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हिन्दू विधि भाग 1 : जानिए हिन्दू विधि (Hindu Law) और हिंदू विवाह (Hindu Marriage) से संबंधित आधारभूत बातें

Shadab Salim
20 Aug 2020 4:30 AM GMT
हिन्दू विधि भाग 1 : जानिए हिन्दू विधि (Hindu Law) और हिंदू विवाह (Hindu Marriage) से संबंधित आधारभूत बातें
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भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के अंतर्गत भारत के समस्त नागरिकों को उनके धार्मिक तथा जातिगत रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार अपने व्यक्तिगत मामलों (विवाह, तलाक, भरण पोषण,उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण) से संबंधित मामले अधिनियमित किए गए।

भारत के सभी नागरिकों को अपनी धार्मिक तथा जातिगत परंपराओं और रिवाजों को अपने व्यक्तिगत मामलों में कानून का दर्जा दिया गया है। इन परंपराओं और रीति-रिवाजों को अधिनियम के माध्यम से समय-समय पर बल दिया गया है तथा इन प्रथाओं को सहिंताबद्ध किया गया है।

भारत के मुसलमानों को उनकी शरीयत के अधीन विधान दिया गया है जो उनके विवाह, तलाक तथा उत्तराधिकार से संबंधित मामलों को नियंत्रित करता है। इसी प्रकार भारत के हिंदुओं को उनका अपना सहिंताबद्ध विधान उनके व्यक्तिगत मामलों को नियंत्रित करने के लिए दिया गया है। यह हिंदू विधान हिंदू शास्त्रों और हिंदू उपविधियों के अधीन बनाया गया है।

इस विधान में चार महत्वपूर्ण अधिनियम हैं, जो हिंदुओं के व्यक्तिगत मामले अधिनियमित करते हैं। यह अधिनियम भारत की संसद द्वारा पारित किए गए हैं। इन अधिनियम में यह ध्यान रखा गया है कि कहीं पर भी यह अधिनियम हिंदू विधि की आस्थाओं पर प्रहार नहीं करें तथा जहां तक हो सके प्राचीन शास्त्रीय हिंदू विधि के अधीन रहते हुए इन अधिनियमों को सहिंताबद्ध करने का प्रयास भारत की संसद द्वारा किया गया है।

विधि समय के अनुसार बदलती रहती है, परंतु फिर भी सब विधियों में रूढ़ि और प्रथा (Custom and Usage) का स्थान ऊपर होता है। रूढ़ि और प्रथा यदि युक्तियुक्त हैं एवं अनिश्चितकालीन समय से चली आ रही हैं तो ऐसी परिस्थिति में रूढ़ि और प्रथाओं को मान्यता दी जाती है। इस बात में विशेष बल इस पर दिया जाता है कि यह रूढ़ि और प्रथाएं मौजूदा समय में भारत के संविधान के मूल उद्देश्यों के ऊपर नहीं जा रही हो।

यदि कोई रूढ़ि और प्रथा भारत के संविधान को आध्यारोहित (Overlap) कर रही है तो ऐसी परिस्थिति में उस रूढ़ि और प्रथा को सहिंताबद्ध (Codified) नहीं किया जाता है तथा उन्हें अधिनियम के अंतर्गत मान्यता नहीं दी जाती है।

भारत की संसद द्वारा हिंदू विधि से संबंधित जो 4 विशेष अधिनियम बनाए गए हैं वह निम्न हैं-

1)- हिंदू विवाह अधिनियम 1955

2)- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956

3)- हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षता अधिनियम 1956

4)- हिंदू दत्तक एवं भरण पोषण अधिनियम 1956-

ये चार अधिनियम हिंदुओं के व्यक्तिगत मामले जिन्हें, स्वीय विधि (Personal Law) कहा जाता है, उन्हें नियंत्रित करते हैं तथा उनसे संबंधित संपूर्ण विधि इस अधिनियम के अंतर्गत समावेश कर दी गई है। इन अधिनियमों का निर्माण हिंदू विधि के अधीन वेदों, शास्त्रों, उपनिषदों, मनुस्मृति श्रुतियां, स्मृतियां,पुराण, प्राचीनता, निरंतरता, युक्तियुक्तता, मानवता एवं लोकनीति तथा सार्वजनिक प्रयोग के अधीन किया गया है।

