सुप्रीम कोर्ट

ट्रैकिंग डिवाइस और इमरजेंसी पैनिक बटन के बिना पब्लिक सर्विस गाड़ियों को कोई फिटनेस सर्टिफिकेट या परमिट नहीं: सुप्रीम कोर्ट
ट्रैकिंग डिवाइस और इमरजेंसी पैनिक बटन के बिना पब्लिक सर्विस गाड़ियों को कोई फिटनेस सर्टिफिकेट या परमिट नहीं: सुप्रीम कोर्ट

यात्रियों की सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए एक अहम कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को निर्देश दिया कि किसी भी पब्लिक सर्विस गाड़ी को तब तक फिटनेस सर्टिफिकेट या परमिट नहीं दिया जाएगा, जब तक उसमें व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTDs) और इमरजेंसी पैनिक बटन लगे न हों, उनकी जांच न हो गई हो, और वे 'वाहन' डेटाबेस में दर्ज न हों।जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने 'एस राजशेखरन बनाम भारत संघ' मामले की सुनवाई करते हुए ये निर्देश दिए। यह मामला पूरे देश में सड़क दुर्घटनाओं में...

पति की भावनाएं आहत होने के डर से पत्नी का करियर बनाना क्रूरता नहीं कहा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
पति की भावनाएं आहत होने के डर से पत्नी का करियर बनाना क्रूरता नहीं कहा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

शादी के भीतर लैंगिक समानता पर एक कड़े फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि पत्नी के अपने पेशेवर सपनों को पूरा करने की कोशिश को वैवाहिक क्रूरता करार देना - सिर्फ इसलिए कि इससे उसके पति या ससुराल वालों की भावनाएं आहत हो सकती हैं - एक बहुत ही पिछड़ी सोच को दिखाता है, जो आज के संवैधानिक मूल्यों के साथ मेल नहीं खाती।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा,"पत्नी के अपने करियर के लक्ष्यों को पाने की कोशिश को क्रूरता का काम बताना - सिर्फ इसलिए कि इससे पति या ससुराल वालों की...

S.167 B(2) IT Act | एसोसिएशन ऑफ़ पर्सन्स के सदस्य को मुनाफ़े की परवाह किए बिना दिया गया तय हिस्सा, टैक्स के दायरे में आएगा: सुप्रीम कोर्ट
S.167 B(2) IT Act | 'एसोसिएशन ऑफ़ पर्सन्स' के सदस्य को मुनाफ़े की परवाह किए बिना दिया गया तय हिस्सा, टैक्स के दायरे में आएगा: सुप्रीम कोर्ट

टैक्स क़ानून पर एक अहम फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (12 मई) को कहा कि 'एसोसिएशन ऑफ़ पर्सन्स' (AOP) से कुल कमाई का एक तय हिस्सा पाने वाला सदस्य, अगर बिज़नेस के ख़र्च या नुक़सान नहीं उठाता है तो वह इस कमाई को "मुनाफ़े का हिस्सा" बताकर इनकम टैक्स से छूट का दावा नहीं कर सकता।यह बताना ज़रूरी है कि 'एसोसिएशन ऑफ़ पर्सन्स' (AOP) या 'बॉडी ऑफ़ इंडिविजुअल्स' (BOI) के सदस्यों पर टैक्स, इनकम टैक्स एक्ट, 1961 की धारा 167B (2) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 86 के तहत तय होता है। इन प्रावधानों को एक साथ...

जल्द इंसाफ़ आर्टिकल 21 की ज़रूरी शर्त: सुप्रीम कोर्ट ने जल्द सुनवाई के अधिकार के उल्लंघन पर 35 साल पुराना केस रद्द किया
'जल्द इंसाफ़ आर्टिकल 21 की ज़रूरी शर्त': सुप्रीम कोर्ट ने जल्द सुनवाई के अधिकार के उल्लंघन पर 35 साल पुराना केस रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस कांस्टेबल के खिलाफ 35 साल से चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने माना कि इस केस को जारी रखना संविधान के आर्टिकल 21 के तहत जल्द सुनवाई के उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा।कोर्ट ने कहा,"जल्द सुनवाई का अधिकार संविधान के आर्टिकल 21 की ज़रूरी शर्तों में से एक है, चाहे आरोपी जेल में हो या ज़मानत पर, और अपराध की प्रकृति चाहे जो भी हो। यह जल्द सुनवाई संविधान के आर्टिकल 21 की ज़रूरी शर्तों में से एक है। अगर किसी केस के तथ्यों और परिस्थितियों...

