28 Specific Relief Act | खरीदार की चूक के कारण बिक्री समझौता रद्द करने के लिए अलग से आवेदन की ज़रूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (6 मई) को यह टिप्पणी की कि यदि कोई डिक्री-धारक (जिसके पक्ष में फैसला आया हो) तय समय सीमा के भीतर बिक्री की शेष राशि जमा करने में विफल रहता है तो बिक्री समझौते के 'विशिष्ट पालन' (specific performance) के लिए जारी डिक्री को लागू नहीं किया जा सकता, जिसके परिणामस्वरूप वह अनुबंध (contract) रद्द हो जाता है।कोर्ट ने यह फैसला दिया कि खरीदार की चूक के कारण अनुबंध रद्द करने के लिए 'निर्णय-ऋणी' (जिसके खिलाफ फैसला आया हो) द्वारा अलग से आवेदन देना अनिवार्य नहीं है।जस्टिस पंकज मित्तल...
ट्रायल में देरी के आधार पर 22 किलो गांजा रखने के आरोपी को सुप्रीम कोर्ट से जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (5 मई) को लगभग 22 किलोग्राम गांजा रखने के आरोपी एक व्यक्ति को नियमित जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि आरोपी एक वर्ष से अधिक समय से जेल में है और अब तक ट्रायल में एक भी गवाह का परीक्षण नहीं हुआ है, जिससे मुकदमे के जल्द पूरा होने की संभावना नहीं दिखती।जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने आरोपी को विवेकाधीन राहत देते हुए जमानत प्रदान की। आरोपी के खिलाफ NDPS Act की धारा 8(c), 20(b)(ii)(c) और 29(1) के तहत मामला दर्ज किया गया था। मामले में वाणिज्यिक मात्रा...
सुप्रीम कोर्ट ने ज़िला कलेक्टरों को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2026 लागू करने का अधिकार दिया, जारी किए दिशा-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत वैधानिक शक्तियाँ सौंपकर, पूरे देश के ज़िला कलेक्टरों को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 लागू करने का अधिकार दिया।जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की खंडपीठ ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) को निर्देश दिया कि वह पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 23 के तहत एक अधिसूचना जारी करे, जिसमें धारा 5 के तहत शक्तियाँ एक वर्ष की अवधि के लिए ज़िला कलेक्टरों को सौंपी जाएं। इन शक्तियों में बाध्यकारी निर्देश जारी करने...
सुनिश्चित करें कि सामान्य कट-ऑफ से ज़्यादा स्कोर करने वाले दिव्यांग व्यक्तियों को अनारक्षित रिक्तियों में शामिल किया जाए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से आग्रह किया कि वे 'बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्तियों' (PwBD) के लिए "ऊपरी गति" (upward movement) की नीति लागू करें। इस नीति के तहत, जो PwBD अपनी योग्यता के आधार पर सामान्य कट-ऑफ से ज़्यादा स्कोर करते हैं, उन्हें अनारक्षित रिक्तियों के मुकाबले विचार किया जाएगा।यह देखते हुए कि केंद्र सरकार ने PwBD की नियुक्ति और पदोन्नति उनकी अपनी योग्यता के आधार पर सुनिश्चित करने के लिए पहले ही कार्यकारी निर्देश जारी कर दिए, कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस नीति का पूरी तरह से...
मंदिर पर सिर्फ़ निगरानी की भूमिका निभाने और पुजारियों की नियुक्ति करने से ही मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि सिर्फ़ इस बात से कि किसी समूह ने मंदिर पर प्रबंधकीय या निगरानी का नियंत्रण रखा है, उसे अपने-आप मंदिर का मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता।कोर्ट ने कहा,"सिर्फ़ इस बात से कि किसी संस्था ने मंदिर पर कुछ निगरानी या प्रबंधकीय काम किए, या 'पुजारियों' की नियुक्ति में हिस्सा लिया है, उसे अपने-आप मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता।" जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया। हाईकोर्ट ने राजस्थान के कोटा में स्थित मंदिर 'मूर्ति स्वरूप श्री...
