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सम्पत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 3: सूचना क्या होती है और कितने प्रकार की होती है
संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 भारत में अधिनियमित सिविल विधियों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस सीरीज के अंतर्गत लेखक द्वारा संपत्ति अंतरण अधिनियम के महत्वपूर्ण प्रावधानों पर आलेख लिखे जा रहे हैं इस श्रंखला में इस आलेख के अंतर्गत इस अधिनियम की धारा 3 जोकि इस अधिनियम में उपयोग किए गए महत्वपूर्ण शब्दों की परिभाषाएं तथा स्पष्टीकरण प्रस्तुत करती है का वर्णन किया जा रहा है। इससे पूर्व के आलेख में इस ही धारा से संबंधित स्थावर संपत्ति शब्द पर विस्तारपूर्वक टीका टिप्पणी की गई थी। इस आलेख के अंतर्गत संपत्ति...
बाल विवाह निषेध और महत्वपूर्ण कानून
भारत में बाल विवाह सदियों से प्रचलित है और यह किसी धर्म विशेष से नहीं होकर सभी धर्मों, समुदायों और वर्गों में लम्बे समय से चल रही एक प्रथा है। वर्तमान समय में यह प्रथा ग्रामीण इलाकों में ज्यादा देखने को मिलती है। बाल विवाह के पीछे कारणों में मुख्यतः गरीबी, अशिक्षा, पितृसत्ता जैसे कारक हैं। बाल विवाह से तात्पर्य है उस विवाह से जब बालक अथवा बालिका अथवा दोनों विवाह के लिए निर्धारित उम्र से काम के हों। वर्तमान समय में बालक के लिए 21 साल एवं बालिका के लिए 18 साल निर्धारित है। यदि कोई भी व्यक्ति इस...
जानिए सिविल मुक़दमे कहां दायर किए जा सकते हैं?
मुकदमा दायर करने के दौरान सर्व प्रथम यह निर्धारित करना आवश्यक है कि "मुकदमा कहाँ एवं किस कोर्ट / न्यायालय में दाखिल किया जायेगा?" कोई भी मुकदमा किसी भी स्थान / न्यायालय में दाखिल नहीं किया जा सकता है। प्रत्येक न्यायालय को कुछ निश्चित प्रकार के मुक़दमे तय करने का अधिकार होता है। आमतौर पर मुक़दमे उनकी प्रकृति के आधार पर विभिन्न प्रकार के होते हैं। जैसे संपत्ति, अनुबंध, अपकार, वैवाहिक कार्यवाही, आदि। किसी मुकदमे का विचार करने, निर्णय लेने और निर्णय लेने का न्यायालय का अधिकार-क्षेत्र वाद की...
सम्पत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 2: स्थावर सम्पत्ति क्या होती है
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 मूल रूप से अचल संपत्तियों के अंतरण के विनियमन हेतु निर्माण किया गया है। इस अधिनियम में कहीं भी चल संपत्ति की परिभाषा नहीं है जबकि इस अधिनियम में धारा 3 के अंतर्गत स्थावर संपत्ति अर्थात अचल संपत्ति की परिभाषा प्रस्तुत की गई है। इस अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत कुछ महत्वपूर्ण शब्दों की परिभाषाओं को प्रस्तुत किया गया है और यह धारा इस अधिनियम की अत्यधिक महत्वपूर्ण धाराओं में से एक हैं।इस धारा में स्थावर संपत्ति पदावली का प्रयोग बिना यह स्पष्ट किए हुए की संपत्ति क्या है...
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 1: अधिनियम का सामान्य परिचय
इस आलेख के माध्यम से संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 का सामान्य परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है तथा इसके बाद के आलेखों में इस अधिनियम से संबंधित संपूर्ण महत्वपूर्ण विषयों पर सारगर्भित टीका टिप्पणी की जाएगी। यह समझने का प्रयास किया जाएगा कि इस अधिनियम के महत्वपूर्ण विषय किस संबंध में उल्लेख कर रहे हैं तथा इस अधिनियम में महत्वपूर्ण धाराएं कौन-कौन सी है।संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882-संपत्ति एक लंबे समय से जटिल विषय रहा है। संपत्ति किसे माना जाए तथा किसे नहीं माना जाए इस विषय पर समय-समय पर समाज में नित नए...