प्रत्यक्षदर्शी गवाह न होने मात्र से अभियोजन मामला कमजोर नहीं पड़ता : सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के दोषी की सजा बरकरार रखी
प्रत्यक्षदर्शी गवाह न होने मात्र से अभियोजन मामला कमजोर नहीं पड़ता : सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के दोषी की सजा बरकरार रखी

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (11 मई) को एक हत्या के आरोपी की सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि किसी मामले में प्रत्यक्षदर्शी गवाह (Eyewitness) का न होना अभियोजन के लिए घातक नहीं माना जा सकता, यदि परिस्थितिजन्य साक्ष्य और मृतक का मृत्यु पूर्व बयान आरोपी के अपराध को स्पष्ट रूप से साबित करते हों।जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। दोनों अदालतों ने आरोपी को हत्या का दोषी ठहराया था।मामला अहमदाबाद के सोमाभाई...

बार और बेंच न्याय के रथ के दो पहिए, आपसी टकराव से न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा कमजोर पड़ सकता है : सुप्रीम कोर्ट
बार और बेंच न्याय के रथ के दो पहिए, आपसी टकराव से न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा कमजोर पड़ सकता है : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट यतीन ओझा के खिलाफ अवमानना कार्यवाही बंद करते हुए कहा कि बार और बेंच “न्याय के रथ के दो पहिए” हैं और इनके बीच टकराव न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को कमजोर कर सकता है।जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदूरकर की खंडपीठ ने कहा कि वकालत पेशा और न्यायपालिका न्याय व्यवस्था के दो मूल स्तंभ हैं और दोनों को परस्पर सम्मान व संयम बनाए रखना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यह मामला बार और बेंच के बीच “दुर्भाग्यपूर्ण टकराव” का उदाहरण है।मामला वर्ष 2020 का है, जब कोविड-19...

कथित जातिगत गाली-गलौज किसी निजी घर के अंदर किए जाने पर SC/ST Act के तहत कोई अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट
कथित जातिगत गाली-गलौज किसी निजी घर के अंदर किए जाने पर SC/ST Act के तहत कोई अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (11 मई) को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) के तहत व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मामला रद्द किया। इस व्यक्ति पर आरोप था कि उसने एक घर की चारदीवारी के अंदर, अनुसूचित जाति श्रेणी से ताल्लुक रखने वाले शिकायतकर्ता के साथ जाति-आधारित गाली-गलौज की थी।चूंकि FIR में यह ज़िक्र नहीं था कि अपीलकर्ता नंबर 1 और अन्य अपीलकर्ताओं द्वारा गाली-गलौज और धमकाने की कथित घटना किसी ऐसी जगह पर हुई, जहां आम लोगों की नज़र पड़ सकती हो, इसलिए कोर्ट ने यह माना कि SC/ST...

Order XII Rule 6 CPC | आपराधिक मामले में की गई स्वीकारोक्ति का इस्तेमाल सिविल कार्यवाही में किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट
Order XII Rule 6 CPC | आपराधिक मामले में की गई स्वीकारोक्ति का इस्तेमाल सिविल कार्यवाही में किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश XII नियम 6 के तहत स्वीकारोक्ति पर आधारित फैसला, उन स्वीकारोक्तियों पर भी आधारित हो सकता है, जो लिखित दलीलों (Pleadings) के बाहर की गई हों।ट्रायल कोर्ट, पहली अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट के एक जैसे फैसलों में दखल देने से इनकार करते हुए जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने प्रतिवादी (Defendant) की याचिका खारिज की। इस प्रतिवादी को आपराधिक कार्यवाही के दौरान की गई स्वीकारोक्तियों के आधार पर विवादित जगह खाली करने का...

यतिन ओझा को सुप्रीम कोर्ट की अंतिम माफी, अवमानना दोषसिद्धि और सजा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित
यतिन ओझा को सुप्रीम कोर्ट की 'अंतिम माफी', अवमानना दोषसिद्धि और सजा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित

सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट यतिन ओझा को बड़ी राहत देते हुए गुजरात हाईकोर्ट द्वारा 2020 के आपराधिक अवमानना मामले में दी गई दोषसिद्धि और सजा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित (In Abeyance) कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने चेतावनी दी कि भविष्य में यदि उन्होंने इसी तरह का कोई आचरण दोहराया, तो गुजरात हाईकोर्ट की सजा और दोषसिद्धि फिर से प्रभावी की जा सकती है।जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। मामला कोविड-19 अवधि के दौरान गुजरात हाईकोर्ट प्रशासन के खिलाफ यतिन ओझा...

