सुप्रीम कोर्ट

8.5 साल से जेल में बंद अंडरट्रायल को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देने से किया इनकार, 6 महीने में ट्रायल पूरा करने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (1 सितंबर 2026) को डकैती/चोरी के एक मामले में साढ़े आठ साल से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में बंद अंडरट्रायल कैदी को जमानत देने से इनकार कर दिया। हालांकि, लंबे समय से जेल में रहने और मुकदमे की धीमी गति को देखते हुए कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को छह महीने के भीतर पूरे मुकदमे का निपटारा करने का निर्देश दिया।मामले की सुनवाई जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने की। याचिकाकर्ता ने कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा उसकी जमानत याचिका खारिज किए जाने के फैसले को सुप्रीम...

NCTE की एग्जीक्यूटिव कमिटी को टीचर एजुकेशन इंस्टिट्यूट से सालाना परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट मांगने का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (3 सितंबर) को टीचर एजुकेशन इंस्टिट्यूट से सालाना परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट (PAR) मांगने के लिए नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCTE) और उसकी एग्जीक्यूटिव कमिटी के अधिकार को सही ठहराया।जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा,"...काउंसिल और एग्जीक्यूटिव कमिटी के पास टीचर एजुकेशन देने वाले इंस्टिट्यूट से सालाना परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट मांगने का पूरा अधिकार है।" बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट की डिविजन बेंच का वह फैसला रद्द किया, जिसमें NCTE की...

BREAKING| NALSAR के खिलाफ़ BCI चेयरमैन का निर्देश कानूनन गलत था, बार काउंसिल के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और राज्य बार काउंसिल के पास लॉ स्टूडेंट्स के खिलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की कोई कानूनी शक्ति नहीं है। बार काउंसिल को लॉ स्टूडेंट्स पर अनुशासनात्मक नियंत्रण तभी मिलता है जब वे वकील के तौर पर एनरोल हो जाते हैं।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्टूडेंट्स पर अनुशासनात्मक शक्ति केवल उनके मूल संस्थान, या ऐसे संस्थान को नियंत्रित करने वाले नियमों या उप-नियमों के तहत निर्धारित प्राधिकरण के पास होती है।इस कानूनी स्थिति को लागू करते हुए कोर्ट ने...

NDPS Act | ड्रग डिस्पोज़ल कमिटी ट्रायल कोर्ट के आदेश के बिना ज़ब्त गाड़ी को डिस्पोज़ नहीं कर सकती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि NDPS एक्ट, 1985 के तहत किसी मामले में ज़ब्त गाड़ी को ज़ब्त करने का अधिकार सिर्फ़ उस कोर्ट के पास है, जो एक्ट की धारा 63 के तहत अपराध की सुनवाई कर रही है। कोर्ट ने यह भी कहा कि NDPS Act की धारा 52A के तहत बनी ड्रग डिस्पोज़ल कमिटी (DDC) कोर्ट के आदेश के बिना ज़ब्त गाड़ी को डिस्पोज़ करने की प्रक्रिया खुद शुरू नहीं कर सकती।कोर्ट ने कहा,"कानूनी तौर पर ज़ब्ती का अधिकार उस कोर्ट के पास है जो अपराध की सुनवाई कर रही है।" इसे लागू करते हुए जस्टिस जेबी पारदीवाला और...

कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम के तहत रिविज़न पर लिमिटेशन एक्ट लागू नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (2 सितंबर) को कहा कि कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम में दी गई समय-सीमा (लिमिटेशन पीरियड) को खत्म करने के लिए लिमिटेशन एक्ट, 1963 के प्रावधानों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने एक मामले की सुनवाई की, जिसमें कर्नाटक सरकार के भूमि रिकॉर्ड प्राधिकरण ने अपनी रिविज़न शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए बेंगलुरु के येदियुर झील इलाके में भूमि सर्वेक्षण नंबरों की नई जांच का आदेश दिया। यह आदेश कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम, 1964 ("अधिनियम") के...

