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हिंदू विधि भाग 16 : बगैर वसीयत के स्वर्गवासी होने वाली हिंदू नारी की संपत्ति का उत्तराधिकार (Succession) कैसे तय होता है

Shadab Salim
19 Sep 2020 3:42 PM GMT
हिंदू विधि भाग 16 : बगैर वसीयत के स्वर्गवासी होने वाली हिंदू नारी की संपत्ति का उत्तराधिकार (Succession) कैसे तय होता है
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हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 ( Hindu Succession Act, 1956) हिंदू पुरुष और हिंदू स्त्रियों में किसी प्रकार का उत्तराधिकार के संबंध में कोई भेदभाव नहीं करता है। यह विधि प्राकृतिक स्नेह और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है। भारत की संसद द्वारा इसका निर्माण सामाजिक समरसता और समानता के आधार पर किया है।

इस अधिनियम के अंतर्गत हिंदू पुरुष की संपत्ति को उत्तराधिकार में बांटने का अलग वैज्ञानिक तरीका है जिसका वर्णन इस अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत किया गया है। लेखक द्वारा इस अधिनियम की धारा 8 पर सारगर्भित टीका टिप्पणी कर दी गई है जिस के संबंध में आलेख लाइव लॉ वेबसाइट पर उपलब्ध है।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अंतर्गत जिस प्रकार पुरुष को संपत्ति के उत्तराधिकार के संबंध में अधिकार दिए गए हैं। इसी प्रकार हिंदू नारी यदि निर्वसीयती स्वर्गवासी होती है तो ऐसी परिस्थिति में उसकी संपत्ति के उत्तराधिकार के नियमों का निर्धारण इस अधिनियम की धारा 15 के अंतर्गत किया गया है तथा धारा 16 के अंतर्गत हिंदू नारी की संपत्ति के उत्तराधिकार के वारिसों का क्रम उल्लेखित किया गया है।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 (धारा- 15)

यह इस अधिनियम की दूसरी सर्वाधिक महत्वपूर्ण धारा है। इस धारा के अंतर्गत हिंदू नारी के उत्तराधिकार के संबंध में साधारण नियमों का उल्लेख किया गया है।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के पारित होने के बाद किसी हिंदू नारी के पास तीन प्रकार की संपत्तियां होती हैं।

पिता या माता से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति-

पति या ससुर से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति-

अन्य सभी प्रकार की संपत्ति-

जैसा कि यह साधारण नियम है किसी भी हिंदू व्यक्ति को अपने को उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति और अपने द्वारा अर्जित की गई संपत्ति वसीयत करने का अधिकार प्राप्त है। वह अपनी संपत्ति को कहीं भी वसीयत कर सकता है। कोई भी कानून या नियम किसी व्यक्ति को अपनी संपत्ति के संबंध में किसी प्रकार की वसीयत करने से नहीं रोकता है। कोई भी हिंदू पुरुष या स्त्री अपनी संपत्ति कहीं भी वसीयत कर सकता है तथा किसी हिंदू पुरुष की संताने यह दावा नहीं कर सकती के वह उसकी संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त करने के अधिकारी हैं क्योंकि किसी भी हिंदू पुरुष या स्त्री को आत्यंतिक रूप से अधिकार प्राप्त है कि वह अपनी संपत्ति कहीं पर भी वसीयत कर दे।

परंतु यदि हिंदू पुरुष या स्त्री अपनी संपत्ति के संबंध में कोई वसीयत छोड़कर नहीं मरता है तब ऐसी स्थिति में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के प्रावधानों लागू होते हैं।

इन प्रावधानों के अंतर्गत पुरुष के लिए अलग नियमों का निर्धारण किया गया है तथा हिंदू नारी के लिए अलग नियमों का निर्धारण किया गया है। उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 15 के अंतर्गत हिंदू नारी की संपत्ति के अधिकार के नियम वर्णित किए गए हैं।

इस अधिनियम की धारा 30 के अंतर्गत कोई भी हिंदू नारी अपनी संपत्ति कहीं भी वसीयत कर सकती है परंतु वह कोई वसीयत छोड़कर नहीं मरती है तो ऐसी स्थिति में धारा 15 के अनुसार उसकी संपत्ति का उत्तराधिकार तय होता है।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 15 के अनुसार किसी हिंदू नारी की निर्वसीयती मृत्यु होने की परिस्थिति में उसकी संपत्ति निम्नांकित व्यक्तियों को न्यागत होती है-