राजस्थान APO परीक्षा 2024: आवेदन के समय लॉ डिग्री न होने पर उम्मीदवार अयोग्य—सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 मई) को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राजस्थान असिस्टेंट प्रॉसिक्यूशन ऑफिसर (APO) परीक्षा 2024 के उन उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित कर दिया, जिनके पास आवेदन जमा करने की तिथि पर आवश्यक विधि (लॉ) डिग्री नहीं थी।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने Rajasthan Public Service Commission (राजस्थान लोक सेवा आयोग) की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें अभ्यर्थियों को प्रारंभिक परीक्षा में बैठने की अनुमति दी गई थी।क्या था मामला?7 मार्च...
'दोनों पक्ष 4 साल तक खुशी-खुशी साथ रहे, बाद में रिश्ते में खटास आ गई': सुप्रीम कोर्ट ने शादी के झूठे वादे पर रेप का मामला रद्द किया
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में शादी के झूठे वादे पर रेप के आरोपी व्यक्ति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने पाया कि यह रिश्ता कई सालों तक आपसी सहमति से बना था और शादी के झूठे वादे के कारण शुरू नहीं हुआ, क्योंकि जब यह रिश्ता शुरू हुआ था, तब दोनों पक्ष पहले से ही किसी और से शादीशुदा थे।कोर्ट ने कहा,"तथ्यों को देखते हुए दोनों पक्षकारों को पता था कि वे पहले से ही किसी और से शादीशुदा हैं। यह भी माना हुआ तथ्य है कि तलाक मिलने से पहले ही, शिकायतकर्ता (महिला) ने शादी के लिए विज्ञापन दे...
'CrPC की धारा 156(3) और 200 के लिए मापदंड अलग-अलग': दूसरी बार धारा 156(3) के तहत याचिका की अनुमति देने वाला आदेश रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 156(3) और 200 को लागू करने वाले मापदंड अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें मजिस्ट्रेट के उस निर्देश को सही ठहराया गया था कि CrPC की धारा 156(3) के तहत दूसरी अर्जी पर FIR दर्ज की जाए।CrPC की धारा 156(3) के तहत यह दूसरी अर्जी शिकायतकर्ता ने हाई कोर्ट द्वारा दी गई उस छूट (liberty) के आधार पर दायर की थी, जिसमें उसे पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ CrPC की धारा 200 के तहत...
हेट स्पीच मामलों में स्वतः FIR न दर्ज करना अवमानना नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हेट स्पीच के मामलों में पुलिस द्वारा स्वतः (suo motu) FIR दर्ज न करना अपने-आप में अदालत की अवमानना नहीं माना जाएगा। अदालत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता ने पहले पुलिस या संबंधित प्राधिकरण के पास शिकायत ही नहीं की, तो अवमानना कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी शिकायत या साक्ष्य के यह मान लेना कि पुलिस ने जानबूझकर आदेशों की अवहेलना की है, उचित नहीं है।पीठ ने कहा कि 21 अक्टूबर...
'तटस्थ रहने वालों' को तीसरे पक्ष के अधिकार पक्के हो जाने के बाद वरिष्ठता विवाद उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 मई) को कहा कि 'तटस्थ रहने वालों' (fence-sitters)—यानी ऐसे लोग जो किसी मुकदमे को बिना दखल दिए किनारे से देखते रहते हैं—को मामला खत्म हो जाने के बाद वरिष्ठता और उसके आधार पर मिलने वाले प्रमोशन से जुड़े विवाद उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा,"यह एक स्थापित कानून है कि तटस्थ रहने वालों को मामला खत्म हो जाने के बाद वरिष्ठता और उसके आधार पर मिलने वाले प्रमोशन से जुड़ा कोई विवाद उठाने या किसी आदेश की वैधता को...
मृत वादी के कानूनी प्रतिनिधियों को 'मुकदमा करने के अधिकार' का हस्तांतरण: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किए सिद्धांत
हाल के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने किसी पक्ष की मृत्यु के बाद उसके कानूनी प्रतिनिधियों को मुकदमा करने का अधिकार जारी रहने से जुड़े सिद्धांतों को संक्षेप में बताया।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पारंपरिक कहावत 'एक्टियो पर्सनैलिस मोरिटुर कम पर्सोना' (व्यक्तिगत कार्रवाई व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाती है) भारत में पूर्ण नहीं है। इसे 'घातक दुर्घटना अधिनियम, 1855', 'कानूनी प्रतिनिधियों के मुकदमे का अधिनियम, 1855' और 'भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925' जैसे कानूनों द्वारा संशोधित किया गया।किसी...
