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हिन्दू विधि भाग- 3 : जानिए हिन्दू मैरिज एक्ट के अंतर्गत हिन्दू विवाह की शर्तें

Shadab Salim
22 Aug 2020 5:45 AM GMT
हिन्दू विधि भाग- 3 : जानिए हिन्दू मैरिज एक्ट के अंतर्गत हिन्दू विवाह की शर्तें
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हिंदू शास्त्रीय विवाह के अधीन विवाह एक महत्वपूर्ण संस्कार है। इस संस्कार को पूरा करने के लिए प्राचीन विधि में भी शर्ते अधिरोपित की गई थी। वर्तमान हिंदू विवाह अधिनियम 1955 ( The Hindu Marriage Act, 1955) आधुनिक हिंदू विधि है, जिसे प्राचीन शास्त्रीय विधि तथा आधुनिक परिक्षेप को ध्यान में रखते हुए भारत की संसद द्वारा बनाया गया है।

इस अधिनियम के अंतर्गत हिंदू विवाह किए जाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण शर्तों का समावेश किया गया है। हिंदू विवाह के अधीन इन शर्तों की पूर्ति की जाना अति आवश्यक है। अधिनियम की धारा 5 हिंदू विवाह के लिए शर्तों का उल्लेख करती है। धारा 7 में हिंदू विवाह के संस्कार बताए गए हैं तथा धारा 8 में हिंदू विवाह के रजिस्ट्रीकरण के संबंध में उपबंध दिए गए हैं।

हिंदू विवाह की शर्तें

(हिंदू विवाह अधिनियम 1955 धारा 5)

अधिनियम की इस धारा के अंतर्गत आवश्यक कतिपय विधिक शर्ते अधिरोपित की गई है। विधि सम्मत विवाह हेतु आवश्यक शर्तें वर्तमान धारा में उल्लेखित की गई है। यदि समस्त अधिनियम को समझा जाए तो हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत इन शर्तों का सीधा संबंध किसी विवाह के शून्य और शून्यकरणीय अर्थात धारा 11 और 12 से संबंधित है।

धारा 17 और 18 के अधीन हिंदू विवाह के अंतर्गत दंड का प्रावधान दिया गया है। हिंदू विवाह में कुछ कार्य ऐसे हैं, जिन्हें कारित करने पर दंड की व्यवस्था दी गई है। अधिनियम की धारा 5 के अंतर्गत कुछ शर्ते ऐसी हैं जिन का उल्लंघन करने पर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 17 और 18 के अधीन दंड की व्यवस्था की गई है।

इस अधिनियम के अंतर्गत धारा 5 के अधीन जो शर्ते उल्लेखित की गई है उन शर्तों का उल्लंघन होने पर किसी विवाह को शून्य और शून्यकरणीय घोषित किया जाता है। इन वर्णित शर्तों का यदि पालन नहीं किया गया है इसके परिणाम क्या होंगे इसका उल्लेख अधिनियम की धारा 11, 12, 17 और 18 में किया गया है।

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 5 के अंतर्गत हिंदू विवाह के संपन्न किए जाने हेतु जो शर्ते दी गई हैं वह शर्तें निम्न हैं-

पक्षकारों का हिंदू होना

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अधीन जो शर्त दी गई हैं, उनमें सबसे पहली शर्त दो हिंदू पक्षकारों का होना अति आवश्यक है। कोई भी विवाह हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अधीन तब ही संपन्न होगा जब दोनों पक्षकार हिंदू होंगे।

भीमराव लोखंडे बनाम महाराष्ट्र राज्य एआईआर 1985 सुप्रीम कोर्ट 1564 के मामले में कहा गया है कि जब विवाह के दोनों पक्षकार हिंदू हों तो ही हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत कोई हिंदू विवाह संपन्न माना जाएगा। यदि विवाह का कोई एक पक्षकार हिंदू है तथा दूसरा पक्षकार गैर-हिंदू है तो विवाह इस अधिनियम की परिधि के बाहर होगा और यह विवाह हिंदू विवाह नहीं कहलाएगा।

यह आवश्यक नहीं है कि दोनों पक्षकार एक ही वर्ण के हो तथा एक ही पंथ के हो। हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत हिंदुओं में प्रचलित जातिगत व्यवस्था के अधीन हिंदू विवाह को संपन्न किए जाने की अनिवार्यता को समाप्त किया गया है।