पत्नी को जानवर की तरह नहीं रख सकता पति, उसे सम्मान के साथ जीने का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट
पत्नी को जानवर की तरह नहीं रख सकता पति, उसे सम्मान के साथ जीने का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा के आरोपी एक व्यक्ति को अग्रिम जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि पति अपनी पत्नी के साथ जानवरों जैसा व्यवहार नहीं कर सकता और उसे सम्मान के साथ जीने का अधिकार है।जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की खंडपीठ आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। आरोपी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज है।मामले में आरोप है कि आरोपी ने शराब के नशे में अपनी पहली पत्नी के साथ मारपीट की। शिकायत के अनुसार, उसने पत्नी को जमीन पर फेंक दिया,...

जमानत याचिकाओं के जल्द निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हाइकोर्ट्स को दिए अहम सुझाव
जमानत याचिकाओं के जल्द निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हाइकोर्ट्स को दिए अहम सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के हाइकोर्ट्स में लंबित जमानत याचिकाओं पर चिंता जताते हुए उनके त्वरित निपटारे के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। अदालत ने कहा कि जमानत मामलों की सुनवाई और सूचीबद्ध करने में हो रही देरी गंभीर चिंता का विषय है।चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें पहले देश के सभी हाइकोर्टों से लंबित जमानत याचिकाओं का ब्योरा मांगा गया था।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकांश हाइकोर्ट्स ने समय पर जानकारी उपलब्ध कराई और जमानत मामलों के...

असफल उम्मीदवारों के अंकों को प्रकाशित न करने से यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वे परीक्षा में पास हो गए: सुप्रीम कोर्ट
असफल उम्मीदवारों के अंकों को प्रकाशित न करने से यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वे परीक्षा में पास हो गए: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि जहां भर्ती नियमों या विज्ञापन में उम्मीदवारों के अंकों को सार्वजनिक करने या प्रकाशित करने का प्रावधान नहीं है, वहां जिस उम्मीदवार का नाम मेरिट लिस्ट में नहीं है, वह केवल इस आधार पर नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता कि उसके अंक सार्वजनिक नहीं किए गए।जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने दुर्गापुर स्टील प्लांट द्वारा दायर अपील पर सुनवाई की। इस अपील में कलकत्ता हाईकोर्ट के उस निर्देश को चुनौती दी गई, जिसमें प्रतिवादियों को 'प्लांट अटेंडेंट'...

Order VII Rule 11 CPC | यह देखने के लिए कि क्या कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग से छिपाया गया, वाद-पत्र को ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
Order VII Rule 11 CPC | यह देखने के लिए कि क्या कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग से छिपाया गया, वाद-पत्र को ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

CPC के आदेश VII नियम 11 के दायरे पर महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को वाद-पत्र की "ध्यान से और पूरी तरह" जांच करनी चाहिए ताकि यह देखा जा सके कि क्या किसी कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के ज़रिए छिपाया गया।कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर तथ्यों को जान-बूझकर छिपाया गया हो तो वाद-पत्र को खारिज किया जा सकता है।कोर्ट ने कहा,"ट्रायल कोर्ट को ऐसे बेतुके मुकदमों को रोकना चाहिए, जो कानून द्वारा वर्जित हैं। साथ ही ऐसे मामलों को भी, जहां कार्रवाई का कारण (Cause of Action) केवल एक...

S. 25 Hindu Succession Act | हत्या का आरोपी, मारे गए व्यक्ति की संपत्ति पर उत्तराधिकार का दावा नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
S. 25 Hindu Succession Act | हत्या का आरोपी, मारे गए व्यक्ति की संपत्ति पर उत्तराधिकार का दावा नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक वादी को किसी मृतक द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर संपत्ति का उत्तराधिकार पाने से अयोग्य घोषित किया। कोर्ट ने यह पाया कि वह वादी, उस मृतक की हत्या के मामले में आरोपी के तौर पर नामजद है।कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act) की धारा 25 के तहत मिली शक्ति का इस्तेमाल करते हुए वादी को अयोग्य घोषित किया। यह धारा यह प्रावधान करती है कि जो व्यक्ति किसी की हत्या करता है, या हत्या करने में किसी की मदद करता है, वह मारे गए व्यक्ति की संपत्ति का...