गुजरात प्रोहिबिशन एक्ट के तहत ज़ब्त गाड़ियों को अंतरिम तौर पर छोड़ने पर कोई पूरी तरह रोक नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (02.09.2026) को ट्रायल कोर्ट, सेशंस कोर्ट और गुजरात हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द किया, जिनमें भारतीय निर्मित विदेशी शराब (IMFL) की बड़ी खेप ले जाते समय ज़ब्त किए गए ट्रक की अंतरिम कस्टडी देने से इनकार कर दिया गया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सिक्योरिटी जमा करने पर गाड़ी उसके मालिक को सौंप दी जाए। आदेशों को रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि गुजरात प्रोहिबिशन एक्ट, 1949 की धारा 98(2) ट्रायल के दौरान ज़ब्त गाड़ी को उसके मालिक को सौंपने पर पूरी तरह रोक नहीं लगाती है, भले ही बरामद...

सिर्फ़ इसलिए दोषी नहीं माना जा सकता कि जांच अधिकारी पर मिलीभगत के आरोप हैं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (1 सितंबर) को कहा कि हालांकि खराब जांच का फ़ायदा आरोपी को नहीं मिल सकता, लेकिन अदालतें सिर्फ़ इसलिए आरोपी को दोषी नहीं मान सकतीं कि जांच अधिकारी (IO) असहयोगी था या उस पर मिलीभगत के आरोप हैं, खासकर तब जब अभियोजन पक्ष आरोपी का दोष साबित करने के लिए भरोसेमंद सबूत पेश करने में नाकाम रहा हो।जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा,"खराब जांच का फ़ायदा आरोपी को नहीं मिल सकता, लेकिन जब कोई भरोसेमंद सबूत न हो, तो सिर्फ़ इसलिए कि IO असहयोगी था या उसके...

कम गंभीर अपराधों में सज़ा के बाद हुए समझौते के आधार पर कानूनी कार्यवाही रद्द की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कम गंभीर अपराधों में आरोपी और शिकायतकर्ता/पीड़ित के बीच सज़ा के बाद हुए समझौते के आधार पर आरोपी के खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही रद्द की जा सकती है।जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले में दखल देने से इनकार किया, जिसमें आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द की गई। आरोपी को गैर-कानूनी तरीके से इकट्ठा होने, अपहरण/अगवा करने और खतरनाक हथियारों के इस्तेमाल जैसे अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया।ट्रायल कोर्ट के...

BREAKING | छात्र प्रदर्शनों से जुड़ी देशभर की FIRs सुप्रीम कोर्ट ने की रद्द, नई FIR पर भी रोक

सुप्रीम कोर्ट ने 20 से 25 जुलाई के बीच हुए छात्र प्रदर्शनों के संबंध में देशभर के किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में दर्ज FIRs को आगे न बढ़ाने और उनकी जांच न करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने इन मामलों को सभी उद्देश्यों के लिए बंद माना है।CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह आदेश दिया।कोर्ट ने केंद्र (दिल्ली पुलिस), बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और असम द्वारा दायर आवेदनों में चिन्हित...

अंडरट्रायल कैदियों की रिहाई: सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को ज़िला कमेटियों के सही ढंग से काम करने को सुनिश्चित करने का निर्देश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 'गरीब कैदियों की सहायता' (Support to Poor Prisoners) योजना के लिए केंद्र की स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) का पालन न किए जाने का मुद्दा उठाया। कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि वे यह सुनिश्चित करें कि ज़िला स्तरीय अधिकार प्राप्त कमेटियां (DLECs) नियमित रूप से बैठकें करें और रिहाई पर विचार के लिए उनके सामने रखे गए विचाराधीन कैदियों के मामलों पर समय पर निर्णय लें।कोर्ट ने निर्देश दिया,"हमने इस बात पर भी ध्यान दिया है कि ज़िला स्तरीय अधिकार प्राप्त कमेटियों...