यह अधिनियम हिंदुओं को जाति पाती के बंधन से मुक्त करने का प्रयास करता है तथा इस अधिनियम के अंतर्गत पक्षकारों का केवल हिंदू होना आवश्यक है।

लेखक पूर्व के लेख में इस अधिनियम के अंतर्गत कौन हिंदू होगा इस संबंध में चर्चा कर चुका है।

हिन्दू विधि भाग 2 : जानिए हिंदू विवाह अधिनियम का विस्तार, यह अधिनियम कहां तक लागू होता है

यदि विवाह के पक्षकार हिंदू हैं तो उनका आपस में विवाह संपन्न हो सकता है इसके लिए किसी जाति पाती तथा पंथ विशेष की कोई आवश्यकता नहीं होगी।

प्राचीन शास्त्रीय हिंदू विवाह समय की मांग के अनुसार जातियों के आधार पर हिंदू विवाह को मान्यता देता था, परंतु आधुनिक हिंदू विवाह जातियों के आधार पर हिंदू विवाह में कोई बाध्यता नहीं रखता है। जगन्नाथम बनाम सविथम्मा एआईआर 1972 आंध्र प्रदेश 377 के मामले में यह बात कही गई है कि हिंदू विवाह किसी जातिगत व्यवस्था की अनिवार्यता का समर्थन नहीं करता है।

एक पति या एक पत्नी का होना

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 5 के अंतर्गत यह महत्वपूर्ण शर्त अधिरोपित की गई है कि हिंदू विवाह तभी संपन्न होगा जब विवाह के समय दोनों पक्षकारों में से न तो वर कि कोई पत्नी जीवित होगी और न ही वधू का कोई पति जीवित होगा। प्राचीन शास्त्रीय हिंदू विवाह बहुपत्नी को मान्यता देता था परंतु आधुनिक हिंदू विवाह अधिनियम 1955 बहुपत्नी का उन्मूलन करता है।

लीला गुप्ता बनाम लक्ष्मी नारायण 1978 (3) सुप्रीम कोर्ट 558 के मामले में कहा गया है कि दांपत्य युगल शब्द से आशय पूर्व दांपत्य युगल से नहीं है यदि वर या वधू की पत्नी या पति जीवित नहीं है तो उन्हें पुनर्विवाह करने से वर्जित नहीं किया जा सकता है। एक कुंवारा व्यक्ति जिसने विवाह के समय तक विवाह न किया हो एक विधवा यह विधुर या विवाह विच्छेद के उपरांत ऐसा व्यक्ति विवाह विधिक रुप से रचा सकता है यदि अन्य सभी विनिर्दिष्ट शर्तों का पालन किया गया जाए।

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 5 के अधीन जिस एक पत्नी के सिद्धांत का पालन किया गया है उसकी संवैधानिक वैधता पर प्रश्न आए थे। रामप्रसाद सेठ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एआईआर 1961 इलाहाबाद 334 में प्रार्थी ने कहा कि उसकी स्त्री से उसे कोई पुत्र नहीं हुआ है, उसे हिंदू धर्म के अनुसार परलोक सुख के लिए पुत्र होना अनिवार्य है क्योंकि मृत्यु के उपरांत सभी अनुष्ठान पुत्र के द्वारा किए जाते हैं तथा पुत्र हिंदू धर्म के अधीन नर्क से मुक्ति का कारण बनता है।

अतः वह पुत्र प्राप्ति के लिए दूसरा विवाह करना चाहता है परंतु हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 उसे इस प्रकार के विवाह करने से रोकती है। यह रोक संविधान के अनुच्छेद 25 (1)के द्वारा प्रदत्त उसके धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार का उल्लंघन करती है।

न्यायालय ने कहा कि पुत्र लाभ के लिए प्रार्थी दूसरा विवाह करना चाहता है जो कि हिंदू विधि के अधीन आवश्यक नहीं है, क्योंकि हिंदू विधि दत्तक पुत्र को औरस पुत्र की भांति ही सभी अनुष्ठान किए जाने की अधिकारिता प्रदान करती है तथा कोई औरस पुत्र भी किसी व्यक्ति के लिए नरक से मुक्ति का प्रदाता बन सकता है। हिंदू दत्तक ग्रहण अधिनियम 1956 के अधीन प्रार्थी दत्तक ग्रहण कर सकता है इसके लिए दूसरा विवाह किए जाने की कोई आवश्यकता नहीं।