बेनामी लेन-देन में खरीदी गई संपत्ति पर असली मालिक, बेनामीदार द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर दावा नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
बेनामी लेन-देन में खरीदी गई संपत्ति पर असली मालिक, बेनामीदार द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर दावा नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि कोई भी व्यक्ति बेनामी लेन-देन में खरीदी गई संपत्ति पर, केवल उसके नाममात्र के मालिक (Ostensible Owner) द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की वसीयत संबंधी व्यवस्थाओं का इस्तेमाल 'बेनामी संपत्ति लेन-देन निषेध अधिनियम, 1988' केतहत मौजूद कानूनी रोक को खत्म करने के लिए नहीं किया जा सकता।कोर्ट ने शुक्रवार (8 मई) को यह भी फैसला दिया कि किसी व्यावसायिक अनुबंध के तहत किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दिए गए...

रेलवे, बिजली अधिनियम के तहत उपभोक्ता, डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
रेलवे, बिजली अधिनियम के तहत 'उपभोक्ता', 'डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी' नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (8 मई) को फैसला सुनाया कि रेलवे, बिजली अधिनियम, 2003 के अर्थ के तहत एक 'उपभोक्ता' है। इस फैसले के साथ ही रेलवे का वह दावा खारिज हो गया, जिसमें वह 'डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी' (माना गया वितरण लाइसेंसी) का दर्जा मांग रहा था, ताकि वह वितरण कंपनियों को क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज और अतिरिक्त सरचार्ज का भुगतान करने से बच सके।कोर्ट ने कहा कि भारतीय रेलवे एक बंद और आत्मनिर्भर बिजली नेटवर्क चलाता है, जिसका एकमात्र उद्देश्य उसकी अपनी आंतरिक परिचालन ज़रूरतों को पूरा करना है—जिसमें...

उपभोक्ताओं से उस अवधि के लिए मूल्यह्रास नहीं वसूला जा सकता, जिस दौरान उन्हें बिजली की सप्लाई न की गई: सुप्रीम कोर्ट
उपभोक्ताओं से उस अवधि के लिए मूल्यह्रास नहीं वसूला जा सकता, जिस दौरान उन्हें बिजली की सप्लाई न की गई: सुप्रीम कोर्ट

बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (7 मई) को यह टिप्पणी की कि बिजली उपभोक्ताओं पर उस पावर प्लांट के डेप्रिसिएशन की लागत चुकाने का बोझ नहीं डाला जा सकता, जिससे उन्हें अब बिजली की सप्लाई नहीं मिल रही है; भले ही उस एसेट (संपत्ति) की तकनीकी उपयोगिता अवधि अभी बाकी हो।जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने टिप्पणी की,"...यह स्वीकार्य है कि मार्च 2018 के बाद उपभोक्ताओं को बिजली की सप्लाई नहीं की गई। उपभोक्ताओं से ऐसी सेवा के लिए भुगतान करने की...

S.294 CrPC | आरोपी चार्जशीट का हिस्सा बन चुके दस्तावेज़ों को बिना हस्ताक्षर के औपचारिक सबूत के भी पेश कर सकता है: सुप्रीम कोर्ट
S.294 CrPC | आरोपी चार्जशीट का हिस्सा बन चुके दस्तावेज़ों को बिना हस्ताक्षर के औपचारिक सबूत के भी पेश कर सकता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि जब कोई आरोपी बचाव पक्ष की ओर से कुछ ऐसे दस्तावेज़ पेश करना चाहता है, जो पहले से ही चार्जशीट और अभियोजन पक्ष के रिकॉर्ड का हिस्सा हैं, तो उन्हें औपचारिक रूप से साबित करने की ज़रूरत नहीं होती। ऐसे दस्तावेज़ों को उन पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति के हस्ताक्षर साबित किए बिना भी सबूत के तौर पर पढ़ा जा सकता है।कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 294(3) का हवाला दिया। इस धारा के अनुसार, यदि किसी दस्तावेज़ की प्रामाणिकता पर कोई विवाद नहीं है तो उसे सबूत के तौर...