1)- पुत्र पुत्री और पति को

2)- पति के वारिसों को

3)- माता और पिता को

4)- पिता के वारिसों को

5)- माता के वारिसों को

किसी भी हिंदू नारी के संपत्ति के उत्तराधिकार के संबंध में क्रम वही होता है जिस प्रकार हिंदू पुरुष की संपत्ति के उत्तराधिकार में क्रम होता है। सबसे पहले संपत्ति पुत्र, पुत्री और पति को न्यागत होती है। यदि मरने वाली हिंदू नारी के पुत्र, पुत्री और पति नहीं है ऐसी परिस्थिति में संपत्ति पति के वारिसों को न्यागत होती है। यदि पति के वारिस भी उपलब्ध नहीं है तो मरने वाली हिंदू नारी की संपत्ति उसके माता और पिता को न्यागत होती है। यदि माता और पिता भी उपलब्ध नहीं है तो चौथे उत्तराधिकारी पिता के वारिस होते हैं। यदि पिता के वारिस भी नहीं है ऐसी परिस्थिति में पांचवें उत्तराधिकारी माता के वारिस होते हैं।

इस धारा के अंतर्गत कुछ विशेषताएं यदि कोई संपत्ति जिसका उत्तराधिकार हिंदू नारी को अपने माता-पिता से प्राप्त हुआ हो मृतक के पुत्र या पुत्री के अभाव में उपर्युक्त वारिसों को क्रम से न्यागत न होकर पिता के वारिसों को न्यागत होगी। इसी प्रकार पति या ससुर से प्राप्त संपत्ति भी यदि मृतक के पुत्र या पुत्री न हो तब पति के वारिसों को न्यागत होगी।

इस धारा में न्याय करने का प्रयास किया गया है वह संपत्ति उन्हीं लोगों को न्यागत करने के प्रयास किए गए हैं जिस तरफ से संपत्ति प्राप्त होती है। सबसे पहला उत्तराधिकार तो पुत्र और पुत्रियों का है यदि पुत्र और पुत्री उपलब्ध नहीं है ऐसी परिस्थिति में उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति उन्हीं लोगों को न्यागत हो जाती है जहां से वह संपत्ति हिंदू नारी को प्राप्त होती है।

उदाहरण के लिए एक हिंदू नारी को उसके ससुर से उत्तराधिकार में कोई भूमि का टुकड़ा प्राप्त हुआ है अब इस हिंदू नारी की कोई संतान उपलब्ध नहीं है तथा संतान के कोई अपत्य भी नहीं है ऐसी परिस्थिति में ससुर से प्राप्त होने वाली संपत्ति पति के नहीं होने की स्थिति में ससुर के वारिसों को न्यागत हो जाएगी।

किसी हिंदू नारी को संपत्ति पति से प्राप्त होने की परिस्थिति में पति के वारिसों को न्यागत हो जाएगी। अपने पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त होने की परिस्थिति में पिता के वारिसों को न्यागत हो जाएगी परंतु यदि कोई संपत्ति किसी निर्वसीयती मरने वाली हिंदू नारी ने स्वयं अर्जित की है तो ऐसी परिस्थिति में उसकी संपत्ति के लिए नियम यही होगा कि सबसे पहले संपत्ति के सबसे पहले उत्तराधिकार को न्यागत होगी। उसके बाद दूसरे उत्तराधिकार न्यागत होगी उसके बाद तीसरे उत्तर अधिकारियों को न्यागत होगी। पहले उत्तराधिकारी दूसरे उत्तराधिकारियों को अपवर्जित कर देते है।