मध्यस्थता एवं सुलह (संशोधन) अधिनियम [Arbitration and Conciliation (Amendment) Act], 2019 भाग 4: मध्यस्थ की नियुक्ति कैसे होती है (Appointment of Arbitrator)
मध्यस्थता करार के संबंध में पिछले आलेख में विस्तारपूर्वक उल्लेख किया गया था, इस आलेख के अंतर्गत मध्यस्थ की नियुक्ति के संबंध में अध्ययन किया जा रहा है।मध्यस्थ की नियुक्ति-मध्यस्थ की नियुक्ति मध्यस्थता करार के प्रावधानों के अनुसार की जाती है। मध्यस्थ की नियुक्ति तीन प्रकार से की जा सकती है-1. पक्षकारों द्वारा-2. निर्दिष्ट प्राधिकारी द्वारा-3. मध्यस्थता अधिकरण द्वारा-1. पक्षकार द्वारा मध्यस्थ की नियुक्ति-जहाँ मध्यस्थ या मध्यस्थों को नियुक्ति पक्षकारों द्वारा की गई हो, वहां वह तत्काल को मध्यस्य...
केशवानंद भारती मामले से जुड़े 50 रोचक तथ्य
केशवानंद भारती श्रीपादगलवरु एंड अन्य बनाम केरल राज्य एंड अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय इतिहास की एक ऐसी घटना है जो कल्पना से परे है। ऐसा कहा जाता है कि इस निर्णय ने भारत के संविधान की रक्षा की और भारत में अधिनायकवादी शासन या एक दलीय सरकार के शासन को आने से रोका।13 जजों की बेंच के 7 जजों के बहुमत के फैसले ने गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य के मामले में 11 जजों की बेंच के फैसले को पलट दिया, जिसमें 24वें, 25वें और 29वें संविधान संशोधन की वैधता को बरकरार रखा था, सिवाय अनुच्छेद 31-सी के...
भारत का संविधान और आपातकाल
भारत के संविधान के अंतर्गत आपातकालीन समय के लिए कुछ व्यवस्थाएं की गई हैं। इन व्यवस्थाओं के अंतर्गत आपातकालीन परिस्थितियों में भारत के संविधान की स्थिति बदल जाती है। भारत का संविधान एक संघीय संविधान है, राज्यों का एक संघ कहा जा सकता है।संघ को अलग शक्तियां और भारत के राज्यों को अलग शक्तियां दी गई है परंतु भारत के संविधान की बनावट से यह प्रतीत होता है कि यहां संघ अधिक शक्तिशाली है। भारत के संविधान में आपात उपबंध का समावेश कर संकटकाल में भारत का संविधान संघात्मक से एकात्मक संविधान में बदल जाता है।...
मध्यस्थता एवं सुलह (संशोधन) अधिनियम [Arbitration and Conciliation (Amendment) Act], 2019 भाग 3: मध्यस्थता करार क्या होता है
पिछले आलेख में मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम से संबंधित विशेष शब्दों का अध्ययन किया गया था, इस आलेख में 'मध्यस्थता करार' के संबंध में विस्तार से अध्ययन किया जा रहा हैइस अधिनियम की धारा 7 मध्यस्थता करार को परिभाषित नहीं करती है। धारा 7 की उपधारा (1) उल्लेखित करती है कि मध्यस्थता करार एक ऐसा करार हैं जो विवाद के मामलों में यह प्रावधान करती है कि ऐसे विवाद को मध्यस्थ को सौंपा जाना चाहिये।पक्षकारों के मध्य किसी विवाद किसी मध्यस्थता को सौंपने का करार मध्यस्थता करार वर्तमान के विवादों या भविष्य के...
मध्यस्थता एवं सुलह (संशोधन) अधिनियम [Arbitration and Conciliation (Amendment) Act], 2019 भाग 2: मध्यस्थता और सुलह अधिनियम से संबंधित विशेष शब्द
मध्यस्थता एवं सुलह (संशोधन) अधिनियम [Arbitration and Conciliation (Amendment) Act] के पिछले आलेख में मध्यस्थता और सुलह अधिनियम 1996 से संबंधित सामान्य परिचय प्रस्तुत किया गया था, इस आलेख में इस अधिनियम से संबंधित विशेष शब्दों का वर्णन किया जा रहा है।मध्यस्थता और सुलह अधिनियम 1996 के अंतर्गत कुछ ऐसे शब्द हैं जिन पर इस अधिनियम के अंतर्गत विशेष प्रकाश डाला गया है तथा यह शब्द अधिनियम में विशेष रूप से उपयोगी है। इस आलेख के अंतर्गत ऐसे शब्दों को विस्तारपूर्वक वर्णित किया जा रहा है। 1....
