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हिंदू विधि भाग 11 : जानिए पति पत्नी के बीच मुकदमेबाज़ी के दौरान बच्चों की अभिरक्षा (Child Custody) कैसे निर्धारित की जाती है

Shadab Salim
2 Sep 2020 4:30 AM GMT
हिंदू विधि भाग 11 : जानिए पति पत्नी के बीच मुकदमेबाज़ी के दौरान बच्चों की अभिरक्षा (Child Custody) कैसे निर्धारित की जाती है
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वैवाहिक बंधन आपसी सूझबूझ पर निर्भर करता है। जब किसी वैवाहिक बंधन में ऐसी आपसी सूझबूझ का अभाव होता है तथा वैचारिक मत मिल नहीं पाते हैं तब मतभेद का जन्म होता है। ऐसे मतभेद से पति पत्नी के बीच अलगाव का भी जन्म हो जाता है। इस अलगाव के परिणामस्वरूप पति-पत्नी न्यायालय की शरण लेते हैं तथा दांपत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापन, न्यायिक पृथक्करण और तलाक के मुकदमों का जन्म होता है।

जब इस प्रकार की कार्यवाही अदालतों में चलती रहती है, उस समय विवाह से उत्पन्न होने वाली संतानों पर संकट आ जाता है। किसी भी बच्चे के हित के लिए उसके माता पिता पिता दोनों का होना नितांत आवश्यक होता है। किसी भी बच्चे का भविष्य उसके माता-पिता के आपसी संयोजन पर निर्भर करता है। माता-पिता का समन्वय ही किसी बच्चे का भविष्य निर्धारण करता है।

जब पति पत्नी के बीच कोई न्यायालयीन कार्यवाही लंबित रहती है। ऐसी परिस्थिति में बच्चे की संरक्षकता उसकी अभिरक्षा के प्रश्न उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार की कार्यवाही के लंबित रहते हुए बच्चे की अभिरक्षा किसके पास होगी यह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है।

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 इस समस्या से निपटने हेतु अधिनियम के भीतर संपूर्ण व्यवस्था करता है। अधिनियम की धारा 26 संतान की अभिरक्षा से संबंधित धारा है। इस आलेख में हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 26 से संबंधित महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख किया जा रहा है।

बच्चों की अभिरक्षा (Child Custody) (धारा 26)

यह धारा वाद कालीन स्थिति में वाद के पक्षकार पति और पत्नी में उत्पन्न होने वाली संतानों की अभिरक्षा के संबंध में प्रावधान करती है। यह धारा यह प्रावधान करती है कि न्यायालय वैध एवं अवैध संतानों की अभिरक्षा भरण पोषण व शिक्षा के संबंध में जहां तक संभव हो सके उनकी इच्छानुसार प्रावधान करने के लिए अंतरिम आदेश पारित कर सकता है। जहां ऐसा प्रावधान या तो अंतरिम आदेश के द्वारा अथवा डिक्री में किया जाता है तो इस प्रकार के मामलों में डिक्री के उपरांत भी अभिरक्षा भरण पोषण व शिक्षा के संबंध में आवेदन दिया जा सकता है।

अरुण लता बनाम सिविल जज बुलंदशहर 197 (3) ए डब्ल्यू सी 2284 में स्पष्ट किया गया है कि अधिनियम की वर्तमान धारा की शक्तियों का प्रयोग डिक्री पारित होने के उपरांत मात्र उस दशा में किया जा सकता है जबकि ऐसा आदेश डिक्री के पूर्व अंतरिम आदेश के रूप में अथवा डिक्री में पारित किया गया हो।

धारा 26 के अनुसार न्यायालय अपनी शक्ति का प्रयोग उस समय ही करता है जिस समय वाद के पक्षकारों द्वारा कोई मुकदमेबाजी की जा रही होती है। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 विवाह के पक्षकार पति पत्नी को ऐसे अनेक अधिकार देता है जिसके माध्यम से वह न्यायालय की शरण लेते हैं तथा दोनों के बीच मुकदमेबाजी का जन्म होता।