एसिड हमले के पीड़ितों की परिभाषा का दायरा बढ़ाया: सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने आज एक महत्वपूर्ण फैसले में अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए कहा कि जबरन एसिड पिलाए गए लोग और वे पीड़ित जिनके शरीर पर बाहरी विकृति नहीं दिखती लेकिन आंतरिक चोटें हैं, उन्हें भी 'एसिड अटैक पीड़ित' माना जाएगा।चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि यह व्याख्या वर्ष 2016 से प्रभावी मानी जाएगी।कानून में कमी को किया दूरअदालत ने कहा कि Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 (दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016) में 'एसिड अटैक पीड़ित' की...
दलित-आदिवासी आरोपियों से थाने साफ करवाने की जमानत शर्तें 'अमानवीय', सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ओडिशा की अदालतों द्वारा जमानत देते समय लगाई गई उन शर्तों पर कड़ी आपत्ति जताई, जिनमें दलित और आदिवासी आरोपियों को दो महीने तक पुलिस स्टेशन साफ करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने इन शर्तों को “आपत्तिजनक (obnoxious)” और जातिगत पक्षपात से प्रेरित बताया।चीफ़ जस्टिस और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने कहा कि इस तरह की शर्तें न केवल अपमानजनक और अमानवीय हैं, बल्कि मानवाधिकारों का प्रत्यक्ष उल्लंघन भी हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी शर्तें न्याय के उद्देश्य को...
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत मेडिकल लापरवाही के लिए डॉक्टर के कानूनी वारिस भी जवाबदेह: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 मई) को फैसला सुनाया कि किसी डॉक्टर की मृत्यु होने पर उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत चल रही कार्यवाही में उसके कानूनी वारिसों को उसकी जगह शामिल किया जा सकता है। हालांकि, डॉक्टर की कथित लापरवाही से होने वाले नुकसान के लिए मुआवजे की उनकी जवाबदेही, मृतक से विरासत में मिली संपत्ति तक ही सीमित होगी।जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने कहा,"पिछली चर्चा और 1986 के अधिनियम के साथ-साथ 2019 के अधिनियम में दिए गए कानूनी ढांचे को देखते हुए हम इस निष्कर्ष...
कानूनी उपायों का लाभ उठाए बिना FIR दर्ज करवाने के लिए अनुच्छेद 226 का सहारा नहीं लिया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 मई) को यह टिप्पणी की कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल पहली बार में FIR दर्ज करवाने का निर्देश मांगने के लिए नहीं किया जा सकता।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने टिप्पणी की,"अगर किसी व्यक्ति को यह शिकायत है कि पुलिस ने उसकी FIR दर्ज नहीं की, या दर्ज होने के बाद भी ठीक से जांच नहीं की जा रही है तो आमतौर पर इसका समाधान पहली बार में रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करने में नहीं, बल्कि कानूनी ढांचे के तहत उपलब्ध उपायों का...
दहेज से होने वाली मौतों पर सुप्रीम कोर्ट चिंतित: यूपी, बिहार और कर्नाटक राज्यों का नाम लेकर जताई आपत्ति
दहेज से जुड़ी हिंसा के लगातार बढ़ते खतरे की कड़ी आलोचना करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दहेज से होने वाली मौतें "समाज के कुछ वर्गों में एक गंभीर समस्या" बनी हुई हैं, खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक राज्यों में। कोर्ट ने ये टिप्पणियाँ दहेज से जुड़ी एक मौत के मामले में पति को दी गई ज़मानत रद्द करते हुए कीं।कोर्ट ने ये टिप्पणियां तब कीं, जब उसने एक मृत महिला के पिता द्वारा दायर अपील स्वीकार की। इस अपील में इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द करने की मांग की गई, जिसमें आरोपी पति को ज़मानत दी गई। यह...




















