हर आवारा कुत्ते के हमले पर प्रशासन और डॉग फीडर्स की जिम्मेदारी तय करेंगे: सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

13 Jan 2026 3:50 PM IST

  • हर आवारा कुत्ते के हमले पर प्रशासन और डॉग फीडर्स की जिम्मेदारी तय करेंगे: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों पर गंभीर चिंता जताते हुए संकेत दिया कि यदि किसी व्यक्ति — विशेषकर बच्चों और बुज़ुर्गों — को कुत्तों के हमले से चोट या मृत्यु होती है, तो इसके लिए न केवल नगर निकाय बल्कि कुत्तों को खाना खिलाने वाले लोग भी जिम्मेदार ठहराए जा सकते हैं।

    जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की खंडपीठ आवारा कुत्तों से जुड़ी एक सुओ मोटो याचिका की सुनवाई कर रही थी।

    जस्टिस विक्रम नाथ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा—

    “अगर किसी बच्चे या बुज़ुर्ग को कुत्ते काटते हैं या उनकी मौत होती है, तो राज्य से भारी मुआवज़ा वसूला जाएगा। साथ ही उन लोगों से भी जवाबदेही तय की जाएगी जो कहते हैं कि हम कुत्तों को खाना खिला रहे हैं। अगर आपको इतना ही प्रेम है तो उन्हें अपने घर ले जाइए। सड़कों पर घूमकर लोगों को काटने और डराने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता।”

    जस्टिस संदीप मेहता ने पूछा—

    “जब एक 9 साल के बच्चे पर कुत्ते हमला करते हैं तो ज़िम्मेदारी किसकी होगी? क्या उन संगठनों की जो उन्हें खाना खिला रहे हैं? क्या हम इस समस्या से आंख मूंद लें?”

    उन्होंने आगे कहा—

    “अगर कोई कुत्ता किसी की निगरानी में है तो उसे पालतू माना जाएगा और इसके लिए लाइसेंस होना चाहिए। सड़क पर घूमने वाले कुत्तों की कोई जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।”

    सार्वजनिक स्थानों से कुत्तों को हटाने का आदेश

    पीठ नवंबर 2025 में दिए गए अपने आदेश के अनुपालन की निगरानी कर रही है, जिसके तहत बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, अस्पताल, स्कूल, कैंपस और अन्य सार्वजनिक संस्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने का निर्देश दिया गया था।

    कोर्ट ने यह भी कहा था कि पकड़े गए कुत्तों को टीकाकरण और नसबंदी (ABC Rules) के बाद उन्हीं स्थानों पर वापस नहीं छोड़ा जाएगा।

    हालांकि, कई पशु-अधिकार संगठनों ने इस आदेश में संशोधन की मांग करते हुए कहा कि कुत्तों को वापस उसी इलाके में छोड़ना जरूरी है।

    डॉग-फीडर्स और पशु-अधिकार समूहों पर भी सवाल

    सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार ने कोर्ट के नवंबर 7 के आदेश का समर्थन करते हुए कहा कि

    “आवारा कुत्तों को संस्थागत परिसरों में रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। अगर इंसान वहां नहीं रह सकता तो जानवर भी नहीं रह सकते।”

    उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे स्थानों पर कुत्तों को वापस छोड़ना “पशु अतिक्रमण (Animal Trespass)” के समान है।

    उन्होंने लद्दाख में लगभग 55,000 आवारा और जंगली कुत्तों की मौजूदगी का हवाला देते हुए कहा कि ये दुर्लभ वन्य जीवों के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं।

    कोर्ट परिसर तक पहुँची समस्या

    जस्टिस मेहता ने गुजरात हाईकोर्ट में हुए हालिया कुत्ते के काटने की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि समस्या अब अदालतों तक पहुँच गई है। उन्होंने यह भी बताया कि नगर निगम के कर्मचारी जब कुत्ते को पकड़ने गए तो कुछ “कथित डॉग लवर्स (वकील)” ने उन पर हमला कर दिया।

    पशु-कल्याण पक्ष की दलीलें

    वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह, पिंकी आनंद और मेनका गुरुस्वामी ने कुत्तों के संरक्षण और पर्यावरण संतुलन का मुद्दा उठाया।

    उन्होंने कहा कि—

    कुत्ते चूहों को नियंत्रित करते हैं

    एबीसी सेंटरों की संख्या बहुत कम है

    कुत्तों को हटाने से और आक्रामक जानवर उस जगह आ सकते हैं

    हालांकि, न्यायमूर्ति मेहता ने टिप्पणी की कि

    “अब तक भावनाएं केवल कुत्तों के लिए ही दिखाई दे रही हैं।”

    कुत्तों की गिनती पर भी सवाल

    वरिष्ठ अधिवक्ता परसीवल बिलिमोरिया ने कहा कि देश में आवारा कुत्तों की कोई वास्तविक गणना (census) नहीं हुई है।

    इस पर न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि बिना किसी सर्वे के दी जा रही संख्या “पूरी तरह अवास्तविक” है।

    डॉग-बाइट पीड़िता की भावुक गवाही

    डॉग-बाइट पीड़िता कामना पांडे ने बताया कि उन्हें 20 साल पहले एक कुत्ते ने बुरी तरह काटा था, लेकिन बाद में उन्होंने उसी कुत्ते को गोद ले लिया और उसके बाद उसने किसी को नहीं काटा।

    उन्होंने कहा कि डर और हिंसा कुत्तों को आक्रामक बनाती है, और समाधान मानवीय और समग्र होना चाहिए।

    मामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी को दोपहर 2 बजे होगी।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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