धारा 26 में प्रयोग किए गए शब्दों से स्पष्ट होता है कि न्यायालय कुछ शर्तों के अधीन ही अधिकारिकता का प्रयोग कर सकता है। उन शर्तों में सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि इस शक्ति का प्रयोग उस ही स्थिति में किया जा सकता है। जब विवाह के पक्षकार पति और पत्नी के बीच कोई वैवाहिक मुकदमेबाजी चल रही हो। वैवाहिक मुकदमेबाजी से आशय न्यायिक पृथक्करण, दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन, शून्य विवाह और शून्यकरणीय विवाह तथा संबंध विच्छेद याचिका और पारस्परिक विवाह विच्छेद इस प्रकार की कोई मुकदमेंबाजी यदि पक्षकारों के बीच चल रही है। ऐसी परिस्थिति में न्यायालय को यह विवेक अधिकार के साथ शक्ति दी गई है कि वह परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विवाह के पक्षकारों से उत्पन्न हुई संतान की अभिरक्षा के हित में कोई निर्णय ले सकेगा।

इस धारा के अंतर्गत न्यायालय मामले के दौरान अंतरिम आदेश पारित कर सकता है। यह डिक्री पारित करते समय या डिक्री पारित करने के बाद भी कर सकता है। बच्चों के वयस्क होने तक ही इस धारा के अंतर्गत आदेश प्रभाव में रहता है। हिंदू अप्राप्तव्यता और संरक्षता अधिनियम 1956 की धारा 6 के अनुसार 5 वर्ष तक के बच्चे को साधारणता माता की अभिरक्षा में ही रखा जाता है।

हिंदू विवाह अधिनियम 1956 की धारा 26 के अंतर्गत कोई भी स्वतंत्र कार्यवाही नहीं की जा सकती है। इस धारा के अधीन न्यायालय आदेश जब ही पारित कर सकता है, जबकि अन्य वैवाहिक उपचार पीड़ित पक्षकार द्वारा वाद योजित किया गया हो। इस धारा के अधीन किसी व्यक्ति को न्यायालय के सम्मुख स्वतंत्र रूप से अवयस्क की अभिरक्षा भरण पोषण अथवा उसके शिक्षा संबंधी व्यय के लिए प्रार्थना पत्र देने का अधिकार नहीं देता है। यह धारा वर्तमान अधिनियम के अंतर्गत मुकदमेबाजी कर रहे पक्षकारों को ही मात्र लंबित कार्यवाही में प्रार्थना पत्र देने का अधिकार प्रदान करती है।

सरदार भूपेंद्र सिंह बनाम श्रीमती जसवीर कौर एआईआर 2000 मध्य प्रदेश 330 के प्रकरण में पति ने विवाह विच्छेद का आवेदन प्रस्तुत किया था। उसकी एक पुत्री उत्पन्न हुई थी जो पत्नी के मायके में रहती थी तथा दोनों पुत्र पढ़ रहे थे। बालकों का प्राकृतिक संरक्षक पिता है। पति से पत्नी की आय कम है इस कारण पत्नी का अभिरक्षा प्राप्त करने का दावा अस्वीकार नहीं किया जा सकता। दोनों पुत्र पिता के साथ नहीं रहते थे और बाहर पढ़ते थे ऐसी स्थिति में दोनों पुत्रों को माता की अभिरक्षा में दिया गया क्योंकि पिता को देखभाल करने का समय नहीं था।

श्रीमती चंद्रप्रभा बनाम प्रेमनाथ कपूर एआईआर 1969 दिल्ली 283 के प्रकरण में न्यायिक पृथक्करण की कार्यवाही के दौरान पत्नी ने 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों को अभिरक्षा में प्राप्त करने का आवेदन किया। आवेदन हिंदू अपर्याप्तव्यता और संरक्षकता अधिनियम 1956 के प्रावधानों के अनुसार वितरित करके निर्णीत किया जाएगा तथा 5 वर्ष से कम आयु के बच्चे की अभिरक्षा की अधिकारी माता है। यदि बच्चे के लिए आवश्यक हो तभी अभिरक्षा को परिवर्तित किया जाना चाहिए।