लेखक इस प्रकार के अन्य लेख 'हिंदू विधि सीरीज' के अंतर्गत लिख रहा है। यह लेख हिंदू विवाह से संबंधित आधारभूत बातों के संदर्भ में आगे लिखा जा रहा है।

इस लेख के पश्चात अन्य लेख समस्त आधुनिक हिंदू विधि से संबंधित उपबंधों पर सारगर्भित टिप्पणियों के समावेश के साथ लिखे जाएंगे।

हिंदू विवाह अधिनियम 1955

हिंदुओं के विवाह से संबंधित विधि को सहिंताबद्ध करने के उद्देश्य से भारत गणराज्य के छठे वर्ष में संसद द्वारा अधिनियमित किया गया है। यह अधिनियम हिंदुओं के विवाह से संबंधित संपूर्ण विधि उपलब्ध करता है।

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 एवं प्राचीन शास्त्रीय विधि के अंतर्गत विवाह-

प्राचीन काल से वर्तमान समय तक स्त्री और पुरुष के संबंधों में विवाह को सर्वाधिक योग्य एवं उपयोगी प्रथा माना गया है। आज भी विवाह से अधिक सार्थक प्रथा मनुष्यों के पास स्त्री और पुरुषों के संबंध को लेकर उपलब्ध नहीं है। प्राचीन हिंदू विधि में विवाह एक संस्कार माना गया है। विवाह को हिंदुओं के सोलह संस्कारों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार माना है। धर्म अनुसार मोक्ष प्राप्त करने के लिए पुत्र की उत्पत्ति आवश्यक है जिसके लिए विवाह का होना अनिवार्य है।

हिंदू विधि में पुत्र को रत्न के समतुल्य माना गया है। पुत्र का अर्थ नर्क से रक्षा करने वाला होता है। पुत्र श्राद्ध आदि कर्मों से पिता की आत्मा को नरक से मुक्ति प्रदान करता है, इसलिए कहा गया है कि पुत्रहीन की गति नहीं होती है। धार्मिक अनुष्ठानों के लिए पत्नी आवश्यक है, वंश को चलाने के लिए भी पुत्र की आवश्यकता पड़ती है अतः विवाह का होना मोक्ष हेतु धर्म अनुसार नितांत आवश्यक था और आज भी है।

हिंदू विचारधारा में विवाह का महत्व व्यक्ति की नैतिकता का चरित्र उठाने की दृष्टि से है। अन्य धर्मों में विवाह को स्त्री-पुरुष के मध्य संविदा माना है, कुछ धार्मिक औपचारिकताएं संविदा पूर्ण होने के पूर्व या बाद में संपन्न की जाती है। यह सभी धर्मों में सफलता और संपन्नता हेतु ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।

हिंदू धर्म में विवाह एक पवित्र संस्कार माना गया है, वेदों में भी विवाह की महत्ता का वर्णन किया गया है, हिंदू विवाह एक अनिवार्य संस्कार की तरह है।

प्राचीन हिन्दू विधि के अधीन विवाहित कृत्य इस लोक और परलोक दोनों में बना रहता था इसलिए हिंदू विवाह को संस्कार माना गया है। हिंदुओं में विवाह बंधन केवल इस धरती तक ही सीमित नहीं है परंतु अपितु इसका संबंध परलोक तक है यह संबंध जन्म जन्मांतर का है। यह धारणा है कि पति पत्नी के संबंध परलोक तक भी अटूट रहते हैं।