मध्यस्थता एवं सुलह (संशोधन) अधिनियम 2019 भाग: 1 सामान्य परिचय
विवादों को न्यायालय के बाहर समाप्त करने के उद्देश्य से मध्यस्थता तथा सुलह अधिनियम 1996 बनाया गय। यह अधिनियम इसके नाम से ही प्रतीत होता है कि विवादों को सुलह के माध्यम से निपटाने का प्रयास कर रहा है। इसके द्वारा मध्यस्थता के नियमों को समेकित किया गया है तथा उन्हें सूचित भी किया गया है।इस अधिनियम के पीछे मूल उद्देश्य है कि अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रीय, प्रादेशिक विवादों को सुलझाने में मध्यस्थता के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाए। यह अधिनियम अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए...
आवासीय परिसर के लिए सिक्योरिटी डिपॉजिट के रूप में केवल दो महीने का किराया; किरायेदारी की अवधि के बाद किराया बढ़ेगा: ड्राफ्ट मॉडल टेनेंसी एक्ट की मुख्य विशेषताएं
अशोक किनिकेंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को मॉडल टेनेंसी एक्ट को मंजूरी दी।अब, यह मॉडल एक्ट सभी राज्यों/ केंद्र शासित प्रदेशों को भेजा जाएगा, ताकि वे नए कानून बनाकर या मौजूदा किरायेदारी के कानूनों में उपयुक्त संशोधन करके अनुकूलन कर सकें। सरकार के अनुसार, मॉडल टेनेंसी एक्ट का उद्देश्य देश में एक जीवंत, टिकाऊ और समावेशी रेंटल हाउसिंग मार्केट बनाना है।सरकार की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है, "इससे सभी आय समूहों के लिए किराये के मकानों का पार्याप्त निर्माण हो सकेगा, जिससे बेघरों की समस्या को हल किया...
क्या चुनाव हारने वाला व्यक्ति मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त हो सकता है?
अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव जीता लिया है लेकिन पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी नंदीग्राम से चुनाव हार गईं। ममता ने कहा है कि वे राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगी।क्या चुनाव हारने वाला व्यक्ति मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त हो सकता है? इससे जुड़े संविधानिक प्रावधान कौन-कौन से हैं? इस कॉलम में इससे संबंधित कानून और मिसाल पर चर्चा किया गया है।भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164 मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति से संबंधित है।यह इस प्रकार है कि,भारतीय...
भारत का संविधान ( Constitution of India): भारत में चुनाव सुधार और समितियां
भारत में अब तक 17 आम चुनाव हो चुके हैं। वैसे तो सभी चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से बीते हैं, लेकिन कुछ चुनावों में कुछ ऐसी चीजें देखने को मिली हैं, जिससे जनता का चुनावों में आस्था कम हुआ है। चुनावों में काले धन, हिंसा, मतदान केंद्रों पर कब्जा करने की प्रवृत्तियां निरंतर बढ़ रही हैं। इसे सही समय रहते नियंत्रित करना आवश्यक है।इन्हीं सब चीजों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान चुनाव में सुधार करने का प्रयास किया। साल 1990 में दिनेश गोस्वामी की अध्यक्षता में गठित समिति ने चुनाव...
किशोर-न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 के अंतर्गत संरक्षण की आवश्यकता वाले बालक के संदर्भ में प्रावधान
किशोर न्याय अधिनियम केवल किशोरों के संबंध में उन किशोरों के लिए ही उपबंध नहीं करता है जो किसी अपराध में संलिप्त है अपितु इसमे उन बालकों को भी शामिल किया गया है जिन्हें देख रेख की आवश्यकता है। इससे संबंधित प्रावधानों को यहां इस आलेख में प्रस्तुत किया जा रहा है।चाइल्ड वेलफेयर कमेटीइस अधिनियम की धारा 29 के अंतर्गत प्रत्येक जिले के लिए, जैसा कि अधिसूचना में विहित किया जाए देख रेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बालक के कल्याण के लिए ऐसी समिति को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का निर्वहन करने के...
किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत विधि विरोधी किशोर तथा किशोर न्याय बोर्ड
किशोर न्याय अधिनियम से संबंधित पिछले आलेख में इस अधिनियम का सामान्य परिचय तथा इस अधिनियम में दिए गए विशेष शब्दों की परिभाषाओं का अध्ययन किया गया था। इस आलेख के अंतर्गत विधि विरोधी किशोर के संबंध में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया तथा किशोर न्याय बोर्ड के गठन पर चर्चा की जा रही है।किशोर न्याय बोर्डइस अधिनियम की धारा 4 किशोर न्याय बोर्ड से संबंधित धारा है। इस धारा के अंतर्गत किशोर न्याय बोर्ड का गठन किया गया है। इस धारा में विधि-विरोधी कार्यों में लिप्त किशोरों के मामलों में जाँच एवं सुनवाई आदि हेतु...
किशोर न्याय (बालकों की देख-रेख और संरक्षण) अधिनियम का परिचय और परिभाषाएं
किशोर न्याय के संबंध में भारत की संसद द्वारा बनाए गए किशोर न्याय बालकों की देखरेख और संरक्षण अधिनियम, 2000 का सामान्य परिचय इस आलेख के माध्यम से प्रस्तुत किया जा रहा है तथा इस अधिनियम के अंतर्गत दी गई विशेष शब्दों की परिभाषाओं पर टिप्पणी की जा रही है।भारतीय दंड संहिता की धारा 82 (7) वर्ष से कम आयु के शिशु के कार्य को अपराध नहीं मानती है अर्थात कोई ऐसा बालक जिसकी आयु 7 वर्ष से कम है उसके द्वारा किया गया कोई भी कार्य अपराध नहीं माना जाता है। इसी के साथ धारा 83 (7) वर्ष से ऊपर किंतु 12 वर्ष से कम...
जानिए अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम के मुख्य प्रावधान
स्वतंत्रता के बाद भारत में वेश्यावृत्ति को दंडनीय अपराध बनाया गया तथा वेश्यावृत्ति को रोकने हेतु अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956 भारत की संसद द्वारा बनाया गया। वेश्यावृत्ति या अनैतिक शारीरिक व्यापार प्राचीन व्यवसाय के रूप में अपनी पहचान रखता है। संपूर्ण विश्व में महिला एवं पुरुष वेश्या द्वारा सामाजिक पर आर्थिक मान्यताओं के कारण इस जीवन शैली के व्यवसाय को अपनाया जाता है। भौतिकता वादी जीवन शैली संपन्न आधुनिकता ने अनैतिक व्यापार की प्रवृत्ति को और भी बढ़ावा प्रदान किया है। समाज के प्रत्येक...
जानिए गर्भपात और लिंग चयन निषेध से संबंधित कानून
भारत की संसद द्वारा गर्भपात और लिंग चयन निषेध से संबंधित विस्तृत अधिनियमों का निर्माण किया गया है। गर्भ का समापन तथा भ्रूण लिंग चयन निषेध अधिनियम, दो प्रमुख अधिनियम लिंग चयन निषेध और गर्भपात से संबंधित है। इस आलेख में इन दोनों अधिनियमों का अध्ययन किया जा रहा है।एमटीपी एक्ट 1971 (गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम)भारत की संसद द्वारा बनाया गया यह अधिनियम गर्भ के समापन से संबंधित है। गर्भ का समापन एक ऐसा कार्य है जिसे गर्भपात कहा जाता है। गर्भपात का अर्थ होता है गर्भधारण की अवधि पूर्ण होने के पूर्व...
भारत का संविधान (Constitution of India): भारत में दल-बदल की राजनीति और दल-बदल कानून
भारतीय राजनीति में 'दल-बदल' काफी प्रचलित है। इसे आसान भाषा में आप कह सकते हैं कि सांसद या विधायक द्वारा एक दल (अपना दल) छोड़कर दूसरे दल में शामिल होना। जिस तरह से सासंद और विधायक अपने राजनीतिक और निजी लाभ के लिए दल बदलते रहते हैं, इसलिए राजनीति में इन्हें 'आया राम, गया राम' कहा जाता है। इस आलेख में हम दल-बदल की राजनीतिक घटनाओं और इससे जुडें कानूनों के बारे में जानेंगे।1957 से 1967 तक की अवधि में रिसर्च के अनुसार 542 बार लोगों ( सांसद/विधायक) ने अपने दल बदले। 1967 में चौथे आम चुनाव के प्रथम वर्ष...






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