अमिता शर्मा बनाम राजेंद्र जैन 1996 के प्रकरण में यह मत व्यक्त किया गया कि न्यायालय को बच्चों की अभिरक्षा अनिष्ट करने की व्यापक शक्तियां है। इस प्रयोजन के लिए आवेदन अधिनियम की कार्यवाही के अधीन करना चाहिए और यह अवयस्क व्यक्तियों के संबंध में ही होना चाहिए। किसी भी वयस्क व्यक्ति को यह अधिकार है कि यदि उसने वयस्कता प्राप्त कर ली है तो वह जिसके पास जाए जहां उसकी इच्छा हो वे जाकर रहे, यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार है जो किसी भी व्यक्ति को प्राण और दैहिक स्वतंत्रता प्रदान करता है।

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 26 के अनुसार यह धारा धर्मज और अधर्मज दोनों प्रकार के पुत्र को और पुत्रियों के संबंध में प्रावधान करती है। इस धारा के अंतर्गत धर्मज और अधर्मज संतानों के बीच में कोई भी विभेद नहीं किया गया है। अधर्मज और धर्मज संतान क्या होती है इस संबंध में लेखक द्वारा पूर्व में लेख लिखा जा चुका।

सुरेंद्र कौर बनाम हरबक्श सिंह एआईआर 1984 सुप्रीम कोर्ट 1224 के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि जहां एक बालक को उसके माता-पिता की अभिरक्षा से अपहरण किया जाता है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन बंदी प्रत्यक्षीकरण कि रिट याचिका को दायर किया जाता है तब बालक की अभिरक्षा का प्रश्न विधि सम्मत अधिकारों के पीछे छूट जाता है और बालक का हित और कल्याण उससे संबंधित आदेशों को पारित करने में एकमात्र कसौटी होना चाहिए।

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 26 के अनुसार यदि किसी बालक की अभिरक्षा का प्रश्न उठता है तो ऐसी अभिरक्षा माता या पिता में से किसी को सौंपते हुए न्यायालय बालक की इच्छा को महत्वपूर्ण स्थान देता है। किसी भी बालक का हित उसके भविष्य के लिए सर्वोपरि होता है। न्यायालय कोई भी ऐसा निर्णय नहीं लेता है जो किसी बालक के भविष्य के लिए कष्टदायक सिद्ध हो। हिंदू अप्राप्तव्ययता और दत्तक ग्रहण अधिनियम के अनुसार किसी भी बालक को प्रारंभ 5 वर्ष की उम्र तक उसकी माता को ही सौंपा जाता है क्योंकि पिता भले ही नैसर्गिक संरक्षक हो परंतु किसी भी पालक के लिए उसकी माता का स्नेह है और प्रेम सर्वोपरि होता है। एक छोटे से अबोध बालक को उसकी माता से किसी भी सूरत में पृथक नहीं किया जा सकता।

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 26 बालक की अभिरक्षा के साथ ऐसे बालक की भरण पोषण की व्यवस्था भी करता है। भरण पोषण की धनराशि की मात्रा माता-पिता की आर्थिक दशा और उनके आर्थिक स्तर और बालक की आवश्यकता पर निर्भर करती है।

हीरालाल बनाम श्रीमती रवि जैन 1991 मध्य प्रदेश के एक प्रकरण में धारा 26 के प्रावधान के अनुसार न्यायालय को समय-समय पर कोई भी अंतरिम आदेश पारित करने का अधिकार होता है। विवाह विच्छेद के लिए धारा 13 के अधीन पति द्वारा की गई कार्यवाही में पत्नी द्वारा धारा 26 के अधीन दायर आवेदन पत्र घोषणा भरण पोषण के लिए ₹100 प्रति माह स्वीकार किया। पुत्र के भरण-पोषण के लिए धारा 26 के आदेश नहीं दिया जा सकता था फिर भी धारा 26 के अधीन भरण पोषण की राशि का भुगतान करने का आदेश प्राप्त था।

रयूर वेंकट बनाम श्रीमती मेरुका कमलम्मा एआईआर 1982 आंध्र प्रदेश 369 में वर्तमान धारा का निर्वाचन करते हुए न्यायालय की शक्तियों को स्पष्ट करते हुए यह बताया गया है कि विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करने के दौरान संबंधित न्यायालय धारा 26 के अधीन अवयस्क संतानों की शिक्षा के संबंध में उपबंध कर सकता है।

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