प्राचीन हिंदू समाज शास्त्रियों ने विवाह को संस्कार का विषय माना था न कि संविदा (contract) । यह बात वर्तमान हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 को ध्यान में रखकर हिंदू विवाह को संस्कार की संज्ञा देने का प्रयास किया गया है। किंतु अधिनियम की धारा 13 जोड़कर विवाह के संस्कारित स्वरूप को नष्ट भी किया गया है, अधिनियम की धारा 13 तलाक से संबंधित है। हिन्दू विवाह में तलाक जैसी कोई अवधारणा नहीं है।

फिर भी अधिकांश हिंदू विवाह के लिए धार्मिक अनुष्ठानों को अनिवार्य मानते हैं हिंदू विवाह अधिनियम के लागू हो जाने के पश्चात यह कहा जा सकता है कि वर्तमान हिंदू विवाह न तो पूर्ण संस्कार है और न ही एक संविदा ( contract) है। यह संस्कार और संविदा दोनों का मिश्रित स्वरूप है।

वर्तमान हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 5, धारा 11 और धारा 12 अर्थात वैध विवाह के लिए आवश्यक शर्तें, शून्य विवाह और शून्यकरणीय विवाह यही स्थापित करते हैं कि विवाह एक संविदा है, संस्कार नहीं।

यह संविदा की भांति ही अनियमित और अवैध हो सकता है। इन आधार पर शून्य और शून्यकरणीय हो सकता है। धारा 13 के अनुसार विवाह का विच्छेद भी किया जा सकता है जो विवाह एतदपूर्व वैध विवाह रहा है। दोनों पक्षों में संताने भी उत्पन्न हुई हैं फिर भी एक पक्ष के द्वारा कोई वैवाहिक रोग उत्पन्न हो जाने पर इसे विवाह विच्छेद की आज्ञप्ति द्वारा तोड़ा जा सकता है।

वर्तमान परिस्थितियों के अधीन रहते हुए हिंदू विवाह की प्रकृति को तो लगभग लगभग नष्ट कर दिया गया है, परंतु फिर भी हिंदू विवाह कुछ हिस्से तक संस्कार ही है इसलिए यह कहा जा सकता है कि हिंदू विवाह भले ही अधिकांशतः संविदा की भांति हो परंतु फिर भी इसमें कुछ गुण संस्कार के हैं जो प्राचीन हिंदू विवाह की भांति के है। समय के अनुरूप हिन्दू विवाह के स्वरूप को बदलना पड़ा।

हिंदू विवाह के अधीन बहुपत्नी

वर्तमान हिंदू विवाह अधिनियम 1955 हिंदुओं को बहुपत्नी को वैध नहीं मानता, परंतु शास्त्रीय विधि के अधीन हिंदू विधि में पुरुष के लिए एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति थी। कितनी ही पत्नियां एक साथ हो सकती थी। बहुपत्नी प्रथा हिंदुओं में प्रचलित थी। इस प्रथा का पूर्ण रूप से समापन हिंदू विवाह अधिनियम के लागू होने पर हो गया है। हिंदू विवाह एक अटूट और आमोद बंधन माना जाता था। इस प्रकार विवाह विच्छेद जैसी कल्पना भी हिंदू विवाह के अधीन नहीं थी।

विधवा पुनर्विवाह

वर्तमान हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अधीन हिंदू विधवा स्त्री को पुनर्विवाह करने की मान्यता प्राप्त है। परंतु शास्त्रीय विधि के अनुसार विधवा को पुनर्विवाह की मनाही थी। हिंदू विवाह पुनर्विवाह अधिनियम 1955 द्वारा विधवा विवाह को विधिमान्य कर दिया गया है। विधवा पुनर्विवाह आजकल अनुज्ञात है किंतु जैनी के प्राधिकारी आज भी इसकी अवहेलना करना ठीक समझते हैं। इनका कहना है कि जंगमो में यह प्रतिषिद्ध है और लिंगायत में यह रूढ़ि का विकास है। इसका यह भी कहना है लिंगायतओं में विधवा पुनर्विवाह का आम प्रचलन है और विवाह विच्छेद अनुज्ञेय है।