न्यायालय के इस निर्णय ने उन हिंदू स्त्रियों के अधिकारों की रक्षा की है जो स्त्रियां किसी शारीरिक दुर्बलता के कारण संतान को जन्म नहीं दे पाती है। इस निर्णय ने आधुनिक हिंदू विधि को समृद्ध किया है।

श्रीमती जमुना बाई अंतरराव माधव बनाम अंतरराव शिवराम एआईआर 1988 सुप्रीम कोर्ट 644 के प्रकरण में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 के खंड (1) की व्याख्या करते हुए यह कहा है कि विवाह के समय वर या वधू की कोई पति या पत्नी जीवित नहीं होना चाहिए।

विवाह के पक्षकारों की सहमति हेतु मानसिक स्थिति

विवाह का संबंध पति और पत्नी के समक्ष अनेक अधिकारों और दायित्व को उत्पन्न करता है। ऐसी स्थिति में विवाह के पक्षकारों की मानसिक स्थिति संतुलित होना चाहिए। वर्तमान अधिनियम की धारा 5 के उपखंड (2) के अनुसार विवाह के लिए यह शर्त अधिरोपित की गई है कि विवाह के समय पक्षकारों की मानसिक स्थिति विवाह की प्रकृति और परिणामों को समझने के योग्य हो। धारा 5 का खंड 2 विवाह विधि संशोधन अधिनियम 1976 के द्वारा बदला गया है।

इस अधिनियम में यह प्रावधान है कि विवाह के समय दोनों पक्षकारों में से कोई पक्षकार चित्त विकृति के कारण विधिमान्य सम्मति देने में असमर्थ न हो। इस प्रकार के या इस सीमा तक मानसिक विकार से ग्रस्त न हो कि वह विवाह और संतान उत्पत्ति के अयोग्य हो। उसे बार-बार उन्मत्तता का दौरा न पड़ता हो। इस प्रावधान का यह अर्थ है कि विवाह के पक्षकार पागल जड़बुद्धि मनबुद्धि नहीं हो।

यदि पागलपन के आधार पर विवाह को शून्य की डिक्री की मांग की गई है तथा ऐसे विवाह को बातिल करार दिए जाने की मांग की गई है तो पागलपन को सिद्ध करने का भार ऐसी मांग करने वाले याचिकाकर्ता पर होगा।

उच्चतम न्यायालय ने राम नारायण गुप्ता बनाम रामेश्वरी गुप्ता एआईआर 1988 सुप्रीम कोर्ट 2226 के वाद में उल्लेख किया है कि यदि पागलपन विवाह के संपन्न होने के पश्चात उत्पन्न होता है तो ऐसी दशा में विवाह बातिल नहीं समझा जाएगा। विधि की अवधारणा यह है कि प्रत्येक व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ है उसमें दांपत्य सूत्र में बनने की योग्यता है।

इस प्रकरण के बाद सतीश चंद्र बनाम यूनियन ऑफ इंडिया 1987 के प्रकरण में कहा गया है कि यदि पागल व्यक्ति का विवाह कर दिया गया हो तो विवाह विच्छेद की कार्यवाही की जा सकेगी, क्योंकि इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार अस्वस्थ मस्तिष्क का व्यक्ति विधिमान्य रूप से विवाह नहीं कर सकता है।

हिंदू विवाह अधिनियम विवाह की सहमति हेतु तो कोई प्रावधान नहीं करता है लेकिन इस विवाह के अनुष्ठान किए जाने के लिए विवाह के पक्षकारों की सहमति होना अनिवार्य है। धारा 12 के अंतर्गत कपट के आधार पर प्राप्त की गई सहमति से संबंध हुए विवाह को शुन्यकरणीय घोषित किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त उस स्थिति में भी उसे विवाह के लिए उपयुक्त पक्षकार नहीं माना जा सकता जब वह उस सीमा तक मानसिक बीमारी से पीड़ित है कि उसे विवाह तथा संतान पैदा करने के योग्य भी नहीं माना जा सकता।