पुत्र से आशय-

इस अधिनियम के अंतर्गत हिंदू नारी के पुत्र और पुत्रियों से आशय उसकी कोख से प्राप्त होने वाले पुत्र और पुत्री तथा उसके पति द्वारा दत्तक गोद लिए गए पुत्र और पुत्रियां शामिल है। यदि कोई हिंदू स्त्री के 2 पुत्र हैं और उन दोनों के पिता अलग-अलग हैं ऐसी परिस्थिति में हिंदू नारी की संपत्ति उसके दोनों ही पुत्रों को प्राप्त होगी। उसके सौतेले पुत्र अर्थात यदि उसके पति ने किसी अन्य स्त्री से कोई पुत्र या पुत्री को जन्म दिया है तो ऐसी परिस्थिति में यह धारा लागू नहीं होती है।

हिंदू दत्तक ग्रहण अधिनियम के अंतर्गत जब कोई पति या पत्नी किसी दत्तक का ग्रहण करते हैं तो ऐसी परिस्थिति में पत्नी की भी सहमति होती है, यदि किसी हिंदू पुरुष ने कोई पुत्र दत्तक लिया है तो वह दत्तक पुत्र हिंदू नारी की संपत्ति में वही उत्तराधिकार रखता है जो उसकी कोख से पैदा होने वाला पुत्र रखता है। लक्ष्मण सिंह बनाम कृपा सिंह एआईआर 1986 सुप्रीम कोर्ट 1616 के प्रकरण में यह अभिनिर्धारित हुआ है कि जहां तक सौतेले पुत्र का प्रश्न है तो वह धारा 15 (1) (क) के विस्तार के अंतर्गत नहीं आता है।

कंपो बाई बनाम देवीराम 1982 राजस्व निर्णय 14 मध्यप्रदेश के प्रकरण में यह कहा गया है कि धारा 15 (1) के खंड (क) के अधीन पुत्रगण पुत्रियों का जो संदर्भ आया है उसके अधीन महिला स्वयं के पुत्रगण पुत्रियों से है। उसके पति के अन्य पत्नी के पुत्र एवं पुत्रियां सम्मिलित नहीं है। उपखंड के अधीन सौतेले पुत्र नहीं आएंगे और सौतेली पुत्रियां भी नहीं आएगी।

पति

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 15 के अनुसार किसी हिंदू नारी के वारिस सबसे पहले उसके पुत्र, पुत्रियां और पति है परंतु यहां पर पति की स्थिति में फेर उलझा हुआ है। वह यह है कि धारा 15 की उपधारा दो यह प्रावधान करती है कि यदि किसी हिंदू नारी को संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है और उसका कोई पुत्र या पुत्री नहीं है तो ऐसी परिस्थिति में व संपत्ति उसी ही व्यक्ति के वारिसों को न्यागत हो जाती है जिससे संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई।

उदाहरण के लिए यदि किसी स्त्री को पिता से उत्तराधिकार में कोई संपत्ति प्राप्त होती है। स्त्री की कोई संतान नहीं होती है तथा कोई दत्तक गोद नहीं लेती है और निर्वसीयती मर जाती है अब ऐसी परिस्थिति में उसे जो उत्तराधिकार में संपत्ति प्राप्त हुई थी वह पुनः उसके पिता के वारिसों को न्यागत हो जाएगी न कि उसके पति को उत्तराधिकार में प्राप्त होगी।

सीधा सा अर्थ यह है कि संपत्ति उत्तराधिकार में जिस पक्ष से प्राप्त हुई है उस पक्ष के वारिसों को ही न्यागत होगी। राधिका मेहता बनाम अनुराग मेहता 1994 (5) सुप्रीम कोर्ट 761 में यह कहा गया है कि निर्वसीयती हिंदू नारी ने अपनी माता और नाना से संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त की थी तो यह संपत्ति मृतक की पुत्री उत्तराधिकार में प्राप्त करेगी और उसका पति धारा 15 (2) (क) के प्रावधान के अनुसार उत्तराधिकार में संपत्ति प्राप्त नहीं करेगा।

इस धारा की प्रकृति के अनुसार पति अपनी पत्नी द्वारा छोड़ी गई संपत्ति का उत्तराधिकारी उस दशा में नहीं होगा जहां उसकी पत्नी ने अपने पिता से संपत्ति का आयोजन किया था। पति उस ही परिस्थिति में संपत्ति का उत्तराधिकारी बनेगा जिस परिस्थिति में संपत्ति या तो उसके द्वारा पत्नी को दी गई थी या फिर पत्नी द्वारा स्वयं अर्जित की गई थी।

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