विवाह की प्रकृति चाहे कोई भी हो चाहे उसे संस्कार माना जाए या अनुबंध, यह पति-पत्नी के मध्य एक प्रस्थिति को जन्म देता है, विवाह के पक्षकार पति पत्नी की स्थिति प्राप्त करते हैं। विवाह की संतान धर्मज की संस्थिति प्राप्त करती है। लगभग सभी विधि व्यवस्थाओं में वैध विवाह के लिए दो शर्तों का होना अनिवार्य है। विवाह करने का सामर्थ्य और वैवाहिक अनुष्ठानों का संपन्न होना। हिंदुओं ने विवाह की संस्था का आदर्शीकरण किया है और उसे शालीनता एवं भव्यता प्रदान की है।

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 का अध्यारोही प्रभाव

वर्तमान अधिनियम के प्रावधानों का अधिभावी या अध्यारोही प्रभाव है अर्थात शास्त्रीय विधियां एवं सामाजिक रूढ़ियां जो अधिनियम के पूर्व से प्रचलित एवं मान्य थी निष्प्रभावी हो जाएगी यदि ही इस अधिनियम के प्रावधानों के विरुद्ध है।

इस अधिनियम की धारा 4 के अनुसार वर्तमान ऐसी सभी विधियां चाहे वह प्राचीन मूल पाठ रूढ़ियों एवं नियमों के रूप में हो यदि वे अधिनियम के उपबंधों के प्रतिकूल है तो उन्हें निरसित कर दिया जाएगा। यह अधिनियम सभी वर्तमान विधियों को निश्चित करता है किंतु इसके ऊपर ऐसे विषय लागू होंगे जिनके बारे में अधिनियम के अंतर्गत छूट दे दी गई हो और ऐसे विषयों में पहले कि भारतीय मूल पाठ की हिंदू विधि लागू होगी, यह विषय निम्न प्रकार के हैं।

1)- रूढ़ि के अधीन इस अधिनियम द्वारा मान्य हिंदू विवाह को समाप्त करने का अधिकार {धारा 29( 2)}

2)- विवाह को समाप्त करने तथा न्यायिक पृथक्करण (judicial Separation) के लिए चल रहे वाद {धारा 29 (3)}

3)- रूढ़ि द्वारा स्वीकृति

4)- प्रतिषिद्ध वर्ग के संबंधियों के मध्य हुआ विवाह धारा 5(4)

5)- सपिंडों के मध्य विवाह

6)- तलाक धारा 29 (2)

7)- स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के अंतर्गत हिंदुओं के मध्य हुआ विवाह धारा 29(4)

इन ऊपर वर्णित सभी बातों के संबंध में रूढ़ि और प्रथा को मान्यता दी गयी है। उदारहण के लिए यदि किसी विशेष प्रकार से किसी समाज की प्रथा में तलाक होता है तो वह किया जा सकेगा और उसके लिए किसी न्यायलयीन डिक्री की आवश्यकता नहीं होगी, जैसे आदिवासी समाज में इस प्रकार की रूढ़ि होती है।

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में विवाह का कोई विशेष रूप नहीं निर्धारित किया गया है। धारा 7 में केवल यह कहा गया है कि विवाह का संपादन विवाह के दोनों पक्षकारों में से किसी एक की रीति रिवाज तथा कर्मकांड के अनुसार होना चाहिए। यदि वर हिंदू है और वधू जैन है तो विवाह दोनों में से किसी एक के रीति रिवाज के अनुसार होना चाहिए परंतु जहां ऐसे रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह की क्रियाओं से सप्तपदी भी शामिल है तो विवाह उसी समय पूरा होगा तथा बंधनकारी होगा जब सातवां पग हो जाए।

नोट- अगला लेख हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के विस्तार और यह अधिनियम किन लोगों पर लागू होगा। हिंदू कौन है? तथा अधिनियम के अंतर्गत दी गई परिभाषाओं के संबंध में सारगर्भित लिखा जाएगा।

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