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हिंदी विधि भाग-15: बगैर वसीयत के स्वर्गवासी होने वाले हिंदू पुरुष के उत्तराधिकारियों में संपत्ति के बंटवारे का क्रम क्या होता है?

Shadab Salim
17 Sep 2020 5:18 AM GMT
हिंदी विधि भाग-15:  बगैर वसीयत के स्वर्गवासी होने वाले हिंदू पुरुष के उत्तराधिकारियों में संपत्ति के बंटवारे का क्रम क्या होता है?
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इससे पूर्व के आलेख में किसी बगैर वसीयत के मरने वाले हिंदू पुरुष की संपत्ति के उत्तराधिकार के निर्धारण के संबंध में उल्लेख किया गया था तथा उन वारिसों को बताया गया था जिन्हें इस प्रकार बगैर वसीयत के मरने वाले हिंदू पुरुष की संपत्ति हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 8 के अंतर्गत उत्तराधिकार में प्राप्त होती है। इस आलेख में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार संपत्ति जब उत्तराधिकारियों को प्राप्त होती है तो वह किस क्रम में प्राप्त होगी! इस संबंध में चर्चा की जा रही है।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 (धारा- 9)

हिंदू मृत पुरुष की संपत्ति का उत्तराधिकार उसके वसीयत नहीं किए जाने की परिस्थिति में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 8 के अंतर्गत तय होता है। अधिनियम की धारा 8 उन वारिसों का उल्लेख करती है जिन्हें इस प्रकार से किसी हिंदू पुरुष की संपत्ति प्राप्त होती है। इसके बाद का प्रश्न आता है कि यदि यह संपत्ति धारा-8 में बताए गए वारिसों को प्राप्त होगी तो उन्हें प्राप्त होने का क्रम क्या होगा! इस प्रश्न का उत्तर हमें अधिनियम की धारा 8 में प्राप्त होता है। अधिनियम की धारा 9, 10, 11, 12 और 14 इस संबंध में उल्लेख करती है कि उत्तराधिकारियों को संपत्ति का बंटवारा करने में किस क्रम और किस प्रक्रिया को अपनाया जाएगा!

निर्वसीयती मरने वाले हिंदू पुरुष की संपत्ति के वारिस-

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 8 के अनुसार हिंदू पुरुष के मरने पर उसके उत्तराधिकार के वारिसों का उल्लेख है इसमें चार प्रकार के वारिस बताए गए हैं-

1)- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की अनुसूची के वर्ग 1 के वारिस।

2)- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की अनुसूची के वर्ग 2 के वारिस।

3)- गोत्रज

4)- बंधु

यह चार प्रकार के वारिस अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत उल्लेखित किए गए हैं तथा अधिनियम की धारा 9 के अंतर्गत इन वारिसों का क्रम बताया गया है। इन वारिसों को संपत्ति किस क्रम में प्राप्त होगी इस संबंध में उल्लेख किया गया है।

इन वारिसों के संबंध में पूर्व के आलेख में स्पष्ट और अधिक उल्लेख किया जा चुका है।

वर्ग -1 के वारिसों के मध्य उत्तराधिकार का क्रम-

धारा के अनुसार जो वारिस अनुसूची के वर्ग-1 में विनिर्दिष्ट हैं वे सभी समान रूप से उत्तराधिकारी होंगे व अन्य सभी वारिसों को जो अनुसूची के वर्ग एक में उल्लेखित नहीं है अपवर्जित करेंगे अर्थात यदि अनुसूची के वर्ग -1 के वारिस विधमान है, जीवित है तो उन वारिसों को संपत्ति प्राप्त होगी तथा अनुसूची के वर्ग 2 के वारिस तथा गोत्रज और बंधु इन सभी को वर्जित कर देंगे।