पक्षकारों की न्यूनतम आयु

हिंदू विवाह के लिए पक्षकारों की न्यूनतम आयु निर्धारित की गई है। बाल विवाह निरोधक संशोधन अधिनियम के बाद सभी प्रकार के विवाह में न्यूनतम आयु तय कर दी गई है। 2 हिंदुओं के मध्य हिंदू विवाह तभी अनुष्ठापित किया जा सकता है जब वर 21 वर्ष की आयु और वधु ने 18 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है। यदि किन्हीं पक्षकारों का विवाह इस शर्त की अवहेलना करके कर दिया गया है तो न्यायालय द्वारा इस प्रकार के विवाह को पक्षकारों में से किसी एक के द्वारा याचिका लाए जाने पर शून्य घोषित किया जा सकता है।

प्रतिषिद्ध नातेदारी

प्रतिषिद्ध नातेदारी का हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत कड़ाई से पालन किया गया है। कोई भी हिंदू विवाह तभी संपन्न माना जाता है, जब पक्षकारों के मध्य प्रतिषिद्ध नातेदारी की डिग्रियां नहीं हो। प्रतिषिद्ध नातेदारी क्या होती हैं इस संबंध में लेखक द्वारा पूर्व के लेख में उल्लेख किया जा चुका है। यदि पक्षकारों में कोई प्रतिषिद्ध नातेदारी होती है तो इस आधार पर अधिनियम की धारा 11 के अनुसार विवाह को शून्य घोषित किया जा सकता है। यदि इस प्रकार की शर्त का पालन नहीं किया गया और कोई विवाह प्रतिषिद्ध नातेदारी के होते हुए भी हिंदू विवाह के अधीन संपन्न कर दिया गया तो इस प्रकार का विवाह याचिका लाए जाने पर शून्य घोषित किया जाएगा तथा प्रारंभ से ही इस प्रकार के विवाह की कोई विधिमान्यता नहीं होगी।

इस शर्त का अपवाद है कि यदि कहीं इस प्रकार की प्रतिषिद्ध नातेदारी में विवाह को मान्यता प्राप्त है रूढ़ि और प्रथाओं के अधीन इस प्रकार के विवाह का प्रचलन रहा है तो वहां इस शर्त की अनिवार्यता आवश्यक नहीं होगी। कामाक्षी बनाम 'के मणि' 1971 के प्रकरण में कहा गया है कि यदि किसी प्रथा के अधीन इस प्रकार की प्रतिषिद्ध नातेदारी में विवाह को मान्यता प्राप्त है तो विवाह पर कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा तथा अधिनियम की धारा 5 के अधीन यह शर्त लागू नहीं होगी, यह प्रकरण मद्रास का था तथा मद्रास के हिंदुओं में निकट के संबंधियों में विवाह की प्रथा रही है।

प्रथा और रूढ़ियों को कब मान्यता प्राप्त होगी इस संबंध में लेखक द्वारा पूर्व के लेख में उल्लेख किया जा चुका है।

सपिंड नहीं होना

अधिनियम की धारा 5 के अधीन किसी भी हिंदू विवाह के संपन्न होने के लिए विवाह के पक्षकारों का आपस में सपिंड संबंध का नहीं होना चाहिए। यदि विवाह के पक्षकार आपस में सपिंड संबंध के होते हैं तो इस प्रकार का विवाह अधिनियम की धारा 11 के अनुसार शून्य होता है। सपिंडा रिलेशनशिप का हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत कड़ाई से पालन किए जाने का प्रयास किया गया है।

सपिंड नातेदारी के अंदर वाले दो हिंदू पक्षकारों के बीच विवाह प्रारंभ से ही कोई भी वजूद नहीं रखता है तथा इस प्रकार का विवाह किए जाने पर तो अधिनियम के अंतर्गत ही दंड का भी प्रावधान रखा गया है। अर्थात हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत इस विवाह को दंड का रूप दिया गया है। शास्त्रीय प्राचीन हिंदू विवाह में भी सपिंड नातेदारी के भीतर विवाह किए जाने को अत्यंत बुरा और राक्षसी कृत्य समझा जाता है।