अगर कानूनी मदद ठीक से नहीं मिल रही है तो संवैधानिक अदालतों को यह पक्का करना चाहिए कि केस लड़ने वालों को अच्छी कानूनी मदद मिले: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी वजहों से अपील खारिज करने को सही नहीं माना है—जैसे कि देरी को माफ़ करने की अर्ज़ी न होना—खासकर तब जब केस लड़ने वाले को सही कानूनी मदद न मिल रही हो। केस लड़ने वालों को अच्छी कानूनी मदद दिलाना अदालतों की ज़िम्मेदारी है।जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा,"यह सच है कि अपील के साथ देरी को माफ़ करने की अर्ज़ी होनी चाहिए, लेकिन संवैधानिक अदालतों को केस लड़ने वाले की मुश्किलों का भी ध्यान रखना चाहिए। अगर कानूनी मदद ठीक से नहीं मिल रही है तो अदालत की...

अगर प्रॉसिक्यूशन अहम गवाह से पूछताछ नहीं करता है तो ट्रायल कोर्ट को उससे सवाल पूछना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में ट्रायल कोर्ट्स को चेतावनी दी कि वे ट्रायल के दौरान तेज़ी से काम करें, खासकर तब जब प्रॉसिक्यूशन अहम गवाहों से पूछताछ करने में पूरी तरह नाकाम रहा हो।जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा,"...जब प्रॉसिक्यूशन पूरी तरह नाकाम हो जाता है तो कोर्ट को अहम गवाहों से पूछताछ न करने के प्रॉसिक्यूशन के रवैये पर तुरंत सवाल उठाना चाहिए। ट्रायल कोर्ट सिर्फ़ मूक दर्शक नहीं होता और एक निष्पक्ष जज के तौर पर उसकी यह ज़िम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि...

पीड़ित के साथ समझौते के आधार पर आपराधिक केस रद्द करने के लिए शिकायतकर्ता की सहमति ज़रूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (31 अगस्त) को कहा कि भले ही FIR में ऐसे अपराध शामिल हों, जिनमें समझौता नहीं हो सकता (Non-Compoundable Offences), फिर भी अगर असली पीड़ित ने आरोपी के साथ विवाद को साफ़ तौर पर सुलझा लिया है तो समझौते के आधार पर आपराधिक कार्यवाही रद्द की जा सकती है; और ऐसे शिकायतकर्ता की सहमति ज़रूरी नहीं है जो पीड़ित नहीं है।जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने कहा,"अगर ऐसे शिकायतकर्ताओं (जो पीड़ित नहीं हैं) को समझौता करने की इजाज़त दी जाती है और असली पीड़ित को अधर में...

Art. 226 | ट्रिब्यूनल के बहुत ज़्यादा गलत या मनमाने फ़ैसले रद्द करने के लिए सर्टिओरारी का इस्तेमाल किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (31 अगस्त) को कहा कि हाईकोर्ट संविधान के आर्टिकल 226 के तहत अपनी 'सर्टिओरारी रिट अधिकार क्षेत्र' (certiorari writ jurisdiction) का इस्तेमाल करते हुए ट्रिब्यूनल के उस आदेश में दखल दे सकते हैं जिसमें निष्कर्ष किसी भी ठोस या दस्तावेज़ी सबूत पर आधारित नहीं हैं।जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने कहा,"अगर कोई निष्कर्ष बिना किसी सबूत या बिना किसी सहायक दस्तावेज़ के दर्ज किया जाता है तो दखल देने का मामला बनता है क्योंकि ऐसा निष्कर्ष कानून की गलती (error...

NCDRC के तीसरे सदस्य का रेफरेंस का जवाब देने के बजाय अपील पर फ़ैसला सुनाना ज़रूरी नहीं कि ग़ैर-क़ानूनी हो: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) की बेंच के सदस्यों के बीच मतभेद होने पर तीसरे या "रेफरी" सदस्य की भूमिका की सीमाएं स्पष्ट की। कोर्ट ने कहा कि हालाँकि आम तौर पर रेफरी सदस्य को केवल रेफर किए गए सवालों का जवाब देना चाहिए और मामले को मूल बेंच को वापस भेजना चाहिए, लेकिन किसी असाधारण मामले में अपील पर ख़ुद फ़ैसला करना सही हो सकता है।जब रेफर करने वाली बेंच कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019 की धारा 58(3) के तहत मतभेद के सटीक बिंदुओं को बताने के बजाय, शिकायत की जड़ तक जाने...