वर्ग 1 के वारिस एक समूह को गठित करते हैं और वह सब मिलकर उत्तराधिकार में संपत्ति प्राप्त करते हैं। यदि वर्ग एक का एक भी वारिस होता है तो उस दशा में वर्ग 2 में उल्लेखित सभी वारिस अपवर्जित कर दिए जाते हैं। वर्ग 1 के वारिस वर्ग 2 के वारिस से अधिमान्यता प्राप्त करते हैं।

जैसे कि यदि कोई निर्वसीयती हिंदू पुरुष अपने पीछे केवल अपने एक पुत्र को छोड़कर मर जाता है तथा उसकी कोई विधवा नहीं होती हैं उसकी मां नहीं होती है और उसकी पुत्री नहीं होती है। ऐसी परिस्थिति में उस हिंदू पुरुष का वर्ग 1 का वारिस उसका पुत्र जीवित है तो सारी संपत्ति का उत्तराधिकार एक पुत्र को प्राप्त हो जाएगा, क्योंकि पुत्र वर्ग 1 का वारिस है।

एक अन्य उदाहरण के माध्यम से भी समझा जा सकता है कि यदि कोई हिंदू पुरुष बगैर वसीयत के मर जाता है तो ऐसी परिस्थिति में उसके पिता, भाई और बेटी वारिस के रूप में होते हैं। इस परिस्थिति में केवल बेटी ही वर्ग 1 की वारिस है, पिता और भाई वर्ग 2 के वारिस है तो यहां पर वर्ग 1 के वारिस उसकी बेटी को सारी संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त होगी।

सत्य चरण दत्ता बनाम उर्मिला सुंदरी दासी एआईआर 1970 सुप्रीम कोर्ट 1714 के प्रकरण में कहा गया है कि यह भी महत्वपूर्ण है कि वर्ग 1 में पुरुष-महिला वारिसगण को समान माना गया है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अंतर्गत महिला और पुरुष वारिसों के बीच में कोई भी लिंग के आधार पर विभेद नहीं किया गया है।

एक अन्य उदाहरण के माध्यम से धारा 9 के प्रावधान को समझा जा सकता है-

जैसे बगैर वसीयत के मरने वाले हिंदू पुरुष अपने पीछे पूर्व मृत पुत्र के पूर्व मृत पुत्र की पुत्री अर्थात प्रपौत्री (क) तथा पूर्व मृत पुत्र की पूर्व मृत पुत्री के पुत्र प्रपौत्र (ख) छोड़ कर मरा है। (क) वर्ग एक का वारिस है, (ख) वर्ग 2 प्रविष्ट 2 का वारिस है।

(क) और (ख) मृतक की प्रपौत्री और प्रपौत्र है किंतु (क) वर्ग एक का वारिस है इसलिए मृतक की संपूर्ण संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त करेगी और (ख) को कोई संपत्ति उसको उत्तराधिकार में नहीं मिलेगी।

वर्ग-2 के वारिसों के मध्य उत्तराधिकार का क्रम-

जिस प्रकार अनुसूची के वर्ग 1 के वारिसों के मध्य उत्तराधिकार के क्रम में समानता होती है, उसी प्रकार वर्ग 2 के वारिसों के मध्य उत्तराधिकार के क्रम में समानता नहीं होती है।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अंतर्गत जो अनुसूची दी गई है उसमें 2 वर्ग बताए गए। पहला वर्ग-1 तो दूसरा वर्ग-2।

वर्ग-1 के जो वारिस है उन सभी को समान रूप से उत्तराधिकार प्राप्त होता है, परंतु वर्ग 2 के जो वारिस है उनमें प्रविष्टियां (Entry's) दी गई हैं। पहली प्रविष्टि के वारिसों को दूसरी प्रविष्टि के वारिसों पर वरीयता प्राप्त होती है अर्थात यदि 1 प्रविष्टि का कोई वारिस जीवित है तो संपत्ति उसे जाएगी, आगे दूसरी प्रवष्टि के वारिसों को कोई संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त नहीं होगी।