सपिंड नातेदारी के संबंध में लाइव लॉ के ही एक पूर्व के लेख में उल्लेख किया जा चुका है।

हिंदू विवाह के लिए संस्कार

अधिनियम के अनुसार किसी भी हिंदू विवाह के संपन्न किए जाने के लिए उसके संस्कारों का होना अति आवश्यक होता है। इन संस्कारों का उल्लेख अधिनियम की धारा 7 के अंतर्गत प्राप्त होता है। इस धारा के अनुसार कोई भी हिंदू विवाह उस प्रकार से अनुष्ठापित किया जा सकता है जिस परंपरा और रीति-रिवाज के अनुसार हिंदू विवाह को अनुष्ठापित्त किया जाता है। यदि किसी समाज में सप्तपदी की परंपरा है तब सातवें पग के होने पर विवाह संपन्न होगा।

आर्य समाज के भीतर होने वाले विवाहों में भी अग्नि के फेरे लिए जाते हैं परंतु अग्नि के फेरे चार होते हैं यदि आर्य समाज में 4 अग्नि के फेरे लिए जाने की परंपरा रही है तो हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन इस परंपरा को भी स्वीकार किया गया है और चार फेरों में भी हिंदू विवाह स्थापित हो जाएगा तथा जयमाला अंगूठी इत्यादि पहना देने से भी हिंदू विवाह के कर्मकांड संपन्न हो जाएंगे। किसी भी हिंदू विवाह के संपन्न होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वहां कोई पंडित या पुरोहित उपस्थित हों, कोई भी हिंदू विवाह लोगों की मौजूदगी में वर वधु के द्वारा एक दूसरे को माला पहनाकर अंगूठी पहना कर और ताली बजाकर भी संपन्न किया जा सकता है।

सामान्यत: माना जाता है कि जब भी कोई हिंदू विवाह संपन्न किया जाए तब कम से कम सप्तपदी जैसी प्रक्रिया को पूरी कर लिया जाना चाहिए बगैर सप्तपदी के विवाह संपन्न करने पर विवाह को सिद्ध करने में अत्यधिक परेशानी का सामना करना होता है। यदि सप्तपदी कर ली जाए तो यह विवाह का आदर्श रूप होगा या फिर उस रूढ़ि या प्रथा का पालन कर लिया जाए जिस रूढ़ि या प्रथा से विवाह के दोनों में से कोई पक्षकार आते हैं, जैसे कई समाजों में मात्र पुष्प माला से भी विवाह संपन्न हो जाता है। ऐसी कोई भी रूढ़ि या प्रथा होना चाहिए जिससे विवाह होता हो।

हिंदू विवाह का रजिस्ट्रेशन

किसी हिंदू विवाह को सामान्य तौर पर तो रजिस्ट्रेशन की कोई आवश्यकता नहीं होती है परंतु इस प्रकार के विवाह को सुविधाजनक बनाने हेतु अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत हिंदू विवाह को रजिस्टर किए जाने हेतु प्रावधान कर दिए गए हैं। इस हेतु अलग-अलग राज्यों को अपने नियम बनाने की शक्ति दी गई है। मध्य प्रदेश, पंजाब, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक केरल और राजस्थान, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य इस प्रकार के नियम बना चुके हैं।

हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह का पंजीयन अनिवार्य न होकर वैकल्पिक प्रावधान है। विशेष विवाह अधिनियम 1954 के अंतर्गत सभी प्रकार के विवाह के पंजीकरण का प्रावधान है। एक हिंदू विवाह को भी विशेष विवाह अधिनियम के अधीन पंजीकृत कराया जा सकता है किंतु पंजीकरण के उपरांत हिंदू विवाह सिविल विवाह के रूप में माना जाएगा। ऐसा विवाह वर्तमान अधिनियम के प्रावधानों से शासित नहीं होगा यदि किसी विवाह को हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत रजिस्टर कराया जाता है तब ही वह विवाह के प्रावधानों के संबंध में हिंदू विवाह अधिनियम के नियम लागू होंगे यदि किसी विवाह को विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत रजिस्टर करा दिया गया तो फिर तलाक के नियम भी उसी अधिनियम के अंतर्गत लागू होंगे।

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