इस वर्ग- 2 में (9) प्रविष्टियां है।

प्रविष्टि 1 में केवल पिता है।

दूसरी में चार वारिस है अर्थात पुत्र के पुत्री का पुत्र, पुत्र की पुत्री की पुत्री, भाई और बहन।

प्रविष्टि 3 में भी चार वारिस है- पुत्री के पुत्र का पुत्र, पुत्री के पुत्र की पुत्री, पुत्री की पुत्री का पुत्र, पुत्री की पुत्री की पुत्री।

प्रविष्टि 4 में भी चार वारिस है- भाई का पुत्र, बहन का पुत्र, भाई की पुत्री और बहन की पुत्री।

अन्य पांचो प्रविष्टियां में केवल दो-दो वारिस है।

प्रविष्टि 5 में पिता के पिता तथा माता की माता।

प्रविष्टि 6 में पिता की विधवा और भाई की विधवा।

प्रविष्टि 7 में पिता का भाई और पिता की बहन।

प्रविष्टि 8 में माता का पिता और माता की माता।

प्रविष्टि 9 माता का भाई और माता की बहन।

श्रीमती कस्तूरी देवी बनाम डिप्टी डायरेक्टर कंसोलिडेशन अन्य एआईआर 1976 उच्चतम न्यायालय 2595 के प्रकरण में कहा गया है कि निर्वसीयती मृत हिंदू के वर्ग 1 के वारिस न हो तथा वर्ग 2 की प्रविष्टि 1 के वारिस न हो तो प्रविष्टि 2 में जो चार वारिस बताए गए हैं वे सभी एक समान हक में मृतक की संपत्ति को उत्तराधिकार में प्राप्त करेंगे। प्रविष्टि 2 में चार वारिस बताए गए हैं, वह चारो यदि मृतक की मृत्यु के दिन जीवित हो तो चारों एक साथ समान रूम में मृतक की संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त करेंगे।

इसे इस प्रकार समझिए कि किसी व्यक्ति ने विवाह नहीं किया और कोई संतान गोद भी नहीं ली और उसके माता-पिता मर गए। अब इस स्थिति में वर्ग 1 का कोई भी वारिस नहीं है और वर्ग दो की प्रविष्टि 1 का वारिस अर्थात उस हिन्दू पुरूष का पिता भी नहीं है, तो अब इस स्थिति में वर्ग 2 की प्रविष्ट 2 का सहारा लेना होगा।

अब प्रविष्टि 2 में चार वारिस है जिनमे संतान नहीं होने के कारण पुत्र और पुत्री का प्रश्न ही समाप्त हो गया तो उत्तराधिकार सीधे भाई और बहन पर चला जाएगा, जितने भी एकोदर रक्त के भाई-बहन को छोड़कर अर्ध-रक्त और पूर्ण-रक्त भाई-बहन है उन सभी को समान रूप से संपत्ति का उत्तराधिकार प्राप्त होगा।

यदि भाई-बहन भी नहीं है तो फिर प्रविष्टि 3 का सहारा लेना होगा। अब प्रविष्टि 3 के वारिस भी पुत्र और पुत्री से संबंधित है सो वह भी उपलब्ध नहीं होंगे तो प्रविष्टि 4 के वारिस जो भाई और बहन के बच्चे है उन्हें समान रूप से संपत्ति प्राप्त होगी।

यह जो 9 प्रविष्ठियां दी गई हैं, इन प्रविष्टि के भीतर पहली प्रविष्टि को दूसरी प्रविष्टि पर वरीयता प्राप्त होती है अर्थात यदि 1 प्रविष्टि का कोई भी वारिस जीवित है तो ऐसी परिस्थिति में वह दूसरी प्रविष्टि के वारिसों को अपवर्जित कर देगा अर्थात दूसरी प्रविष्टि के वारिसों को कोई उत्तराधिकार प्राप्त नहीं होगा। उत्तराधिकार की समस्त संपत्ति 1 प्रविष्टि के वारिसों को प्राप्त होगी।

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